ब्रह्म महा पुराण
51 - अश्वत्थ-पिप्पलतीर्थ, शनैश्चरतीर्थ, सोमतीर्थ, धान्यतीर्थ और विदर्भा-संगम तथा रेवती-संगम-तीर्थकी महिमा
ब्रह्माजी कहते हैं - गोदावरी के उत्तर-तटपर अश्वत्थतीर्थ, पिप्पलतीर्थ और शनैश्चरतीर्थ हैं। उनका फल सुनो पूर्वकाल की बात है- देवताओंने महर्षि अगस्त्यसे अनुरोध किया था कि आप विन्ध्यपर्वतको आदेश देकर ऊपर उठनेसे रोकें। महर्षि अगस्त्य धीरे-धीरे सहस्त्रों मुनियों के साथ विन्ध्यपर्वतके समीप गये। उन्होंने देखा नगश्रेष्ठ विन्ध्य असंख्य वृक्षोंसे व्याप्त, सैकड़ों शिखरोंसे घिरा हुआ और बहुत ही ऊँचा है। ऊँचाईयोंमें वह मेरुगिरि और सूर्यसे टक्कर ले रहा है। मुनि के आनेपर विन्ध्यपर्वतने उनका आतिथ्य-सत्कार किया। मुनिश्रेष्ठ अगस्त्यने सब ब्राह्मणोंके साथ विन्ध्यगिरिकी प्रशंसा की और देवताओंका कार्य सिद्ध करनेके लिए इस प्रकार कहा- 'पर्वतश्रेष्ठ! मैं तत्त्वदर्शी मुनियोंके साथ तीर्थयात्रा के उद्देश्य से दक्षिण दिशाकी यात्रा करना चाहता हूँ, तुम मुझे जानेका मार्ग दो। मैं तुमसे आतिथ्यमें यही माँगता हूँ- जबतक लौट न आऊँ, तबतक तुम नीचे होकर ही रहना। इसके विपरीत न करना।' विन्ध्यपर्वत ने कहा- 'बहुत अच्छा। ऐसा ही करूँगा।' महर्षि अगस्त्य उन मुनियों के साथ दक्षिण दिशा में चले गये। वे धीरे-धीरे गौतमी के तटपर पहुँचकर संवत्सरिक यज्ञ में दीक्षित हो गये। उन्होंने ऋषियोंके साथ एक वर्षतक के लिए यज्ञ आरम्भ कर दिया।
उन दिनों कैटभके दो पापी पुत्र राक्षस धर्मके कंटक हो रहे थे। उनका नाम था- अश्वत्थ और पिप्पल। वे देवलोक में भी प्रसिद्ध थे। ब्राह्मणोंको पीड़ा देना उनका नित्यका काम था। ब्राह्मणों का कष्ट देख महर्षिगण गोदावरीके दक्षिणतटपर नियमपूर्वक तपस्या करनेवाले सूर्यपुत्र शनैश्चरके पास गये और उनसे उन राक्षसोंके सब अत्याचार कह सुनाये। यह सुनकर श्नैश्चर ब्राह्मण के वेष में रहनेवाले अश्वत्थ नामक राक्षसके पास गये और स्वयं भी ब्राह्मण बनकर उन्होंने उसकी परिक्रमा की। उन्हें परिक्रमा करते देख राक्षसने ब्राह्मण ही समझा और प्रतिदिनकी भाँति माया करके उस पापी राक्षस ने उनको भी अपना ग्रास बना लिया। उसके शरीर में प्रवेश करके शनि ने उसकी आँतोंको देखा। शनिकी दृष्टि पड़ते ही वह पापात्मा राक्षस वज्रके मारे हुए पर्वतकी भाँति क्षणभरमें जलकर भस्म करके वे ब्राह्मणरूप धारी शनि दूसरे राक्षस के पास गये। वहाँ उन्होंने अपने को वेदाध्ययन करनेवाले ब्राह्मण के रूप में उपस्थित किया, मानों वे विनीत शिष्य थे और पिप्पल गुरु। पिप्पलने पहलेकी ही भाँति अन्य शिष्योंके समान शनैश्चरको भी अपना आहार बनाया, किन्तु उदरमें प्रवेश करनेपर शनिने उसकी आँतों पर दृष्टि डाली। उनके देखते ही वह भी जलकर भस्म हो गया। इस प्रकार उन दोनोंको मारकर सूर्यपुत्र शनैश्चरने मुनियोंसे पूछा- 'अब मेरे लिए कौन-सा कार्य है? आप लोग बताएँ।' मुनियोंको बड़ा हर्ष हुआ। उन्होंने शानिको इच्छानुसार वर देना चाहा। शनैश्चर बोले- 