3 - वैवस्वत मनु के वंशजोंका वर्णन

लोमहर्षणजी कहते हैं - वैवस्वत मनु के नौ पुत्र उन्हीं के समान हुए; उनके नाम इस प्रकार हैं-इक्ष्वाकु, नाभाग, धृष्ट, शर्याति, नरिष्यन्त, प्रांशु, अरिष्ट, कुरुष तथा पृषध्र। एक समयकी बात है, प्रजापति मनु पुत्र की इच्छा से मैत्रवरुणयाग कर रहे थे। उस समय तक उन्हें कोई पुत्र नहीं हुआ था। उस यज्ञ में मनु ने मित्रावरुण के अंश की आहुति डाली। उसमें से दिव्य वस्त्र एवं दिव्य आभूषणों से विभूषित दिव्य रूप वाली इला नाम की कन्या उत्पन्नहुई। महाराज मनु ने उसे 'इला' कहकर सम्बोधित किया और कहा-'कल्याणी! तुम मेरे पास आओ।' तब इला ने पुत्री की इच्छा रखने वाले प्रजापति मनु से यह धर्मयुक्त वचन कहा-'महाराज! मैं मित्रावरुण के अंश से उत्पन्न हुई हूँ, अत: पहले उन्ही के पास जाऊँगी। आप मेरे धर्म में बाधा न डालिये।' यों कहकर वह सुन्दरी कन्या मित्रावरुण के समीपगयी और हाथ जोड़कर बोली-'भगवन्! मैं आप दोनों के अंश से उत्पन्न हुई हूँ। आप लोगों की किस आज्ञा का पालन करूँ? मनु ने मुझे अपने पास बुलाया है।'

मित्रावरुण बोले - सुन्दरी! तुम्हारे इस धर्म, विनय, इन्द्रिय संयम और सत्य से हम लोग प्रसन्न हैं। महाभागे! तुम हम दोनों की कन्या के रूप में प्रसिद्ध होगी तथा तुम्ही मनु के वंश का विस्तार करनेवाला पुत्र हो जाओगी। उस समय तीनों लोकों में सुद्युम्न के नाम से तुम्हारी ख्याति होगी।

यह सुनकर वह पिता के समीप से लौट पड़ी। मार्ग में उसकी बुध से भेंट हो गयी। बुध ने उसे मैथुन के लिये आमन्त्रित किया। उनके वीर्य से उसने पुरुरवा को जन्म दिया। तत्पश्चात् वह सुद्युम्न रूप में परिणत हो गयी। सुद्युम्न के तीन बड़े धर्मात्मा पुत्र हुए-उत्कल, गय और विन्ताश्व। उत्कल की राजधानी उत्कला (उड़ीसा) हुई। विन्ताश्व्र को पश्चिम दिशा का राज्य मिला तथा गय पूर्व दिशा के राजा हुए। उनकी राजधानी गया के नाम से प्रसिद्ध हुई। जब मनु भगवान् सूर्य के तेज में प्रवेश करने लगे, तब उन्होंने अपने राज्य को दस भागों में बाँट दिया। सुद्युम्न के बाद उनके पुत्रों में इक्ष्वाकु सबसे बड़े थे, इसलिये उन्हें मध्यप्रदेश का राज्य मिला। सुद्युम्न कन्या के रूप में उत्पन्न हुए थे, इसलिये उन्हें राज्य का भाग नहीं मिला फिर वसिष्ठजी के कहने से प्रतिष्ठानपुर का राज्य पाकर महायशस्वी सुद्युम्न उसे पुरुरवा को दे दिया। मनु कुमार सुद्युम्न क्रमश: स्त्री और पुरुष दोनों के लक्षणों से युक्त हुए, इसलिए इला और सुद्युम्न दोनों नामों से उनकी प्रसिध्दि हुई। नरिष्यन्त के पुत्र शक हुए। नाभाग के राजा अम्बरीष हुए। धृष्ट से धर्ष्टक नाम वाले क्षत्रियों की उत्पत्ति हुई, जो युद्ध में उन्मत होकर लड़ते थे। करुष के पुत्र कारुष नाम से विख्यात हुए। वे भी रणोन्मत्त थे। प्रांशु के एक ही पूत्र थे, जो प्रजापति के नाम से प्रकट हुए। शर्याति के दो जुड़वीं संतानें हुईं। उनमें अनर्त नाम से प्रसिद्ध पुत्र था सुकन्या नामवाली कन्या थी। यही सुकन्या महर्षि च्यवन की पत्नी हुई। अनर्त के पुत्र का नाम रैव था। उन्हें अनर्त देश का राज्य मिला। उनकी राजधानी कुशस्थली (द्वारका) हुई। रैवके पुत्र रैवत हुए, जो बड़े धर्मात्मा थे। उनका दूसरा नाम ककुद्मी भी था। अपने पिता के ज्येष्ठ पुत्र होने के कारण उन्हें कुशस्थली का राज्य मिला। एक बार वे अपनी कन्या को साथ ले ब्रह्माजी के पास गये और वहाँ गन्धर्वों के गीत सुनते हुए दो घड़ी ठहरे रहे। इतने ही समय में मानवलोक में अनेक युग बीत गये। रैवत जब वहाँ से लौटे, तब अपनी राजधानी कुशस्थली में आये; परन्तु अब वहाँ यादवों का अधिकार हो गया था। यदुवंशियों ने उसका नाम बदलकर द्वारवती रख दिया था। उसमे बहुत-से द्वार बने थे। वह पुरी बड़ी मनोहर दिखायी देती थी। भोज, वृष्णि और अन्धक वंश के वसुदेव आदि यादव उसकी रक्षा करते थे। रैवत ने वहाँ का सब वृतान्त ठीक-ठीक जानकार अपनी रेवती नाम की कन्या बलदेवजी को ब्याह दी और स्वयं मेरुपर्वत के शिखर पर जाकर वे तपस्या में लग गये। धर्मात्मा बलरामजी रेवती के साथ सुखपूर्वक विहार करने लगे। पृषध्रने अपने गुरु की गायका वध किया था, इसलिये वे शाप से शूद्र हो गये। इस प्रकार ये वैवस्वत मनु के नौ पुत्र बताये गये हैं। मनु जब छींक रहे थे, उस समय इक्ष्वाकु की उत्पत्ति हुई थी। इक्ष्वाकु के सौ पुत्र हुए। उनमें विकुक्षि सबसे बड़े थे। वे अपने पराक्रम के कारण अयोध्य नाम से प्रसिद्ध हुए। उन्हें अयोध्या का राज्य प्राप्त हुआ। उनके शकुनि आदि पाँच सौ पुत्र हुए, जो अत्यन्त बलवान् और उत्तर-भारत के रक्षक थे। उनमें से वशाति आदि अट्ठावन राजपुत्र दक्षिण दिशा के पालक हुए। विकुक्षि का दूसरा नाम शशाद था। इक्ष्वाकु के मरने पर वे ही राजा हुए। शशाद के पुत्र ककुत्स्थ, ककुत्स्थ के अनेना, अनेना के पृथु, पृथु के विष्टराश्व, विष्टराश्व के आर्द्र, आर्द्र के युवनाश्व और युवनाश्व के पुत्र श्रावस्त हुए विष्टराश्व उन्होंने ही श्रावस्तीपुरी बसायी थी। श्रावस्त के पुत्रबृहदश्व और उनके पुत्र कुवलाश्व हुए। ये बड़े धर्मात्मा राजा थे। इन्होनें धुन्धु नामक दैत्यका वध करने के कारण धुन्धुमार नाम से प्रसिध्दि प्राप्त की।

मुनि बोले - महाप्राज्ञ सूतजी! हम धुन्धुवधका वृतान्त ठीक-ठीक सुनना चाहते हैं, जिससे कुवलाश्वका नाम धुन्धुमार हो गया।

