व्यासजी कहते हैं – जिस प्रकार दुर्बल मनुष्य पानीके वेगमें बह जाता है , उसी प्रकार निर्बल योगी विषयोंसे विचलित हो जाता है । किंतु उसी महान् प्रवाहको जैसे हाथी रोक देता है , वैसे योगका महान् बल पाकर योगी भी समस्त विषयोंको रोक लेता है , उनके द्वारा विचलित नहीं होता । योगशक्तिसम्पन्न पुरुष स्वतन्त्रतापूर्वक समस्त प्रजापतियों , मनुओं तथा महाभूतोंमें प्रवेश कर जाते हैं । अमित तेजस्वी योगीके ऊपर क्रोधमें भरे हुए यमराज , काल और भयंकर पराक्रम दिखानेवाली मृत्युका भी जोर नहीं चलता । वह योगबल पाकर अपने हजारों रूप बना सकता और उन सबके द्वारा इस पृथ्वीपर विचर सकता है । फिर तेजको समेट लेनेवाले सूर्यकी भाँति वह उन सभी रूपोंको अपनेमें लीन करके उग्र तपस्यामें प्रवृत्त हो जाता है । बलवान् योगी बन्धन तोड़नेमें समर्थ होता है। उसमें अपनेको मुक्त करनेकी पूर्ण शक्ति होती है। द्विजवरो ! ये मैंने योगकी स्थूल शक्तियाँ बतायी हैं । अब दृष्टान्तके लिये योगसे प्राप्त होनेवाली कुछ सूक्ष्म शक्तियों का वर्णन करूँगा तथा आत्म समाधिके लिये जो चित्तकी धारणा की जाती है , उसके विषयमें भी कुछ सूक्ष्म दृष्टान्त बतलाऊँगा । जिस प्रकार सदा सावधान रहनेवाला धनुर्धर वीर चित्तको एकाग्र करके प्रहार करनेपर लक्ष्यको वेध देता है , उसी प्रकार जो योगी मनको परमात्माके ध्यानमें लगा देता है , वह निःसंदेह मोक्ष प्राप्त कर लेता है । जैसे सावधान मल्लाह समुद्रमें पड़ी हुई नावको शीघ्र ही किनारे लगा देता है , उसी प्रकार योगके अनुसार तत्त्वको जाननेवाला पुरुष समाधिके द्वारा मनको परमात्मामें लगाकर देहका त्याग करनेके अनन्तर दुर्गम स्थान ( परम धाम )-को प्राप्त होता है । जिस प्रकार सावधान सारथि अच्छे घोड़ोंको रथमें जोतकर धनुर्धर श्रेष्ठ वीरको तुरंत अभीष्ट स्थानपर पहुँचा देता है , वैसे ही धारणाओंमें चित्तको एकाग्र करनेवाला योगी लक्ष्यकी ओर छूटे हुए बाणकी भाँति शीघ्र परम पदको प्राप्त कर लेता है । जो समाधिके द्वारा अपने आत्माको परमात्मामें लगाकर स्थिर भावसे बैठा रहता है , उसे अजर ( बुढ़ापेसे रहित ) पदकी प्राप्ति होती है । योगके महान् व्रतमें एकाग्रचित्त रहनेवाला जो योगी नाभि , कण्ठ , पार्श्वभाग , हृदय , वक्षःस्थल , नाक , कान , नेत्र और मस्तक आदि स्थानों में धारणाके द्वारा आत्माको परमात्माके साथ युक्त करता है , वह पर्वतके समान महान् शुभाशुभ कर्मोंको भी शीघ्र ही भस्म कर डालता है और इच्छा करते ही उत्तम योगका आश्रय ले मुक्त हो जाता है । निर्मल अन्तःकरणवाले यति परमात्माको प्राप्त करके तद्रूप हो जाते हैं । उन्हें अमृतत्व मिल जाता है , फिर वे संसारमें नहीं लौटते । ब्राह्मणो ! यही परम गति है । जो सब प्रकारके द्वन्द्वोंसे रहित , सत्यवादी , सरल तथा सम्पूर्ण प्राणियोंपर दया करनेवाले हैं , उन महात्माओंको ही ऐसी गति प्राप्त होती है ।
मुनि बोले – साधुशिरोमणे ! दृढ़तापूर्वक व्रतका पालन करनेवाले यति उत्तम स्थानस्वरूप भगवान्को प्राप्त होकर क्या निरन्तर उन्हींमें रमण करते रहते हैं ? अथवा ऐसी बात नहीं है ? यहाँ जो तथ्य हो , उसका यथावत् वर्णन कीजिये आपके सिवा दूसरे किसीसे हम ऐसा प्रश्न नहीं कर सकते ।
