67 - सामुद्र, ऋषिसत्र आदि तीर्थोंकी महिमा तथा गौतमी-माहात्म्यका उपसंहार

ब्रह्माजी कहते हैं - नारद! सामुद्रतीर्थ सब तीर्थोंका फल देनेवाला है। उसके स्वरुप का वर्णन करता हूँ, मन लगाकर सुनो। गौतम के विदा करनेपर पापनाशिनी गङ्गा जब तीनों लोकों का उपकार करनेके लिये ब्रह्मगिरि से पुर-समुद्र की ओर चलीं, तब मार्ग में मैंने उनके जलको लेकर कमण्डलु में धारण किया। परमात्मा शिवने उन्हें मस्तकपर चढ़ाया। वे भगवान् विष्णुके चरणों से प्रकट हुई हैं। ब्रह्मर्षि गौतम ने मर्त्यलोक में उनका अवतरण कराया है। वे स्मरणमात्र से सब पापोंका नाश करनेवाली हैं और गुरुओंकी भी गुरु हैं। समुद्र ने जब उन्हें अपनी ओर आते देखा, तब मन-ही-मन विचार किया- 'जो सम्पूर्ण जगत् की वन्दनीया और सबकी ईश्वरी हैं, जिन्हें ब्रह्मा तथा शिव आदि देवता भी मस्तक झुकाते हैं, उनके स्वागत में मुझे कुछ दूर आगेतक जाना चाहिये। नहीं तो मेरे धर्म में दोष आएगा। जो अपने घर आते हुए महापुरुषको लेनेके लिये माहेवश स्वयं उपस्थित नहीं होता, उस पापीकी रक्षा करनेवाला दोनों लोकों में कोई नहीं है।' यों विचारकर समुस्र मूर्तिमान् हो हाथ जोड़े विनीत भाव से गङ्गाजी के समीप आया और इस प्रकार बोला- 'देवि! तुम्हारा यह जल, जो आकाश, पाताल और मर्त्यलोक में फैला हुआ है, मुझमें आकार मिले-  इसके लिए मैं कुछ नहीं कहूँगा। मेरे भीतर रत्न, अमृत, पर्वत, राक्षस और असुर रहते हैं। इनको तथा अन्यान्य भयंकर जलजन्तुओं को भी मैं धारण करता हूँ। मेरे जल में लक्ष्मीसहित भगवान् विष्णु सदा शयन करते हैं। इस चराचर जगत् में मेरे लिए कुछ भी असंभव नहीं है। मैं तुम्हारे स्वागत में यहाँ तक आया हूँ। जो अपने से बड़े के आनेपर अहंकारवश आगे बढ़कर उसका स्वागत नहीं करता, वह धर्म आदि से भ्रष्ट होकर नरक में पड़ता है।* भगवती गङ्गा! तुमसे एक प्रार्थना करता हूँ। तुम सात धाराओं में आकार मुझसे मिलो। यदि एक ही धारा के रूप में आकर मिलोगी तो मैं तुम्हारे दु:सह वेग को धारण न कर सकूँगा।' समुद्र का यह वचन सुनकर गौतमी गङ्गाने कहा- 'तुम मेरी यह बात मानो;

सप्तर्षियोंकी जो अरुन्धती आदि पत्नियाँ हैं उन सबको उनके पतियों सहित ले आओ; तब मैं छोटे रूप में हो जाऊँगी।' 'बहुत अच्छा' कहकर समुद्र सप्तर्षियों और उनकी पत्नियों को ले आया। तब गोदावरी देवी सात धाराओं में विभक्त हो गयीं और उसी रूप में उनका समुद्र से संगम हुआ। सप्तर्षियोंके नामपर वे सप्तगङ्गा के नाम से विख्यात हुईं। वहाँ भक्तिपूर्वक जो स्नान, दान, श्रवण, पाठ और स्मरण आदि शुभ कर्म किया जाता है, वह समस्त अभीष्ट वस्तुओं को देनेवाला होता है। पापकी हानि, भोग और मोक्षकी प्राप्ति तथा मन की प्रसन्नता के लिए तीनों लोकों में सामुद्रतीर्थ से बढ़कर दूसरा कोई तीर्थ नहीं है।

