ब्रह्म पुराण

50 - मातृतीर्थ, अविघ्नतीर्थ और शेषतीर्थकी महिमा

ब्रह्माजी कहते हैं - गौतमी के तटपर मातृतीर्थके नामसे विख्यात जो उत्तम तीर्थ है, वह मनुष्योंको सब प्रकारकी सिद्धि देनेवाला है। जीव उसके स्मरण क्र्नेमात्र से समस्त मानसिक चिंताओंसे मुक्त हो जाता है। पूर्वकाल में देवताओं और असुरोंके बीच बड़ा भयंकर संग्राम छिड़ा था। उस समय देवतालोग दानवोंको परास्त न कर सके। तब मैं सब देवताओं के साथ शूलपाणि भगवान् शंकरके पास गया और हाथ जोड़कर नाना प्रकार के वाक्योंद्वारा उनका स्तवन करने लगा- 'महेश! जिस समय सम्पूर्ण देवताओं और असुरोंने एक-दूसरेसे सलाह करके समुद्रका मन्थन किया और उसमें से एक कालकूट विष निकला, उसे खा लेने में आपके सिवा दूसरा कौन समर्थ हो सकता था। जिसके सामने दूसरे देवता मस्तक झुकाते हैं तथा जो केवल फूलोंकी मारसे तीनों लोकोंको अपने अधीन करनेमें समर्थ है, वाही कामदेव जब आप पर आक्रमण करने चला, तब स्वयं ही नष्ट हो गया। अत: आपसे बढ़कर शक्तिशाली दूसरा कौन है।'

यह स्तुति सुनकर भगवान् शंकर प्रशन्न हो गये और बोले- 'देवताओ! बतलाओ, क्या चाहते हो? मैं तुम्हें अभीष्ट वरदान दूँगा।' देवता बोले- 'वृषभध्वज! हमपर दानवोंकी ओरसे बड़ा भारी भय उपस्थित हुआ है। आप वहाँ चलकर शत्रुओंका संहार और देवताओंकी रक्षा करें। प्रभो हम आपसे सनाथ हैं।' देवताओंके इतना कहते ही भगवान् शंकर उस स्थान आये, जहाँ दैत्य युद्धके लिए खड़े थे। वहाँ दैत्योंका शंकरजी के साथ घमासान युद्ध छिड गया। दैत्य इधर-उधर भागने लगे। युद्ध करते समय शंकरजी के ललाटसे पसीने की बूँदें गिरने लगीं। वे बूँदें जहाँ-जहाँ गिरीं, वहाँ-वहाँ शिवके आकारकी ही माताएँ प्रकट हो गयीं। वे भगवान् महेश्वरसे बोलीं- 'आप आज्ञा दें तो हम सब असुरोंको कहा जाएँ।' तब देवताओं से घिरे हुए भगवान् ने कहा- 'शत्रु जहाँ-जहाँ जाएँ, सर्वत्र उनका पीछा करो। इस समय वे मेरे डर से रसातल में जा पहुँचे हैं। तुम भी रसातलतक उनके पीछे-पीछे जाओ।' यह आज्ञा पाकर सब माताएँ पृथ्वी छेदकर रसातल में गयीं और अत्यन्त भयंकर दैत्यों तथा दानवों का संहार करके फिर उसी मार्गसे देवताओंके पास लौट आयीं। माताओंके जाने से लौटनेतक देवता गौतमीके तटपर खड़े रहे। लौटनेपर देवताओंने माताओंको वर दिया- 'संसारमें जिस प्रकार शिवकी पूजा होती है, उसी प्रकार माताओं की भी हो।' यों कहकर देवता अन्तर्धान हो गये और माताएँ वहीँ रह गयी। जहाँ-जहाँ वे देवियाँ स्थित हुईं, वह सब स्थान मातृतीर्थ माना जाता है। वे सभी तीर्थ देवताओंके लिए भी सेव्य हैं, फिर मनुष्य आदिके लिए तो बात ही क्या है। शिवजी के कथनानुसार उन तीर्थोंमें किया हुआ आनन, दान और तर्पण- सब अक्षय होता है। जो मनुष्य मातृतीर्थोंके इस उपाख्यानको प्रतिदिन सुनता, स्मरण रखता और पढ़ता है, वह दीर्घायु और सुखी होता है।

मातृतीर्थके अन्तर अविघ्नतीर्थ है, जो सब विघ्नोंका नाश करनेवाला है। नारद! वहाँ का वृतान्त भी बतलाता हूँ, भक्तिपूर्वक सुनो। "एक बार गौतमीके उत्तर-तटपर देवताओंका यज्ञ आरम्भ हुआ, किन्तु विघ्न-दोषके कारण उसकी समाप्ति नहीं हुई। तब सब देवताओंने मुझसे और भगवान् विष्णुसे इसका कारण पूछा। उस समय मैंने ध्यानस्थ होकर कारणका पता लगाया और कहा- 'इसमें गणेशजी विघ्न डाल रहे हैं। इसलिये इस यज्ञ की समाप्ति नहीं हो पाति। अत: सब लोग आदिदेव विनायककी स्तुति करें।' मेरा आदेश पाकर सब देवता गौतमीमें स्नान करके आदिदेव गणेशकी भक्तिपूर्वक स्तुति करनेलगे।