व्यासजीने कहा- मुनिवरो ! आपने जो प्रश्न किया है , वह उचित ही है । यह विषय बहुत ही कठिन है । इसमें विद्वानों को भी मोह हो जाता है । यहाँ भी जो परम तत्त्वकी बात है , उसे बतलाता हूँ ; सुनो । इस विषयमें कपिलके सांख्यमका अनुसरण करनेवाले महात्माओंका विचार उत्तम माना गया है । देहधारियोंकी इन्द्रियाँ भी अपने सूक्ष्म शरीरको जानती हैं ; क्योंकि वे आत्माके करण हैं और आत्मा भी उनके द्वारा सब कुछ देखता है । आत्मासे सम्बन्ध न रहनेपर वे काठ और दीवारकी भाँति जड़मात्र हैं तथा महासागर में उसके तटकी भूमिकी भाँति नष्ट हो जाती हैं । विप्रवरो ! जब इन्द्रियोंके साथ देहधारी जीव सो जाता है , तब उसका सूक्ष्म शरीर आकाशमें वायुकी भाँति सर्वत्र विचरता रहता है । वह यथायोग्य वस्तुओं को देखता , स्मरण करता , छूता और पहलेकी ही भाँति उन सबका अनुभव करता है । सम्पूर्ण इन्द्रियाँ स्वयं असमर्थ होनेके कारण विषके द्वारा मारे हुए सर्पोंकी भाँति अपने - अपने गोलकोंमें विलीन रहती हैं । उनकी सूक्ष्म गतिका आश्रय लेकर निश्चय ही आत्मा सर्वत्र विचरता है । सत्त्व , रज , तम , बुद्धि , मन , आकाश , वायु , तेज , जल और पृथ्वी – इन सबके गुणोंको व्याप्त करके क्षेत्रज्ञ आत्मा सम्पूर्ण क्षेत्रों में विचरण करता है । जैसे शिष्य महात्मा गुरुका अनुसरण करते हैं , उसी प्रकार इन्द्रियाँ क्षेत्रज्ञ आत्माका अनुसरण करती हैं । सांख्ययोगी प्रकृतिका भी अतिक्रमण करके शुद्ध , सूक्ष्म , परात्पर , निर्विकार , समस्त पापोंसे रहित , अनामय , निर्गुण तथा आनन्दमय परमात्मा श्रीनारायणको प्राप्त होते हैं । विप्रवरो ! इस ज्ञानके समान दूसरा कोई ज्ञान नहीं है । इसके विषयमें तुमको संदेह नहीं करना चाहिये । सांख्यज्ञान सबसे उत्कृष्ट माना गया है । इसमें अक्षर , ध्रुव एवं पूर्ण सनातन ब्रह्मका ही प्रतिपादन हुआ है । वह ब्रह्म आदि , मध्य और अन्तसे रहित , द्वन्द्वोंसे अतीत , सनातन , कूटस्थ और नित्य है- ऐसा शान्तिपरायण विद्वान् पुरुषोंका कथन है । इसीसे जगत्की उत्पत्ति और प्रलय आदिरूप सम्पूर्ण विकार होते हैं । गूढ़ तत्त्वोंकी व्याख्या करनेवाले महर्षियोंने शास्त्रों में ऐसा ही वर्णन किया है । सम्पूर्ण ब्राह्मण , देवता , वेद तथा सामवेत्ता पुरुष उसी अनन्त , अच्युत , ब्राह्मणभक्त तथा परमदेव परमेश्वरकी प्रार्थना करते और उनके गुणोंका चिन्तन करते रहते हैं । ब्राह्मणो ! महात्मा पुरुषोंमें , वेदोंमें , सांख्य और योगमें तथा पुराणोंमें जो उत्तम ज्ञान देखा गया है , वह सब सांख्यसे ही आया हुआ है । बड़े - बड़े इतिहासोंमें , यथार्थ तत्त्वका वर्णन करनेवाले शास्त्रों में तथा इस लोकमें जो कुछ भी ज्ञान श्रेष्ठ पुरुषोंके देखनेमें आया है , वह सब सांख्यसे ही प्राप्त हुआ है । पूर्ण दृष्टि , उत्तम बल , ज्ञान , मोक्ष तथा सूक्ष्म तप आदि जितने भी विषय बताये गये हैं , उन सबका सांख्यशास्त्रमें यथावत् वर्णन किया गया है । सांख्यज्ञानी सदा सुखपूर्वक कल्याणमय ब्रह्मको प्राप्त होते हैं । उस ज्ञानको धारण करके भी मनुष्य कृतार्थ हो जाते हैं । सांख्यका ज्ञान अत्यन्त विशाल और परम प्राचीन है । यह महासागरके समान अगाध , निर्मल और उदार भावोंसे पूर्ण है । इस अप्रमेय ज्ञानको भगवान् नारायण ही पूर्णरूपसे धारण करते हैं । मुनिवरो ! यह मैंने तुमसे परम तत्त्वका वर्णन किया । यह सम्पूर्ण पुरातन विश्व भगवान् नारायणसे ही प्रकट हुआ है । वे ही सृष्टिके समय संसारकी सृष्टि और संहारकालमें उसका संहार करते हैं ।
Summary of chapter 101 of the [[BOOK_TITLE]] is as follows:
Ominous signs of the coming end of the Yādava clan appear — the divine conch and weapons behave ominously, the city of Dvārakā is troubled by bad portents. Sensing the approach of the end of his earthly mission, Śrī Kṛṣṇa prepares the Yādavas for what is to come. The chapter narrates the final period of Kṛṣṇa's earthly sojourn and the portents signaling the conclusion of the divine avatāra's work on earth.