ब्रह्म पुराण

103 - योग और सांख्यका संक्षिप्त वर्णन

व्यासजी कहते हैं – जिस प्रकार दुर्बल मनुष्य पानीके वेगमें बह जाता है , उसी प्रकार निर्बल योगी विषयोंसे विचलित हो जाता है । किंतु उसी महान् प्रवाहको जैसे हाथी रोक देता है , वैसे योगका महान् बल पाकर योगी भी समस्त विषयोंको रोक लेता है , उनके द्वारा विचलित नहीं होता । योगशक्तिसम्पन्न पुरुष स्वतन्त्रतापूर्वक समस्त प्रजापतियों , मनुओं तथा महाभूतोंमें प्रवेश कर जाते हैं । अमित तेजस्वी योगीके ऊपर क्रोधमें भरे हुए यमराज , काल और भयंकर पराक्रम दिखानेवाली मृत्युका भी जोर नहीं चलता । वह योगबल पाकर अपने हजारों रूप बना सकता और उन सबके द्वारा इस पृथ्वीपर विचर सकता है । फिर तेजको समेट लेनेवाले सूर्यकी भाँति वह उन सभी रूपोंको अपनेमें लीन करके उग्र तपस्यामें प्रवृत्त हो जाता है । बलवान् योगी बन्धन तोड़नेमें समर्थ होता है। उसमें अपनेको मुक्त करनेकी पूर्ण शक्ति होती है। द्विजवरो ! ये मैंने योगकी स्थूल शक्तियाँ बतायी हैं । अब दृष्टान्तके लिये योगसे प्राप्त होनेवाली कुछ सूक्ष्म शक्तियों का वर्णन करूँगा तथा आत्म समाधिके लिये जो चित्तकी धारणा की जाती है , उसके विषयमें भी कुछ सूक्ष्म दृष्टान्त बतलाऊँगा । जिस प्रकार सदा सावधान रहनेवाला धनुर्धर वीर चित्तको एकाग्र करके प्रहार करनेपर लक्ष्यको वेध देता है , उसी प्रकार जो योगी मनको परमात्माके ध्यानमें लगा देता है , वह निःसंदेह मोक्ष प्राप्त कर लेता है । जैसे सावधान मल्लाह समुद्रमें पड़ी हुई नावको शीघ्र ही किनारे लगा देता है , उसी प्रकार योगके अनुसार तत्त्वको जाननेवाला पुरुष समाधिके द्वारा मनको परमात्मामें लगाकर देहका त्याग करनेके अनन्तर दुर्गम स्थान ( परम धाम )-को प्राप्त होता है । जिस प्रकार सावधान सारथि अच्छे घोड़ोंको  रथमें जोतकर धनुर्धर श्रेष्ठ वीरको तुरंत अभीष्ट  स्थानपर पहुँचा देता है , वैसे ही धारणाओंमें चित्तको  एकाग्र करनेवाला योगी लक्ष्यकी ओर छूटे हुए बाणकी भाँति शीघ्र परम पदको प्राप्त कर लेता है । जो समाधिके द्वारा अपने आत्माको परमात्मामें लगाकर स्थिर भावसे बैठा रहता है , उसे अजर ( बुढ़ापेसे रहित ) पदकी प्राप्ति होती है । योगके महान् व्रतमें एकाग्रचित्त रहनेवाला जो योगी नाभि , कण्ठ , पार्श्वभाग , हृदय , वक्षःस्थल , नाक , कान , नेत्र और मस्तक आदि स्थानों में धारणाके द्वारा आत्माको परमात्माके साथ युक्त करता है , वह  पर्वतके समान महान् शुभाशुभ कर्मोंको भी शीघ्र ही भस्म कर डालता है और इच्छा करते ही उत्तम योगका आश्रय ले मुक्त हो जाता है । निर्मल अन्तःकरणवाले यति परमात्माको प्राप्त करके तद्रूप हो जाते हैं । उन्हें अमृतत्व मिल जाता है , फिर वे संसारमें नहीं लौटते । ब्राह्मणो ! यही परम गति है । जो सब प्रकारके द्वन्द्वोंसे रहित , सत्यवादी , सरल तथा सम्पूर्ण प्राणियोंपर दया करनेवाले हैं , उन महात्माओंको ही ऐसी गति प्राप्त होती है ।

मुनि बोले – साधुशिरोमणे ! दृढ़तापूर्वक व्रतका पालन करनेवाले यति उत्तम स्थानस्वरूप भगवान्को प्राप्त होकर क्या निरन्तर उन्हींमें रमण करते रहते हैं ? अथवा ऐसी बात नहीं है ? यहाँ जो तथ्य हो , उसका यथावत् वर्णन कीजिये आपके सिवा दूसरे किसीसे हम ऐसा प्रश्न नहीं कर सकते ।

