87 - यमलोक के दक्षिणद्वार तथा नरकों का वर्णन

मुनियों ने पूछा - तपोधन! पापी मनुष्य दक्षिण मार्ग से यमपुरी में किस प्रकार प्रवेश करते हैं? यह हम सुनना चाहते हैं। आप विस्तारपूर्वक बतलाइये।

व्यासजी बोले - मुनिवरो! दक्षिणद्वार अत्यन्त घोर और महाभयंकर है। मैं उसका वर्णन करता हूँ।वहाँ सदा नाना प्रकार के हिंस्त्र जन्तुओं और गीदडियों के शब्द होते रहेते हैं। वहाँ दूसरों का पहुँचना असंभव है। उसे देखते ही रोंगटे खड़े हो जातेहैं। भूत, प्रेत, पिशाच और राक्षसों से यह द्वार सदा ही घिरा रहता है।पापी जीव दूरसे ही उस द्वार को देखकर त्रास से मुर्च्छित हो जाते हैं और विलाप-प्रलाप करने लगते हैं। तब यमदूत उन्हें साँकलों से बाँधकर घसीटते और निर्भय होकर डंडों से पीटते हैं। साथ ही डाँटते-फटकारते भी रहते हैं। होश में आनेपर वे खून से लथपथ हो पग-पगपर लड़खड़ाते हुए दक्षिणद्वारा को जाते हैं। मार्ग में खिन तीखे काँटे होते हैं और  कहीं छूरे की धार के समान तीक्ष्ण पत्थरोंके टुकड़े बिछे होते हैं। खिन कीचड़-ही-कीचड़ भरी रहती है और कहीं ऐसे-ऐसे गड्ढ़े होते हैं, जिनको पार करना असंभव-सा होता है। खिन-खिन लोहे की सुईके समान कीलें गाड़ी होती हैं। खिन वृक्षों से भरे हुए पर्वत होते हैं, जो किनारों पर झरने गिरते रहने से दुर्गम प्रतीत होते हैं और खिन-खिन तपे हुए अंगारे बिछे होते हैं। ऐसे मार्ग से दु:खी होकर पापी जीवों को यात्रा करनी पड़ती है। खिन दुर्गम गर्त्त, कहीं चिकने ढेले, कहीं तपायी हुई बालू और खिन तीखे काँटे होते हैं। कहीं  दावानल प्रज्वलित रहता है। कहीं तपी हुई शिला है तो कहीं जमी हुई बर्फ। खिन इतनी अधिक बालू है कि उस मार्ग से जानेवाला जीव उसमें आकण्ठ डूब जाता है।खिन दूषित जल से और खिन कंडेकी आग से वह मार्ग भरा रहता है। खिन सिंह, भेड़िये, बाघ, डाँस और भयानक कीड़े डेरा डाले रहते हैं। कहीं बड़ी-बड़ी जोंकें और अजगर पड़े रहते हैं। भयंकर मक्खियाँ, विषैले साँप और दुष्ट एवं बलोन्मत्त हाथी सताया करते हैं खुरों से मार्ग को खोदते हुए तीखे सिंगोंवाले बड़े-बड़े साँड, भैसें और मतवाले ऊँट सबको कष्ट देते हैं।भयानक डाइनो और भीषण रोगों से पीड़ित होकर जीव उस मार्ग से यात्रा करते हैं।

