मुनियोंने पूछा- महाभाग ! आप सर्वज्ञ हैं समस्त प्राणियोंके हितमें तत्पर रहनेवाले हैं । मुने भूत , भविष्य और वर्तमान- कुछ भी आपसे छिपा नहीं है। महामते ! किस कर्मसे उच्च वर्णोंकी नीच गति होती है और किस कर्मसे नीच वर्णोंकी उत्तम गति होती है ? यह बतानेकी कृपा करें ।
व्यासजी बोले – मुनिवरो ! भाँति - भाँतिके वृक्ष और लताओंसे आच्छादित , अनेक प्रकारकी धातुओंसे विभूषित तथा विविध आश्चर्योंसे युक्त हिमालयके रमणीय शिखरपर त्रिपुरासुरका नाश करनेवाले त्रिनेत्रधारी भगवान् शंकर विराजमान थे । वहाँ गिरिराजकुमारी पार्वतीदेवीने देवेश्वर महादेवजीको प्रणाम करके यही प्रश्न किया था । मैं वही प्रसङ्ग यहाँ सुना रहा हूँ , तुम सब लोग ध्यान देकर सुनो ।
पार्वतीजीने पूछा- भगवन् ! स्वयम्भू भगवान् ब्रह्माने पूर्वकालमें चार वर्णोंकी सृष्टि की । उनमेंसे वैश्य किस कर्मसे शूद्रभावको प्राप्त होता है ? अथवा क्या करनेसे क्षत्रिय वैश्य हो जाता है और ब्राह्मण किस कर्मके अनुष्ठानसे क्षत्रिय होता है ? देव ! इस प्रकार धर्मको प्रतिलोम - दशामें कैसे लाया जा सकता है ? ब्राह्मण अथवा क्षत्रिय किस कर्मसे शूद्र होते हैं ? भूतनाथ ! आप मेरे इस संशयका निवारण कीजिये । क्षत्रिय आदि तीन वर्णोंके लोग , जो जन्मसे ही यहाँ भिन्न वर्णवाले हैं , कैसे ब्राह्मणभावको प्राप्त हो सकते हैं ?
शिवजी बोले- देवि ! ब्राह्मणत्वकी प्राप्ति अत्यन्त कठिन है । शुभे ! ब्राह्मण स्वभावसे ही ब्राह्मण होता है ; इसी प्रकार क्षत्रिय , वैश्य और शूद्र भी स्वभावसे ही वैसे होते हैं- ऐसा मेरा विचार है । ब्राह्मण इस लोकमें पापकर्म करनेसे अपने पथसे भ्रष्ट हो जाता है , उत्तम वर्णको पाकर भी फिर उससे नीचे गिर जाता है जो ब्राह्मण धर्मका है पालन करते हुए उसीसे जीवन निर्वाह करता है ,
वह ब्रह्मभावको प्राप्त होता है ; परंतु जो ब्राह्मणत्वका होते त्याग करके क्षत्रियोचित धर्मोंका सेवन करता है , शूद्रान वह ब्राह्मणत्वसे भ्रष्ट होकर क्षत्रिययोनिमें जन्म लेता है । जो विप्र लोभ और मोहका आश्रय ले अपनी मन्द बुद्धिके कारण दुर्लभ ब्राह्मणत्वको पाकर भी सदा वैश्यकर्मका अनुष्ठान करता है , वह वैश्ययोनिको प्राप्त होता है ; अथवा यदि वैश्य शूद्रोचित कर्म करने लगता है तो वह शूद्र हो जाता है । अपने धर्मसे भ्रष्ट हुआ ब्राह्मण शूद्रत्वको प्राप्त होता है । वर्णसे भ्रष्ट या बहिष्कृत होनेपर वह ब्रह्मलोकसे भी गिर जाता है और नरकमें पड़नेके पश्चात् शूद्रयोनिमें जन्म लेता है । महाभागे ! क्षत्रिय अथवा वैश्य भी जब अपना - अपना कर्म छोड़कर शूद्रोचित कर्म करने लगते हैं , तब अपने पदसे भ्रष्ट होकर वर्णसंकर हो जाते हैं । ऐसे कर्म भ्रष्ट ब्राह्मण , क्षत्रिय और वैश्य- तीनों शूद्रभावको प्राप्त होते हैं । जो शूद्र ज्ञान - विज्ञानसे युक्त एवं पवित्र हो अपने धर्मका पालन करते हुए जीवन निर्वाह करता है , धर्मको जानता और उसके पालनमें तत्पर रहता है , वह धर्मके फलका भागी होता है ।