ब्रह्म पुराण

39 - वाराहतीर्थ, कुशावर्त, नीलगङ्गा और कपोततीर्थकी महिमा; कपोत और कपोतीके अद्भुत त्यागका वर्णन

नारदजी ने कहा - भगवन्! आपके मुख से कथा सुनते-सुनते मेरे मन को तृप्ति नहीं होती। पहले गौतम ब्राह्मणके द्वारा लायी हुई गङ्गाका वर्णन कीजिये। उनके पृथक्-पृथक् तीर्थोंके फल, पुण्य तथा इतिहासपर भी क्रमशः प्रकाश डालिये।

ब्रह्माजी बोले - नारद! गोदावरीके पृथक्-पृथक् तीर्थों, फलों और माहात्म्यों का पूरा-पूरा वर्णन बन तो मैं कर सकता हूँ और न तुम सुनने में ही समर्थ हो; तथापि कुछ बतलाता हूँ। जहाँ भगवान् त्र्यम्बक गौतम के सामने प्रत्यक्ष प्रकट हुए थे, वह तीर्थ त्र्यम्बकके नामसे प्रसिद्ध है (वही गौतमी गङ्गाका उद्र्मस्थान है)। वह भोग और मोक्ष देनेवाला है । दूसरा वाराहतीर्थ है, जो तीनों लोकों में विख्यात है। उसका स्वरुप बतलाता हूँ। पूर्वकालकी बात है, सिन्धुसेन नामक राक्षस देवताओंको परास्त करके यज्ञ छीनकर रसातल में जा पहुँचा। यज्ञ के रसातल चले जानेपर पृथ्वीपर उसका सर्वथा अभाव हो गया। देवताओंने सोचा, यज्ञ के बिना न तो यह लोक रह जायगा और न परलोक ही; अत: अपने शत्रुके पीछे उन्होंने रसातल में भी धावा किया। परन्तु इन्द्र आदि देवता सिन्धुसेनको जीत न सके। तब उन्होंने पुराणपुरुष भगवान् विष्णुके पास जाकर यज्ञापहरण आदि राक्षसकी सब करतूत कह सुनायी। भगवान्ने उन्हें सान्त्वना देते हुए कहा- 'मैं वाराहरूप धारण करके शङ्ख, चक्र और गदा हाथ में ले रसातलमें जाउँगा और मुख्य-मुख्य राक्षसोंका संहार करके पुण्यमय यज्ञ को लौटा लाऊँगा। देवताओ! तुम सब लोग स्वर्गमें जाओ। तुम्हारी मानसिक चिंता दूर हो जानी चाहिये।'

गङ्गाजी जिस मार्गसे रसातल में गयी थी, उसी मार्ग से पृथ्वीको छेदकर चक्रधारी भगवान् भी रसातलमें पहुँच गये। उन्होंने वराहरूप धारण करके रासताल्वासी राक्षसों और दानवोंका वध किया तथा माहायज्ञको मुखमें रखकर रसातलसे निकल आये। उस समय देवता ब्रह्मगिरिपर श्रीहरिकी प्रतीक्षा करते थे। उस मार्ग से निकलकर भगवान् गङ्गास्रोतमें आये और रक्तसे लथपथ हुए अपने अङ्गोंको गङ्गाजी के जलसे धोया। उस स्थानपर वाराह नमक कुण्ड हो गया। इसके बाद भगवान् ने मुँहमें रखे हुए माहायज्ञको दे दिया। इस प्रकार उनके मुखसे यज्ञका प्रादुर्भाव हुआ, इसलिये वाराहतीर्थ परम पवित्र और सम्पूर्ण अभिलषित वस्तुओंको देनेवाला है। वहाँ किया हुआ स्नान और दान सब यज्ञोंका फल देता है। जो पुण्यात्मा पुरुष वहाँ रहकर अपने पितरोंका स्मरण करता है, उसके पितर सब पापों से मुक्त हो स्वर्गमें चले जाते हैं। त्र्यम्बकमें एक कुशावर्त नमक तीर्थ है, उसके स्मरणमात्र से मनुष्य कृतार्थ हो जाता है। वह समस्त अभीष्ट वस्तुओंको देनेवाला है। कुशावर्त उस तीर्थका नाम है, जहाँ महात्मा गौतमने गङ्गाका कुशोंसे आवर्तन किया था। वे वहाँ गङ्गाको कुशसे लौटाकर ले आये थे। कुशावर्त में किया हुआ स्नान और दान पितरोंको तृप्ति देनेवाला है। जहाँ नदियों में श्रेष्ठ गङ्गा नीलपर्वत से निकली है, वहाँ वे नीलगङ्गाके नाम से विख्यात हैं। मनुष्य शुद्धिचित्त होकर नीलगङ्गामें स्नान आदि जो कुछ भी शुभ कर्म करता है, वह सब अक्षय जानना चाहिये। उससे पितरों को बड़ी तृप्ति होती है।

