ब्रह्म पुराण

68 - अनन्त वासुदेव की महिमा तथा पुरुषोत्तमक्षेत्रके माहात्म्यका उपसंहार

मुनि बोले - देव! भगवान् की यह कथा सुनने से हमें तृप्ति नहीं होती। आप पुन: परम गोपनीय रहस्यका वर्णन कीजिये। अनन्त वासुदेव की महिमाका अपने भलीभाँति वर्णन नहीं किया। अब हम उसी को सुनना चाहते हैं। आप विस्तारपूर्वक बतलायें।

ब्रह्माजी ने कहा - मुनिवरो! अनन्त वासुदेवका माहात्म्य सारसे भी अत्यन्त सारतर वस्तु है। वह इस पृथ्वी पर दुर्लभ है। विप्रगण! आदिकल्पकी बात है, मैंने देवशिल्पियों में श्रेष्ठ विश्वकर्मा को बुलाकर कहा- 'तुम पृथ्वीपर भगवान् वासुदेव की शिलामयी प्रतिमा बनाओ, जिसका दर्शन करके इन्द्र आदि देवता और मनुष्य भक्तिपूर्वक भगवान् वासुदेव की आराधना करें और उनकी कृपा से निर्भय होकर रहें।' मेरी बात सुनकर विश्वकर्मा ने तत्काल ही एक सुन्दर और सुदृढ़ प्रतिमा बनायी, जिसके हाथों में शङ्ख, चक्र, गदा और पद्य शोभा पा रहे थे। भगवान् वह विग्रह सब प्रकार के शुभ लक्षणों से सम्पन्न और अत्यन्त प्रभावशाली था। नेत्र कमलदल के समान विशाल थे। वक्ष:-स्थल में श्रीवत्सका चिह्न सुशोभित था। हृदयदेश वनमाला से आवृत हो रहा था। मस्तकपर मुकुट और भुजाओं में अङ्गद शोभा पाते थे। कंधे मोटे जान पड़ते थे। कानों में कुण्डल झिलमिला रहे थे। श्याम अङ्गपर पीताम्बर की अपूर्व शोभा थी। इस प्रकार वह प्रतिमा दिव्य थी। स्थापना का समय आनेपर स्वयं मैंने ही गूढ़ मन्त्रों द्वारा उसे स्थापित किया।२ उस समय देवराज इन्द्र ऐरावतपर सवार हो समस्त देवताओं के साथ मेरे लोक में आये। उन्होंने स्नान-दान आदि के द्वारा भगवत्प्रतिमा को प्रसन्न किया और उसे लेकर वे अपनी अमरावती पुरी में चले गये। वहाँ इन्द्रभवन में उसे पधराकर उन्होंने मन, वाणी और शरीरको संयम में रखते हुए दीर्घकाल तक भगवान् की आराधना की और उन्हीं के प्रसाद से वृत्र एवं नमुचि आदि क्रूर राक्षसों तथा भयंकर दानवों का संहार करके तीनों लोकों का राज्य भोगा।

