104 - क्षर-अक्षर तत्त्वके विषयमें राजा करालजनक और वसिष्ठका संवाद

मुनियोंने पूछा- महामुने ! वह अक्षर - तत्त्व  क्या है , जिसको प्राप्त कर लेनेपर जीव पुनः इस संसारमें नहीं आता ? तथा क्षर पदार्थ क्या है , जिसको जाननेपर भी आवागमन बना रहता है ? क्षर और अक्षरके स्वरूपको स्पष्टरूपसे जाननेके लिये हम आपसे यह प्रश्न करते हैं ।

 व्यासजीने कहा- मुनिवरो ! इस विषयमें राजा करालजनक और वसिष्ठके संवादरूप एक प्राचीन इतिहासका वर्णन करता हूँ । एक समयकी बात है , सूर्यके समान तेजस्वी मुनिवर वसिष्ठ अपने आश्रमपर विराजमान थे । वे परमात्मतत्त्वके प्रतिपादनमें कुशल थे । उन्हें अध्यात्मतत्त्वका निश्चयात्मक ज्ञान था । उस समय राजा करालजनकने उस आश्रमपर पहुँचकर वसिष्ठजीको हाथ जोड़कर प्रणाम किया और विनययुक्त मधुरवाणीमें  कहा — ' भगवन् ! जहाँसे ज्ञानी पुरुषोंको पुनः इस संसारमें नहीं आना पड़ता , उस सनातन ब्रह्मके स्वरूपका मैं वर्णन सुनना चाहता हूँ । इसके सिवा जो क्षर कहा गया है , उसका तथा जिसमें इस जगत्का लय होता है , उस अनामय , कल्याणमय , अक्षरतत्त्वका भी ज्ञान प्राप्त करना चाहता अतः आप इस विषयका उपदेश करें । '

 वसिष्ठजीने कहा- राजन् ! सुनो । जिस प्रकार इस जगत्का क्षरण ( लय ) होता है , उसको तथा जिसमें इसका लय होता है , उस अक्षरको भी बतलाता हूँ । देवताओंके बारह हजार वर्षोंका एक चतुर्युग होता है । एक हजार चतुर्युगको ब्रह्माका एक दिन कहते हैं । इसीको कल्प समझो । दिनके ही बराबर ब्रह्माजीकी रात्रि भी होती है , जिसके अन्तमें वे सोकर उठते हैं और इस विशाल विश्वकी सृष्टि करते हैं । वे यद्यपि निराकार हैं तो भी साकार जगत्की रचना करते हैं । उनमें अणिमा , लघिमा तथा प्राप्ति आदि शक्तियोंका स्वाभाविक निवास है । वे अविनाशी ज्योतिर्मय परमेश्वर हैं । उनके सब ओर हाथ - पैर हैं , सब ओर नेत्र , मस्तक और मुख हैं तथा सब ओर कान हैं । वे संसारमें सबको व्याप्त करके स्थित हैं । वे ही भगवान् हिरण्यगर्भ हैं । वे ही योगशास्त्रमें महान् और विरञ्चि आदि नामोंसे प्रसिद्ध हैं तथा सांख्यशास्त्रमें भी उनका अनेकों नामोंसे वर्णन आता है । उनके नाना प्रकारके अनेक अद्भुत रूप  हैं । वे विश्वके आत्मा और एकाक्षर कहे गये हैं । उन्होंने सम्पूर्ण त्रिलोकीको स्वयं ही धारण कर  रखा है तथा वे बहुत से रूप धारण करने के  कारण विश्वरूप नामसे प्रसिद्ध हैं । वे महातेजस्वी  भगवान् अपनी शक्तिसे महत्तत्त्वकी सृष्टि करके फिर अहंकार और उसके अभिमानी देवता प्रजापतिको उत्पन्न करते हैं । राजस , तामस और सात्त्विक भेदसे तीन प्रकारके अहंकारोंसे आकाश , वायु , तेज , जल और पृथ्वी- ये पाँच महाभूत तथा शब्द , स्पर्श , रूप , रस और गन्ध- ये पाँच विषय तथा कान , त्वचा , नेत्र , जिह्वा और नासिका - ये पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ तथा वाणी , हाथ , पैर , गुदा और लिङ्ग - ये पाँच कर्मेन्द्रियाँ हैं । मनके सहित इन  सबका प्रादुर्भाव हुआ है । ये चौबीस तत्त्व सम्पूर्ण शरीरों में मौजूद रहते हैं । इनके स्वरूपको भलीभाँति  जानकर तत्त्वदर्शी ब्राह्मण कभी शोक नहीं करते । नरश्रेष्ठ ! यह त्रिलोकी उन्हीं तत्त्वोंसे बनी है । देवता , मनुष्य , यक्ष , भूत , गन्धर्व , किंनर , महानाग , चारण , पिशाच , देवर्षि , निशाचर , दंश , कीट , मशक , दुर्गन्धित कीड़े , चूहे , कुत्ते , चाण्डाल , हिरन , पुक्कस , हाथी , घोड़े , गदहे , व्याघ्र , भेड़िये तथा गौ आदि जितने भी मूर्तिमान् पदार्थ हैं , उन  सबमें इन्हीं तत्त्वोंका दर्शन होता है । पृथ्वी , जल और आकाशमें ही प्राणियोंका निवास है ; अन्यत्र नहीं । यह सम्पूर्ण जगत् व्यक्त कहलाता है । प्रतिदिन  इसका क्षरण ( क्षय ) होता है , इसलिये इसको क्षर कहते हैं । इससे भिन्न तत्त्व अक्षर कहा गया है । सम्पूर्ण भूतोंके आत्मा परमेश्वरको ही अक्षर कहते हैं । इस प्रकार उस अव्यक्त अक्षरसे उत्पन्न यह व्यक्त नामवाला मोहात्मक जगत् सदा क्षयशील होनेके कारण