खिन धूलिमिश्रित प्रचण्ड वायु चलती है, जो पत्थरों की वर्षा करके निराश्रय जीवों को कष्ट पहुँचाती रहती है; खिन बिजली गिरने से शरीर विदीर्ण हो जाता है; कहीं बड़े जोर से बाणों की वर्षा होती है, जिससे सब अङ्ग छिन्न-भिन्न होजाते हैं। कहीं-कहीं बिजली की गडगडाहटके सतह भयंकर उल्कापात होते रहेते हैं और प्रज्वलित अँगारों की वर्षा हुआ करती है, जिससे जलते हुए पापी जीव आगे बढ़ते हैं। कभी जोर-जोर से धूलकी वर्षा होने के कारण शरीर भर जाता है और जीव रोने लगते हैं। मेघों  की भयंकर गर्जना से बारंबार त्रास पहुँचता रहता है। बाण वर्षा से घायल हुए शरीर पर खारे जल की धारा गिरायी जाति है और उसकी पीड़ा सहन करते हुए जीव आगे बढ़ते हैं। कहीं-कहीं अत्यन्त शीतल हवा चलने के कारण अधिक सर्दी पड़ती है तथा खिन रूखी और कठोर वायु का सामना करना पड़ता है; इससे पापी जीवों के अङ्ग-अड़्ग में बिवाई फट जाती है। वे सूखने और सिखुदने लगते हैं। ऐसे मार्ग से , जहाँ न तो राह-खर्च के लिये कुछ मिल पाता है और न कोई सहारा ही दिखायी देता है, पापी जीवों को यात्रा करनी पड़ती है। सब ओर निर्जल और दुर्गम प्रदेश दृष्टिगोचर होता है। बड़े परिश्रम से  पापी जीव यमलोकतक पहुँच पाते हैं। यमराज की आज्ञा का पालन करनेवाले भयंकर यमदूत उन्हें बलपूर्वक ले जाते हैं। वे एकाकी और पराधीन होते हैं।साथ में न कोई मित्र होता है न बन्धु। वे अपने-अपने कर्मों को सोचते हुए बारंबार रोते रहते हैं। प्रेतोंका-सा उनका शरीर होता है। उनके कण्ठ, ओठ और तालू सूखे रहते हैं। वे शरीर से अत्यन्त दुर्लब और भयभीत हो क्षुब्धाग्नि की ज्वाला से जलते रहते हैं। कोई साँकल में बंधे होते हैं। किन्हीं को उतान सुलाकर यमदूत उनके दोनों पैर पकड़कर घसीटते हैं और यमदूत उनके दोनों पैर पकड़कर घसीटते हैं और कोई  नीचे मुँह करके घसीटे जाते हैं। उस समय उन्हें अत्यन्त दु:ख होता है।उन्हें कहने के अन्न और पीने को पानी नहीं मिलता। वे भूख-प्यास से पीड़ित हो हाथ जोड़ दीनभाव से आँसू भाते हुए गद्रद वाणी में बनबार याचना करते और 'दीजिये, दीजिये' की रट लगाये रहते हैं। उनके सामने सुगन्धित पदार्थ, दही, खीर, घी, भात, सुगन्धयुक्त पेय और शीतल जल प्रस्तुत होते हैं। उन्हें देखकर वे बारंबार उनके लिये याचना करते हैं।

उस समय यमराज के दूत क्रोध में लाल आँखें करके उन्हें फटकारते हुए कठोर वाणी में कहते हैं - 'ओ पापियो! तुमने समयपर अग्निहोत्र नहीं किया, स्वयं ब्राह्मणों को दान नहीं दिया और दूसरों को भी उन्हें देते समय बलपूर्वक मना किया; उसी पापका फल तुम्हारे सामने उपस्थित हुआ है। तुम्हारा धन आग में नहीं जला था, जल में नहीं नष्ट हुआ थाम राजा ने नहीं जला था, जल में नहीं नष्ट हुआ था, राजा ने नहीं छीना था और चोरों ने नहीं चुराया था। नराधमो! तो भी तुमने जब पहले ब्राह्मणों को दान नहीं दिया है, तब इस समय तुम्हें कहाँ से कोई वस्तु प्राप्त हो सकती है। जिन साधु पुरुषों ने सात्त्विकभाव से नाना प्रकार के दान किये हैं. उन्हीं के लिए ये पर्वतों के समान अन्न के ढेर लगे दिखायी देते हैं। इनमें भक्ष्य, भोज्य, पेय, लेह्य और चेष्य- सब प्रकार के खाद्य पदार्थ हैं। तुम इन्हें पाने की इच्छा न करो, क्योंकि तुमने किसी प्रकार का दान नहीं दिया है। जिन्होंने दान, होम, यज्ञ और ब्राह्मणों का पूजन किया है, उन्हींका अन्न ले आकर सदा यहाँ जमा किया जाता है। नारकी जीवो! यह दूसरों की वस्तु हम तुम्हें कैसे दे सकते हैं।'