'जो मेरे दिनको नियमसे रहकर अश्वत्थका स्पर्श करें, उनके सब कार्य सिद्ध हो जाएँ और मेरे द्वारा होनेवाली पीड़ा भी उन्हें न हो। जो मनुष्य अश्वत्थतीर्थ में स्नान करें, उनके भी सब कार्य सिद्ध हो जाएँ। जो मानव शनिवारको प्रात:काल उठकर अश्वत्थका स्पर्श करते हैं, उनकी समस्त ग्रहपीड़ा दूर हो जाय।' तबसे उस तीर्थको अश्वत्थतीर्थ, पिप्पलतीर्थ और शनैश्चरतीर्थ भी कहते हैं। अगस्त्य, सात्रिक, याज्ञिक और सामग आदि सोलह हजार एक सौ आठ तीर्थ वहाँ वास करते हैं। उन तीर्थोंमें किया हुआ स्नान और दान सम्पूर्ण यज्ञोंका फल देनेवाला है।
इसके आगे विख्यात सोमतीर्थ है। उसमें स्नान और दान करनेसे सोमपानका फल मिलता है। औषधियाँ पूर्वकाल से ही सम्पूर्ण जगत् की माताएँ हैं। उन्हींमें यज्ञ, स्वाध्याय और धर्मकार्य प्रतिष्ठित है। ओषधियों से ही समस्त रोगोंका निवारण होता है। उन्हींसे अन्नकी उत्पत्ति और सबके प्राणोंकी रक्षा होती है। एक दिन ओषधियोंने मुझसे कहा- 'सुरश्रेष्ठ! हम लोगोंको एक ऐसा पति दीजिये, जो राजा हो।' उनकी बात सुनकर मैंने कहा- 'तुम सबको राजा पतिरूपमें प्राप्त होगा।' तब उन्होंने पुन: प्रश्न किया- 'इसके लिए हमें कहाँ जाना होगा?' मैंने कहा- 'माताओ! तुम गौतमीके तटपर जाओ। गौतमीके प्रसन्न होनेपर तुम्हें लोकपूजित राजा की प्राप्ति होगी।' यह सुनकर वे वहाँ गयीं और गौतमीकी स्तुति करने लगीं।
ओषधियाँ बोलीं - भगवान् शंकरकी प्रियतमा पुण्यसलिला गौतमी! यदि आप इस भूतलपर न आतीं तो संसारके प्राणी, जो नाना प्रकार की पापराशियोंसे तिरस्कृत एवं दु:खी हो रहे हैं, क्या करते। नदीश्वरि! भूमण्डलके मनुष्योंके सौभाग्यका अनुमान कौन कर सकता है, जिनके महापातकोंका नाश करनेवाली आप जगन्माता गङ्गा उनके लिए सदा ही सुलभ हैं। तीनों लोकों की वन्दनीया जगज्जननी गङ्गा! आपके वैभवको कोई नहीं जानता; क्योंकि कामदेवके शत्रु भगवान् शंकर भी आपको सदा मस्तकपर लिए रहते हैं। मनोवांछित फल देनेवाली माता! तुम्हें नमस्कार है। पापोंका विनाश करनेवाली ब्रह्मयी देवी! तुम्हें नमस्कार है। भगवान् विष्णुके चरणकमलोंसे निकली हुई गङ्गा! तुम्हें नमस्कार है। भगवान् शंकर की जटासे प्रकट हुई गौतमी देवी! तुम्हें नमस्कार है।
इस प्रकार स्तुति करनेवाली ओषधियोंसे गङ्गाजी ने कहा- 'देवियो! बताओ, तुम्हें क्या दूँ?' ओषधियाँ बोलीं- 'जगन्माता! हमें अत्यन्त तेजस्वी राजा को पतिरूप में दीजिए।' गङ्गाजीने कहा- 'माता ओषधियो! मैं अमृतरूप हूँ। तुम भी अमृतस्वरूपा हो। अत: तुम्हें तुम्हारे योग्य ही अमृतात्मा सोमको पतिरूप में देती हूँ।' गौतमीके इस वरदानका देवताओं, ऋषियों, चन्द्रमा तथा ओषधियोंने भी अनुमोदन किया। इसके बाद वे सब अपने-अपने स्थानको चली गयीं। जिस स्थान पर ओषधियोंने समस्त पाप-संतापका निवारण करनेवाले अमृतस्वरुप राजा सोमको पतिरूपमें प्राप्त किया, वह सोमतीर्थके नामसे प्रसिद्ध हुआ। वहाँ स्नान और दान करनेसे पितर स्वर्गमें जाते हैं। जो प्रतिदिन इस प्रसङ्गको पढ़ता, सुनता अथवा भक्तिपूर्वक स्मरण करता है, वह दीर्घायु, पुत्रवान् और धनवान् होता है।