सामुद्रतीर्थ के अतिरिक्त वहाँ ऋषिसत्रतिढ़त भी है, जहाँ सातों ऋषि तपस्या के लिये बैठे थे और जहाँ भीमेश्वर शिव विराजमान हैं। वहाँ का वृत्तांत इस प्रकार है। सात ऋषियों ने गङ्गाको सात धाराओं में विभक्त किया। सबसे दक्षिण की धरा वासिष्ठी कहलायी। उससे उत्तर वैश्वामित्री, उससे उत्तर वामदेवी, बीचकी धारा गौतमी, उससे उत्तर भारद्वाजी, उससे उत्तर आत्रेयी और अंतिम धारा जामद्ग्नी है। उन सब ऋषियों ने मिलकर वहाँ बहुत बड़े सत्रका अनुष्ठान किया। इसी बीच में देवताओं का प्रबल शत्रु विश्वरूप वहाँ आया और ब्रहमचर्य तथा तपस्या         के द्वारा उन ऋषियों को प्रसन्न करके विनयपूर्वक पूछा- 'मुनिवरो! यज्ञ अथवा तपस्या- जिस उपाय से भी मुझे बलवान् पुत्र प्राप्त हो, जिसे देवता भी परास्त न कर सकें, वह उपाय बतलाइये।'

तब परम बुद्धिमान् विश्वामित्र ने कहा - 'तात! कर्मसे नाना प्रकार के फल प्राप्त होते हैं। तीन कारणोंमें कर्म ही पहला कारण है। दूसरा कारण करता है तथा तीसरे कारणके अन्तर्गत उपादान और बीज आदि अन्य उपकरण हैं। उपादान और बीजको विद्वानोंने कर्म नहीं माना है। जहाँ बहुत-से कारण उपस्थित हों, वहाँ कर्म ही प्रधान कारण सिद्ध होता है। क्योंकि कर्म करनेसे फलकी सिद्धि देखि जाति है और न करनेसे नहीं। अत: फलकी सिद्धि कर्मके अधीन है। कर्म भी दो प्रकार के जानने चाहिए- क्रियमाण और कृत। क्रियमाण कर्म का जो-जो साधन है, कह कर्तव्य बताया गया है। विद्वान् पुरुष कर्म करते हुए जो-जो भावना करता है, उसके अनुरूप ही फलकी सिद्धि होती है। यदि बिना भावना के विधिपूर्वक कर्म का अनुष्ठान करता है तो उसे अन्य प्रकार का फल मिलता है। किन्तु भावना करने पर सम्पूर्णफल उस भावना के अनुरूप ही होता है; अत: तप, व्रत, दान, जप और यज्ञ आदि क्रियाएँ कर्मके अनुरूप भाव होनेसे ही अभीष्ट फल देती हैं। भाव भी तीन प्रकार का जानना चाहिये- सात्त्विक, राजस और तामस। जिस भावना के अनुरूप कर्म होगा, वैसा ही फल मिलेगा। अत: फलकी प्राप्ति क्रमके अनुसार और भावना के अनुरूप भी होता है; इसलिये कर्मोंकी स्थिति विचित्र है, यों समझकर विद्वान् पुरुषको अपनी इच्छा के अनुकूल भाव भी बनाना चाहिये। फिर उसके अनुरूप कर्म भी करना चाहिये। फल देनेवाला भी जब फल चाहनेवालों को फल देने में प्रवृत्त होता हिया, तब उसके कर्म और भावना के अनुसार ही फल देता है। कर्म धर्म, अर्थ काम और मोक्ष- चारों पुरुषार्थोंका कारण है। यदि निष्कामभाव से कर्म हो तो वह मुक्तिदायक होता है और सकामभाव से होनेपर वही बन्धन का कारण बन जाता है। अपने भाव के अनुसार ही कर्म बनता है तथा वाही इस लोक और परलोकमें भाँति-भाँति के फल देता है। भाव के अनुकूल कर्म होता और तदनुसार भोग मिलता है; अत: भाव सबसे बढ़कर है। तुम भी भावके अनुसार कर्म करो। फिर जो चाहोगे, प्रपात कर लोगे।'

