व्यासजी कहते हैं - तदनन्तर श्रीकृष्णने राजमार्गपर एक कुब्जा स्त्री देखि, जो अङ्गराग से भरा हुआ पात्र लिये आ रही थी। उसे देखकर श्रीकृष्ण ने पूछा- 'कमललोचने! तू यह अङ्गराग किसके पास लिये जाति है? सच-सच बता।' उनकी बात सुनकर वह श्रीहरि के प्रति अनुरक्त हो गयी और बोली- 'प्रिय! क्या नहीं जानते, कंसने मुझे अङगराग लगानेका कार्य सौंप रखा है? मैं अनेकवक्रा के नाम से विख्यात हूँ। मेरे सिवा दूसरे किसीका घिसा हुआ चन्दन कंसको पसंद नहीं आता।'
श्रीकृष्ण बोले - सुमुखि! यह सुंदर सुगन्धयुक्त अनुलेपन तो राजा के योग्य है। हमारे शरीर के योग्य भी कोई अनुलेपन हो तो दो।
यह सुनकरकुब्जाने आदरपूर्वक कहा- 'लीजिये न।' फिर उन दोनों को उनके शरीर के अनुरूप चन्दन आदि अनुलेप प्रदान किया। कुब्जाने ही उनके कपोल आदि अङ्गों में पत्रभङ्गीरचना पूर्वक अङ्गराग लगाया। इससे वे दोनों पुरुषरत्न इन्द्रधनुषके साथ शोभा पाने वाले श्वेत-श्याम मेघोंके समान सुशोभित हुए। तत्पश्चात् उल्लापन-विधि (कुब्जत्व दूर करनेकी क्रिया)- के जाननेवाले श्रीकृष्ण ने उसकी ठोढ़ी में अपने हाथ की दो उँगलियाँ लगा दीं और उस उचकाकर ऊपर की ओर खींचा। साथ ही उसके पैर अपने दोनों पैरोंसे दबा लिये। इस प्रकार केशव ने उसके शरीर को सीधा कर दिया। फिर तो वह युवतियों में श्रेष्ठ परम सुन्दरी बं गयी और प्रेमसे शिथिल वाणी में बोली- 'प्यारे! आप मेरे घर में पधारें।' 'अच्छा, तुम्हारे घर आऊँगा' यों कहकर श्रीकृष्ण ने कुब्जाको विदा किया और बलराम जी के मुँह की ओर देखकर वे जोर से हँसे। तदनन्तर पत्रभङ्गी-रचनापूर्वक अङ्गराग लगाये और पीताम्बर तथा नीलाम्बर धारण किये विचित्र पुष्पोंके हारसे सुशोभित वे दोनों भाई धनुषशाला में गये। वहाँ उन्होंने रक्षकोंसे धनुष के विषय में पूछा और उनके बतलानेपर उसे उठाकर चढ़ाया। बलपूर्वक चढ़ाते ही वह धनुष टूट गया। उससे बड़े जोरका शब्द हुआ, जिससे सारी मथुरा पुरी गूँज उठी। धनुष टूटने पर रक्षकों ने उनपर आक्रमण किया। तब वे रक्षक-सेनाका संहार करके धनुषशाला से बाहर निकले। कंसको अक्रूर के लौटनेका हाल मालूम हो चुका था। फिर धनुष टूटने का शब्द सुनकर उसने चाणूर और मुष्टिक से कहा- 'दोनों गोप पुत्र यहाँ आ गये हैं। उन्हें मेरे सामने मल्लयुद्ध करके तुम दोनों अवश्य मार डालना, क्योंकि वे दोनों मेरे प्राण लेनेवाले हैं। यदि युद्ध में उन्हें मारकर तुमने मुझे संतुष्ट किया तो मैं तुम्हारी जो-जो इच्छा होगी, वह सब पूर्ण करूँगा। वे दोनों मेरे शत्रु हैं, अत: न्यायसे अथवा अन्यायसे उनको अवश्य मार डालो। उनके मारे जानेपर इस राज्यपर मेरा और तुम्हारा समान अधिकार होगा।'