गोदावरी में परम उत्तम कपोततीर्थ भी है, जिसकी तीनों लोकों में प्रसिद्धि है। मुने! मैं उस तीर्थ का स्वरुप और महान् फल बतलाता हूँ, सुनो। ब्रह्मगिरिपर एक बड़ा भयंकर व्याध रहता था। वह ब्राह्मणों, साधुओं, यतियों, गौओं, पक्षियों तथा मृगों की हत्या किया करता था। वह पापात्मा बड़ा ही क्रोधी और असत्यवादी था। उसके हाथमें सदा पाश और धनुष मौजूद रहते थे। उस महापापी व्याधके मन में सदा पापके ही संकल्प उठते थे। उसकी स्त्री और पुत्र भी उसी स्वभावके थे। एक दिन अपनी पत्नीकी प्रेरणासे वह घने जङ्गलमें घुस गया। वहाँ उस पापीने अनेक प्रकारके मृगों और पक्षियोंका वध किया। कितनोंको जीवित ही पकड़कर पिंजड़ेमें डाल दिया। इस प्रकार बहुत दूरतक घूम-फिरकर वह अपने घरकी ओर लौटा। तीसरे पहरका समय था। चैत्र और वैशाख बीत चुके थे। एक ही क्षणमें बिजली कौंधने लगी और आकाशमें मेघोंकी घटा छा गयी। हवा चली और पानीके साथ पत्थरोंकी वर्षा होने लगी। मूसलाधार वर्षा होनेके कारण बड़ी भयंकर अवस्था हो गयी। व्याध राह चलते-चलते थक गया था। जलकी अधिकताके कारण मार्गका ज्ञान नहीं हो पाटा था। जल, थल और गड्ढेकी पहचान असम्भव हो गयी थी। उस समय वह पापी सोचने लगा, 'कहाँ जाऊँ, कहाँ ठहरूँ, क्या करूँ? मैं यमराजकी भाँति सब प्राणियोंके प्राण लिया करता हूँ। आज मेरा भी प्राणान्त कर देनेवाली पत्थरोंकी वृष्टि हो रही है। आसपास कोई ऐसी शिला अथवा वृक्ष नहीं दिखलायी देता, जहाँ मेरी रक्षा हो सके।'