द्वितीय युग त्रेता आनेपर महापराक्रमी राक्षसराज रावण बड़ा प्रतापी हुआ। उसने दस हजार वर्षों तक निराहार और जितेन्द्रिय रहकर अत्यन्त कठोर व्रतका पालन करते हुए भारी तपस्या की, जो दूसरों के लिये अत्यन्त दुष्कर थी। उस तपस्या से संतुष्ट होकर मैंने रावण को वरदान दिया- 'तुम्हें सम्पूर्ण देवताओं, दैत्यों, नागों और राक्षसोंमें से कोई नहीं मार सकेगा। शाप के भयंकर प्रहार से भी तुम्हारी मृत्यु नहीं होगी। तुम यमदूतों से भी अवध्य रहोगे।' ऐसा वर पाकर वह राक्षस सम्पूर्ण यक्षों और उनके राजा धनाध्यक्ष कुबेरको भी परास्त करके इन्द्रको भी जितनेके लिये उद्यत हुआ। उसने देवताओं के साथ बड़ा भयंकर संग्राम किया। उसके पुत्रका नाम मेघनाद था। मेघनाद ने इन्द्रको जीत लिया, अत: वह इन्द्रजित् के नाम से प्रसिद्ध हुआ। तदनन्तर बलवान रावण ने अमरावतीपुरी में प्रवेश करके देवराज इन्द्रके सुंदर भवन में भगवान् वासुदेव की प्रतिमा देखी, जो अञ्जनके समान श्यामवर्ण और समस्त शुभ लक्षणों से सम्पन्न थी। पद्यपत्र के समान विशाल नेत्र, वनमाला से ढके हुए वक्ष:स्थल में श्रीवत्सका सुंदर चिह्न, मस्तकपर मुकुट, भुजाओं में भुजबंध, हाथों में शङ्ख, चक्र, गदा और पद्य, शरीरपर पीताम्बर, चार भुजाएँ तथा अङ्गो में समस्त आभूषण शोभा दे रहे थे। वह प्रतिमा समस्त मनोवाञ्छित फलोंको देनेवाली थी। रावण ने यहाँ रखे हुए ढेर-के-ढेर रत्नोंको तो छोड़ दिया और उस सुन्दर प्रतिमाको तुरंत ही पुष्पक विमानसे लङ्कामें भेज दिया।

वहाँ रावणके छोटे भाई धर्मात्मा विभीषण नगराध्यक्ष थे। वे सदा भगवान् नारायण के भजन में लगे रहते थे। देवराजकी भूमिसे आयी हुई उस दिव्य प्रतिमाको देखकर उनके शरीर में रोमाञ्च हो आया। उन्हें बड़ा विस्मय हुआ। विभीषण ने प्रसन्नचित्तसे मस्तक झुकाकर भगवान् को प्रणाम किया और कहा- 'आज मेरा जन्म सफल हो गया। आज मेरी तपस्याका फल मिल गया।' यों कहकर धर्मात्मा विभीषण बारंबार भगवान् को प्रणाम करके अपने बड़े भाईके पास गये और हाथ जोड़कर बोले- 'राजन्! आप वह प्रतिमा देकर मुझपर कृपा कीजिये। मैं उसकी आराधना करके भवसागर से पार होना चाहता हूँ।' भाई'की बात सुनकर रावणने कहा- 'वीर! तुम प्रतिमा ले लो, मैं उसे लेकर क्या करूँगा। मैं तो ब्रह्माजी की आराधना करके तीनों लोकोंपर विजय पा रहा हूँ।' विभीषण बड़े बुद्धिमान् थे उन्होंने वह कल्याणमयी प्रतिमा ले ली और उसके द्वारा एक सौ आठ वर्षोंतक भगवान् विष्णुकी आराधना की। इससे उन्होंने अणिमा आदि आठों सिद्धियोंके साथ अजर-अमर रहनेका वरदान प्राप्त कर लिया।