यमदूतों की यह बात सुनकर वे भूख-प्यास से पीड़ित जीव उस अन्न की अभिलाषा छोड़ देते हैं। तदनन्तर यमदूत उन्हें भयानक  अस्त्रों से पीड़ा देते हैं। मुद्र्र, लोहदण्ड, शक्ति, तोमर, पट्टिश, परिघ, भिन्दिपाल, गदा, फरसा और बाणों से उनकी पीठपर प्रहार किया जाता है और सामनेकी  ओरसे सिंह तथा बाघ आदि उन्हें काट खाते हैं। इस प्रकार के पापी जीव न तो भीतर प्रवेश कर पते हैं और न बाहर ही निकल पाते हैं। अत्यन्त दु:खित होकर करुणक्रन्दन किया करते हैं। इस प्रकार वहाँ भलीभाँति पीड़ा देकर यमराज के दूत उन्हें भीतर प्रवेश कराते और उस स्थानपर ले जाते हैं, जहाँ सबका संयमन (नियंत्रण) करनेवाले धरमात्मा यमराज रहते हैं। वहाँ पहुँचकर वे दूत यमराजको उन पापियों के आने की सूचना देते हैं और उनकी आज्ञा मिलनेपर उन्हें उनके सामने उपस्थित करते हैं। तब पापाचारी जीव भयानक यमराज और चित्रगुप्त को देखते हैं। यमराज उन पापियों को बड़े जोरसे फटकारते हैं और चित्रगुप्त धर्मयुक्त वचनों से पापियों को समझाते हुए कहते है- 'पापाचारी जीवो! तुमने दूसरों के धनका अपहरण किया है और अपने रूप और वीर्य के घमंड में आकार पराई स्त्रियों सतीत्व नष्ट किया है। जीव स्वयं जो कर्म करता है, उसका फल भी उन्हें स्वयं ही भोगना पड़ता है- यह जानते हुए भी तुमने अपना विनाश करने के लिये यह पापकर्म क्यों किया? अब क्यों शोक करते हो। अपने कुकर्मों से ही तुम पीड़ित हो रहे हो। तुमने अपने कर्मों द्वारा जिन दुखों का उपार्जन किया है, उन्हें भोगो। इसमें किसीका कुछ दोष नहीं है। ये जो राजालोग मेरे समीप आये हुए हैं, इन्हें भी अपने बलका घमंड था। ये अपने घोर दुष्कर्मों द्वारा यहाँ लाये गये हैं। इनकी बुद्धि बहुत ही खोटी थी।' तत्पश्चात् यमराज राजाओं की ओर दृष्टिपात करके कहते हैं- 'अरे ओ दुराचारी नरेशो! तुमलोग प्रजाका विध्वंस करनेवाले हो। थोड़े दिनों तक रहनेवाले राज्य के लिये तुमने क्यों भयंकर पाप किया? राजाओ! तुमने राज्यके लोभ, मोह, बल तथा अन्यायसे जो प्रजाओं को कठोर दण्ड दिया है, उसका यथोचित फल इस समय भोगो। कहाँ गया वह राज्य। कहाँ गयीं वे रानियाँ, जिनके लिये तुमने पापकर्म किये हैं। उन सबको छोड़कर यहाँ तुमलोग एकाकी- असहाय होकर खड़े हो। यहाँ वह सारी सेना नहीं दिखायी देती, जिसके द्वारा तुमने प्रजाका दमन किया है। इस समय यमदूत तुम्हारे अङ्ग-अङ्ग फाड़े डालते हैं। देखो तो, उस पापका अब कैसा फल मिल रहा है।'

