ब्रह्म महा पुराण
77 - अक्रूरका नन्दगाँव में जान, श्रीराम-कृष्णकी मथुरायात्रा, गोपियोंकी कथा, अक्रूरको यमुनामें भगवदद्रर्शन, उनके द्वारा भगवान् की स्तुति, मथुरा-प्रवेश, रजक-वध और मालीपर कृपा
व्यासजी कहते हैं - अक्रूरजी शीघ्र चलनेवाले रथपर चदकर मथुरा से निकले और श्रीकृष्ण के दर्शन का लोभ लेकर नन्दगाँवकी ओर चल दिये। मार्ग में सोचने लगे- "अहा! मुझसे बढ़कर सौभाग्यशाली कोई नहीं है, क्योंकि आज मैं अंशसहित अवतीर्ण हुए साक्षात् भगवान् विष्णु का मुख देखूँगा। आज मेरा जन्म सफल हुआ और आनेवाला प्रभात बहुत ही सुन्दर होगा। क्योंकि में विकसित कमलके समान नेत्रोंवाले भगवान् विष्णुके मुखका दर्शन करूँगा। जो स्मरण अथवा ध्यान में आकर भी मनुष्य के सारे पाप हर लेता है, वही कमल-सदृश नेत्रोंवाला श्रीविष्णुका सुन्दर मुख आज मुझे देखने को मिलेगा। जिससे सम्पूर्ण वेद और वेदाङ्गो का प्रादुर्भाव हुआ है तथा जो देवताओं के लिये सर्वश्रेष्ठ आश्रय है, भगवान् के उसी मुखका आज मैं दर्शन करूँगा।१ ब्रह्मा, इन्द्र, रूद्र, अश्विनीकुमार, वसु, आदित्य तथा मरुद्र्ण जिनके स्वरुप को नहीं जानते, वे श्रीहरि आज मेरा स्पर्श करेंगे। जो सर्वात्मा, सर्वव्यापी, सर्वस्वरुप, सम्पूर्ण भूतों में स्थित, अव्यय एवं व्यापी परमात्मा हैं, वे ही आअज मेरे नेत्रों के अतिथि होंगे। जिन्होंने अपनी योगशक्तिसे मत्स्य, कूर्म, वराह और नरसिंह आदि अवतार ग्रहण किये थे, वे ही भगवान् आज मुझसे वार्तालाप करेंगे। स्वेच्छा से शरीर धारण करनेवाले अविनाशी जगन्नाथ इस समय कार्यवश व्रजमें निवास करनेके लिये मानवरूप धारण किये हुए हैं। जो भगवान् अनन्त अपने मस्तकपर इस पृथ्वीको धारणकरते हैं, वे ही जगत्का हित करनेके लिये अवतीर्ण हो आज मुझे 'अक्रूर' कहकर बुलायेंगे। पिता, पुत्र, सुहृदय, भ्राता, माता और बन्धु-बान्धवरूपिणी जिनकी मायाको यह जगत् हटा नहीं पाता, उन भगवान् को बारंबार नमस्कार है। जिनको हृदय में स्थापित करके मनुष्य इस योगमायारूप फैली हुई अविद्या को तर जाते हैं, उन विद्यास्वरूप परमात्मा को नमस्कार है। जिन्हें यज्ञपरायण मनुष्य यज्ञपुरुष, भगवभ्दक्तजन वसुदेव और वेदान्तवेत्ता सर्वव्यापी श्रीविष्णु कहते हैं, उनको मेरा नमस्कार है। जो सम्पूर्ण जगत्के निवासस्थान हैं, जिनमें सत् और असत् दोनों प्रतिष्ठित हैं, वे भगवान् अपने सहज सत्त्वगुण से मुझपर प्रसन्न हों। जिनका स्मरण करनेपर मनुष्य पूर्ण कल्याण का भागी होता है, उन पुरुषश्रेष्ठ श्रीहरिकी मैं सदा के लिये शरण लेता हूँ।२