रावण बड़ा पापी और क्रूर राक्षस था। उसने देवता, गन्धर्व, किंनर, लोकपाल, मनुष्य, मुनि और सिद्धोंको भी युद्धमें जीतकर उनकी स्त्रियोंको हर लिया और लङ्का नगरी में लाकर रखा फिर सीताके लिए मोहित होकर उसने उनको भी हर लानेका प्रयत्न किया। श्रीरामके सम्मुख जाने में उसे भय होता था; इसलिये मारीचको सुवर्णमय मृगके रूपमें भेजकर उन्हें आश्रम से दूर हटा दिया और सीताको अकेली पाकर हर किया। इसका पता लगने पर लक्ष्मणसहित श्रीरामको बड़ा क्रोध हुआ। उन्होंने रावणको मार डालनेका निश्चित किया। इस कार्यमें सुग्रीव सहायक हुआ। सुग्रीवका वाली के साथ वैर था, अत: श्रीराम ने वालीको मारकर सुग्रीवको किष्किन्धाके राज्यपर अभिषिक्त कर दिया और अङ्गद को युवराज बनाया। फिर हनुमान्,नल, नील, जाम्बवान्, पनस, गवय, गवाक्ष और पाठीन आदि असंख्य महाबली वानरों के साथ कमलनयन श्रीराम ने लङ्काकी यात्रा की। उन्होंने समुद्र में पर्वतोंकी बड़ी-बड़ी चट्टानें डालकर पुल बँधाया और विशाल सेना के साथ समुद्रको पार किया। रावण ने राक्षसोंको साथ लेकर भगवान् श्रीराम के साथ घोर संग्राम किया। परम पराक्रमी श्रीरघुनाथजी ने महोदर, प्रहस्त, निकुम्भ, कुम्भ, नरान्तक, यमान्तक, मालाढ्य, माल्यवान्, इन्द्रजित्, कुम्भकर्ण तथा रावणको मारकर विदेहकुमारी सीताको अग्निपरीक्षा द्वारा शुद्ध प्रमाणित किया और विभीषण को राज्य दे भगवान् वासुदेव की प्रतिमा को साथ लेकर वे पुष्पक विमानपर आरुढ़ हुए और अनायास ही पूर्वजोंद्वारा पालित अयोध्या नगरीमें जा पहुँचे। भक्तवत्सल श्रीरघुनाथजी ने अपने छोटे भाई भरत और शत्रुघ्न को भिन्न-भिन्न राज्यों पर अभिषिक्त किया और स्वयं सम्राटकी भाँति समस्त भूमण्डल के राज्यपर आसीन हुए। उन्होंने अपने पुरातन स्वरुप श्रीविष्णुकी उस प्रतिमा का आराधन करते हुए समुद्रपर्यन्त पृथ्वीका ग्यारह हजार वर्षोंतक पालन किया। उसके बाद वे अपने वैष्णव धाममें प्रवेश कर गये। उस समय श्रीराम ने वह प्रतिमा समुद्रको दे दी और कहा- 'अपने जल और रत्नों के साथ तुम इस प्रतिमाकी भी रक्षा करना।'

द्वापर आनेपर जब जगदीश्वर भगवान् विष्णु पृथ्वीकी प्रार्थना से कंस आदिका वध करनेके लिये बलभद्रजी के साथ वसुदेवजी के कुल में अवतीर्ण हुए, उस समय नदियोंके स्वामी समुद्रने उस परम दुर्लभ पुण्यमय पुरुषोत्तमक्षेत्रमें सम्पूर्ण लोकोंका हित करने के लिये उक्त प्रतिमाको प्रकट किया, जो सम्पूर्ण मनोवाञ्छित फलोंको देनेवाली थी। तबसे उस मुक्तिदायक क्षेत्र में ही देवाधिदेव अनन्त वासुदेव विराजमान हैं, जो मनुष्यों की समस्त कामनाएँ पूर्ण करनेवाले हैं।जो लोग मन, वाणी और क्रियाद्वारा सदा सर्वेश्वर भगवान् अनन्त वासुदेवकी भक्तिपूर्वक शरण लेते हैं, वे परमपद को प्राप्त होते हैं। भगवान् अनन्त का एक बार दर्शन, भक्तिपूर्वक पूजन और प्रणाम करके मनुष्य राजसूय और अश्वमेध-यज्ञों से दसगुना फल पाटा है। वह समस्त भोग-सामग्री से सम्पन्न छोटी-छोटी घंटियों से सुशोभित, सूर्यके समान तेजस्वी और इच्छानुसार चलनेवाले विमानसे वैकुण्ठधाम में जाता है। उस समय दिव्याङ्गनाएँ उसकी सेवा में रहती हैं और गन्धर्व उसके यशका गान करते हैं। वह अपने साथ कुलकी इक्कीस पीढ़ियों का भी उद्धार कर देता है। मुनिवर! इस प्रकार मैंने भगवान्अनन्तके समबन्धमें कुछ निवेदन किया। कौन ऐसा मनुष्य है, जो सौ वर्षों में भी उनके गुणों का वर्णन कर सके।