देवता बोले - सदा सब कार्योंमें सम्पूर्ण देवता तथा शिव, विष्णु और ब्रह्माजी भी जिनका पूजन, नमस्कार और चिन्तन करते हैं, उन विघ्नराज गणेशकी हम शरण लेते हैं। विघ्नराज गणेशके समान मनोवाञ्छित फल देनेवाला कोई देवता नहीं है, ऐसा निश्चय करके त्रिपुरारी महादेवजीने भी त्रिपुरवधके समय पहले उनका पूजन किया था। जिनका ध्यान करनेसे सम्पूर्ण देहधारियों के मनोरथ पूर्ण हो जाते हैं, वे अम्बिकानन्दन गणेश इस महायज्ञ में शीघ्र ही हमारे विघ्नोंका निवारण करें। 'देवी पार्वतीके चिन्तनमात्रसे ही गणेशजी- जैसा पुत्र उत्पन्न हो गया। इससे सम्पूर्ण जगत् में महान् उत्सव छा गया है।' यह बात उन देवताओंने अपने मुख से कही थी, जो नवजात शिशुके रूप में गणेशजी को नमस्कार करके कृतार्थ हुए थे। माता की गोद में बैठे हुए और माता के मना करनेपर भी उन्होंने पिता के ललाटमें स्थित चन्द्रमाको बलपूर्वक पकड़कर उनकी जटाओंमें छिपा दिया, यहे गणेशजीका बालविनोद था। यद्यपि वे पूर्ण तृप्त थे ति भी अधिक देरतक माता के स्तनोंका दूध इसलिये पीते रहे कि कहीं बड़े भैया कार्तिकेय भी आकर न पीने लगें। उनकी बुद्धिमें बालस्वभाववश भाईके प्रति ईर्ष्या भर गयी थी। यह देखकर भगवान् शंकरने विनोदवश कहा- 'विघ्नराज! तुम बहुत दूध पीते हो, इसलिये लम्बोदर हो जाओ।' यों कहकर उन्होंने उनका नाम 'लम्बोदर' रख दिया। देवसमुदायसे घिरे हुए महेश्वरने कहा- 'बेटा! तुम्हारा नृत्य होना चाहिये।' यह सुनकर उन्होंने ओने घूँघुरकी आवाजसे ही शंकरजी को संतुष्ट कर दिया। इससे प्रसन्न होकर शिव ने अपने पुत्रको गणेशके पदपर अभिषिक्त कर दिया।जो एक हाथ में विघ्नपाश और दूसरे हाथ से कंधेपर कुठार लिए रहते हैं तथा पूजा न पाने पर अपनी माता के कार्य में भी विघ्न डाल देते हैं, उन विघ्नराज के समान दूसरा कौन है। जो धर्म, अर्थ और काम आदि में सबसे पहले पूजनीय हैं तथा देवता और असुर भी प्रतिदिन जिनकी पूजा करते हैं, जिनके पूजनका फल कभी नष्ट नहीं होता, उन प्रथम-पूजनीय गणेशको हम पहले मस्तक नवाते हैं। जिनकी पूजासे सबको प्रार्थनाके अनुरूप सब प्रकारके फल की सिद्धि दृष्टिगोचर होती है, जिन्हें अपने स्वतंत्र सामर्थ्यपर अत्यन्त गर्व है, उन बन्धुप्रिय मूषक वाहन गणेशजी की हम स्तुति करते हैं। जिन्होंने अपने सरस संगीत, नृत्य, समस्त मनोरथोंकी सिद्धि तथा विनोदके द्वारा माता पार्वतीको पूर्ण संतुष्ट किया है, उन अत्यन्त संतुष्ट हृदयवाले श्रीगणेशकी हम शरण लेते हैं।

इस प्रकार देवताओंके स्तवन करनेपर गणेशजी ने उनसे कहा- 'देवताओ! अब तुम्हारे यज्ञ में विघ्न नहीं पड़ेगा।' जब देवयज्ञ निर्विघ्य पूरा हो गया तब गणेशजी ने उन देवताओंसे कहा- 'जो लोग इस स्तोत्र से भक्तिपूर्वक मेरी स्तुति करेंगे, उन्हें कभी दरिद्रता और दु:खका सामना नहीं करना पड़ेगा। जो इस तीर्थ मेंआलस्य छोड़कर भक्तिपूर्वक स्नान और दान करेंगे, उनके शुभ कार्य निर्विघ्न सिद्ध होंगे। इस बात का आप लोग भी अनुमोदन करें।' उनके इतना कहनेके साथ ही देवताओंने एक स्वरसे कहा- 'ऐसा ही होगा।' यज्ञय समाप्त होनेपर देवता अपने-अपने स्थानको चले गये। तबसे वह तीर्थ 'अविघ्न तीर्थ' कहलाने लगा। वह मनुष्योंकी समस्त कामनाओंको पूर्ण करनेवाला तथा सम्पूर्ण विघ्नों को मिटानेवाला है।