अक्रूर का हृदय भक्ति से विन्रम हो रहा था। वे इस प्रकार श्री विष्णु का चिन्तन करते हुए कुछ दिन रहते नन्दगाँव में पहुँच गये। वहाँ उन्होंने भगवान् श्रीकृष्ण को उस स्थान पर देखा, जहाँ गौएँ दुही जा रही थीं। वे बछड़ोंके बीच में खड़े थे। उनका श्रीअङ्ग विकसित नीलकमल की आभासे सुशोभित था। नेत्र खिले हुए कमल की शोभा धारण करते थे। वक्ष:स्थल में श्रीवत्स का चिह्न दिखायी देता था। बड़ी-बड़ी बाँहें, चौड़ी और उभरी हुई छाती, ऊँची नासिका, विलासयुक्त मुसकान से सुशोभित मुख, लाल-लाल नख, शरीरओअर पीताम्बर, गलेमें जंगली पुष्पों के हार, हाथ में स्निग्ध नील लता और कानों में श्वेत कमलपुष्पके आभूषण- यही उनकी झाँकी थी। उनके दोनों चरण भूमिपर विराजमान थे। श्रीकृष्णका दर्शन करनेके बाद अक्रूरजी की दृष्टि यदुनन्दन बलभद्रजी पर पड़ी, जो हँस, चन्द्रमा और कुण्ड के समान गौरववर्ण थे। उनके शरीर पर नील वस्त्र शोभा पा रहे थे। उनकी कद ऊँची और बाँहें बड़ी-बड़ी थीं। मुख प्रफुल्ल कमल-सा सुशोभित था। नीलाम्बरधारी गौराङ्ग बलभद्र जी ऐसे जान पड़ते थे, मानो मेघमाला से घिरा हुआ दूसरा कैलास पर्वत हो।* उन दोनों भाईयोंको देखकर महाबुद्धिमान् अक्रूरजीका मुखकमल प्रसन्नता से खिल उठा। सम्पूर्ण शरीरमें रोमाञ्च हो आया और वे मन-ही-मन इस प्रकार कहने लगे- 'इन दोनों बन्धुओंके रूप में यहाँ साक्षात् भगवान् विष्णु विराज रहे हैं। ये ही वह परम धाम और ये ही वह परम पद हैं। अनन्तमूर्ति भगवान् आज ही मेरे हाथ का स्पर्श करके उसे शोभासम्पन्न बनायेंगे। इन्हीं भगवान् की अँगुलियों के स्पर्श से सम्पूर्ण पाप नष्ट हो जाने के कारण मनुष्य उत्तमोत्तम सिद्धि प्राप्त करते हैं तथा अश्विनीकुमार, रूद्र, इन्द्र और वासु आदि देवता प्रसन्न होकर उन्हें उत्तम वर देते हैं। इन्हीं भगवान् ने दैत्यराज की सेनाका विनाश करके दैत्यपत्नियों की आँखों का काजल भी छीन लिया। राजा बलिने जिनके हाथ में संकल्पका जल छोड़कर रसातल में रहते हुए भी मनोहर स्वर्गीय भोग प्राप्त कर लिये तथा देवराज इन्द्र ने जिनकी आराधना करके एक मन्वन्तरके लिये देवलोकका अखण्ड साम्राज्य प्राप्त किया, वे ही भगवान् कंस के साथ रहने के कारण निर्दोष होते हुए भी दोष के पात्र बने हुए मुझ अक्रूर का क्या आदर न करेंगे? जो साढू पुरुषों से बहिष्कृत है उसके जन्मको धिक्कार है। भगवान् श्रीहरि ज्ञानस्वरुप हैं। परिपूर्ण सत्त्वके पुञ्ज हैं। सब प्रकार के दोषों से रहित हैं, अव्यक्त हैं और समस्त प्राणियों के हृदय में विराजमान हैं। जगत् में कौन-सी ऐसी वस्तु है, जो उन्हें ज्ञात न हो। अत: मैं भक्ति से विनीत होकर आदि, मध्य और अन्तसे रहित, अजन्मा, पुरुषोत्तम, भगवान् विष्णुके अंशावतार तथा ईश्वरोंके भी ईश्वर श्रीकृष्णकी शरण में जाता हूँ।'