इस प्रकार मनुष्यों को भोग और मोक्ष देनेवाले परम दुर्लभ पुरुषोत्तमक्षेत्र तथा अनन्त वासुदेव के माहात्म्यका वर्णन किया गया। पुरुषोत्तमक्षेत्र में शङ्ख, चक्र, गदा, पद्य और पीताम्बर धारण करनेवाले कमलनयन भगवान् श्रीकृष्ण विराजमान हैं, जिन्होंने कंस और केशीका संहार किया था। जो लोग वहाँ देव-दानव-वन्दित श्रीकृष्ण, बलभद्र और सुभद्रा का दर्शन करते हैं, वे धन्य हैं। भगवान् श्रीकृष्ण तीनों लोकों के स्वामी तथा सम्पूर्ण अभीष्ट वस्तुओं के दाता हैं। जो सदा उनका ध्यान करते हैं, वे निश्चय ही मुक्त हो जाते हैं। जो सदा श्रीकृष्ण में अनुरुक्त रहते हैं, रात को सोते समय श्रीकृष्ण चिन्तन करते हैं और फिर सोकर उठनेके बाद श्रीकृष्ण का स्मरण करते हैं, वे शरीर त्यागने के बाद श्रीकृष्ण में ही प्रवेश करते हैं- ठीक वैसे ही जैसे मन्त्रोच्चारणपूर्वक होम किया हुआ हविष्य अग्नि में लीन हो जाता है।१ अत: मुनिवरो! मोक्षकी इच्छा रखनेवाले पुरुषोंको पुरुषोत्तमक्षेत्र में सदा यत्नपूर्वक कमलनयन श्रीकृष्णका दर्शन करना चाहिये। जो मनीषी पुरुष शयन और जागरणकाल में श्रीकृष्ण, बलभद्र तथा सुभद्राका दर्शन करते हिं, वे श्रीहरि के धाम में जाते हैं। जो हर समय भक्तिपूर्वक पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण, रोहिणीनन्दन बलभद्र और सुभद्रादेवीका दर्शन करते हैं, वे भगवान् विष्णु के लोक में जाते हैं। जो वर्षा के चार महीनोंमें पुरुषोत्तमक्षेत्र के भीतर निवास करते हैं, उन्हें सारी पृथ्वीकी तीर्थयात्रा से भी अधिक फल प्राप्त होता है। जो इन्द्रियोंको जीतकर और क्रोध को वशीभूत करके सदा पुरुषोत्तमक्षेत्र में ही निवास करते हैं, वे तपस्या का फल पाते हैं। मनुष्य अन्य तीर्थों में दस हजार वर्षों तक तपस्या करके जो फल पाटा है, उसे पुरुषोत्तमक्षेत्र में एक ही मासमें प्राप्त कर लेता है। तपस्या, ब्रह्मचर्यपालन तथा आसक्ति-त्यागसे जो फल मिलता हिया, उसे मनीषी पुरुष वहाँ सदा ही पाते रहते हैं। सब तीर्थों में स्नान-दान करनेका जो पुण्य फल बताया गया है, वह मनीषी पुरुषों को यहाँ सर्वदा प्राप्त होता हिया। विधिपूर्वक तीर्थसेवन तथा व्रत और नियमोंके पालन से जो फल बताया गया है, उसे वहाँ इन्द्रियसंयमपूर्वक पवित्रतासे रहनेवाला पुरुष प्रतिदिन प्राप्त करता है। नाना प्रकार के यज्ञों से मनुष्य जो फल प्राप्त करता है, वह जितेन्द्रिय पुरुषको वहाँ प्रतिदिन मिला करता है। जो पुरुषोत्तम क्षेत्र में कल्पवृक्ष (अक्षयवट)- के पास जाकर शरीरत्याग करते हैं, वे नि:संदेह मुक्त हो जाते हैं। जो मानव बिना इच्छाके भी वहाँ प्राणत्याग करता हिया, वह भी दु:ख से मुक्त हो दुर्लभ मोक्ष प्राप्त कर लेता है। कृमि, कीट, पतङ्ग आदि तथा पशु-पक्षियोंकी योनि में पड़े हुए जीव भी वहाँ देहत्याग करनेपर परमगति को प्राप्त करते हैं। जो मानुष एक बार भी श्रद्धापूर्वक भगवान् पुरुषोत्तमका दर्शन कर लेता हिया, वह सहस्त्रों पुरुषों में उत्तम है। भगवान् प्रकृति से परे और पुरुष से भी उत्तम हैं। इसलिये वे वेद, पुराण तथा इस लोक में पुरुषोत्तम कहलाते हैं। जो पुराण और वेदान्त में परमात्मा कहे गये हैं, वे ही सम्पूर्ण जगत्का उपकार करनेके लिये पुरुषोत्तमरूप से विराजमान हैं।२ पुरुषोत्तमक्षेत्र के भीतर मार्ग में, श्मशान भूमिमें, घर के मण्डप में, सड़कों और गकियों में- जहाँ कहीं इच्छा या अनिच्छा से भी शरीरत्याग करनेवाला मनुष्य मोक्षका भागी होता है। पुरुषोत्तमतीर्थ के समान किसी तीर्थका माहात्म्य न हुआ है और न होगा। मैंने उस क्षेत्र के गुणों का एक अंशमात्र यहाँ बताया है। कौन पुरुष सौ वर्षों में भी उसके समस्त गुणोंका वर्णन कर सकता है। मुनिवरो! यदि तुम सनातन मोक्ष पाना चाहते हो तो आलस्य छोड़कर उस पवित्र तीर्थ में निवास करो।