तदनन्तर धान्यतीर्थ है, जो मनुष्योंकी सब अभीष्ट वस्तुओं को देनेवाला है। वह सुकाल उपस्थित करनेवाला, कल्याणप्रद तथा मनुष्योंको सब प्रकारकी आपत्तिसे मुक्त करनेवाला है। राजा सोमको पतिरूप में पाकर ओषधियाँ बहुत प्रसन्न हुई थीं। उन्होंने सब लोगों तथा गङ्गा के सामने यह अभीष्ट वचन कहा- 'वेदमें एक पवित्र गाथा है, जिसे वेदोंके विद्वान जानते हैं। जिस भूमि में फसल उगी हुई है, वह माता के समान किंवा साक्षात् माता ही है। जो गङ्गाजी के समीप उसका दान करता हिया, वह समस्त अभिलषित वस्तुओंको प्राप्त कर लेता है। जो मानव खेती लगी हुई भूमि, गौ तथा ओषधियोंको ब्रह्मा, विष्णु एवं शिवरूप ब्राह्मणके लिए भक्तिपूर्वक दान देता है, उसका किया हुआ सब दान अक्षय होता हिया तथा वह अपने सम्पूर्ण अभीष्टोंको प्राप्त कर लेता है। ओषधियाँ सोम राजाकी प्रिय हैं और सोम भी ओषधियोंके पति हैं- यह जानकार जो ब्रह्मवेत्ता ब्राह्मणको ओषधि (अन्न) दान करता है, वह सम्पूर्ण अभिलषित वस्तुओंको पाता और ब्रह्मलोक में प्रतिष्ठित होता है। ओषधियाँ राजा सोम से बातचीत करती हुई कहती हैं- 'राजन्! हम ब्रह्मरूपिणी और प्राणरूपिणी हैं। जो हमें ब्राह्मणोंको दान करे, उसे तुम पार लगाओ। स्थावर-जङ्गमरूप जितना भी जगत् है, वह सब हम लोगोंसे व्याप्त है। हव्य, कव्य, अमृत तथा जो कुछ भी भोजन के काम आता है, वह हमारा ही श्रेष्ठ अंश है- यह जानकार जो अन्नका दान करता है, राजन्! उसे पार लगाओ। राजा सोम! जो भक्तिपूर्वक इस वैदिकी की गाथा का श्रवण, स्मरण अथवा पाठ करे, उसे तुम पार लगाओ।'
गङ्गा के किनारे जिस स्थान पर राजा सोमके साथ ओषधियोंने इस वैदिकी गाथाका पाठ किया था, वह धान्यतीर्थ कहलाता है। उस दिनसे उसके कई नाम हो गये- औषध्यतीर्थ, सौम्यतीर्थ, अमृततीर्थ, वेदगाथा तीर्थ और मातृतीर्थ। जो मनुष्य इन तीर्थोंमें स्नान, जप, होम, दान, पितृ-तर्पण और अन्न-दान करता है, उसका वह सब कर्म अक्षय फल देनेवाला होता है। वहाँ दोनों तटोंपर एक हजार छ: सौ तीर्थहैं, जो सब पापोंका नाश करनेवाले और सब प्रकारकी सम्पत्ति बढ़ानेवाले हैं।
वहाँ विदर्भा-संगम और रेवती-संगमतीर्थ भी हैं। अब उनका वृत्तान्त बतलाऊँगा। पुराणवेत्ता पुरुष उसे जानते हैं। महर्षि भरद्वाज एक बड़े तपस्वी महात्मा थे। उनकी बहिन का नाम रेवती था। वह कुरूपा थी। उसका स्वर बड़ा विकृत था। प्रतापी भरद्वाज गङ्गाजी के दक्षिण-तटपर बैठकर बड़ी चिंता करने लगे कि 'इस भयंकर आकारवाली अपनी बहिनका विवाह किसके साथ करूँ? कोई भी तो इसे ग्रहण नहीं करता। अहो. किसीके कन्या न हो। कन्या केवल दु:ख देनेवाली होती है। जिसके कन्या हो, उस प्राणीकी जीते-जी पग-पगपर मृत्यु होती रहती है।' इस प्रकार वे अपने सुंदर आश्रमपर तरह-तरह के विचचार कर रहे थे। इतनेमें ही कठनाम के एक मुनि वहाँ भरद्वाज मुनिका दर्शन करनेके लिए आये। उनकी