इस प्रकार भाँति-भाँति की चिंता में पड़े हुए व्याध थोड़ी ही दूर पर एक उत्तम वृक्ष देखा, जो शाखा और पल्लवोंसे सुशोभित हो रहा था। वह उसीकी छाया में आकार बैठ गया। उसके सब वस्त्र भीग गये थे। वह इस चिन्ता में पड़ा था की मेरे स्त्री-बच्चे जीवित होंगे या नहीं। इसी समय सूर्यास्त भी हो गया। उसी वृक्षपर एक कबूतर अपनीस्त्री और पूत-पौत्रोंके साथ रहता था। वह वहाँ सुख से निर्भय होकर पूर्ण तृप्त और प्रसन्न था। उस वृक्षपर रहते हुए उसके कई वर्ष बीत चुके थे। उसकी स्त्री कबूतरी बड़ी पतिव्रता थी। वह अपने पति के साथ उस वृक्षके खोखल में रहा करती थी। वहाँ हवा और पानी से पूरा बचाव था। उस दिन दैववश कपोत और कपोती दोनों ही चारा चुगनेके लिये गये थे, किन्तु केवल कपोत ही लौटकर उस वृक्षपर आया। भाग्यवश कपोती भी वहीं व्याधके पिंजड़ेमे पड़ी थी। व्याध ने उसे पकड़ लिया था, परन्तु अभीतक उसके प्राण नहीं गये थे। कपोत अपनी संतानोंको मातृहीन देखकर चिन्तित हुआ। भयानक वर्षा हो रही थी। सूर्य डूब चुका था, फिर भी वह वृक्षका खोखला कपोतीसे खाली ही रह गया- यह विचारक कपोत विलाप करने लगा। उसे इस बात का पता नहीं था कि कपोती यहीं पिंजड़ेमें बँधी पड़ी है। कपोतने अपनी प्रियाके गुणोंका वर्णन आरम्भ किया- 'हाय! मेरे हर्षको बढ़ानेवाली कल्याणमयी कपोती न जाने क्यों अभी तक नहीं आयी। वाही मेरे धर्म की जननी है - उसके सहयोग से ही मैं धर्म का सम्पादन कर पता हूँ। मेरे इस शरीरकी स्वामिनी भी वही है। धर्म, अर्थ, काम और मोक्षकी सिद्धिमें वाही सर्वदा मेरी सहायता करती है। मुझे प्रसन्न देखकर वह हँसती है और खिन्न जानकार मेरे दु:खोंका निवारण करती है। उचित सलाह देने में वह मेरी सखी है और सदा मेरी आज्ञा के ही पालन में संलग्न रहती है। सूर्य अस्त हो गया तो भी वह कल्याणी अभी तक नहीं आयी। वह पतिके सिवा दूसरा कोई व्रत, मन्त्र, देवता, धर्म अथवा अर्थ नहीं जानती। वह पतिव्रता है। पति में ही उसके प्राण बसते हैं। पति ही उसका मन्त्र और पति ही उसका प्रियतम है। मेरी कल्याणमयी भार्या अभीतक नहीं आयी। क्या करूँ, कहाँ जाऊँ? मेरा यह घर उसके बिना आज जङ्गल-सा दिखायी देता है। उसके रहने पर भयंकर स्थान भी शोभासम्पन्न और सुंदर दिखायी देता है। जिसके रहनेपर यह घर वास्तवमें घर कहलाता है, वह मेरी प्रिय भार्या अबतक नहीं आयी। मैं उसके बिना जीवित नहीं रह सकूँगा। अपने प्रिय शरीरको भी त्याग दूँगा। किन्तु ये बच्चे क्या करेंगे। ओह! आज मेरा धर्म लुप्त हो गया है।'

इस प्रकार विलाप करते हुए स्वामीके वचन सुनकर पिंजड़ेमें पड़ी हुई कपोती बोली- 'खगश्रेष्ठ! में यहाँ पिंजड़ेमें बँधी हुई बेबस हो गयी हूँ। महामते! यह व्याद मुझे जाल में फँसाकर ले आया है। आज में धन्य हूँ और अनुगृहित हूँ; क्योंकि पतिदेव मेरे गुणोंका बखान करते हैं। मुझमें जो गुण हैं और जो नहीं है, उन सबका मेरे पतिदेव गान कर रहे हैं। इससे मैं निस्संदेह कृतार्थ हो गयी। पति के संतुष्ट होने पर स्त्रियोंपर सम्पूर्ण देवता संतुष्ट हो जाते हैं। इसके विपरीत यदि पति संतुष्ट हो तो स्त्रियों का अवश्य नाश हो जाता है। प्राणनाथ! तुम्हीं मेरे देवता, तुम्हें ओर्भु, तुम्हीं सुहृद्, तुम्हीं शरण, तुम्हीं व्रत, तुम्हीं स्वर्ग, तुम्हीं परब्रह्म और तुम्हीं मोक्ष हो।१ आर्य! मेरे लिए चिंता न करो। अपनी बुद्धिको धर्म में स्थिर करो। तुम्हारी कृपासे मैंने बहुतेरे भोग भोग लिए हैं।'