व्यासजी कहते हैं -   अव्यक्तजन्मा ब्रह्माजीका यह वचन सुनकर मुनियों ने वहाँ निवास किया और परमपद प्राप्त कर लिया। द्विजवरो! यदि आपलोग भी मोक्ष प्राप्त करना चाहते हों तो परम उत्तम पुरुषोत्तमक्षेत्र में निवास करें।

१. गङ्गा गङ्गेति यो ब्रूयाद्योजनानां शतैरपि। मच्यते सर्वपापेभ्यो विष्णुलोकं स गच्छति ॥

तिस्त्र: कोट्योऽर्धकोटी च तीर्थानि भुवनत्रये। तानि स्नातुं समायान्ति गङ्गायां सिंहगे गुरौ ॥

(१७५।८२-८३)

२. चकार प्रतिमां शुद्धां शङ्खचक्रगदाधराम् ॥

सर्वलक्षणसंयुक्तां पुण्डरीकायतेक्षणाम्। श्रीवत्सलक्ष्मसंयुक्तामृत्युग्रां प्रतिमोत्त्माम् ॥

वन मालावृतोरस्कां मुकुटाङ्गदधारिणीम्। पीतवस्त्रां सुपीनांसां कुण्डलाभ्यामलंकृताम् ॥

एवं सा प्रतिमा गुह्रयमन्त्रैस्तदा स्वयम्। प्रतिष्ठाकालमासाद्य मयासौ निर्मिता पुरा ॥

(१७६।८-११)

१. कृष्णे रताः कृष्णमनुस्मरन्ति रात्रौ च कृष्णं पुनरुत्थिता ये।

ते भिन्न्देहा: प्रविशन्ति कृष्णं कविर्यथा मन्त्रहुतं हुताशम् ॥ (१७७।५)

२. प्रकृते: स परो यस्मात् पुरुषादपि चोत्तम:। तस्माद् वेदे पुराणे च लोकेऽस्मिन् पुरुषोत्तम: ॥

योऽसौ पुराणे वेदान्ते परमात्मेत्युदाहृत:। आस्ते विश्वोपकाराय तेनासौ पुरुषोत्तम: ॥

(१७७।२२-२३)