बुद्धिमान् विश्वामित्र मुनिका कथन सुनकर विश्वरूप ने तामस भावका आश्रय ले दीर्घकाल तक तपस्या की। प्रधान-प्रधान ऋषियोंके मना करनेपर भी उसने अपने क्रोध के अनुरूप देवताओं के लिये भयंकर कार्य किया। भयंकर कुण्ड खोदकर उसमें भयानक अग्निदेव को प्रज्वलित किया और उसी में बैठकर मन-ही-मन अत्यन्त भयंकर रौद्रपुरुष का आत्मरूप से चिन्तन किया। उसे इस प्रकार तपस्या करते देख आकाशवाणी हुई- 'भीमस्वरूप जगदीश्वर शिवकी महिमा को कौन जनता है। वे सम्पूर्ण जगत्की सृष्टि करते हैं तो भी उसकी आसक्ति से लिप्त नहीं होते।' यों कहकर आकाशवाणी मौन हो गयी। मुनीश्वरगण भगवान् भीमेश्वर को नमस्कार करके अपने-अपने आश्रम को चले गये। विश्वरूप महाभीम (अत्यन्त भयंकर) था। उसके कर्म भी भयंकर थे। उसकी आकृति भी बड़ी भयानक थी। उसके हृदयका भाव भी भयंकर ही था। उसने भीमस्वरूप भगवान् रूद्रका ध्यान करके अग्नि में अपनी आहुति दे दी। तबसे उसके द्वारा आराधित भगवान् शङ्कर भीमेश्वर कहलाते हैं।

वहाँ किया हुआ स्नान और दान निस्सन्देह मोक्ष देनेवाला होता है। जो सदा भक्तिपूर्वक इस प्रसङ्गका पाठ और श्रवण करता है तथा देवताओंके स्वामी भीमस्वरूप भगवान् शिवको प्रणाम करता हिया, उसे भगवान् शिव अपने सर्वपापापहारी चरणों की शरण में लेकर मुक्ति प्रदान करते हैं। यों तो भगवती गोदावरी सर्वत्र और सदा ही सम्पूर्ण पापराशि का विनाश करनेवाली तथा परम पुरुषार्थ (मोक्ष) देनेवाली हैं, तथापि जहाँ वे समुद्रमें मिली हैं, वहाँ उनका माहात्म्य विशेषरूपसे बढ़ा हुआ है। जो पुण्यात्मा प्राणी गोदावरी-सागर-संगममें स्नान कर लेता हिया, वह अपने पूर्वजोंका सु:सह नरकसे उद्धार करके स्वयं भी भगवान् शिव के धाम में जाता है। जो वेदान्तद्वारा जानने योग्य तथा सबका उपास्य है, साक्षात् वह ब्रह्म ही भीमेश्वर के रूप में प्रकट है। भीमेश्वर का दर्शन कर लेनेपर जीव फिर भयंकर दु:ख देनेवाले संसार में नहीं प्रवेश करते।