अपनी प्रिय कपोतीका यह वचन सुनकर कपोत उस वृक्षसे उतर आया और पिंजड़े में पड़ी हुई कपोतीके पास गया। वहाँ पहुँचकर उसने देखा, मेरी प्रिया जीवित है और व्याध मृतक की भाँति निश्चेष्ट हो रहा है। तब उसने उसे बन्धनसे छुड़ाने का विचार किया। कपोतीने रोकते हुए कहा- 'महाभाग! संसारका सम्बन्ध स्थिर रहनेवाला नहीं है, ऐसा जानकार मुझे बन्धनसे मुक्त न करो। इसमें मुझे व्याधका अपराध नहीं जान पड़ता। तुम अपनी धर्ममयी बुद्धिको दृढ़ करो। ब्राह्मणोंके गुरु अग्नि हैं। सब वर्णोंका गुरु ब्राह्मण है। स्त्रियोंका गुरु उसका पति है और सब लोगोंका गुरु अभ्यागत है। जो लोग अपने घरपर आये हुए अतिथिको वचनोंद्वारा संतुष्ट करते हैं, उनके उन वचनोंसे वाणीकी अधीश्वरी सरस्वती देवी तृप्त होती हैं। अतिथि को अन्न देने से इन्द्र तृप्त होते हैं। उसके पैर धोनेसे पितर, उसके भोजन करने से प्रजापति, उसकी सेवा-पूजासे लक्ष्मीसहित श्रीविष्णु तथा उसके सुखपूर्वक शयन करनेपर सम्पूर्ण देवता तृप्त होते हैं। अत: अतिथि सबके लिए परम पूजनीय है। यदि सूर्यास्तके बाद थका-माँदा अतिथि घर पर आ जाए तो उसे देवता समझे; क्योंकि वह सब यज्ञों का फलरूप है। थके हुए अतिथिके साथ गृहस्थके घरपर सम्पूर्ण देवता, पितर और अग्नि भी पधारते हैं। यदि अतिथि तृप्त हुआ तो उन्हें भी बड़ी प्रसन्नता होती है और यदि वह निराश होकर चला गया तो वे भी निराश होकर ही लौटते हैं।२ अत: प्राणनाथ! आप सर्वथा दुःख छोड़कर शान्ति धारण कीजिये और अपनी बुद्धि को शुभ में लगाकर धर्म का सम्पादन कीजिये। दूसरोंके द्वारा किये हुए उपकार और अपकार दोनों ही साधु पुरुषों के विचार से श्रेष्ठ हैं। अपकार करनेवालोंसे साथ जो अच्छा बर्ताव करे, वही पुण्यका भागी बताया गया है।३

कपोत बोला - सुमुखि! तुमने हम दोनों के योग्य ही उत्तम बात कही है; किन्तु इस विषय में मुझे कुछ और भी कहना है, उसे सुनो। कोई एक हजार प्राणियोंका भरण-पोषण करता है। दूसरा दसका ही निर्वाह करता है और कोई ऐसा है, जो सुखपूर्वक केवल अपनी जीविकाका काम चला लेता है; किन्तु हमलोग ऐसे जीवों में से हैं, जो अपना ही पेट बड़े कष्टसे भर पाते हैं। कुछ लोग खाई खोदकर उसमें अन्न भरकर रखते हैं। कुछ लोग कोठेभर धानके धनी होते हैं और कितने ही घड़ोंमें धान भरकर रखते हैं; परन्तु हमारे पास तो उतना ही संग्रह होता हिया, जितना अपनी चोंचमें आ जाए। शुभे! तुम्हीं बताओ, ऐसी दशा में इस थके-माँदे अतिथि का आदर-सत्कार मैं किस प्रकार करूँ?

