ब्रह्म महा पुराण
66 - चक्षुस्तीर्थ का माहात्म्य
ब्रह्माजी कहते हैं - चक्षुस्तीर्थ रूप और सौभाग्य देनेवाला है। जहाँ भगवान् योगेश्वर गौतमीके दक्षिण-तटपर निवास करते हैं, वहाँ पर्वत के शिखर पर भौवन नगर विख्यात स्थान है। यहाँ क्षात्र-शर्मपरायण राजा भौवन निवास करते थे। उसी नगर में वृध्दकौशिक नाम के एक ब्राह्मण थे, जिनके वेदवेत्ताओं में श्रेष्ठ गौतम नामक पुत्र हुआ। गौतमकी एक वैश्य के साथ मित्रता हुई। वैश्यका नाम मणिकुण्डल था। इनमें एक दरिद्र और दूसरा धनी था तो भी दोनों एक-दूसरे के हितैषी थे। एक दिन गौतम ने अपने धनी मित्र मणिकुण्डलसे एकान्त में प्रेमपूर्वक कहा- 'मित्र! हमलोग धनका उपार्जन करनेके लिये पर्वतों और समुद्रोंकी यात्रा करें। यदि अनुकूल सुख न प्राप्त हुआ तो समझना चाहिये जवानी व्यर्थ गयी। धन के बिना सौख्य कैसे प्राप्त हो सकता है। अहो! निर्धन मनुष्य को धिक्कार है।' कुण्डलने ब्राह्मण से कहा- 'मेरे पिता ने बहुत धन कमाया है। अब अधिक धन लेकर क्या करूँगा।' तब ब्राह्मण ने पुन: मणिकुण्डलसे कहा- 'जो धर्म, अर्थ, ज्ञान और भोगोंसे तृप्त हो जाय, ऐसा कौन पुरुष प्रशंसनीय माना जाता है। सखे! इन सबकी अधिकाधिक वृद्धि ही समस्त शरीरधारियों को अभीष्ट होती है। जो प्राणी अपने ही व्यवसाय से जीवन-निर्वाह करते हैं, वे धन्य हैं। जो दूसरे के दिए हुए धन से संतोष-लाभ करते हैं, वे कष्ट से ही जीते हैं। जो पुत्र अपने बाहुबल का आश्रय लेकर धनका उपार्जन करता है और पिता के धनको हाथ से नहीं छूता, वह संसार में कृतार्थ होता है।'
धनाभिलाषी ब्राह्मणका यह कथन सुनकर वैश्य ने उसे सत्य माना उअर घर से रत्न लाकर गौतमी को देते हुए कहा- 'मित्र! इस धन से हम लोग सुखपूर्वक देश-देशान्तरोंमें भ्रमण करेंगे और धन कमाकर फिर अपने घर को लौट आयेंगे।' वैश्य तो अपनी सभ्दावनाके अनुसार सत्य ही कहता था, किन्तु ब्राह्मण उसे धोखा दे रहा था। उसके मन में पाप था। किन्तु वैश्य उसे ऐसा नहीं समझता था। दोनों ने आपस में सलाह की और माता-पिता को सूचना दिए बिना ही धन कमानेके लिये देश-देशान्तर में चल दिये। ब्राह्मण सोचने लगा- 'जिस किसी उपाय से हो सके, वैश्यका धन ले लूँ। अहो, पृथ्वीपर सहस्त्रों सुन्दर नगर हैं, जहाँ कामकी अधिष्ठात्री देवी-जैसी अभीष्ट भोग प्रदान करनेवाली युवतियाँ हैं। यदि यत्नपूर्वक धन लाकर उनको दिया जाय तो वे सदा भोगी जा सकती हैं और वही जीवन सफल है। किस प्रकार वैश्यसे अपने हाथ में आये हुए धनको हड़पकर उसका इच्छानुसार उपभोग करूँ?' यह सोचते हुए गौतमी ने मणिकुण्डल से हँसते-हँसते कहा- 'पापसे ही जीवों की उन्नति होती है और वे मनोवाञ्छित सुख प्राप्त करते हैं। संसार में धर्मात्मा लोग दु:खके ही भागी देखे जाते हैं। अत: एक मात्र दु:ख ही जिसका फल है, उस धर्म से क्या लाभ।'