इस प्रकार यमराज के उपालम्भयुक्त अनेक वचन सुनकर वे राजा अपने-अपने कर्मों का विचार करते हुए चुपचाप खड़े रह जाते हैं। तब उनके पापों की शुद्धि के लिए धर्मराज अपने सेवकों को इस प्रकार आज्ञा देते हैं- 'ओ चण्ड! ओ महाचण्ड! इन राजाओं को पकड़कर ले जाओ और क्रमशः नरक की अग्नि में तपाकर इन्हें पापों से मुक्त करो।' धर्मराज की आज्ञा पाते ही यमदूत राजाओं के दोनों पैर पकड़कर वेगसे घुमाते हुए उन्हें ऊपर फेंक देते हैं और फिरलौटकर उनके पापों की मात्राके अनुसार उन्हें बड़ी-बड़ी शिलाओंपर देरतक पटकते रहते हैं, मानो वज्र से किसी महान् वृक्षपर प्रहार करते हों। इससे पापी जीव का शरीर जर्जर हो जाता है। उसके प्रत्येक छिद्रसे रक्त की धारा बहने लगती है। उसकी चेतना लुप्त हो जाति है और वह हिलने-डुलने में भी असमर्थ हो जाता है। तदनन्तर शीतल वायुका स्पर्श होनेपर धीरे-धीरे पुन: वह सचेत हो उठता है। तब यमराज के दूत उसे पापों की सुद्धिके लिए नरक में डाल देते हैं। एकसे निवृत्त होनेपर वे दूसरे-दूसरे पापियों के विषयमें यमराज से निवेदन करते हैं- 'देव! आपकी आज्ञा से हम दूसरे पापी को भी ले आये हैं। यह सदा धर्म से विमुख और पापपरायण रहा है।यह दुराचारी व्याध है। इसने महापातक और उपपातक-सभी किये हैं। यह अपवित्र मनुष्य सदा दूसरे जीवों की हिंसा में संलग्न रहा है। यह जो दुष्टात्मा खड़ा है, आगम्या स्त्रियों के साथ समागम करनेवाला है, इसने दूसरे के धन का

भी अपहरण किया है। यह कन्या बेचनेवाला, झूठी गवाही देनेवाला, कृत्घन तथा मित्रों को धोखा देनेवाला है। इस दुरात्मा ने मदोन्मत्त होकर सदा धर्मकी निन्दा की है, मर्त्यलोक में केवल पापका ही आचरण किया है। देवेश्वर! इस समय इसको दण्ड देना है या इसपर अनुग्रह करना है, यह बताइये। क्योंकि आप ही निग्रहानुग्रह करनेमें  समर्थ हैं। हमलोग तो केवल आज्ञापालक हैं।'

यों निवेदन करके वे दूत पापीको यमराज के सामने उपस्थित कर देते हैं और स्वयं दूसरे पापियों को लानेके लिये चल देते हैं। जब पापीपर लगाये गये दोषकी सिद्धि हो जाति है, तब यमराज अपने भयंकर सेवकों को उन्हें दण्ड देने के लिये आदेश देते हैं। वसिष्ठ अदि महर्षियों ने जिसके लिये जो दण्ड नियत किया है, उसी के अनुसार वे यमकिंकर पापीको दण्ड प्रदान करते हैं। अङ्कुश, मुद्र्र, डंडे, आरे, शक्ति, तोमर, खड्ग और शूलों के  प्रहार से पापियों को विदीर्ण कर डालते हैं। अब नरकों के भयंकर स्वरुप का वर्णन सुनो।