कपोतीने कहा - नाथ! अग्नि, जल, मीठी वाणी, तृण और काष्ठ आदि जो भी सम्भव हो, वह अतिथिको देना चाहिये।  यह व्याध सर्दीसे कष्ट पा रहा है।१

अपनी प्यारी स्त्री का कथन सुनकर पक्षिराज कपोतने पेड़पर चढ़कर सब और देखा तो कुछ दूरीपर उसे आग दिखायी दी। वहाँ जाकर वह चोंच एक जलती हुई लड़की उठा लाया और व्याध आगे रखकर अग्निको प्रज्वलित किया; फिर सूखे काठ, पत्ते और तिनके बार-बार आग में डालने लगा। आग प्रज्वलित हो उठी। उसे देखकर सर्दी से दु:खी व्याध ने अपने जडवत् बने हुए अङ्गोंको तपाया। इससे उसको बड़ा आराम मिला। कपोती ने देखा व्याध क्षुधाकी आग में जल रहा है, तब उसने अपने स्वामीसे कहा- 'महाभाग! मुझे आग में डाल दीजिये। मैं अपने शरीर से इस दु:खी व्याधको तृप्त करूँगी। सुव्रत! ऐसा करनेसे तुम अतिथि-सत्कार करनेवाले पुण्यात्माओं के लोक में जाओगे।'

कपोत बोला - शुभे! मेरे जीते-जी यह तुम्हारा धर्म नहीं है। मुझे ही आज्ञा दो। में ही आज अतिथि-यज्ञ करूँगा।

यों कहकर कपोतने सबको शरण देनेवाले भक्तवत्सल विश्वरूप चतुर्भुज महाविष्णुका स्मरण करते हुए अग्निकी तीन बार परिक्रमा की; फिर व्याधसे यह कहते हुए अग्निमें प्रवेश किया कि 'मुझे सुखपूर्वक उपयोगमें लाओ।' कपोतने अपने जीवनको अग्निमें होम दिया, यह देख व्याध कहने लगा- 'अहो! मेरे इस मनुष्य-शरीरका जीवन धिक्कार देने योग्य है, क्योंकि मेरे ही लिए पक्षिराज ने यह साहसपूर्ण कार्य किया है।' यों कहते हुए व्याधसे कपोतीने कहा- 'महाभाग! अब मुझे छोड़ दो। देखो, मेरे ये पतिदेव मुझसे दूर चले जा रहे हैं।' उसकी बात सुनकर व्याध सहम गया और तुरंत ही पिंजड़ेमें पड़ी हुई कपोती की उसने छोड़ दिया। तब उसने भी पति और अग्निकी परिक्रमा करके कहा- 'स्वामीके साथ चिता में प्रवेश करना स्त्रियोंके लिए बहुत बड़ा धर्म है। वेद में इस मार्ग का विधान है और लोकमें भी सबने इसकी प्रशंसा की है। जैसे साँप पकड़नेवाला मनुष्य साँपको बिलसे बलपूर्वक निकाल लेता है, उसी प्रकार पतिका अनिगमन करनेवाली नारि पतिके साथ ही स्वर्गलोकमें जाति है।'२

यों कहकर कपोतीने पृथ्वी, देवता, गङ्गा तथा वनस्पतियोंको नमस्कार किया और अपने बच्चोंको सान्त्वना देकर व्याधसे कहा- 'महाभाग! तुम्हारी ही कृपा से मेरे लिए ऐसा शुभ अवसर प्राप्त हुआ है। मैं पति के' साथ स्वर्गलोकमें जाती हूँ।' यों कहकर वह पतिव्रता कपोती आग में प्रवेश कर गयी। इसी समय आकाश में जय-जयकारकी ध्वनि गूँज उठी। तत्काल ही सूर्य के समान तेजस्वी अत्यन्त सुंदर विमान उतार आया। दोनों दम्पति देवताके समान दिव्य शरीर धारण करके उसपर आरुढ़ हुए और आश्चर्य में पड़े हुए व्याधसे प्रसन्न होकर बोले- 'महामते! हम देवलोक में जाते हैं और तुम्हारी आज्ञा चाहते हैं। तुम अतिथिके रूप में हम दोनों के लिए स्वर्गकी सीढ़ी बनकर आ गये। तुम्हें नमस्कार है।'

उन दोनोंको श्रेष्ठ विमानपर बैठे देख व्याधने अपना धनुष और पिंजड़ा फेंक दिया और हाथ जोड़कर कहा- 'महाभाग! मेरा त्यागन न करो। मैं अज्ञानी हूँ। मुझे भी कुछ दो। मैं तुम्हारे लिए आदरणीय अतिथि होकर आया था, इसलिये मेरे उद्धारका उपाय बतलाओ।'