इस प्रकार विचार करते हुए वे भगवान् श्रीकृष्ण के पास गये और 'मैं यदुवंशी अक्रूर हूँ'- यों कहकर उनके चरणों में पड़ गये। भगवान् ने भी ध्वजा, वज्र और कमल आदि चिह्नों से सुशोभित अपने करकमल द्वारा उनका स्पर्श किया और उन्हें खींचकर प्रेमपूर्वक गाढ़ आलिङ्गन दिया। फिर बलराम और श्रीकृष्ण ने उनसे बातचीत की और उन्हें साथ ले अपने भवन में चले गये। परस्पर प्रणाम आदि के बाद अक्रूर ने दोनों भाईयों के साथ बैठकर भोजन किया और यथायोग्य उनसे सब बातें निवेदन कीं। दुरात्मा दानव कंस ने वसुदेव और देवकी को जिस प्रकार धमकाया था, उग्रसेन के प्रति जैसा उसका बर्ताव था और जिस उद्देशसे कंस ने उन्हें वज्रमें भेजा था, वह सब विस्तार के साथ कह सुनाया। सुनकर भगवान् श्रीकृष्ण ने कहा- 'ये सब बातें मुझे ज्ञात हैं। इस विषय में जो उचित कर्तव्य है, उसे मैं करूँगा। आप अन्यथा विचार न करें। कंसको मारा गया ही समझें। मैं बलरामजी सहित कल आपके साथ मथुरा चलूँगा। बड़े-बूढ़े गोप भी भेंटकी बहुत-सी सामग्री लेकर जाएँगे। वीर! आप किसी प्रकार की चिंता न करें। आराम से यहाँ रात बितायें। आजसे तीन रात के भीतर ही में अनुचरोंसहित कंसको मार डालूँगा।'
तदनन्तर गोपोंको मथुरा चलनेका आदेश से अक्रूर, श्रीकृष्ण तथा बलराम जी नन्दके घरमें सोये। सबेरा होनेपर महाबली राम और श्रीकृष्ण अक्रूर के साथ मथुरा जानेको तैयार हो गये, यह देख गोपियों के नेत्रों में आँसू भर आये। वे चिंता से इतनी दुर्लब हो गयीं कि उनके कंगन और बाजूबंद खिसक-खिसककर गिरने लगे। वे दु:ख से पीड़ित हो लंबी साँस लेती हुई एक दूसरी से कहनेलगीं- 'सखी! गोविन्द मथुरा जाते हैं। वहाँ जाकर वे इस गोकुलमें फिर क्यों आने लगे। वहाँ तो अपने कानों द्वारा नगर की स्त्रियोंके मधुर वार्तालापका रस पान करेंगे। नगरकी नारियों के विलासपूर्ण वचनों में जब इनका मन आसक्त हो जायगा, तब फिर गाँवों की रहनेवाली इन गँवार गोप-गोपियों की ओर उनका झुकाव कैसे हो सकेगा। हाय! श्रीहरि सम्पूर्ण व्रजके प्राण थे। इन्हें छीनकर दुरात्मा और निर्दयी विधाता ने हम गोपियोंपर निष्ठुर प्रहार किया है। नगरकी युवतियाँ भावभरी मुसकान के साथ बात करती हैं। उनकी गति में लालित्य है। वे कटाक्षपूर्ण नेत्रों से देखती हैं। अत: ये हम लोगों के पास क्यों आने लगे। यह देखो, गोविन्द रथपर बैठकर मथुरा जाते हैं।