महावीचि नामक नरक रक्स्त से भरा रहता है। उसमें वज्रके समान काँटे होते हैं। उसका विस्तार दस हजार योजन है। उसमें डूबा हुआ पापी जीव काँटों में बिंधकर अत्यन्त कष्ट भोगते है। गौओंका वध करनेवाला मनुष्य उस भयंकर नरक में एक लाख वर्षोंतक निवास करता है। कुम्भीपाकका विस्तार सौलाख योजन है। वह अत्यन्त भयंकर नरक है। वहाँ की  भूमि तपाये हुए ताँबे के घड़ों से भरी रहने के कारण अत्यन्त प्रज्वलित दिखायी देती है। वहाँ गरम-गरम बालू और अँगारें बिछे होते हैं। ब्राह्मण की हत्या तथा पृथ्वी का अपहरण करनेवाले और धरोहर को हड़प लेनेवाले पापी उस नरक में डालकर प्रलयकाल तक जलाए जाते हैं। तदनन्तर रौरव नमक नरक है, जो प्रज्वलित वज्रमय बाणों से व्याप्त रहता है।उसका विस्तार साथ हजार योजनका है। उस नरक में गिराये हुए मनुष्य जलते हुए बाणों से बिंधकर यातना भोगते हैं। झूठी गवाही देनेवाले मनुष्य उसमें ईखकी भाँति परे जाते हैं। उसके बाद मञ्जूष नामक नरक है, जो लोहे से बना हुआ है। वह सदा प्रज्वलित रहता है।उसमें वे ही डालकर जलाये जाते हैं, जो दूसरों को निरपराध बंदी बनाते हैं।अप्रतिष्ठित नामक नरक पीब, मूत्र और विष्ठा का भण्डार है। उसमें ब्राह्मण को पीड़ा देनेवाला पापी नीचे मुँह करके गिराया जाता है। विलेपक नामक घोर नरक लाहकी एजी से जलता रहता है। उसमें मदिरा पानेवाले द्विज डालकर जलाये जाते हैं। महाप्रभ नाम से विख्यात नरक बहुत ऊँचा है। उसमें चमकता हुआ शूल  गडा होता है। जो लोग पति-पत्नी में भेद डालते हैं, उन्हें वहीं शूल से छेदा जाता है, जहाँ लोहे की बहुत बड़ी चट्टान पड़ी रहती है। परायी स्त्रियों के साथ सम्भोग करनेवाले मनुष्य उसी के नीचे दबाये जाते हैं। शाल्मय नरक  जलते हुए सुदृढ़ काँटों से व्याप्त है। जो स्त्री अनेक पुरुषों के साथ सम्भोग करती है, उसे उस शाल्मल नामक वृक्ष का आलिङ्गन करना पड़ता है। उस समय वह पीड़ा से व्याकुल हो उठती है। जो लोग सदा झूठ बोलते और दूसरों के मर्म को चोट पहुंचानेवाली वाणी मुँहसे निकालते हैं, मृत्यु के बाद उनकी जिह्वा यमदूतों द्वारा काट ली जाति है।जो आसक्ति के साथ कटाक्ष पूर्ण परायी स्त्रीकी ओर देखते हैं, यमराज के दूत बाण मारकर उनकी आँखें फोड़ देते हैं। जो लोग माता, बहिन, कन्या और पुत्रवधू के साथ समागम तथा स्त्री, बालक और बूढोंकी हत्या करते हैं, उनकी भी यही दशा होती है; वे चौदह इन्द्रों की आयुपर्यन्त नरक-यातना में पड़े रहते हैं। महारौरव नमक नार्क ज्वालाओंसे परिपूर्ण तथा अत्यन्त भयंकर है, उसका विष्टार चौदह हजार योजन है। जो मूढ़ नगर, गाँवम घर अथवा खेत में  आग लगते हैं, वे एक कल्पतक उस नरक में पकाये जाते हैं। तामिस्त्र नरकका विस्तार एक लाख योजन है। वहाँ सदा खड्ग, पट्टिश और मुद्र्रोंकी मार पड़ती रहती है। इससे वह बड़ा भयंकर जान पड़ता है। यमराज के दूत चोरों को उसी में डालकर शूल, शक्ति, गदा और खड्ग से उन्हें तीन सौ कल्पों तक पीटते रहते हैं। महातामिस्त्र नामक नरक और भी दु:खदायी है। उसका विस्तार तामिस्त्र की अपेक्षा दूना है। उसमें जोंकें भरी हुई है और निरंतर अन्धकार छाया रहता है। जो माता, पिता और मित्र की हत्या करनेवाले तथा विश्वघाटी हैं, वे जबतक यह पृथ्वी रहती है, तबतक उसमें पड़े रहते हैं और जोंकें निरंतर उनका रक्त चूसती रहती हैं। असिपत्रवन नामक नरक तो बहुत ही कष्ट देनेवाला है। उसका विस्तार दस हजार योजन है। उसमें अग्नि के समान प्रज्वलित खड्ग पत्तों के रूप में व्याप्त है। वहाँ गिराया हुआ पापी खड्गकी धार के समान पत्तों द्वारा क्षत-विक्षत हो जाता है। उसके शरीर में सैकड़ों घाव हो जाते हैं। मित्रघाती मनुष्य उस्मने एक कल्पतक रखकर काटा जाता है। करम्भबालुका नामक नरक दस हजार योजन विस्तीर्ण है। उसका आकार कुएँकी तरह है। उसमें जलती हुई बालू, अंगारे और काँटे भरे हुए हैं।जो भयंकर उपायों द्वारा किसी मनुष्य को जला देता है, वह उक्त नरक में एक लाख दस हजार तीन सौ वर्षों तक जलाया और विदीर्ण किया जाता है।