वैश्य ने कहा - ऐसी बात नहीं है। धर्म में ही सुख की स्थिति है। पाप में तो केवल दु:ख, भय, शोक, दरिद्रता और क्लेश ही रहते हैं। जहाँ धर्म है, वहिन मुक्ति है। भला, अपना धर्म क्या नष्ट हो सकता है?* इस प्रकार विवाद करते हुए दोनों में यह शर्त लग गयी कि जिसका पक्ष श्रेष्ठ हो, वह दूसरे का धन ले ले। वे बोले- 'अब चाकर हम दोनों किसीसे पूछें- धर्मात्मा प्रबल होता है या अधर्मी? वेद से लोक का ही मत श्रेष्ठ है, क्योंकि लोक में ही धर्म से सुख होता है।' इस प्रकार विवाद करके दोनों सब लोगोंसे पूछने लगे कि 'पृथ्वी पर धर्म प्रबल है या अधर्म?' यह प्रश्न सामने आनेपर कोई बोले- 'जो धर्म के अनुसार चलते हैं, उन्हें दु:ख भोगना पड़ता है और बड़े-बड़े पापी मनुष्य सुखी हैं।' यह निर्णय सुनकर वैश्य ने अपना सारा धन ब्राह्मणको दे दिया। मणिमान् धर्मवेत्ताओं में श्रेष्ठ था। वह बाजी हार जानेपर भी धर्मकी ही प्रशंसा करता रहा। ब्राह्मण ने मणिमान् से पूछा- 'क्या तुम अब भी धर्म की प्रशंसा करते हो?' वैश्य बोला- 'हाँ।' ब्राह्मण फिर कहने लगा- 'वैश्य! मैंने तुम्हारा सारा धन जीत लिया, फिर भी निर्लज्ज की तरह धर्मकी बात क्यों करते हो? देखो, स्वेच्छाचारी होनेपर भी मैंने ही धर्मको जीता है।'
ब्राह्मण की बात सुनकर वैश्यने मुसकराते हुए कहा- 'सखे! जैसे धान्यों मई पुलाक (पैया) और पंखधारी चिड़ियों में छोटी मक्खियाँ होती हैं, वैसे ही मैं उन मनुष्यों को भी सारहीन मानता हूँ, जिनमें धर्म नहीं होता। चारों पुरुषार्थों में पहले धर्म का नाम आता है। अर्थ और काम उसके बाद आते हैं। वह धर्म मुझमें मौजूद अहि। फिर तुम कैसे कहते हो कि मैंने जीत लिया।' यह सुनकर ब्राह्मण ने पुन: वैश्य से कहा- 'अब दोनों हाथों की बाजी लगायी जाय।' वैश्य बोला- 'ठीक है।' फिर दोनों ने जाकर पहले की ही भाँति लौकिक मनुष्यों से पूछा, निर्णय ज्यों-का-त्यों रहा। ब्राह्मण बोला- 'फिर मेरी विजय हुई।' यों कहकर उसने वैश्य के दोनों हाथ काट डाले और पूछा- 'अब धर्मको कैसा मानते हो?' ब्राह्मण के इस प्रकार आक्षेप करनेपर वैश्य ने कहा- 'मेरे प्राण कण्ठतक आ जाएँ तो भी में धर्म को ही श्रेष्ठ मानता रहूँगा। धर्म ही देहधारियों की माता, पिता, सुहृद् और बन्धु है।' इस तरह दोनों का विवाद चलता रहा। ब्राह्मण धनवान् हो गया और वैश्य धन के साथ-साथ दोनों बाँहों से भी हाथ धो बैठा। इस तरह भ्रमण करते हुए दोनों गौतमी गङ्गा के तटपर विवादआ पहुँचे। जहाँ योगेश्वर श्रीहरिका निवासस्थान है, वहाँ आनेपर फिर दोनों में विवाद आरम्भ हो गया। वैश्य गङ्गा, योगेश्वर और धर्मकी ही प्रशंसा करता था। इससे ब्राह्मण को बड़ा क्रोध हुआ। वह वैश्य पर आक्षेप करते हुए बोला- 'धन चला गया। दोनों हाथ कट गये। अब केवल तुम्हारे प्राण बाकी हैं। यदि फिर मेरे मतके विपरीत कोई बात मुँहसे निकालोगे तो मैं तलवार से तुम्हारा सिर काट लूँगा।' वैश्य हँस पड़ा। उसने पुन: गौतम को चुनौती देते हुए कहा- 'मैं तो धर्म को ही बड़ा मानता हूँ; तुम्हारी जैसी इच्छा हो, कर लो। जो ब्राह्मण, गुरु, देवता, वेद, धर्म और भगवान् विष्णुकी निन्दा करता है, वह पापाचारी मनुष्य पापरूप है। वह स्पर्श करने योग्य नहीं है। धर्मको दूषित करनेवाले उस दुराचारी पापात्माका परित्याग कर देना चाहिये।'