व्यासजी कहते हैं - देवाधिदेव! श्रीहरि ने पहले जैसा आदेश दिया था, उसके अनुसार जगज्जननी योगमाया ने देवकी के उदर में क्रमशः छ: गर्भ स्थापित किये और सातवें को खींचकर रोहिणीके उदर में डाल दिया। तदनन्तर तीनों लोकों का उपकार करने के लिये साक्षात् श्रीहरि ने देवकी के गर्भ में प्रवेश किया और उसी दिन योगनिद्रा यशोदा के उदर में प्रविष्ट हुईं। भगवान् विष्णु के अंश के भूतल पर आते ही आकाश में ग्रहों की गति यथावत् होने लगी। समस्त ऋतुएँ सुखदायिनी हो गयीं। देवकी के शरीर में इतना तेज आ गया कि कोई उनकी ओर आँख उठाकर भी नहीं सकता था। देवतागण स्त्री-पुरुषों से अदृश्य रहकर अपने उदर में श्रीविष्णु को धारण करनेवाली माता देवकीका प्रतिदिन स्तवन करने लगे।
देवता बोले - देवि! तुम स्वाहा, तुम स्वधा और तुम्हीं विद्या, सुधा एवं ज्योति हो। इस पृथ्वीपर सम्पूर्ण लोकोंकी रक्षाके लिए तुम्हारा अवतार हुआ है। तुम प्रसन्न होकर सम्पूर्ण जगत्का कल्याण करो। हमारी प्रसन्नता के लिए उन परमेश्वरको अपने गर्भ में धारण क्रो, जिन्होंने स्वयं सम्पूर्ण जगत् को धारण कर रखा है।
इस प्रकार देवताओंद्वारा ही हुई स्तुति सुनती हुई माता देवकीने जगत्की रक्षा करनेवाले कमलनयन भगवान् विष्णु को अपने गर्भ में धारण किया। तदनन्तर वह शुभ समय उपस्थित्त हुआ, जबकि समस्त विश्वरूपी कमलको विकसित करनेके लिए महात्मा श्रीविष्णुरुपी सूर्यदेवका देवकीरुपी प्रभातवेला में उदय हुआ। आधी रातका समय था। मेघ मन्द-मन्द स्वर में गरज रहे थे। शुभ मुहूर्त्त में भगवान् जनार्दन प्रकट हुए। उस समय सम्पूर्ण देवता फूलों की वर्षा करने लगे। विकसित नील कमल के समान श्यामवर्ण, श्रीवत्सचिह्न से सुशोभित वक्ष:स्थलवाले चतुर्भुज बालक को उत्पन्न हुआ देख परम बुद्धिमान् वसुदेवजी ने उल्लासपूर्ण वचनों में भगवान् का स्तवन किया और कंस से भयभीत होकर कहा- 'शङ्ख, चक्र एवं गदा धारण करनेवाले देवदेवेश्वर! मैंने जान लिया, आप साक्षात् भगवान् हैं; परन्तु देव! आप मुझपर कृपा करके अपने इस दिव्य रूप को छिपा लीजिये। आप मेरे भवन में अवतीर्ण हुए हैं, यह बात जान लेने पर कंस अभी मुझे कष्ट देगा।'
देवकी बोलीं - जिनके अनन्त रूप हैं, यह सम्पूर्ण विश्व जिनका ही स्वरुप है, जो गर्भ में स्थित होकर भी अपने शरीर से सम्पूर्ण लोकों को धारण करते हैं तथा जिन्होंने पानी माया से ही वाल-रूप धारण किया है, वे देवदेव प्रसन्न हों। सर्वात्मन्! आप अपने इस चतुर्भुज रूप का उपसंहार कीजिये। दैत्यों का संहार करनेवाले देवेश्वर! आपके इस अवतारका वृत्तान्त कंस न जानने पाये।
श्रीभगवान् बोले - देवि! पूर्वजन्म में तुमने मुझ-जैसे पुत्रको पाने की अभिलाषा से जो मेरा स्तवन किया था, वह आज सफल हो गया; क्योंकि आज मैंने तुम्हारे उदरसे जन्म लिया है।