लोमहर्षणजी ने कहा - कुवलाश्व के सौ पुत्र थे। वे सभी अच्छे धनुर्धर, विद्याओं में प्रवीण, बलवान् और दुर्धर्ष थे। सबकी धर्म में निष्ठा थी। सभी यज्ञकर्ता तथा प्रचुर दक्षिणा देने वाले थे। राजा बृहदश्वने कुवलाश्व को राजपद पर अभिषिक्त किया और स्वयं वन में तपस्या करने के लिये जाने लगे। उन्हें जाते देख ब्रह्मार्षि उत्तरङ्क ने रोका और इस प्रकार कहा-'राजन्! आपका कर्तव्य है प्रजा की रक्षा, अत: वही कीजिये। मेरे आश्रम के समीप मधु नामक राक्षस का पुत्र महान् असुर धुन्धु रहता है। वह सम्पूर्ण लोकों का संहार करने के लिये कठोर तपस्या करता और बालू के भीतर सोता है। वर्षभर में एक बार वह बड़े जोर से साँस छोड़ता है। उस समय वहाँ की पृथ्वी डोलने लगती है। उसके श्वास की हवा से बड़े जोर की धूल उड़ती है और सूर्य का मार्ग ढँक लेती है। लगातार सात दिनों तक भूकम्प होता रहता हैं। इसलिये अब मैं अपने उस आश्रम में रह नहीं सकता। आप समस्त लोकों के हित की इच्छा से उस विशालकाय दैत्य को मार डालिये। उसके मारे जाने पर सब सुखी हो जाएँगे।'

बृहदश्व बोले - भगवन्! मैंने तो अब अस्त्र-शास्त्रों का त्याग कर दिया। यह मेरा पुत्र है। यही धुन्धु दैत्य का वध करेगा। राजर्षि बृहदश्व अपने पुत्र कुवलाश्व को धुन्धु के वध की आज्ञा दे स्वयं पर्वत के समीप चले गये। कुवलाश्व अपने सब पुत्रों को साथ ले धुन्धु को मारने चले। साथ में महर्षि उत्तरङ्क भी थे। उत्तरङ्क के अनुरोध से सम्पूर्ण लोकों का हित करने के लिये साक्षात् भगवान् विष्णु ने कुवलाश्व के शरीर में अपना तेज प्रविष्ट किया। दुर्धर्ष वीर कुवलाश्व जब युद्ध के लिये प्रस्थित हुए, तब देवताओं का यह महान् शब्द गूँज उठा-'ये श्रीमान् नरेश अवध्य हैं। इनके हाथ से आज धुन्धु अवश्य मारा जाएगा।' पुत्रों के साथ वहाँ जाकर वीरवर कुवलाश्व ने समुद्र को खुदवाया। खोदने वाले राजकुमारों ने बालू' के भीतर धुन्धु का पता लगा लिया। वह पश्चिम दिशा को घेरकर पड़ा था। वह अपने मुख की आग से सम्पूर्ण लोकों का संहार-सा करता हुआ जल का स्रोत बहाने लगा। जैसे चंद्रमा के उदयकाल में समुद्र में ज्वार आता हैं, उसकी उत्ताल तरङ्गें बढ़ने लगती हैं, उसी प्रकार वहाँ जल का वेग बढ़ने लगा। कुवलाश्व के पुत्रों में से तीन को छोड़कर शेष सभी धुन्धु की मुखाग्नि से जलकर भस्म हो गये। तदनन्तर महातेजस्वी राजा कुवलाश्व ने उस महाबली धुन्धु पर आक्रमण किया। वे योगी थे; इसलिये उन्होंने योगशक्ति के द्वारा वेग से प्रवाहित होने वाले जल को पी लिया और आग को भी बुझा दिया फिर बलपूर्वक उस महाकाय जलचर राक्षस को मारकर महर्षि उत्तरङ्क का दर्शन किया। उत्तरङ्क उन महात्मा राजा को वर दिया कि 'तुम्हारा धन अक्षय होगा और शत्रु तुम्हें पराजित न कर सकेंगे। धर्म में सदा तुम्हारा प्रेम बना रहेगा तथा अन्त में तुम्हे स्वर्गलोक का अक्षय निवास प्राप्त होगा। युद्ध में तुम्हारे जो पुत्र राक्षस द्वारा मारे गये हैं, उन्हें भी स्वर्ग में अक्षयलोक प्राप्त होंगे।'