देवताओंकी भी वन्दनीया गङ्गा जब समुद्रमें मिलीं, तब सम्पूर्ण देवता और मुनि उनके पीछे-पीछे स्तुति करते हुए गये। वसिष्ठ, जाबालि, यज्ञवल्क्य, क्रतु, अङ्गिरा, दक्ष, मरीचि, अन्यान्य वैष्णवगण, शातातप, शौनक, देवरात, भृगु, अग्निवेश, अत्रि, मरीचि, मनु, गौतम, कौशिक, तुम्बुरु, पर्वत, अगस्त्य, मार्कण्डेय, पिप्पल, गालव, योगीजन, वामदेव, आङ्गिरस तथा भार्गव- ये समस्त पुराणवेत्ता महर्षि प्रसन्नचित्त से वैदिक मन्त्रों द्वारा देवी गोदावरी की स्तुति करते थे। गोदावरी को समुद्र में मिली हुई देख भगवान् शिव और विष्णु ने भी मुनियों को प्रत्यक्ष दर्शन दिया। देवताओं और पितरों ने भी सबकी पीड़ा दूर करनेवाले उन दोनों देवताओं का दर्शन और स्तवन किया। आदित्य, वसु, रूद्र, मरुद्र्ण, लोकपाल- ये सब हाथ जोड़कर भगवान् शिव और विष्णुकी स्तुति करते थे। समुद्र और गङ्गाके सातों प्रसिद्ध संगमों पर सदा भगवान् शिव और विष्णु स्थित रहते हैं। वहाँ महादेवजी गौतमेश्वर के नामसे विख्यात हैं। लक्ष्मीसहित भगवान् विष्णु भी वहाँ नित्य निवास करते हैं। मैंने जो वहाँ शिवकी स्थापना की है, वह शिवलिङ्गब्रहोश्वर के नाम से प्रसिद्ध है। देवताओं सहित मैंने अपने लिये कारण उपस्थित होनेपर सम्पूर्ण लोकों के उपकार के लिये भगवान् विष्णुका भी स्तवन किया था। वे विष्णु वहाँ चक्रपाणि के नाम से विख्यात हैं। वहीं ऐन्द्रतीर्थ भी है और उसी को हयग्रीव तीर्थ भी कहते हैं। वहन सोम्तिढ़त भी है, जहाँ भगवान् शिव सोमेश्वर के नाम से प्रसिद्ध हैं। एक समय इन्द्रने बड़े-बड़े यज्ञों द्वारा मेरी आराधना करके मेरे प्रसाद से अपना मनोरथ सिद्ध किया था। तबसे मैं भी वहीं सब लोगोंका उपकार करनेके लिये रहता हूँ, विष्णु और शिव तो वहाँ हैं ही। अग्निने जहाँ यज्ञ किया, वह स्थान आग्नेयतीर्थ के नाम से प्रसिद्ध है। तदनन्तर आदित्यतिढ़त है, जहाँ वेदमय आदित्य प्रतिदिन मध्याह्नकाल में दूसरा रूप धारण करके मेरा, शिवका तथा विष्णुका दर्शन एवं उपासना करनेके लिये आते हैं। वहाँ मध्याह्नकाल में सब लोग वन्दनीय हैं, क्योंकि न मालूम सूर्य वहाँ किस रूप में आ जाएँ। उसके सिवा पर्वतश्रेष्ठ इन्द्रगोपपर एक दूसरा तीर्थ भी है। वहाँ किसी कारणवश गिरिराज हिमालय ने महान् शिवलिङ्ग की स्थापना की थी, अत: उसे अद्रितीर्थ कहते हैं। वहाँ किया हुआ स्नान और दान सम्पूर्ण अभीष्ट वस्तुओं को देनेवाला तथा शुभ है। इस प्रकार गौतमी गङ्गा ब्रह्मगिरी से निकलकर जहाँ समुद्रमें मिली हैं, वहाँ तक के कुछ तीर्थोंका मैंने संक्षेपसे वर्णन किया है। गौतमी गङ्गा वेद और पुराणोंमें भी प्रसिद्ध हैं। ऋषियोंद्वारा भी उनकी बड़ी ख्याति हुई है। सम्पूर्ण विश्वने उनके चरणों में मस्तक झुकाया है। उनका प्रभाव अत्यन्त महान् है। नारद! किसमें इतनी शक्ति है, जो गोदावरी की महिमाका पूरा-पूरा वर्णन कर सके। जो भक्तिपूर्वक उनके गुणगान में प्रवृत्त हो यथाकथंचित् उनकी महिमाका दिग्दर्शन कराता है, उसके ऐसा करनेमें नि:संदेह कोई अपराध नहीं है; इसलिये मैंने भी लोक-कल्याणके उद्देश्य से अत्यन्त प्रयास करके गङ्गाके माहात्म्य को संक्षेपसे सूचित किया है। कौन गोदावरी के प्रत्येक तीर्थ का प्रभाव बता सकता है। कहीं, किसी स्थानपर, किसी विशेष समयमें कोई उत्तम तीर्थ प्रकट होते हिं; परन्तु गौतमी में सर्वत्र और सदा ही तीर्थों का वास है। वे मनुष्यों के लिये सब जगह और सब समय पवित्र हैं। उनके गुणोंका वर्णन कौन कर सकता है। उनके लिये तो केवल नमस्कार करना ही उचित जान पड़ता है।