इस प्रकार उन दोनों मल्लोंको आदेश दे कंसने हाथीवान को बुलाया और उच्च स्वर से कहा- 'महावत! तू कुवलयापीड हाथीको मतवाला करके रङ्गभूमि के द्वारपर खड़ा रखना। जब दोनों गोपपुत्र मल्लयुद्ध के लिये आयें, तब उन्हें द्वारपर ही मरवा डालना।' महावत को यह आज्ञा दे कंस ने देखा, रङगभूमि में सब ओर यथायोग्य मञ्च लग गये हैं; तब वह सूर्योदय होनेकी प्रतीक्षा करने लगा। उसकी मृत्यु समीप आ गयी थी। सबेरा होनेपर सब मञ्चों पर नागरिकगण आ विराजे। जो मञ्च केवल राजाओं के लिये बिछे थे, वहाँ भिन्न-भिन्न स्थानों के राजा अपने सेवकोंसहित आ बैठे। जो लोग लल्लों की जोड़का चुनाव करनेवाले थे, उन्हें कंसने रङ्गभूमि के बीच में अपने पास ही बिठाया। वह स्वयं भी बहुत ऊँचे मञ्चपर विराजमान था। रनिवास की स्त्रियों के लिये अलग मञ्च लगे थे और नगर की स्त्रियों के लिये अलग। नन्द आदि गोप दूसरे-दूसरे मञ्चोंपर बैठे थे। अक्रूर और वसुदेव मञ्चों के किनारे खड़े थे। बेचारी देवकी नगर की स्त्रियों में खड़ी थी। वह सोचती थी, अन्तकाल में भी तो एक बार पुत्रका मुँह देख लूँ।
इसी समय रङ्गभूमिमें तुरही आदि बाजे बज उठे। चाणूर उछल ने और मुष्टिक ताल ठोंकने लगा। लोगों में हाहाकार मच गया। बलराम और श्रीकृष्ण रङ्गभूमि के द्वारपर आये और महावत से प्रेरित कुवलयापीड नामक हाथीको मारकर भीतर घुस गये। उस समय उनके अङ्गोंमें हाथी का मद और रक्त लगे हुए थे। उसके बड़े-बड़े दाँतोंको ही उन्होंने अपना आयुध बना लिया था। वे दोनों भाई गर्वपूर्ण लीलामयी चितवनसे निहारते हुए उस महान् रङ्गोत्सव में इस प्रकार प्रविष्ट हुए, मानो मृगों के झुंड में दो सिंह आ गये हों। उनके आते ही रङ्गभूमि में चारों ओर महान् कोलाहल हुआ। सब लोग विस्मयके साथ कहने लगे- 'ये ही कृष्ण हैं, ये ही बलभद्र हैं। ये कृष्ण वे ही हैं, जिन्होंने भयंकर राक्षसी पूतनाका वध किया, छकड़े उलट दिये और दोनों अर्जुन वृक्षोंको उखाड़ डाला। जिन्होंने बालक होते हुए भी कालिय नागके मस्तकपर नृत्य किया, सात रातोंतक गोवर्धन पर्वतको हाथ पर रखा और अरिष्ट, धेनुक तथा केशी आदि दुराचारियों को खेल-खेल में ही मार डाला, वे ही ये श्रीकृष्ण दिखायी देते हैं और ये जो दूसरे महाबाहु युवतियोंके मन और नयनोंको आनन्द देते हुए लीलापूर्वक आगे-आगे चल रहे हैं, वे श्रीकृष्ण के बड़े भाई बलदेव जी हैं। पौराणिक रहस्यको जाननेवाले विद्वान् पुरुष इन्हीं गोपालके विषयमें यों कहते हैं कि ये शोकसागर में डूबे हुए यदुवंशका उद्धार करेंगे। निश्चय ही ये सबको जन्म देनेवाले सर्वभूतस्वरूप भगवान् विष्णु के अंश हैं, जो पृथ्वीका भार उतारनेके लिए अवतीर्ण हुए हैं।'