अवस्था सोलह वर्षकी थी। शरीर सुंदर था। वे शान्त, जितेन्द्रिय और सद्रुणोंकी खान थे। कठने आते ही भरद्वाज को प्रणाम किया। भरद्वाज उनका विधिपूर्वक पूजन किया और आश्रमपर पधारनेका कारण पूछा। कठने कहा- 'मैं विद्यार्थी हूँ और इसी उद्देश्य से आपका दर्शन करने आया हूँ। जो उचित हो, वह कीजिये।' भरद्वाजने कठसे कहा- 'महामते! तुम्हारी जो इच्छा हो, पढो। मैं पुराण, स्मृति, वेद तथा अनेक प्रकार के धर्मशास्त्र- सब जानता हूँ। तुम शीघ्र अपनी रुचि बतलाओ। कुलीन, धर्मपरायण, गुरु-सेवक तथा सुनी हुई विद्याको तत्काल धारण करनेवाला शिष्य बड़े पुण्यसे प्राप्त होता है।'
कठने कहा - ब्रह्मन्! में निष्पाप, सेवापरायण, भक्त, कुलीन और सत्यवादी शिष्य हूँ। मुझे अध्ययन कराइये।
'एवमस्तु' कहकर भरद्वाजने कठको सम्पूर्ण विद्या पढ़ाई। विद्या पाकर कठ बड़े प्रसन्न हुए। उन्होंने भरद्वाजसे कहा- 'गुरुदेव! आपको नमस्कार है। मैं आपके मनके अनुकूल दक्षिणा देना चाहता हूँ। आप कोई दुर्लभ वस्तु भी माँग सकते हैं। बताइये, क्या दूँ? जो शिष्य अपने गुरुसे विद्या प्राप्त करके भी उन्हें मोहवश दक्षिणा नहीं देते, वे जबतक सूर्य और चन्द्रमाकी सत्ता रहती है तबतक नरकमें पड़े रहते हैं।'
भरद्वाजने कहा - यह मेरी बहिन अभी कुमारी है; इसको विधिपूर्वक ग्रहण करो और पत्नी बनाओ। इसके प्रति प्रेमपूर्ण बर्ताव करना, यही मैं दक्षिणा माँगता हूँ।
कठने 'बहुत अच्छा' कहकर गुरुके आदेशसे विधिपूर्वक दी हुई रेवतीका पाणिग्रहण किया और उसके सुंदर रूप की प्राप्तिके लिए वहीँ रहकर देवेश्वर शङ्करकी आराधना की। रेवती ने भी शिव की प्रसन्नताके लिए उनका पूजन किया। इससे वह सुंदर रूपवती हो गयी। उसका प्रत्येक अङ्ग मनोहर दिखायी देने लगा। अब उसके रूप की कहीं संता नहीं थीं। वहाँ रेवती के स्नान करनेसे जो जलकी धरा प्रकट हुई, वह 'रेवती' नामकी नदी हुई, जो रूप और सौभाग्य प्रदान करनेवाली है। फिर कठने उसकी पुण्यरूपताकी सिद्धिके लिए नाना प्रकारके दर्भों (कुशों) - से अभिषेक किया। इससे 'विदर्भा' नामकी नदी प्रकट हुई। जो मनुष्य रेवती और गङ्गामें श्रद्धापूर्वक स्नान करता है, वह सब पापों से मुक्त हो विष्णुलोकमें प्रतिष्ठित होता है। इसी प्रकार जो विदर्भा और गौतमीके संगम में स्नान करता है, उसे तत्काल भोग और मोक्ष की प्राप्ति होती है। वहाँ दोनों तटोंपर सौ उत्तम तीर्थ हैं, जो सब पापोंके नाशक तथा सम्पूर्ण सिद्धियोंके दाता हैं।
Summary of chapter 50 of the Brahma Mahā Purana is as follows:
During his meditation near the sacred Vaṭa, Mārkaṇḍeya is caught up in the great waters of cosmic dissolution (pralaya). The entire universe is dissolved into the primordial ocean; all beings, Devas, and mountains are swallowed by the flood. The sage wanders alone in the terrifying darkness of the pralaya waters, bewildered and exhausted, until he sights a miraculous light.