नारद जी ने कहा - सुरेश्वर! आप गङ्गाको तीनों देवताओं से सम्बन्ध रखनेवाली बताते हैं। ब्रह्मर्षि गौतमद्वारा लायी हुई लोकपावनी गङ्गा परम पवित्र और कल्याणमयी हैं। उनके आदि, मध्य और अन्तमें दोनों तटोंपर भगवान् विष्णु, शिव तथा आप व्याप्त हैं। उनकी महिमा सुनने से मुझे तृप्ति नहीं होती, आप पुन: संक्षेपसे उनका महत्त्व बतलाइए।

ब्रह्माजी बोले - बेटा! गङ्गा पहले मेरे कमण्डलु में थी, फिर भगवान् के चरणों से प्रकट हुईं। उसके बाद महादेवजी के जटा-जूटमें निवास करनेलगीं। महर्षि गौतमने अपने ब्रह्मतेजके प्रभाव से यत्नपूर्वक भगवान् शिवकी आराधना की, जिससे ये ब्रह्मगिरीपर आयीं और वहाँसे चलकर पूर्व-समुद्रमें जा मिलीं। भगवती गोदावरी सर्वतीर्थमयी हैं। वे मनुष्यों को मनोवाञ्चित फल देती हैं। उनका प्रभाव सबसे बढ़कर है। मैं तीनों लोकों में कोई भी तीर्थ गोदावरीसे बड़ा नहीं मानता उन्हींके प्रभाव से मन की सारी अभिलाषा पूर्ण होती है। आज भी उनकी महिमाका यथावत् वर्णन कोई नहीं कर सकता। सब लोग भक्तिसे सदा उनकी वन्दना करते हैं। वे वस्तुत: साक्षात् ब्रह्म हैं। नारद! मुझे तो यही अबसे बढ़कर आश्चर्यकी बात जान पड़ती है कि मेरी वाणी में गङ्गाके गुणोंका वर्णन सुनकर भी तीनों लोकों में रहनेवाले सब प्राणियोंकी बुद्धि उन्हीं की ओर क्यों नहीं लग जाती।

नारद जी ने कहा - भगवन्! आप धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष के ज्ञाता और उपदेशक हैं। आपके वचनोंमें रहस्योंसहित छन्द (वेद), पुराण, स्मृति और धर्मशास्त्र आदि समस्त वाङ्मय प्रतिष्ठित है। अत: आप बताइए- तीर्थ, दान, यज्ञ, तप, देव-पूजन, मात्र-जप और सेवामें सबसे श्रेष्ठ क्या है? भगवन्! आप जैसा कहेंगे, वैसा ही होगा। उसके विपरीत कोई बात नहीं हो सकती। अत: मेरे इस संशय का निवारण कीजिये।

ब्रह्माजी बोले - नारद! सुनो, मैं रहस्यमय उत्तम धर्मका वर्णन करता हूँ। चार प्रकार के तीर्थ हैं। चार ही युग हैं। तीन गुण, तीन पुरुष और तीन ही सनातन देवता हैं। स्मृतियोंसहित वेद चार बताये गये हैं। पुरुषार्थ भी चार ही हैं और वाणी के भी चार ही भेद हैं। ये सब समान हैं। धर्म सर्वत्र एक ही है। क्योंकि वह सनातन है। साध्य और साधन के भेद से उसके अनेक रूप माने गये हैं। धर्म के दो आश्रय हैं- देश और काल। काल के आश्रित जो धर्म है, वह सदा घटता-बढ़ता रहता है। युगोंके अनुसार उसमें एक-एक चरणकी न्यूनता होती जाती है। कालाश्रित धर्म भी देश में सदा प्रतिष्ठित रहता है। युगोंका क्षय होनेपर भी देशाश्रित धर्मकी हानि नहीं होती। जो धर्म दोनों आश्रयों से हीन है, उसका अभाव हो जाता है। अत: देशके आश्रित रहनेवाला धर्म अपने चारों चरणों के साथ प्रतिष्ठित होता है। देशाश्रित धर्म भिन्न-भिन्न देशों में तीर्थ रूप से स्थित रहता है। सत्ययुगमें धर्म देश और काल दोनों के आश्रित होता है। त्रेतामें उसके एक चरण की, द्वापरमें दो चरणोंकी और कलियुगमें उसके तीन चरणोंकी हानि होती है। द्वापर और कलिमें क्रमशः आधे और चौथाई रूप में शेष रहकर धर्म चालू रहता है। कलिमें उसकी सकंटमयी स्थिति होती है। जो इस प्रकार धर्मको जनता है, उसके धर्मकी हानि नहीं होती।