उन दोनों ने कहा - व्याध!  तुम्हारा कल्याण हो। तुम भगवती गोदावरीके तटपर जाओ और उन्हीं को अपना पाप भेंट कर दो। वहाँ पंद्रह दिनों तक डुबकी लगानेसे तुम सब पापोंसे मुक्त हो जाओगे। पापमुक्त होनेपर जब पुन: गौतमी गङ्गामें स्नान करोगे, तब अश्वमेध-यज्ञका फल पाकर अत्यन्त पुण्यवान् हो जाओगे। नदियों में श्रेष्ठ गोदावरी ब्रह्मा, विष्णु तथा महादेवजी के अंशसे प्रकट हुई हैं। उनके भीतर पुन: गोते लगाकर जब तुम अपने मलिन शरीरको त्याग दोगे, तब निश्चय ही श्रेष्ठ विमानपर आरुढ़ हो स्वर्गलोक में पहुँच जाओगे।

उन दोनोंकी बात सुनकर व्याधने वैसा ही किया, फिर वह भी दिव्य रूप धारण करके एक श्रेष्ठ विमानपर जा बैठा। कपोत, कपोती और व्याध-तीनों ही गौतमी गङ्गाके प्रभावसे स्वर्गमें चले गये। तभी से वह स्थान कपोततीर्थ केनाम से विख्यात हुआ। वहाँ स्नान, दान, पितरों की पूजा, जप और यज्ञ आदि कर्म करनेपर वे अक्षय फलको देनेवाले होते हैं।

१. तुष्टे भर्तरि नारीणां तुष्टा: स्यु: सर्वदेवता:। विपर्यये तु नारीणामवश्यं नाशमाप्नुयात् ॥

त्वं दैव त्वं प्रभुर्मह्यं परायणम्। त्वं व्रतं त्वं परं ब्रह्म स्वर्गो मोक्षस्त्वमेव च ॥

(८० । ४०-४१)

२. गुरुरग्निर्दिजातीनां वर्णानां ब्राह्मणो गुरु: ॥

पतिरेव गुरु: स्त्रीणां सर्वस्याभ्यागतो गुरु:। अभ्यागतमनुप्राप्तं वचनैस्तोषयन्ति

तेषां वागीश्वरी देवी तृप्त भवति निश्चितम्। तस्यान्नस्य प्रदानेन शक्रस्तृप्तिमवाप्नुयात्

पितर: पादशौचेन अन्नाद्यने प्रजापति:। तस्योपचाराद्वै लक्ष्मीर्विष्णुन प्रीतिमाप्नुयात्

शयने सर्वदेवास्तु तस्मात्पूज्यतमोऽतिथि:।

अभ्यागतमनुश्रान्तं सूर्योढं गृहमागतम्। तन विद्याद्देवरूपेण सर्वक्रतुफलो ह्यसौ ॥

अभ्यागतं श्रान्तमनुव्रजन्ति देवाश्च सर्वे पितरोऽग्रयश्च। तस्मिन् हि तृप्ते मुदवाप्नुवन्ति गते निराशेऽपि च ते निराशा: ॥

(८० । ४७-५२)

३. उपकारोऽ प्रवराविति सम्मतौ। उपकारिषु सर्वोऽपी करोत्युपकतिं पुन: ॥

अपकरिषु य: साधु: पुण्यभाक् स उदाहृत: ॥

(८० । ५४-५५)

१. अग्निराप: शुभा वाणी तृणकाष्ठादिकं च यत् । एतदप्यर्थिने देयं शीतार्तो लुब्धकस्त्वयम् ॥

(८० । ६०)

२. स्त्रिणामयं परो धर्मो यभ्दर्तुरनुवेशनम्। वेदे च विहितोमार्ग: सर्वलोकेषु पूजित: ॥

व्यालग्राही यथा व्यालं बिलादुद्धरते बलात्। एवं त्वनुगता नारि सह भर्त्रा दिवं व्रजेत् ॥

(८० । ७५-७६)