धुन्धुमार के जो तीन पुत्र युद्ध से जीवित बच गये थे, उनमें दृढाश्व सबसे ज्येष्ठ थे और चन्द्राश्व तथा कपिलाश्व उनके छोटे भाई थे। दृढाश्व के पुत्र का नाम हर्यश्व का पुत्र निकुम्भ हुआ, जो सदा क्षत्रिय-धर्म में तत्पर रहता था। निकुम्भ का युद्धविशारद पुत्र संहताश्व था। संहताश्व के दो पुत्र हुए-अकृशाश्व और कृशाश्व। उसके हेमवती नामकी एक कन्या भी हुई, जो आगे चलकर दृषद्विती के नाम से प्रसिद्ध हुई। उसका पुत्र प्रसेनजित् हुआ, जो तीनों लोकों में विख्यात था। प्रसेनजित् ने गौरी नाम वाली पतिव्रता स्त्री से ब्याह किया था, जो बाद में पति के शाप से बाहुदा नाम की नदी हो गयी। प्रसेनजित् के पुत्र राजा युवनाश्व हुए। युवनाश्व के पुत्र मान्धाता हुए। वे त्रिभुवन विजयी थे। शशबिन्दु की सुशीला कन्या चैत्रराठी, जिसका दूसरा नाम बिन्दुमती भी था, मान्धाता की पत्नी हुई। इस भूतल पर उसके समानरूपवती स्त्री दूसरी नहीं थी। बिन्दुमती बड़ी पतिव्रता थी। वहदस हजार भाइयों की ज्येष्ठ भगिनी थी। मान्धाताने उसके गर्भ से धर्मज्ञ पुरुकुत्स्थ और राजा मुचुकुन्द-ये दो पुत्र उत्पन्न किये। पुरुकुत्स्थ के उनकी स्त्री नर्मदा के गर्भ से राजा त्रसदस्यु उत्पन्न हुए, उनसे सम्भूत का जन्म हुआ। सम्भूत के पुत्र शत्रुदमन त्रिधन्वा हुए। राजा त्रिधन्वा से विद्वान् त्रय्यारुण हुए। उनका पुत्र महाबली सत्यव्रत हुआ। उसकी बुद्धि बड़ी खोटी थी। उसने वैवाहिक मन्त्रों में विघ्न डालकर दूसरे की पत्नी का अपहरण कर लिया। बालस्वभाव, कामासक्ति, मोह, साहस और चञ्चलतावश उसने ऐसा कुकर्म किया था। जिसका अपहरण हुआ था, वह उसके किसी पुरवासी की कन्या थी। इस अधर्म रुपी शङ्कु (काँटे)-के कारण कुपित होकर त्रय्यारुण ने अपने उस पुत्र को त्याग दिया। उस समय उसने पूछा-'पिताजी! आपके त्याग देने पर मैं कहाँ जाऊँ?' पिता ने कहा-'ओ कुलकलङ्क! जा, चाण्डालोंके साथ रह। मुझे तेरे-जैसे पुत्र की आवश्यकता नहीं है।' यह सुनकर वह पिता के कथनानुसार नगर से बाहर निकल गया। उस समय महर्षि वसिष्ठ ने उसे मना नहीं किया। वह सत्यव्रत चाण्डाल के घर के पास रहने लगा। उसके पिता भी वन में चले गये। तदनन्तर उसी अधर्म के कारण इन्द्र ने उस राज्य में वर्षा बंद कर दी। महाततपस्वी विश्वामित्र उसी राज्य में अपनी पत्नी को रखकर स्वयं समुद्र के निकट भारी तपस्या कर रहे थे। उनकी पत्नी ने अकालग्रस्त हो अपने मझले औरस पुत्र के गले में रस्सी डाल दी और शेष परिवार के भरण-पोषण के लिए सौ गायें लेकर उसे बेच दिया। राजकुमार सत्यव्रत ने देखा कि विक्रय के लिए इसके गले में रस्सी बँधी हुई है; तब उस धर्मत्माने दया करके महर्षि विश्वामित्र के उस पुत्र को छुड़ा लिया और स्वयं ही उसका भरण-पोषण किया। ऐसा करने में उसका उद्देश्य था महर्षि विश्वामित्र को संतुष्ट करके उनकी कृपा प्राप्त करना। महर्षि का वह पुत्र गले में बन्धन पड़ने के कारण महातपस्वी गालव के नाम से प्रसिद्ध हुआ।