क्रूर अक्रूर ने उन्हें चकमा दिया है। क्या इस निर्दयीको प्रेमीजनोंकी मानसिक वेदनाका अनुभव नहीं है, जो यह हमारे नयनानन्द गोविन्दको अन्यत्र लिये जाता है? गोविन्द भी आज अत्यन्त निष्ठुर हो गये हैं। देखो न, बलराम जी के साथ रथपर बैठकर चलेजा रहे हैं। अरी! इन्हें रोकने में शीघ्रता करो। ऐं! क्या कहती हो- गुरुजनों के सामने हमारा कुछ बोलना उचित नहीं है? अरी! हम तो यों ही विरहकी आग में जल रही हैं। अब ये गुरुजन हमारा क्या कर लेंगे। हाय! ये नन्दबाबा आदि भी जानेको उद्यत हैं। कोई भी श्रीकृष्ण को लौटनेका उद्योग नहीं करता। आज मथुरावासिनी युवतियों के नेत्ररुपी भ्रमर श्रीकृष्ण के मुखकमलका मकरन्द पान करेंगे। वे लोग धन्य हैं, जो मार्ग में पुलकित शरीर से बेरोक-टोक श्रीकृष्ण का दर्शन करेंगे। आज गोविन्द का दर्शन पाकर मथुरा की नागरियोंके नेत्रोंमें महान् आनन्द छा जायगा। आज उन भाग्यशालिनी युवतियोंने कौन-सा शुभ स्वप्न देखा है, जो वे अपने विशाल एवं कमनीय नेत्रोंसे श्रीकृष्ण की रूप-माधुरीका पान करेंगी। अहो! विधाता को किञ्चिन्मात्र भी दया नहीं है। उसने हम गोपियों को बहुत बड़ी निधिका दर्शन कराकर हमारी आँखें ही निकाल लीं। हमारे प्रति श्रीकृष्णका अनुराग ज्यों-ज्यों शिथिल होता जाता है, त्यों-ही-त्यों हमारे हाथों के कङ्कण भी शीघ्रतापूर्वक ढीले होते जा रहे हैं। अक्रूरका हृदय बहुत ही क्रूर है।वह घोड़ोंको बहुत जल्दी-जल्दी हाँकता है। हम-जैसी आर्त स्त्रियोंपर उसे छोड़ किसको दया नहीं आएगी। अरी! वह देखो, श्रीकृष्णके रथकी धूल बहुत ऊँचेपर दिखायी देती है। हाय! अब वह धूल भी नहीं दिखायी देती। अब वह भगवान् को बहुत दूर ले गयी।' इस प्रकार गोपियोंके अत्यन्त अनुरागपूर्वक देखते-देखते बलरामसहित श्रीकृष्ण ने व्रजके उस भूभाग का परित्याग किया। रथके घोड़े बहुत तेज चलनेवाले थे; अत: बलराम, अक्रूर और श्रीकृष्ण दोपहर होते-होते मथुराके समीपवर्ती यमुना-तटपर पहुँच गये।
तब अक्रूर ने श्रीकृष्णसे कहा- 'आप दोनों भाई यहीं रथपर बैठे रहें। तबतक मैं यमुना के जल में नैत्यिक स्नान और पूजन कर लेता हूँ।' श्रीकृष्णने 'बहुत अच्छा' कहकर उनकी बात मान ली। परम बुद्धिमान् अक्रूर ने यमुना के जल में प्रवेश करके स्नान और आचमन किया। तत्पश्चात् वे परब्रह्मका चिन्तन करने लगे। उन्हें जलके भीतर सहस्त्रों फणोंसे युक्त बलभद्रजी दिखायी दिये। उनका शरीर कुण्ड के समान गौर और नेत्र कमलपत्र के समान विशाल थे। वासुकि तथा डिम्भ आदि बड़े-बड़े