* तब ब्राह्मणमे कुपित होकर कहा- 'यदि तुम धर्मकी प्रशंसा करते हो तो हम दोनों के प्राणों की बाजी लग जाय।' वैश्यने कहा- 'ठीक है।' फिर दोनों ने साधारण लोगों से पूछा, किन्तु लोगों ने पहले-ही-जैसा उत्तर दिया। उस समय गौतमी के दक्षिण-तटपर भगवान् योगेश्वर के सामने ब्राह्मण ने वैश्य को गिरा दिया और उसकी आँखें निकाल लीं। फिर कहा- 'वैश्य! प्रतिदिन धर्म की प्रशंसा करने से ही तुम इस दशा को पहुँचे हो। तुम्हारा धन गया, आँखें गयीं और दोनों हाथ काट लिए गये। मित्र! अब तुमसे बिदा लेकर जाता हूँ। फिर कभी बातचीत में इस तरह धर्म की प्रशंसा न करना।' यों कहकर गौतम चला गया। उसके जानेपर वैश्य प्रवर मणिकुण्डल धन, बाहु और नेत्रसे रहित होने के कारण शोकग्रस्त हो गया। तथापि वह निरन्तर धर्म की ही स्मरण करता था। अनेक प्रकार की चिंता करते हुए वह भूतल पर निश्चेष्ट होकर पड़ा था। उसके हृदय में उत्साह नहीं रह गया था। वह शोक-सागर में डूबा हुआ था। दिन बीता, रजनीका आगमन हुआ और चन्द्रमण्डलका उदय हो गया। उस दिन शुक्ल पक्षकी एकादशी थी। एकादशी को वहाँ लङ्का से विभीषण आया करते थे। उस दिन भी आये; उन्होंने पुत्र और राक्षसोंसहित गौतमी गङ्गा में स्नान किया और योगेश्वर भगवान् विष्णुकी विधिपूर्वक पूजा की। विभीषणका पुत्र भी दूसरे विभीषण के ही समान धर्मात्मा था। उसे लोग वैभिषणि कहते थे। वैभिषणि ने वैश्य को देखा और उससे वार्तालाप किया। वैश्यका यथावत् वृतान्त जानकर उस धर्मज्ञ ने अपने पिता लङ्कापति महात्मा विभीषण को बतलाया। लङ्केश्वर अपने गुणाकर पुत्र से प्रसन्नतापूर्वक कहा- 'बेटा! भगवान् श्रीराम मेरे गुरु- आराध्यदेव हैं और उनके आदरणीय भक्त हनुमान्जी मेरे सखा हैं। आज से बहुत पहले एक कार्य आ पड़नेपर हनुमान् जी बहुत बड़ा पर्वत उठा लाये थे, जो सब प्रकार की ओषधियों का भण्डार था। उस समय दो ओषधियों की आवश्यकता थी- विशल्यकरणी और मृतसंजीवनी। उन दोनों ओषधियों को लाकर उन्होंने भगवान् श्रीराम अर्पित किया। जब उनकी आवश्यकता पूर्ण हो गयी, तब वे पुन: उस पर्वतको उठाकर हिमालय पर ले गये और वहीं रह आये। हनुमान्जी बड़े वेग से जा रहे थे, इसलिये विशल्यकरणी नाम की ओषधि गौतमी गङ्गाके तटपर गिर पड़ी थी। जहाँ भगवान् योगेश्वर का स्थान है, वहीं वह ओषधि है। उसे ले आकर तुम भगवान् का स्मरण करते हुए इसके हृदयपर रख दो। उससे यह उदारबुद्धि वैश्य अपने सम्पूर्ण अभीष्टोंको प्राप्त कर लेगा।'
वैभीषणि बोला - पिताजी! मुझे शीघ्र ही वह ओषधि दिखा दीजिये। विलम्ब न कीजिये। दूसरों की पीड़ा दूर करनेसे बढ़कर तीनों लोकों में दूसरा कोई कल्याणकारी कार्य नहीं है।
विभीषण ने 'बहुत अच्छा' कहकर पुत्रको वह ओषधि दिखा दी। उसने 'इषे त्वा०' इत्यादि मन्त्र को पढ़कर उस वृक्ष की एक शाखा तोड़ ली और उसका स्पर्श होते ही वैश्य के नेत्र और हाथ ज्यों-के-त्यों हो गये। मणि, मन्त्र और ओषधियों के प्रभाव को कोई नहीं जानता। वैश्य ने धर्मका चिन्तन करते हुए गौतमी गङ्गामें स्नान किया और योगेश्वर भगवान् विष्णुको नमस्कार करके पुन: वहाँ से यात्रा की। उसने अपने साथ ओषधिकी टूटी हुई शाखा भी ले ली थी। देश-देशान्तरों में भ्रमण करता हुआ मणिकुण्डल एक राजधानी में पहुँचा, जो महापुरके नाम से विख्यात थी। वहाँ के महाबली राजा महाराज के नाम से प्रसिद्ध थे। राजा के कोई पुत्र नहीं था, एक पुत्री थी; उसकी भी आँखें नष्ट हो चुकी थीं।वह कन्या ही राजा के लिए पुत्र थी। राजा ने यह निश्चय किया था कि 'देवता, दानव, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, गुणवान् या निर्गुण- कोई भी क्यों न हो, मैं उसी को यह कन्या दूँगा, जो इसकी आँखें अच्छी कर देगा। मुझे अपने राज्य के साथ ही कन्या का दान करना है।' महाराज ने यह घोषणा सब ओर करा दी थी। वैश्य ने वह घोषणा सुनकर कहा- 'मैं निश्चय ही राजकुमारी की खोयी हुई आँखें पुन: ला दूँगा।'