'क्षर' नाम धारण करता है । क्षरतत्त्वों में सबसे पहले महत्तत्त्वकी सृष्टि हुई है । यही क्षरका निरूपण है । महाराज ! तुम्हारे प्रश्नके अनुसार मैंने क्षर-अक्षरका वर्णन किया । अक्षरतत्त्व पच्चीसवाँ तत्त्व है । वह नित्य एवं निराकार है । उसको प्राप्त कर लेनेपर इस संसारमें लौटना नहीं होता । जो अव्यक्ततत्त्व इस व्यक्त जगत्की सृष्टि करता है , वह प्रत्येक शरीरमें साक्षीरूपसे निवास करता है । चौबीस तत्त्वोंका समुदाय तो व्यक्त है , किंतु उनका साक्षी पच्चीसवाँ तत्त्व परमात्मा निराकार होनेके कारण अव्यक्त है । वही सम्पूर्ण देहधारियोंके हृदयमें निवास करता है । वह चेतनरूपसे सबको चेतना प्रदान करता है । वह स्वयं अमूर्त होते हुए भी सर्वमूर्तिस्वरूप है । सृष्टि और प्रलयरूप धर्मसे वह सृष्टिस्वरूप भी है और प्रलयस्वरूप भी । वही विश्वरूपमें सबको प्रत्यक्ष दृष्टिगोचर होता है । वह निर्गुण होते हुए भी गुणस्वरूप है । वह परमात्मा करोड़ों सृष्टि और प्रलय करता रहता है , तथापि उसे अपने कर्तृत्वका अभिमान नहीं होता ।अज्ञानी पुरुष तमोगुण , सत्त्वगुण और रजोगुणसे युक्त होकर तदनुकूल योनियोंमें जन्म लेता है । वह ज्ञान न होने , अज्ञानी पुरुषोंका सेवन करने तथा उनके सम्पर्कमें रहनेसे ऐसा अभिमान करने लगता है कि ' मैं बालक हूँ , यह हूँ , वह हूँ और वह नहीं हूँ ' इत्यादि । इस अभिमानके कारण वह  प्राकृत गुणोंका ही अनुसरण करता है । तमोगुणके सेवनसे वह नाना प्रकारके तामसिक भावों को प्राप्त होता है । रजोगुणके सेवनसे राजसिक और सत्त्वगुणके आश्रयसे वह सात्त्विक रूप ग्रहण करता है । काले , लाल और श्वेत- ये जो तीन प्रकारके रूप हैं , उन सबको प्राकृत ही जानो तमोगुणी पुरुष नरकमें पड़ते हैं , रजोगुणी मनुष्यलोकमें आते हैं और  सत्त्वगुणका आश्रय लेनेवाले जीव सुखके भागी होकर देवलोकमें जाते हैं । केवल पापसे ( पापकी प्रधानतासे ) पशु - पक्षियोंकी योनिमें जाना पड़ता है । पुण्य और पाप दोनोंका मेल होनेसे मनुष्यलोककी  प्राप्ति होती है तथा केवल पुण्यसे

(पुण्यकी प्रधानतासे ) जीव देवताका स्वरूप प्राप्त करता है । अव्यक्त परमात्मामें जो स्थिति होती है , उसीको मनीषी पुरुष मोक्ष कहते हैं । वे परमात्मा ही पच्चीसवाँ तत्त्व हैं । ज्ञानसे ही उनकी प्राप्ति होती है ।