इस प्रकार जब नगर के लोग बलराम और श्रीकृष्ण का वर्णन कर रहे थे, उस समय देवकी के हृदय में स्नेह के कारण उनके स्तनोंसे दूध बहने लगा। वसुदेवजी तो मानो समीप आयी हुई वृद्धावस्था को छोड़कर युवा हो गये। उनकी दृष्टि अपने दोनों पुत्रों पर ही लगी हुई ही, मानो वे ही उनके लिए महान् उत्सव हों। रनिवासकी स्त्रियाँ एकटक नेत्रोंसे श्रीकृष्ण और बलराम को निहारती थीं। नगरकी स्त्रियाँ तो उनकी ओरसे दृष्टि ही नहीं हटती थीं।
स्त्रियाँ आपस में कहने लगीं- 'सखियो! श्रीकृष्ण का मुख तो देखो, कैसी कमल-जैसी सुंदर आँखें हैं। कुवलयापीड हाथी से युद्ध करनेके कारण जो परिश्रम हुआ है, उससे इनके मुखपर पसीने की बूँदें निकल आयी हैं। इन स्वेदबिन्दुओंसे सुशोभित इनका प्रसन्न मुख ऐसा जान पड़ता है, मानो खिले हुए कमल पर ओसके कण शोभा पा रहे हों। इस मनोहर मुखकी झाँकी करके आज अपना जन्म सफल कर लो। अहा! भामिनी! इस बालक के वृक्ष:स्थलपर तो दृष्टिपात करो। श्रीवत्सचिह्न से इसकी कैसी शोभा हो रही है। यह सम्पूर्ण जगत्का आश्रय है और इसकी दोनों भुजाएँ शत्रुओंका दर्प दलन करने में समर्थ हैं। अरि सखी! उधर देखो, मुष्टिक और चाणूर को उछलते-कूदते देख बलभद्रजी के मुखपर मंद हास्य की कैसी छटा छा रही है।हाय, सखी! देखो तो सही, ये श्रीकृष्ण चाणूर के साथ युद्ध करने जा रहे हैं। क्या इस सभा में न्याययुक्त बर्ताव करनेवाले बड़े-बूढ़े नहीं हैं? कहाँ तो अभी युवावस्था में प्रवेश करनेवाले श्री हरि सुकुमार शरीर और कहाँ वज्र के समान कठोर एवं विशाल शरीरवाला यह महान् असुर! ये दोनों भाई रङ्गभूमिमें अभि तरुण दिखायी देते हैं। इनके सभी अङ्ग कोमल हैं और चाणूर आदि दैत्य मल्ल बड़े ही भयंकर हैं। युद्ध के लिये जोड़का चुनाव करनेवाले लोगों का यह बहुत बड़ा अन्याय है कि वे मध्यस्थ होकर भी बालक और बलवान् के युद्ध की उपेक्षा करते हैं।'
जब नगर की स्त्रियाँ इस प्रकार वार्तालाप कर रही थीं, उसी समय भगवान् श्रीहरि अपने पड़ाघात से प्रिथ्वुको काँपते हुए सब लोगों के हृदय में हर्षातिरेककी वृष्टि करने लगे। बलभद्र जी भी ताल ठोंककर मनोहर गति से उछलते हुए चल रहे थे। उस समय यह पृथ्वी पग-पगपर उनके पदाघात से विदीर्ण नहीं हुई- यही बड़े आश्चर्य की बात थी। तदनन्तर अमितपराक्रमी श्रीकृष्ण चाणूर के साथ कुश्ती लड़ने लगे तथा मल्लयुद्ध की विद्या में कुशल मुष्टिक दैत्य बलदेवजी के साथ भिड़ गया। श्रीकृष्ण चाणूर के साथ परस्पर भिड़कर, नीचे गिराकर, उछालकर, घूँसे और वज्रके समान कोहनी से मारकर, पैरोंसे ठोंकरें देकर तथा एक-दूसरे के शरीर को रगड़कर लड़ने लगे। इस तरह उन दोनों में बड़ा भारी युद्ध हुआ। उस युद्ध में यद्यपि किसी अस्त्र-शस्त्र का प्रयोग नहीं होता था तो भी वह अत्यन्त घोर एवं भयंकर था। अपने बल और पानशक्ति से ही साध्य था। ज्यों-ज्यों चाणूर श्री हरि के साथ युद्ध करता, त्यों-ही-त्यों उसकी प्राणशक्ति घटती जाती थी। जगन्मय