राजकर्मचारी शीघ्र ही वैश्यको लेकर गया और महाराज को उसने सब बातें बतायीं। वैश्य ने उस काष्ठका स्पर्श कराया और राजकुमारी के नेत्र ठीक हो गये। यह देखकर राजा को बड़ा विस्मय हुए। उन्होंने पूछा- 'आप कौन हैं?' वैश्य ने राजा से अपना सब हाल ठीक-ठीक कह सुनाया। फिर बोला- 'ब्राह्मणों के प्रसाद से तथा धर्म, तपस्या, दान, यग्य और दिव्य ओषधिके प्रभाव से मुझमें ऐसी शक्ति आयी है।' वैश्य का यह कथन सुनकर महाराज को अत्यन्त आश्चर्य हुआ। वे बोले- 'अहो, ये महानुभाव कोई देवता ही होंगे। अन्यथा देवेतर मनुष्य में ऐसी शक्ति कैसी देखी जाती। अत: इन्हें राज्य के साथ ही अपनी कन्या अवश्य दूँगा।' मन में ऐसा संकल्प करके राजा ने कन्यासहित राज्य वैश्यको दे दिया। मणिकुण्डल राज्य को पाकर भी मित्र के बिना संतुष्ट न हुआ। वह सोचने लगा- 'मित्र के बिना न तो राज्य अच्छा है और न सुख ही अच्छा लगता है।' इस प्रकार वह सदा गौतम ब्राह्मण का ही चिन्तन किया करता था। इस पृथ्वी पर उत्तम कुल में उत्पन्न हुए साधुपुरुषों का यही लक्षण है कि अहित करनेवालों के प्रति भी उनके मन में सदा कारुण्य ही भरी रहती है।*
एक दिन महाराज मणिकुण्डल वन में गये थे। वहाँ उन्होंने अपने पूर्व मित्र गौतम ब्राह्मण को देखा। पापी जुआरिओं ने उसका सब धन चीन लिया था। धर्मज्ञ मणिकुण्डल ने अपने ब्राह्मण मित्र को साथ ले लिए, उसका विधिपूर्वक पूजन किया और धर्मका सब प्रभाव भी बतलाया। फिर समस्त पापों की निवृत्ति के लिए गौतमको गङ्गामें स्नान कराया। वैश्य के देश में जो सगोत्र बन्धु-बान्धव थे, उनको तथा गौतम ब्राह्मण के बन्धु-बान्धव वृद्धकौशिक आदि को उन्होंने बुलवाया और सबके साथ देवपूजनपूर्वक गौतमी के तटपर यज्ञ किया। तदनन्तर शरीर का अन्त होनेपर वे स्वर्गलोक में गये। वह स्थान मृतसंजीवनतीर्थ, चक्षुस्तीर्थ और योगेश्वरतीर्थ कहलाने लगा। वह स्मरणमात्र से पुण्य देनेवाला, मन को प्रसन्न रखनेवाला और समस्त दुर्भावनाओं का नाश करनेवाला है।
* नेत्युवाच ततो वैश्य: सुखं धर्मे प्रतिष्ठितम् ।
पापे दु:खं भयं शोको दारिद्र्यं क्लेश एव च । यतो धर्मस्ततो मुक्ति: स्वधर्म: किं विनश्यति ॥
(१७०। २६)
* धर्ममेव परं मन्ये यथेच्छसि तथा कुरु । ब्राह्मणांश्चय गुरुन् देवान् वेदान् धर्मं जनार्दनम् ॥
वस्तु निन्दयते पापो नासौ स्पृश्योऽथ पापकृत् । उपेक्षणीयो दुर्वृत्त: पापात्मा धर्मदूषक: ॥
(१७०। ४५-४६)
* एतदेव सुजातानां लक्षणं भुवि देहिनाम् । कृपार्द्रं यन्मनो नित्यं तेषामप्यहितेषु हि ॥
(१७०। ८३)
Summary of chapter 64 of the Brahma Mahā Purana is as follows:
Twelve specific sacred pilgrimages within and around the Puruṣottama kṣetra are enumerated, each with its prescribed route, ritual procedures, and specific spiritual fruits. The cumulative merit of completing all twelve is described as conferring everything from worldly prosperity to final liberation. The chapter systematizes the pilgrimage experience at the kṣetra as a practical guide for devoted pilgrims.