काकोल नमक नरक कीड़ों और पीबसे भरा रहता है। जो दुष्टात्मा  मानव दूसरों को न देकर अकेला ही मिष्टान्न उड़ाता है, वह उसी में गिराया जाता है। कुड्मल नरक विष्ठा, मूत्र और रक्त से भरा होता है। जो लोग पञ्चयज्ञों का अनुष्ठान नहीं करते, वे उसी में गिराये जाते हैं। महाभीम नरक अत्यन्त दुर्गन्धयुक्त मांस व रक्त से पूर्ण है। अभक्ष्य-भक्षण करनेवाले नीच मनुष्य उसमें गिरते हैं। महावट नरक मुर्दों से भरा होता है।वह बहुत-से कीटों-से व्याप्त रहता है। जो मनुष्य अपनी कन्या बेचता है, वह नीचे मुँह करके उसमें गिराया जाता है। तिलपाक नाम से प्रसिद्ध नरक बहुत ही भयंकर बताया गया है। जो लोग दूसरों को पीड़ा देते हैं, वे उसमें तिलकी भाँति परे जाते हैं। तैलपाक नरक में खौलता हुआ तेल भूमिपर बहता रहता है। जो मित्रों तथा शरणागतों की हत्या करते हैं, वे उसीमें पकाये जाते हैं। वज्रकपाट नरक वज्रमयी  श्र्ङ्खला से व्याप्त रहता है। जिन लोगों ने दूध बेचनेका व्यवसाय किया है, उन्हें वहाँ निर्दयतापूर्वक पीड़ा दी जाती है। निरूच्छ्वास नरक अन्धकार से पूर्र्ण और वायु से रहित होता है। जो ब्राह्मण को दिए जानेवाले दान में रुकावट डालता है, वह निश्चेष्ट करके उसमें डाल दिया जाता है। अङ्गारोपचय नामक नरक दहकते हुए अँगारों से प्रज्वलित रहता है। जो लोग देनेकी प्रतिज्ञा करके भी ब्राह्मणको दान नहीं देते, वे उसी में जलाये जाते हैं। महापायी नरकका विस्तार एक लाख योजन है। जो सदा असत्य बोला करते हैं, उन्हें नीचे मुख करके उसी में डाल दिया जाता है। महाज्वाल नामक नरक सदा आगकी लपटों से प्रकाशित एवं  भयंकर होता है। जो मनुष्य पाप में मन लगाते हैं, उन्हें दीर्घकालतक उसी में जलाया जाता हैव क्रकच नामक नरक में वज्रकी धार की समान तीखे आरे लगे होते हैं। उसमें अगम्या स्त्रीके साथ समागम करनेवाले मनुष्यों को उन्हीं आरोनसे चीरा जाता है। गुड़पाक नरक खौलते हुए गुडके अनेक कुण्डों से व्याप्त है।जो मनुष्य वर्णसंकरता फैलाता है, वह उसी में डालकर जलाया जाता है।*