नाग उन्हें घेरे हुए स्तुति कर रहे थे। गलेमें सुगन्धित वनमाला उनकी शोभा बढ़ा रही थी। वे दो नील वस्त्र और सुंदर कर्णभूषण धारण किये मनोहर गेंड़ुली मारे जलके भीतर विराजमान थे। उनकी गोद में भगवान् श्रीकृष्ण दृष्टिगोचर हुए, जो सजल मेघके समान श्याम, किञ्चित् लालिमायुक्त विशाल नेत्रोंवाले, चतुर्भुज, सुंदर और चक्र आदि आयुधोंसे विभूषित थे। उन्होंने दो पीताम्बर धारण कर रखे थे। विचित्र-विचित्र हार उनकी शोभा बढ़ाते थे। इन्द्रधनुष और विद्युन्मालासे विभूषित मेघकी भाँति उनकी विचित्र शोभा हो रही थी। वक्ष:स्थल में श्रीवत्सचिह्न सुशोभित था। भुजाओं में भुजबन्ध और मस्तकपर मुकुट देदीप्यमान था। कानों में कमलापुष्प कुण्डलका काम देता था। सानन्द आदि पापरहित सिद्ध योगी नासिका के अग्रभागपर दृष्टि जमाए मन-ही-मन भगवान् का ध्यान करते थे। बलराम और श्रीकृष्णको वहाँ पहचाकर अक्रूर बड़े आश्चर्य में पड़े। वे सोचने लगे- 'दोनों भाई इतना शीघ्र यहाँ कैसे आ गये?' अक्रूर ने कुछ बोलना चाहा, किन्तु श्रीकृष्ण ने उनकी वाणीको स्तम्भित कर दिया। तब वे जल से निकलकर रथ के पास आये, किन्तु वहाँ बलराम और श्रीकृष्ण पहले की ही भाँति बैठे दिखायी दिए। तब उन्होंने पुन: जल में डुबकी लगायी। भीतर वाही दृश्य दिखायी दिया। गन्धर्व, मुनि, सिद्ध तथा बड़े-बड़े नाग श्री कृष्ण और बलराम की स्तुति करते थे। यह सब देखकर दानपति अक्रूरको वास्तविक रहस्यका पता लग गया। वे पूर्ण विज्ञानमय भगवान् अच्युतकी स्तुति करने लगे-
'जिनका सत्तामात्र स्वरुप है, महिमा अचिन्त्य है, जो सर्वत्र व्यापक हैं, जो कारणरूप से एक, किन्तु कार्य रूप से अनेक हैं, उन परमात्मा को बारंबार नमस्कार है। अचिन्त्य परमेश्वर! आप शब्द (वैदिक मन्त्र)- रूप और हवि:स्वरुप हैं। आपको नमस्कार है। प्रभो! आप प्रकृति से परे विज्ञानस्वरूप हैं। आपको नमस्कार है। आप ही भूतात्मा, इन्द्रियात्मा, प्रधानात्मा, जीवात्मा और परमात्मा हैं। इस प्रकार एक होते हुए भी आप पाँच प्रकार से स्थित हैं। सर्वधर्मात्मन् महेश्वर! आप ही क्षर और अक्षर हैं। मुझपर प्रसन्न होइये। ब्रह्मा, विष्णु तथा शिव आदि नामों से आपका ही वर्णन किया जाता है। भगवन्! आपके स्वरूप, प्रयोजन और नाम आदि सभी अनिर्वचनीय हैं। आप परमेश्वरको मेरा नमस्कार है। नाथ! जहाँ नाम जाति आदि कल्पनाओंका अस्तित्व नहीं है, वह नित्य, अविकारी और अजन्मा परब्रह्म आप ही हैं। कल्पनाके बिना- कोई व्यवहारिक नाम रखे बिना किसी भी पदार्थका ज्ञान नहीं होता। इसलिये कृष्ण, अच्युत, अनन्त