श्रीकृष्ण भी उसके साथ लीलापूर्वक युद्ध करने लगे। वह परिश्रम से थक गया था, अत: क्रोधपूर्वक श्रीकृष्ण के हाथ पर हाथ मार रहा था। कंसने देखा, श्रीकृष्ण का बल बढ़ रहा है और चाणूर थकता जा रहा है; कुपित होकर उसने बाजे बंद करा दिये। इसी समय आकाश में देवताओं के अनेक प्रकार के बाजे बज उठे। अदृश्य भाव से खड़े हुए देवता हर्ष में भाकर भगवान् की स्तुति करते हुए बोले- 'केशव! चाणूर दानवको मार डालिये, गोविन्द! आपकी जय हो।'
श्रीकृष्ण देरतक चाणूरके साथ खिलवाड़ करते रहे, फिर उसे मार डालने के लिये सचेष्ट हुए और दैत्यको उठाकर आकाश में घुमाने लगे। घुमाते समय ही उसके प्राण-पखेरू उड़ गये। बह्ग्वाब ने उसे सौ बार घुमाकर पृथ्वीपर पटक दिया। चाणूर के सौ-सौ टुकड़े हो गये। उसके रक्त की धारा से अखाड़े में गहरी कीचड़ हो गयी। महाबली बलदेवजी भी उतनी देरतक मुष्टिकके साथ लड़ते रहे। अन्त में उन्होंने भी उस दैत्य के मस्तक पर मुक्केका प्रहार किया और छातीमें घुटनेसे आघात करके उसे पृथ्वीपर गिरा दिया। फिर अपने शरीर से रगड़कर उसका कचूमर निकाल दिया। उसकी जीवन-लीला समाप्त हो गयी। तत्पश्चात् श्रीकृष्णने पुन: महाबली मल्लराज तोशलको बायें घूँसेकी चोटसे मार गिराया। चाणूर, मुष्टिक और तोशलके मारे जानेपर शेष पहलवान भाग खड़े हुए। उस समय श्रीकृष्ण और बलभद्र रंगभूमिमें समवयस्क ग्वालबालों को साथ ले हर्ष में भरकर उछलने-कूदने लगे। यह देखकर कंस की आँखें क्रोधसे लाल हो गयीं। उसने अपने सेवकोंको आज्ञा दी-'इन दोनों ग्वालों को बलपूर्वक रङ्गशाला से बाहर निकाल दो। पापी नन्दको भी पकड़कर तुरंत बेड़ियोंमें जकड दो। वसुदेवको भी उसकी वृद्धताका विचार न रखते हुए कठोर दण्ड देकर मार डालो। ये जो ग्वाल-बाल श्री कृष्ण के साथ उछल रहे हैं, इन सबकी गौएँ चीन लो और इनके घर में जो कुछ भी धन-सम्पत्ति हो, उसे लूट लो।'
कंसको इस प्रकार आदेश देते देख भगवान् मधुसूदन हँस पड़े। वे उछलकर मञ्चपर जा चढ़े। राजा का मुकुट पृथ्वीपर गिर पड़ा। श्रीकृष्ण ने उसके केश पकड़ लिये और उसे पृथ्वीपर गिराकर स्वयं भी उसीपर कूद पड़े। वे सम्पूर्ण जगत्का भार लेकर उसके ऊपर कूदे थे, इसलिये उसके प्राण निकल गये। उग्रसेनकुमार राजा कंस संसारसे चल बसा। मरनेपर भी श्रीकृष्ण ने उसके मस्तक के बाल पकड़कर उसके शरीर को रङ्गभूमि में घसीटा। कंस को पकड़े जानेपर उसका भाई सुनामा क्रोध में बहरकर आया, किन्तु बलभद्र ने उसे खेल में ही मार गिराया। मथुरा का महाराज कंस श्रीकृष्णके हाथसे अवहेलना पूर्वक मारा गया, यह देखकर रङगभूमि में आये हुए सब लोग हाहाकार करने लगे। तदनन्तर श्रीकृष्णने शीघ्र जाकर वसुदेव और देवकी के चरण पकड़ लिये। बलदेवजी ने भी उनका साथ दिया। वसुदेव और देवकी ने श्रीकृष्ण को उठाया; और जन्मकाल में उन्होंने जो बातें कही थीं, उन्हें याद करके स्वयं ही प्रणाम करने लगे।