मुनिवरो! यों कहकर भगवान् मौन हो गये तथा वसुदेवजी भी रात में ही उन्हें लेकर घरसे बाहर निकले। वसुदेव जी के जाते समय पहरा देनेवाले मथुरा के द्वारपाल योगनिद्रा के प्रभाव से अचेत हो गये थे। उस रात में बादल वर्षा कर रहे थे। यह देख शेषनागने छत्रकी भाँति अपने फणों भगवान् को ढँक लिया और वे वसुदेवजी के पीछे-पीछे चलने लगे। मार्ग में अत्यन्त गहरी यमुना बह रही थीं। उनके जल में नानाप्रकार की सैकड़ों लहरें उठ रही थीं, किन्तु भगवान् विष्णुको ले जाते समय वे वसुदेवजी के घुटनोंतक होकर बहने लगीं। वसुदेवजी ने उसी अवस्था में यमुना पार किया। उन्होंने देखा- नन्द आदि बड़े-बूढ़े गोप राजा कंसका कर लेकर यमुना के तटपर आये हुए हैं। इसी समय यशोदा जी ने भी योगमाया को कन्यारूप में जन्म दिया। परंतु वे योगनिद्रा से मोहित थीं; अत: 'ओउत्र है या पुत्री' इस बात को जान न सकीं। प्रसूतिगृह में और भी जो स्त्रियाँ थीं, वे सब निद्रा के कारण अचेत पड़ी थीं।वसुदेवजी ने चुपकेसे अपने बालकको यशोदाकी शय्या पर सुला दिया और कन्या को लेकर तुरंत लौट आये। जागनेपर यशोदा ने देखा- 'मेरे नील कमल के समान श्यामसुंदर बालक हुआ हिया।' इससे उन्हें बड़ी प्रसन्नता हुई। वसुदेव जी भी कन्या को लाकर अपने घर लौट आये और देवकी की शय्या पर उसे सुलाकर पहले की भाँति बैठ रहे। इतने में ही बालक के रोनेका शब्द सुनकर पहरा देनेवाले द्वारपाल सहसा उठकर खड़े हो गये। उन्होंने देवकीके संतान होनेका समाचार कंस से निवेदन किया। कंसने शीघ्र ही वहाँ पहुँचकर उस बालिका को उठा लिया। देवकी रुँधे हुए कंठ से 'छोड़ो, छोड़ दो इसे' यों कहकर उसे रोकती ही रह गयीं। कंसने उस कन्या को एक शिलापर दे मारा; किन्तु वह आकाश में ठहर गयी और आयुधोंसहित आठ बड़ी-बड़ी भुजाओंवाली देवी के रूप में प्रकट हुई। उसने ऊँचे स्वरसे अट्टहास किया और कंससे रोषपूर्वक कहा- 'ओ कंस! मुझे पटकने से क्या लाभ हुआ। जो तेरा वध करेंगे, वे प्रकट हो चुके हैं। देवताओं के सर्वस्वभूत वे श्रीहरि पूर्वजन्म में भी तेरे काल थे। इन सब बातों पर विचार करके तू शीघ्र ही अपने कल्याणका उपाय कर।' यों कहकर देवी कंस के देखते-देखते आकाशमार्ग से चली गयी। उसके शरीर पर दिव्य हार, दिव्य चन्दन और दिव्य आभूषण शोभा पा रहे थे और सिद्धगण उसकी स्तुति करते थे।
तदनन्तर कंस के मन में बड़ा उद्वेग हुआ। उसने प्रलम्ब और केशी आदि समस्त प्रधान असुरोंको बुलाकर कहा- 'महाबाहु प्रलम्ब! केशी! धेनुक! और पूतना! अरिष्ट आदि अन्य सब वीरों के साथ तुमलोग मेरी बात सुनो। दुरात्मा देवताओं ने मुझे मार डालनेका यत्न प्रारम्भ किया है। किन्तु वे मेरे पराक्रम से भलीभाँति पीड़ित हो चुके हैं। अत: मैं उन्हें वीरों की श्रेणी में नहीं गिनता। दैत्यवीरो! मुझे तो कन्याकी कही हुई बात