और विष्णु आदि नामोंसे आपकी स्तुति की जाती है। सर्वात्मन्! आप अजन्मा परमेश्वर हैं। जगत् में जितनी कल्पनाएँ हैं, उन सबके द्वारा आपका ही बोध होता है। आप ही देवता हैं, सम्पूर्ण जगत् हैं तथा विश्वरूप हैं। विश्वात्मन्! आप विकार और भेदसे सर्वथा रहित है, सम्पूर्ण विश्वमें आपके सिवा दूसरी कोई वस्तु नहीं है। आप ही ब्रह्मा, महादेवजी, सूर्य, धाता, विधाता, इन्द्र, वायु, अग्नि, वरुण, कुबेर और यम हैं। एकमात्र आप ही भिन्न-भिन्न रूप धारण करके अपनी विभिन्न शक्तियोंसे जगत्की रक्षा करते हैं। आप ही विश्वकी सृष्टि करते हैं और आप ही प्रलयकालीन सूर्य होकर सम्पूर्ण जगत् का संहार करते हैं। अज! यह गुणमय प्रपञ्च आपका ही स्वरूप है। सत्स्वरूप परमेश्वर का वाचक जो ॐकाररूप अक्षर है, वह आपका उत्कृष्ट स्वरूप है। वही सत्, असत् और ज्ञानात्मा है।आपके उस स्वरूप को मेरा प्रणाम है। भगवन्! वासुदेवरूप में आपको नमस्कार है। संकर्षण-संज्ञा धारण करनेवाले आपको नमस्कार है। प्रद्युम्न कहलानेवाले आपको नमस्कार है और अनुरुद्ध नामसे पुकारे जानेवाले आपको नमस्कार है।'
इस प्रकार जलके भीतर यदुवंशी अक्रूरने सर्वेश्वर श्रीकृष्णकी स्तुति यदुवंशी अक्रूरने सर्वेश्वर श्रीकृष्ण की स्तुति करके मानसिक धूप और पुष्पोंद्वारा उनका पूजन किया। अन्य विषयोंका चिन्तन छोड़कर मनको उन ब्रह्मभूत परमात्मा में लगा दीर्घकालतक ध्यान किया। तत्पश्चात् समाधिसे विरत हो अपनेको कृतार्थ मानते हुए यमुना-जलसे निकलकर वे पुन: रथके समीप आये। आनेपर उन्होंने बलराम और श्रीकृष्णको पूर्ववत् बैठे देखा। अक्रूरजी के नेत्रोंसे विस्मयका आभास मिलता था। यह देख श्रीकृष्ण ने उनसे कहा- 'अक्रूरजी! आपने यमुनाके जल में कौन-सी आश्चर्यकी बात देखी है, जो आपके नेत्र आश्चर्यचकित दिखायी देते हैं'
अक्रूर बोले - अच्युत! जलके भीतर मैंने जो आश्चर्य देखा है, उसे यहीं अपने सामने मूर्तिमान् बैठा देखता हूँ। यह परम आश्चर्यमय जगत् जिन महात्माका स्वरूप है, उन्हीं आश्चर्यस्वरूप आपके साथ मेरा समागम हुआ है। मधुसूदन! अब इस विषयमें अधिक कहनेकी क्या आवश्यकता। चलिये, मथुरा चलें। मैं कंससे डरता हूँ। जो दूसरोंके टुकड़ोंपर जीवन-निर्वाह करनेवाले हैं, उन मनुष्योंके जन्म को धिक्कार है।
यों कहकर अक्रूरने घोड़ोंको हाँक दिया और सायंकालके समय मथुरापुरी में जा पहुँचे। मथुरा को देखकर अक्रूरने बलराम और श्रीकृष्ण से कहा- 'महापराक्रमी वीरो! अब आपलोग पैदल जाइये। रथसे मैं अकेला ही जाऊँगा। मथुरा में पहुँचकर आप दोनों वसुदेवजी के घर न जाएँ, क्योंकि आपके ही कारण वह बेचारा बूढ़ा कंसके द्वारा सदा अपमानित होता है।'