* देवि ! ब्रह्माजीने यह एक दूसरी आध्यात्मिक बात बतलायी है , जिसके पालनसे धर्मकामी पुरुषों नैष्ठिक सिद्धि प्राप्त होती है । जो मनुष्य क्षत्रियके वीर्य और शूद्रजातीय स्त्रीके गर्भसे उत्पन्न अथवा वर्णसंकर है , उसका अन्न अत्यन्त निन्दित माना गया है । इसी प्रकार एक समुदायका अन्न , श्राद्ध और सूतकका अन्न तथा शूद्रका अन्न कभी नहीं खाना चाहिये । देवि ! देवताओं और महात्मा पुरुषोंने शूद्रके अन्नकी सदा ही निन्दा की है । यह श्रीब्रह्माजी के श्रीमुखका कथन होनेके कारण अत्यन्त प्रामाणिक । जो ब्राह्मण अपने पेटमें शूद्रका अन्न लिये मृत्युको प्राप्त होता है , वह अग्निहोत्री और यज्ञकर्ता होते हुए भी शूद्रोचित गतिको प्राप्त होता है। पेटमें शूद्रान शेष रहनेके कारण वह ब्रह्मलोकसे भ्रष्ट हो जाता है । शूद्रान्न-भोजी ब्राह्मण शूद्रत्वको प्राप्त होता है -इसमें अन्यथा विचारके लिये स्थान नहीं है। ↑ब्राह्मण अपने उदरमें जिसका अन्न शेष रहते प्राण त्याग करता है और जिसके अन्नसे जीवन निर्वाह करता है , उसीकी योनिको प्राप्त होता है । जो लोग दुर्लभ ब्राह्मणत्वको अनायास ही पाकर उसकी अवहेलना करते हैं अथवा अभक्ष्य - भक्षण करते हैं , वे ब्राह्मणत्वसे गिर जाते हैं शराबी , ब्रह्महत्यारा , चोर , व्रत भङ्ग करनेवाला अपवित्र , स्वाध्याय न करनेवाला , पापी , लोभी अपकारी , शठ , व्रतहीन , शूद्रीका पति , दोगलेका अन्न खानेवाला , सोमरस बेचनेवाला और नीचसेवी ब्राह्मण ब्राह्मणत्वसे भ्रष्ट हो जाता है। गुरुस्त्रीगामी गुरुद्वेषी , गुरुनिन्दापरायण तथा ब्रह्मद्रोही ब्राह्मण भी ब्रह्मयोनिसे गिर जाता है।
जो शूद्र सब कर्म शास्त्रीय विधिके अनुसार न्यायपूर्वक करता है , सबका अतिथि सत्कार करनेके बाद बचा हुआ अन्न भोजन करता है , अपनेसे श्रेष्ठ वर्णवाले पुरुषोंकी सेवा शुश्रूषामें यत्नपूर्वक लगा रहता है , जो कभी मनमें बुरा नहीं मानता सदा सन्मार्गपर स्थित रहता है , देवता और द्विजोंका सत्कार करता , सबका आतिथ्य करनेके लिये दृढ़संकल्प रहता , ऋतुकालमें पत्नीके साथ समागम करता , नियमपूर्वक रहकर नियमित भोजन करता और कार्यदक्ष , साधुसेवी तथा अतिथियोंसे बचे हुए अन्नका भोजन करनेवाला होता है , जो कभी भी मांस नहीं ग्रहण करता, ऐसा शूद्र वैश्ययोनिको प्राप्त होता है । जो वैश्य सत्यवादी , अहंकाररहित , निर्द्वन्द्व , सामवेदका ज्ञाता , पवित्र और स्वाध्यायपरायण होकर प्रतिदिन यज्ञ करता , मन और इन्द्रियोंको संयममें रखता , ब्राह्मणोंका सत्कार करता , किसी भी वर्णके दोष नहीं देखता , गृहस्थोचित व्रतका पालन करते हुए केवल दो समय भोजन करता है , जो आहारपर विजय पाकर निष्काम एवं अहंकारशून्य हो गया है , अग्निहोत्रकी उपासना करते हुए विधिपूर्वक हवन करता है और सबका आतिथ्य सत्कार करते हुए यज्ञशिष्ट अन्नका भोजन करता है , वह वैश्य पवित्र होकर श्रेष्ठ क्षत्रिय कुलमें जन्म ग्रहण करता है । क्षत्रियरूपमें उत्पन्न होनेपर वह जन्मसे ही अच्छे संस्कारका होता है I उपनयनके पश्चात् ब्रह्मचर्यव्रतके पालनमें तत्पर हो संस्कारसम्पन्न द्विज होता है । वह समय-समयपर दान देता , प्रचुर दक्षिणा देकर वैभवपूर्ण यज्ञ करता और वेदाध्ययन करके स्वर्गकी इच्छासे आहवनीय आदि तीनों अग्नियोंकी सदा उपासना करता है । राजा होनेपर वह संकल्पके जलसे भीगे हाथोद्वारा दान देता और सदा धर्मपूर्वक प्रजाका पालन करता है । स्वयं सत्यवादी होकर सदा सत्यका ही अनुष्ठान करता है , शुद्धिपर दृष्टि रखता है और धर्मदण्डसे युक्त हो धर्म , अर्थ एवं कामरूप त्रिवर्गका साधन करता है । शरीर और इन्द्रियोंको वशमें रखकर प्रजासे करके रूपमें केवल उसकी आयका छठा भाग ग्रहण करता है। तत्त्वज्ञ राजाको चाहिये कि वह स्वेच्छाचारी होकर विषय- भोगोंका सेवन न करे , अपितु धर्ममें चित लगाकर सदा ऋतुकालमें ही पत्नीके पास जाय नित्य उपवास करनेवाला , नियमपरायण , स्वाध्यायशील तथा पवित्र रहे । सबका अतिथि-सत्कार करे धर्म , अर्थ और कामका चिन्तन करते हुए सदा प्रसन्न चित्त रहे। अन्नकी इच्छा रखनेवाले शूद्रोंको भी सदा यही उत्तर दे- ‘भोजन तैयार है।' स्वार्थ या कामनासे प्रेरित होकर कोई भाव न व्यक्त करे । देवता , पितर और अतिथियोंके लिये सर्वदा साधन-सामग्री उपस्थित रखे अपने घरमें न्यायानुकूल विधिसे उपासना करे । भिक्षुको भिक्षा दे। दोनों समय विधिपूर्वक अग्निहोत्र करे तथा गौओं और ब्राह्मणोंका हितसाधन करनेके लिये संग्राममें सम्मुख होकर प्राण दे दे त्रिविध अग्नियोंके सेवन तथा मन्त्रोच्चारणपूर्वक हवन करनेसे पवित्र होकर क्षत्रिय भी जन्मान्तरमें ज्ञान-विज्ञान- सम्पन्न , वेदोंका पारंगत और संस्कारयुक्त ब्राह्मण हो जाता है । इस प्रकार उत्तरोत्तर शुभ कर्म करनेसे धर्मात्मा वैश्य कर्मानुसार क्षत्रिय होता है और नीच कुलमें उत्पन्न शूद्र भी उत्तम कर्म करनेसे संस्कार सम्पन्न द्विज हो जाता है। देवि ! जन्मसे ब्राह्मण होनेपर भी जो दुराचारी और समस्त वर्णसंकरोंका अन्न भोजन करनेवाला है , वह ब्राह्मणत्वको त्यागकर वैसा ही शूद्र हो जाता है । इसी प्रकार शुद्धात्मा एवं जितेन्द्रिय शूद्र भी शुद्ध कर्मोंके अनुष्ठानसे ब्राह्मणकी भाँति सेवन करने योग्य हो जाता है , यह साक्षात् ब्रह्माजीका कथन है जो शूद्र अपने स्वभाव और कर्मके अनुसार जीवन बिताता है , उसे द्विजातियोंसे भी अधिक शुद्ध जानना चाहिये - ऐसा मेरा विश्वास है । जन्म , संस्कार , वेदाध्ययन और संतति- सब द्विजत्वके कारण नहीं हैं ; द्विजत्वका मुख्य कारण तो सदाचार ही है । संसारमें ये सब लोग आचरणसे ही ब्राह्मण माने जाते हैं । उत्तम आचरणमें स्थित होनेपर शूद्र भी ब्राह्मणत्वको प्राप्त हो सकता है * पार्वती ! ब्रह्मस्वभाव सर्वत्र सम है- यह मेरी मान्यता है जहाँ निर्गुण एवं निर्मल ब्रह्म स्थित है , वहीं द्विजत्व है । देवि ! ये जो विमल स्वभाववाले पुरुष हैं , वे ब्रह्मके ही स्थान और भावका दर्शन करानेवाले हैं । प्रजाकी सृष्टि करते | समय वरदायक भगवान् ब्रह्माने स्वयं ही ऐसी बात कही थी । ब्राह्मण इस संसारमें एक महान् क्षेत्र है , जो हाथ - पैरोंसे युक्त होकर सर्वत्र विचरता रहता है । इसमें जो बीज पड़ता है , वह परलोकमें फल देनेवाली खेती है । ब्राह्मणको सदा संतुष्ट एवं सन्मार्गका पथिक होना चाहिये । उन्नति चाहनेवाले द्विजको सदा ब्रह्ममार्गका अवलम्बन करके रहना चाहिये । गृहस्थ ब्राह्मणको घरपर रहते हुए प्रतिदिन संहिताके मन्त्रोंका अध्ययन और स्वाध्याय करना चाहिये । वह अध्ययनकी वृत्तिसे ही जीवन निर्वाह करे । जो ब्राह्मण इस प्रकार सदा सन्मार्गमें स्थित हो अग्निहोत्र और स्वाध्याय करता है , वह ब्रह्मभावको प्राप्त होता है । देवि ! ब्राह्मणत्वको प्राप्त करके उसकी यत्नपूर्वक रक्षा करनी चाहिये । यह मैंने तुम्हें बड़ी गोपनीय बात बतलायी है । शूद्र धर्माचरणसे ब्राह्मण होता है और ब्राह्मण धर्मभ्रष्ट होनेपर शूद्रत्वको प्राप्त होता है।
*प्राणयात्रानिमित्तं च व्यङ्गारेऽभुक्तवज्जने । काले प्रशस्तवर्णानां भिक्षार्थी पर्यटेद् गृहान् ॥ अलाभे विषादी स्याल्लाभे नैव च हर्षयेत्। प्राणयात्रिकमात्रः स्यान्मात्रासङ्गाद्विनिर्गतः ॥ अतिपूजितलाभांस्तु जुगुप्सेच्चैव सर्वतः। अतिपूजितलाभैस्तु यतिर्मुकोऽपि बध्यते ॥
कामः क्रोधस्तथा दर्पो लोभमोहादयक्ष ये । तांस्तु दोषान् परित्यज्य परिव्राष्निर्ममो भवेत् ॥
( २२२।५०-५३)
* यस्तु शूद्रः स्वधर्मेण ज्ञानविज्ञानवाञ्शुचिः । धर्मज्ञो धर्मनिरतः स धर्मफलमश्नुते॥
(२२३ ।२१)
तेन शूद्रानशेषेण ब्रह्मस्थानादपाकृतः। ब्राह्मणः शूद्रतामेति नास्ति तत्र विचारणा ॥
( २२३ । २६ )
*ब्राह्मणो वाप्यसद्वृत्तः सर्वसंकरभोजनः॥
स ब्राह्मण्यं समुत्सृज्य शूद्रो भवति तादृशःI कर्मभिः शुचिभिर्देवि शुद्धात्मविजितेन्द्रियः॥
शूद्रोऽपि द्विजवत्सेव्य इति ब्रह्माब्रवीत्स्वयम्। स्वभावकर्मणा चैव यश्च शूद्रोऽधितिष्ठति॥
विशुद्धः स द्विजातिभ्यो विज्ञेय इति मे मतिः। न योनिर्नापि संस्कारो न श्रुतिर्न च संततिः ॥
कारणानि द्विजत्वस्य वृत्तमेव तु कारणम् । सर्वोऽयं ब्राह्मणो लोके वृत्तेन तु विधीयते ॥
वृत्ते स्थितश्च शूद्रोऽपि ब्राह्मणत्वं च गच्छति ।
( २२३।५३-५८ )
Summary of chapter 91 of the [[BOOK_TITLE]] is as follows:
Pradyumna — son of Kṛṣṇa and Rukmiṇī who was abducted as an infant by the demon Śambara and raised in his household — grows up as a great hero, slays Śambara, and returns to Dvārakā with his wife Māyāvatī (actually the celestial Rati, Kāma's consort). Their return to the Yādava court is the occasion for joyful recognition and celebration, and the chapter narrates the circumstances of Pradyumna's birth, abduction, and extraordinary upbringing.