जो घर से तीर्थ यात्रा के लिये निकलना चाहता है, उसके सामने अनेक प्रकार के विघ्न आते हैं; परंतु जो उन विघ्नोंके मस्तकपर पैर रखकर गङगाजी के पास नहीं पहुँचता, उसने अपने जीवन में क्या फल पाया। गौतमीके प्रभावका कौन वर्णन कर सकता है। साक्षात् सदाशिव भी उसके वर्णन में असमर्थ हैं। मैंने संक्षेपसे इतिहाससहित गङ्गाके महात्म्यका प्रतिपदन किया है। चराचर जगत्में धर्म, अर्थ, काम और मोक्षका जो भी साधन है, वह सब इस विस्तृत इसतिहास में मौजूद है। इसमें वेदोक्त श्रुतियोंका सम्पूर्ण रहस्य बताया गया है। जगत् के कल्याणके लिये जो उत्तम साधन, जो उत्तम नामवाला प्राचीन तीर्थ देखा गया है, उसीका वर्णन किया गया है। जो इस माहात्म्य का एक श्लोक अथवा एक पद भी भक्तिपूर्वक पढ़ता और सुनता है अथवा 'गङ्गा- गङ्गा' यों उच्चारण करता है, वह पुण्यका भागी हिता है। गङ्गा का यह उत्तम माहात्म्य कलिके कलङ्कका विनाश करनेवाला, सब प्रकार की सिद्धि और मङ्गल देनेवाला है। संसार में यह समादर के योग्य है। इसके पढ़ने और सुनने से मनोवाञ्चित फलकी प्राप्ति होती है। जो सौ योजन दूरसे भी 'गङ्गा- गङ्गा' का उच्चारण करता है, सब पापों से मुक्त होता और भगवान् विष्णुके धाम में जाता है। तीनों लोकों में साढ़े तीन करोड़ तीर्थ हैं। वे सभी बृहस्पतिके सिंहराशि में स्थित होनेपर गौतमी गङ्गा में स्नान करनेके लिये आते हैं।१ बेटा! ये गौतमी मेरी आज्ञा से सदा सब मनुष्यों को स्नान करनेपर मोक्ष प्रदान करेंगी। हजार अश्वमेध और सौ वाजपेय-यज्ञ करनेपर जो फल मिलता है, वह इस माहात्म्य के श्रवणमात्र से प्राप्त हो जाता हिया। नारद! जिसके घर में यह मेरा कहा हुआ पुराण मौजूद है, उसे कलिकालका कोई भय नहीं है। यह उत्तम पुराण जिस किसी मनुष्य के सामने कहने योग्य नहीं है। श्रद्धालु, शान्त एवं वैष्णव महात्मा के सामने ही इसका कीर्तन करना चाहिये। यह भोग मोक्ष देनेवाला तथा पापों का नाश करनेवाला है। इसके श्रवणमात्र से मनुष्य कृतकृत्य हो जाता है। जो अपने हाथ से लिखकर यह पुस्तक ब्राह्मणों को देता है, वह सब पापों से मुक्त होकर फिर कभी गर्भ में नहीं आता।

* महत्यभ्यागते कुर्यात्प्रत्युत्थानं न यो मदात् । स धर्मादिपरिभ्रष्टो निरयं तु समाप्नुयात् ॥

(१७२। ११)