यों कहकर अक्रूर मथुरापुरी में चले गये। राम और श्रीकृष्ण भी पुरीमें पहुँचकर राजमार्गपर आ गये। उस समय नगरके सभी स्त्री-पुरुष आनन्दपूर्ण नेत्रों से उन्हें निहारते थे। वे दोनों वीर तरुण हाथियों की भाँति लीलापूर्वक चल रहे थे। घूमते-घूमते उन दोनों भाइयों ने कपड़ा रँगनेवाले एक रजकको देखा। उससे अपने शरीरके अनुरूप सुन्दर वस्त्र माँगे। वह राजा कंसका रजक था। राजा की कृपा पाकर उसका अहंकार बहुत बढ़ गया था। उसने बलराम और श्रीकृष्णके प्रति ललकारकर अनेक आक्षेपयुक्त कटुवचन कहे। उस दुरात्मा राजकका बर्ताव देख श्रीकृष्ण कुपित हो उठे। उन्होंने थप्पड़से मारकर उस राजकका मस्तक पृथ्वीपर गिरा दिया। उसे मारकर राम और कृष्णने उसके सारे वस्त्र छीन लिए और अपनी रूचिके अनुसार पीले एवं नीले वस्त्र धारण करके वे बड़ी प्रसन्नता के साथ मालीके घर गये। उन्हें देखते ही मालीके नेत्र आनन्दसे खिल उठे। वह अत्यन्त विस्मित होकर मन-ही-मन सोचने लगा- 'ये दोनों किसके पुत्र हैं? कहाँसे आये हैं? एक के अङ्गपर पीताम्बर शोभा पाता है तो दूसरे के शरीर पर नीलाम्बर। दोनों ही अत्यन्त मनोहर दिखायी देते हैं।' उन्हें देखकर माली ने समझा- दो देवता इस भूतल पर उतरे हैं। उन दोनों भाइयों के मुखकमल प्रफुल्लित दिखायी देते थे। मालीने दोनों हाथ पृथ्वीपर फैलाकर सिरसे पृथ्वी का स्पर्श करते हुए साष्टाङ्ग प्रणाम किया और कहा- 'नाथ! आप दोनों बड़ी कृपा करके मेरे घर पधारे हैं! मैं धन्य हो गया। अब पुष्पों से आप दोनोंकी पूजा करूँगा।' यों कहकर उसने रूचिके अनुसार फूल भेंट किये। 'ये सुंदर हैं, ये मनोहर हैं,' यों कहते हुए उसने उनके मनमें फूलों के प्रति आकर्षण पैदा किया और जो-जो उन्हें पसंद आया, वह सब दिया। प्राय: सभी फूल मनोहर, निर्मल और सुगन्धित थे। श्रीकृष्ण ने प्रसन्न होकर मालीको वर दिया- 'भद्र! मेरे अधीन रहनेवाली लक्ष्मी तेरा कभी त्याग न करेगी। सौम्य! तेरे बल और धन की कभी हानि न होगी। जबतक यह पृथ्वी और सूर्य रहेंगे, तबतक तेरी पुत्र-पौत्र आदि वंश-परम्परा कायम रहेगी। तू बहुत-से भोग भोगकर अन्तमें मेरी कृपासे मुझे स्मरण करते हुए दिव्य लोक प्राप्त करेगा। भद्र! तेरा मन हर समय धर्म में लगा रहेगा।'
यों कहकर बलरामसहित श्रीकृष्ण मालीद्वारा पूजित हो उसके घरसे चले आये।
१. चिन्तयामास चाक्रूरो नास्ति धन्यतरो मया। योऽहमंशावतीर्णस्य मुखं द्रक्ष्यामि चक्रिण: ॥