वसुदेवजी बोले - देवदेवेश्वर! आप मुझपर प्रसन्न होइये। प्रभो! आप देवताओं में सर्वश्रेष्ठ हैं। केशव! आपने हम दोनोंपर कृपा करके ही हम दोनोंका उद्धार किया है। हमारी आराधना से भगवान् ने जो दुराचारी दैत्यों का वध
करनेके लिये हमारे घर में अवतार लिया, इससे हमारा कुल पवित्र हो गया। सर्वात्मन्! आप ही सम्पूर्ण भूतों के अन्त हैं- आप में ही सबका लय होता है। आप समस्त प्राणियों के भीतर विराजमान हैं। आपसे ही भूत और भविष्य की प्रवृत्ति हुई है। सर्वदेवमय अच्युत! अचिन्त्य परमेश्वर! यज्ञ में आपका ही यजन किया जाता है। परमेश्वर! आप ही यज्ञ हैं और आप ही यज्ञोंके करता-धर्त्ता हैं। आपके प्रति परमात्मभावको हटाकर जो मेरा और देवकीका मन पुत्रस्नेहके कारण आपकी ओर जाता है, यह हमारे लिए अत्यन्त विडम्बना है। कहाँ तो आप सम्पूर्ण भूतों के करता अनादि और अनन्त परमेश्वर और कहाँ हमारी इस मानवीय जिह्वाका आपको 'पुत्र' कहकर पुकारना! जिनके भीतर समस्त चराचर जगत् प्रतिष्ठित है, वे किसी मनुष्य से कैसे उत्पन्न हो सकते हैं, किसी नारीके गर्भ में कैसे शयन कर सकते हैं। जगन्नाथ! जिनसे यह सम्पूर्ण संसार उत्पन्न हुआ है, वे आप माया के सिवा किस युक्तिसे मेरे पुत्र हो सकते हैं। परमेश्वर! आप प्रसन्न हों। इस विश्वकी रक्षा करें। आप मेरे पुत्र नहीं हों। इस विश्वकी रक्षा करें। आप मेरे पुत्र नहीं हैं। ईश! ब्रह्मा से लेकर वृक्षपर्यन्त सम्पूर्ण जगत् आपसे ही उत्पन्न हुआ है। परमात्मन्! आप हमारे मन में मोह क्यों उत्पन्न करते हैं। मेरी दृष्टि मायासे मोहित हो रही थी। आप मेरे पुत्र हैं, यह समझकर मैंने कंससे अत्यन्त भय किया था और शत्रुके भयसे व्याकुल होकर आपको गोकुल ले गया था। गोविन्द! वहाँ रहकर आप मेरे सौभाग्यसे इतने बड़े हुए हैं। रूद्र, मरुद्र्ण, अश्विनीकुमार और इन्द्रके द्वारा भी जो कार्य सिद्ध नहीं हो सकते, वे भी आपके द्वारा सिद्ध होते देखे गये हैं। ईश! आप साक्षात् श्रीविष्णु हैं। जगत् का कल्याण करनेके लिये इस भूतलपर अवतीर्ण हुए हैं। हमारा सारा मोह अब दूर हो गया।
Summary of chapter 76 of the [[BOOK_TITLE]] is as follows:
Troubled by the repeated demonic attacks in Gokula, the elders — led by Nanda and advised by Upananda — decide to relocate. The entire cowherd community, with all its cattle, carts, and families, moves to the beautiful forest of Vṛndāvana on the banks of the Yamunā. The new setting, with its sacred groves and the river, becomes the principal stage for Kṛṣṇa's childhood and adolescent līlās.