व्यासजीने कहा- मुनिवरो ! आपने जो प्रश्न किया है , वह उचित ही है । यह विषय बहुत ही कठिन है । इसमें विद्वानों को भी मोह हो जाता है । यहाँ भी जो परम तत्त्वकी बात है , उसे बतलाता हूँ ; सुनो । इस विषयमें कपिलके सांख्यमका अनुसरण करनेवाले महात्माओंका विचार उत्तम माना गया है । देहधारियोंकी इन्द्रियाँ भी अपने सूक्ष्म शरीरको जानती हैं ; क्योंकि वे आत्माके करण हैं और आत्मा भी उनके द्वारा सब कुछ देखता है । आत्मासे सम्बन्ध न रहनेपर वे काठ और दीवारकी भाँति जड़मात्र हैं तथा महासागर में उसके तटकी भूमिकी भाँति नष्ट हो जाती हैं । विप्रवरो ! जब इन्द्रियोंके साथ देहधारी जीव सो जाता है , तब उसका सूक्ष्म शरीर आकाशमें वायुकी भाँति सर्वत्र विचरता रहता है । वह यथायोग्य वस्तुओं को देखता , स्मरण करता , छूता और पहलेकी ही भाँति उन सबका अनुभव करता है । सम्पूर्ण इन्द्रियाँ स्वयं असमर्थ होनेके कारण विषके द्वारा मारे हुए सर्पोंकी भाँति अपने - अपने गोलकोंमें विलीन रहती हैं । उनकी सूक्ष्म गतिका आश्रय लेकर निश्चय ही आत्मा सर्वत्र विचरता है । सत्त्व , रज , तम , बुद्धि , मन , आकाश , वायु , तेज , जल और पृथ्वी – इन सबके गुणोंको व्याप्त करके क्षेत्रज्ञ आत्मा सम्पूर्ण क्षेत्रों में विचरण करता है । जैसे शिष्य महात्मा गुरुका अनुसरण करते हैं , उसी प्रकार इन्द्रियाँ क्षेत्रज्ञ आत्माका अनुसरण करती हैं । सांख्ययोगी प्रकृतिका भी अतिक्रमण करके शुद्ध , सूक्ष्म , परात्पर , निर्विकार , समस्त पापोंसे रहित , अनामय , निर्गुण तथा आनन्दमय परमात्मा श्रीनारायणको प्राप्त होते हैं । विप्रवरो ! इस ज्ञानके समान दूसरा कोई ज्ञान नहीं है । इसके विषयमें तुमको संदेह नहीं करना चाहिये । सांख्यज्ञान सबसे उत्कृष्ट माना गया है । इसमें अक्षर , ध्रुव एवं पूर्ण सनातन ब्रह्मका ही प्रतिपादन हुआ है । वह ब्रह्म आदि , मध्य और अन्तसे रहित , द्वन्द्वोंसे अतीत , सनातन , कूटस्थ और नित्य है- ऐसा शान्तिपरायण विद्वान् पुरुषोंका कथन है । इसीसे जगत्की उत्पत्ति और प्रलय आदिरूप सम्पूर्ण विकार होते हैं । गूढ़ तत्त्वोंकी व्याख्या करनेवाले महर्षियोंने शास्त्रों में ऐसा ही वर्णन किया है । सम्पूर्ण ब्राह्मण , देवता , वेद तथा सामवेत्ता पुरुष उसी अनन्त , अच्युत ,  ब्राह्मणभक्त तथा परमदेव परमेश्वरकी प्रार्थना करते और उनके गुणोंका चिन्तन करते रहते हैं । ब्राह्मणो ! महात्मा पुरुषोंमें , वेदोंमें , सांख्य और  योगमें तथा पुराणोंमें जो उत्तम ज्ञान देखा गया है , वह सब सांख्यसे ही आया हुआ है । बड़े - बड़े इतिहासोंमें , यथार्थ तत्त्वका वर्णन करनेवाले शास्त्रों में तथा इस लोकमें जो कुछ भी ज्ञान श्रेष्ठ पुरुषोंके देखनेमें आया है , वह सब सांख्यसे ही प्राप्त हुआ है । पूर्ण दृष्टि , उत्तम बल , ज्ञान , मोक्ष तथा सूक्ष्म तप आदि जितने भी विषय बताये गये हैं , उन सबका सांख्यशास्त्रमें यथावत् वर्णन किया गया है । सांख्यज्ञानी सदा सुखपूर्वक कल्याणमय ब्रह्मको प्राप्त होते हैं । उस ज्ञानको धारण करके भी मनुष्य कृतार्थ हो जाते हैं । सांख्यका ज्ञान अत्यन्त विशाल और परम प्राचीन है । यह महासागरके समान अगाध , निर्मल और उदार भावोंसे पूर्ण है । इस अप्रमेय ज्ञानको भगवान् नारायण ही पूर्णरूपसे धारण करते हैं । मुनिवरो ! यह मैंने तुमसे परम तत्त्वका वर्णन किया । यह सम्पूर्ण पुरातन विश्व भगवान् नारायणसे ही प्रकट हुआ है । वे ही सृष्टिके समय संसारकी सृष्टि और संहारकालमें उसका संहार करते हैं ।