अद्य मे सफलं जन्म सुप्रभाता च मे निशा। यदुन्निद्राब्जपत्राक्षं विष्णोर्द्रक्ष्याम्यहं मुखम् ॥
पापं हरति यात्पुंसां स्मृतं संकल्पनामयम्। तत्पुण्ङरीकनयनं विष्णोर्द्रक्ष्याम्यहं मुखम् ॥
निर्जग्मुश्च यतो वेदा वेदाङ्गान्यखिलानि च। द्रक्ष्यामि यत्परं धाम देवानां भग्वंमुख्म् ॥
(१९१।२-५)
२. न ब्रह्मा नेन्द्ररुद्रश्विवस्वादित्यमरुद्रणा:। यस्य स्वरूपं जानन्ति स्पृशत्यद्य स मे हरि: ॥
सर्वात्मा सर्वग: सर्व: सर्वभूतेष संस्थित:। यो भवत्यव्ययो व्यापी स वीक्ष्यते मयाऽद्य ह॥
मत्स्यकूर्मवराहाद्यै: सिंहरूपादिभि: स्थितम्। चकार योगतो योगं स मामालापयिष्यति ॥
सांप्रतं च जगत्स्वामी कार्यजाते व्रजे स्थितिम्। कर्तुं मनुष्यतां प्राप्त: स्वेच्छादेहधृगव्यय: ॥
योऽनन्त: पृथिवीं धत्ते शिखरस्थितिसंस्थिताम्। सोऽवतीर्णो जगत्यर्थे मामक्रूरेति वक्ष्यति ॥
पितृबन्धुसुहृद्भ्रातृमातृबन्धुमयीमिमाम्। यन्मायां नालमुद्धर्तुं जगत्तस्मै नमो नम: ॥
तरन्त्यविद्यां विततां हृदि यस्मिन्निवेशिते। योगमायामिमां मर्त्यास्तस्मै विद्यात्मने नम: ॥
यज्वभिर्यज्ञपुरुषो वासुदेवश्च शाश्वतै:। वेदान्तवेदिभिर्विष्णु: प्रोच्यते यो नतोऽस्मि तम्॥
तथा यत्र जगद्धाम्नि धार्यते च प्रतिष्ठितम्। सदसत्त्वं स सत्त्वेन माय्यसौ यातु सौम्यताम् ॥
स्मृते सकलकल्याणभाजनं यत्र जायते। पुरुषप्रवरं नित्यं व्रजामि शरणं हरिम् ॥
(१९१।८-१७)
* स ददर्श तदा तत्र कृष्णमादोहने गवाम्। वत्समध्यगतं फुल्लनीलोत्पलदलच्छविम् ॥
प्रफुल्लपद्यपत्राक्षं श्रीवत्साङ्कितवक्षसम्। प्रलम्बबाहुमायामतुङ्गोरस्थलमुन्नसम् ॥
सविलासस्मिताधारं विभ्राणं मुखपङ्कजम्। तुङ्गरक्तनखं पभ्दयां धरण्यां सुप्रतिष्ठितम् ॥
विभ्राणं वाससी पीते वन्यपुष्पविभूषितम्। सान्द्रनीललताहस्तं सिताम्भोजावतंसकम् ॥
हन्सेंदुकुन्दधवलं नीलाम्बरधरं द्विजा:। तस्यानु बलभद्रं च ददर्श यदुनन्दनम् ॥
प्रांशुमुत्तुङ्गबाहुं च विकाशिमुखपङ्कजम्। मेघमालापरिवृतं कैलासाद्रिमिवापरम् ॥
(१९१।१९-२४)
Summary of chapter 75 of the Brahma Mahā Purana is as follows:
The demon Pūtanā, disguised as a beautiful woman, approaches infant Kṛṣṇa in Gokula and offers her poisoned breast. Kṛṣṇa sucks out her life along with the milk, killing her; her body falls with a tremendous crash, revealing her true monstrous form. Subsequently, Kṛṣṇa overturns a decorated cart (Śakaṭa) under which he lies, killing the demon Śakaṭāsura hidden within — performing these feats as a mere infant.