आश्चर्य-सी प्रतीत होती है। देवता मेरे विरुद्ध प्रयत्न कर रहे हैं- यह जानकार मुझे हँसी आ रही है। तथापि दैत्येश्वरो! अब हमें उन दुष्टोंका और अधिक अपकार करनेकी चेष्टा करनी चाहिये। देवकीके गर्भ से उत्पन्न हुई वालिका ने यह भी कहा है कि 'भूत, भविष्य और वर्तमान स्वामी विष्णु, जो पूर्वजन्म में भी मेरी मृत्यु के कारण बन चुके हैं, कहीं-न-कहीं उत्पन्न हो गये।' अत: इस भूतलपर बालकों के दमन का हमें विशेष प्रयत्न करना चाहिये। जिस बालक में बलकी अधिकता जान पड़े, उसे यत्नपूर्वक मौत के घात उतार देना चाहिये।'
असुरोंको ऐसी आज्ञा देकर कंस अपने घर गया और विरोध छोड़कर वसुदेव तथा देवकी से बोला- 'मैंने आप दोनों के इतने बालक व्यर्थ ही मारे। मेरे नाश के लिए तो कोई दूसरा ही बालक उत्पन्न हुआ है। आप लोग संताप न करें। आपके बालकों की भवितव्यता ही ऐसी थी। आयु पूरी होनेपर कौन नहीं मारा जाता।' इस प्रकार सान्त्वना दे कंस ने उन दोनों के बन्धन खोल दिए और उन्हें सब प्रकार से संतुष्ट किया। तत्पश्चात् वह अपने महल के भीतर चला गया।
बन्धन से मुक्त होनेपर वसुदेवजी नन्दके छकड़ेके पास आये। नन्द बड़े प्रसन्न दिखायी दिए। मुझे पुत्र हुआ है, यह सोचकर वे फूले नहीं समाते थे। वसुदेवजी ने भी कहा- 'बड़े सौभाग्यकी बात है कि इस समय वृद्धावस्था में आपको पुत्र हुआ है। अब तो आपलोगों ने राजा का वार्षिक कर चुका दिया होगा। जिसके लिए यहाँ आये थे, वह काम पूरा हो गया। यहाँ किसी श्रेष्ठ पुरुष को अधिक नहीं ठहरना चाहिये। नन्दजी! जब कार्य हो गया, तब आप लोग क्यों यहाँ बैठे हैं। शीघ्र हो अपने गोकुल में जाइये। वहाँ रोहिणी के गर्भ से उत्पन्न मेरा भी एक बालक है। उसका भी अपने ही पुत्र की भाँति लालन-पालन कीजियेगा।'
वसुदेवजी के यों कहनेपर नन्द आदि गोप छकड़ोंपर सामान लादकर वहाँ से चल दिये। उनके गोकुल में रहते समय रात में बालकों की हत्या करनेवाली पूतना आयी और सोये हुए कृष्णको लेकर अपना स्तन पिलाने लगी। पूतना रात में जिस-जिसके मुख में अपना स्तन डालती थी, उस-उस बालकका शरीर क्षणभर में निर्जीव हो जाता था। श्रीकृष्ण ने उसके स्तन को दोनों हाथों से पकड़कर खूब जोर से दबाया और क्रोध में भरकर उसकेप्राणों सहित दूध पीना आरम्भ किया। उस राक्षसी के शरीरकी नस-नाड़ियों के बन्धन छिन्न-छिन्न हो गये। वह जोर-जोर से कराहती हुई पृथ्वीपर गिर पड़ी। मरते समय उसका शरीर बड़ा भयंकर हो गया। पूतना चीत्कार सुनकर समस्त व्रजवासी भयके मारे जाग उठे। उन्होंने आकार देखा, पूतना मरी पड़ी है और श्रीकृष्ण उसकी गोद में बैठे हैं। यह देखकर माता यशोदा थर्रा उठीं और श्रीकृष्ण को शीघ्र ही गोद में उठाकर गायकी पूँछ घुमाने आदि के द्वारा अपने बालक के ग्रह-दोषको शान्त किया। नन्द ने भी गायका गोबर ले श्रीकृष्ण के