क्षुरधार नामक नरक तीखे उस्त्रों से भरा रहता है। जो लोग ब्राह्मणों की भूमि हड़प लेते हैं, वे एक कल्पतक उसी में डालकर काटे जाते हैं। अम्बरीष नामक नरक प्रलयाग्नि के समान प्रज्वलित रहता है। सुवर्ण की चोरी करनेवाला मनुष्य करोड़ कल्पोंतक उसमें दग्ध किया जाता है। वज्रकुठार नमक नरक वज्रसे व्याप्त है। पेड़ काटनेवाले पापी मनुष्य उसी में डालकर काटे जाते हैं। परिताप नामक नरक भी प्रलययाग्नि से उद्दीप्त रहता है। विष देने तथा मधुकी चोरी करनेवाला पापी उसी में यातना भोगता है। कालसूत्र नरक वज्रमय सूतसे निर्मित है।जो लोग दूसरों की खेती नष्ट करते हैं, वे उसी में घुमाए जाते हैं, जिससे उनका अङ्ग छिन्न-भिन्न हो जाता है। कश्मल नरक मुख और नाक के मलसे भरा होता है। मानस की रूचि रखनेवाला मनुष्य उसमें एक कल्पतक रखा जाता है। उग्रगन्ध नमक नरक लार, मूत्र और विष्ठा से भरा होता है।जो पितरों को पिण्ड नहीं देते, वे उसे नरक में साले जाते हैं। दुर्धर नरक जोंकों और बिच्छुओं सेभरा रहता है। सूदखोर मनुष्य उसमें दस हजार वर्षोतक पड़ा रहता है। वज्रमहापीड नमक नरक वज्रसे ही निर्मित है। जो दूसरों के धन-धान्य और सुवर्ण की चोरी करते हैं, उन्हें उसी में डालकर यातना दी जाती है। यमदूत उन चोरों को छुरोंसे क्षण-क्षणपर काटते रहते हैं।जो मुर्ख किसी प्राणी की हत्या करके उसे कौए और गृध्रकी भाँति खाते हैं, उन्हें एक कल्पतक अपने ही शरीर का मांस खाना पड़ता है।जो दूसरों के आसन, शय्या और वस्त्रका अपहरण करते हैं, उन्हें यमदूत शक्ति और तोमरों से विदीर्ण करते हैं। जिन खोटी बुद्धिवाले पुरुषों ने लोगों के फल अथवा पत्ते भी चुराए हैं, उन्हें क्रोध में भरे हुए यमदूत तुनकों की आग में जला डालते हैं। जो मनुष्य पराये धन और पराई स्त्रीके प्रति सदा दूषित भाव रखता है, यमदूत उसकी छाती में जलता हुआ शूल गाड़ देते  हैं। जो मानव मन, वाणी और क्रियाद्वारा धरम से विमुख रहते हैं, उन्हें यमलोक में बड़ी भयंकर यातना भोगनी पड़ती है।इस प्रकार लाखों, करोड़ो और अरबों नरक हैं, जहाँ पापी मनुष्य अपने कर्मों का फल भोगते हैं।इस लोक में थोडा-सा भी पापकर्म करनेपर यमलोक में भयंकर नरक के भीतर घोर यातना सहनी पड़ती है। मूढ़ मनुष्य साढू पुरुषों द्वारा बताये हुए धर्मयुक्त वचनों को नहीं सुनते। जब कोई उनसे परलोक की चर्चा करता है, तब वे झट यही उत्तर देते हैं- किसने स्वर्ग और नरक को प्रत्यक्ष देखा है। ऐसे लोग दिन-रात प्रयत्नपूर्वक पाप करते हैं। श्रमका आचरण तो वे भूलकर भी नहीं करते। इस प्रकार जो इसी लोक में कर्मों के फलका भोग होना मानते हैं, परलोकके प्रति जिनकी तनिक भी आस्था नहीं है, ऐसे नराधम भयंकर नरकों में पड़ते हैं। नरकका निवास अत्यन्त दु:खदाई और स्वर्गवास सुख देनेवाला है। मनुष्य शुभकर्म करनेसे स्वर्ग पाते हैं और अशुभकर्म करके नरकों में पड़ते हैं।

* नरकं गुडपाकेति ज्वलदुडह्यदैर्वृतम् ॥ निक्षिप्तो दह्यते तस्मिन् वर्णसंकरकृत्रर: ।

(२१५।१२१ - १२२)