अविघ्नतीर्थके बाद शेषतीर्थ है, वह भी समस्त अभीष्ट वस्तुओंको देनेवाला है। मैं उसके स्वरुप का वर्णन करता हूँ। रसातलके स्वामी महानाग शेष सम्पूर्ण नागोंके साथ रसातलमें रहनेके लिए गये। परन्तु राक्षसों, दैत्यों और दानवों ने, जिनका रसातल में पहले से ही प्रवेश हो चुका था, नागराजको वहाँ से निकाल दिया। तब वे मेरे ओअस आकार बोले- 'भगवन्! आपने राक्षसोंको तथा हम लोगोंको भी रसातल दे रखा है, किन्तु दैत्य और राक्षस हमें वहाँ स्थान नहीं देना चाहते; इसलिये आपकी शरण में आया हूँ।' तब मैंने नाग से कहा- 'तुम गौतमीके तटपर जाओ, वहाँ महादेवजी की स्तुति करनेसे तुम्हारा मनोरथ पूर्ण होगा। उनके सिवा दूसरा कोई तीनों लोकों में ऐसा नहीं है, जो सबके मनोरथ सिद्ध कर सके। मेरे कहनेसे शेषनाग वहाँ गये और गङ्गा में स्नान करके हाथ जोधकर देवेश्वर महादेवकी स्तुति करने लगे- 'तीनों लोकों के स्वामी भगवान् शंकरको नमस्कार है। जो दक्षयज्ञके विध्वंसक, जगत् के आदि विधाता तथा त्रिभुवनरूप हैं, उन भगवान् शिवको नमस्कार है। जिनके सहस्त्रों मस्तक हैं, उन भगवान् सदाशिवको नमस्कार है। सबका संहार करनेवाले रूद्रदेवको नमस्कार है। भगवन्! आप सोम, सूर्य, अग्नि और जलरूप हैं; आपको नमस्कार है। जो सर्वदा सर्वस्वरूप और कालरूप हैं, उन भगवान् शिव को नमस्कार है। सर्वेश्वर! मेरी रक्षा कीजिये। जगन्नाथ! आपको नमस्कार है। मेरा मनोरथ पूर्ण कीजिये।'

इस स्तुतिसे प्रसन्न होकर महेश्वरने नागराज को मनोवाञ्छित वर दिया, जो देवताओंसे शत्रुता रखनेवाले दैत्य, दानव तथा राक्षसोंके विनाश में सहायक था। भगवान् ने शेषनाग को शूल देकर कहा- 'इससे अपने शत्रुओंका संहार करो।' भगवान् शिव की यह आज्ञा पाकर शेषनाग सर्पों के साथ रसातल में गये। वहाँ उन्होंने शूलसे अपने शत्रु दैत्य, दानव तथा राक्षसों का वध किया और फिर भगवान् शेषेश्वरका दर्शन करनेके लिए वे गौतमी-तटपर लौट आये। नागराज जिस मार्गसे आये थे, उसमें रसातल से वहाँ तक छेद हो गया था। उस बिलसे गौतमी गङ्गाका अत्यन्त पुण्यदायक जल पातालगङ्गा में जा मिला। इस प्रकार उन दोनों का संगम हुआ। भगवान् शेषश्वरके सामने एक विशाल कुण्ड बनाकर शेषनाग ने उसमें हवन किया। उस कुण्ड में सदा अग्निदेव स्थित रहते हैं। उसमें गङ्गाके जल का संगम होनेसे वह जल गरम हो गया। महायशस्वी शेषनाग महादेवजी की आराधना करके पुन: अपने अभीष्ट स्थान रसातल में चले गये। तब से वह तीर्थ नागतीर्थ एवं शेषतीर्थ के नामसे प्रसिद्ध हुआ। वह सम्पूर्ण अभीष्ट वस्तुओंको देनेवाला, पवित्र अट्टहा रोग और दरिद्रता का नाशक है। उससे आयु एवं लक्ष्मीकी भी प्राप्ति होती है। वह पवित्र तुरत स्नान और दान से मोक्ष देनेवाला है। जो मनुष्य इस प्रसङ्गका भक्तिपूर्वक श्रवण, पाठ अथवा मनन करता हिया, उसकी सब कामनाएँ पूर्ण होती हैं। जहाँ शेषश्वरतीर्थ है और जहाँ शक्ति प्रदान करनेवाले भगवान् शिव हैं, वहाँ गौतमीके दोनों तटोंपर इक्कीस सौ तीर्थ हैं, जो सब प्रकार की सम्पत्ति देनेवाले हैं।