मस्तक में लगाया और उनकी रक्षा करते हुए इस प्रकार बोले- 'समस्त प्राणियों की उत्पत्ति करनेवाले भगवान् श्रीहरि, जिनके नाभिकमल से सम्पूर्ण जगत् उत्पन्न हुआ है, तुम्हारी रक्षा करें। जिनकी दाढ़के अग्रभाग पर रखी हुई यह पृथ्वी सम्पूर्ण जगत्को धारण करती है, वे वराहरूपधारी केशव तुम्हारी रक्षा करें। तुम्हारे गुदाभाग और\ उदरकी रक्षा भगवान् विष्णु तथा जङ्घा और चरणों की रक्षा श्रीजनार्दन करें। जो एक ही क्षण में वामनसे विराट् बन गये और तीन पगों से सारी त्रिलोकीको नापकर नाना प्रकार के अस्त्र-शास्त्रोंसे सम्पन्न दिखायी देने लगे, वे भगवान् वामन तुम्हारी सदा रक्षा करें। तुम्हारे सरकी गोविन्द तथा कण्ठकी केशव रक्षा करें। मुख, बाहु, प्रबाहु कोहनीके नीचे का भाग), मन और सम्पूर्ण इन्द्रियों की अखण्ड ऐश्वर्यशाली अविनाशी भगवान् नारायण रक्षा करें। भगवान् वैकुण्ठ दिशाओं में (कोणों)- में, हृषीकेश आकाश में और पृथ्वीको धारण करनेवाले भगवान् अनन्त पृथ्वीपर तुम्हारी रक्षा करें।'
इस प्रकार नन्दगोपद्वारा स्वस्तिवाचन होनेपर बालक श्रीकृष्ण छकड़ेके नीचे एक खटोलेपर सुलाए गये। गोपों को मरी हुई पूतनाका विशाल शरीर देखकर अत्यन्त भय और आश्चर्य हुआ। एक दिन की बात है, मधुसूदन श्रीकृष्ण छकड़ेके नीचे सोये हुए थे। उस समय वे दूध पीने के लिए जोर-जोर से रूने लगे। रोते-ही-रोते उन्होंने अपने दोनों पैर ऊपरकी ओर फेंकने आरम्भ किये। उनका एक पैर छकड़ेसे छू गया। उसके हलके आघातसे ही वह छड़का उलटकर गिर पड़ा। उसपर रखे हुए मटके और घड़े आदि टूट-फूट गये। उसस समय समस्त गोप-गोपियाँ हाहाकार करती हुई वहाँ आ पहुँचीं। उन्होंने देखा- 'बालक श्रीकृष्ण उतान सोये हुए हैं।' तब गोपोंने पूछा- 'किसने इस छकड़ेको उलट दिया?' वहीँ कुछ बालक खेल रहे थे। उन्होंने कहा- 'इस बच्चे ने ही गिराया है।' यह सुनकर गोपोंके मन में बड़ा आश्चर्य हुआ। नन्दगोप ने अत्यन्त विस्मित होकर बालकको गोदमें उठा लिया। यशोदाने भी आश्चर्य-चकित हो टूटे-फूटे भाँडों के टुकड़ों और छकड़े की दही, फूल, फल और अक्षत से पूजा की।
एक दिन वसुदेवजी की प्रेरणासे गर्गजी गोकुलमें आये और अन्य गोपों से छिपे-छिपे ही उन्होंने उन दोनों बालकों के द्विजोचित संसार किये। उनके नामकरण-संस्कार करते हुए परम बुद्धिमान् गर्गजी ने बड़े बालकका नाम 'राम' और छोटेका 'कृष्ण' रखा। थोड़े ही दिनों में वे दोनों बालक महाबलवान् के रूप में प्रसिद्ध हो गये। घुटनों के बल से चलने के कारण उनके दोनों घुटनों और हाथों में रगड़ पड़ गयी थी। वे शरीर में गोबर और राख लपेटे इधर-उधर घूमा करते थे। यशोदा और रोहिणी उन्हें रोक नहीं पाति थीं। कभी गौओंके बड़ों में खेलते-खेलते बछड़ों के बाड़ेमें निकल जाते थे। कभी उसी दिन पैदा हुए बछड़ोंकी पूँछ पकड़कर खींचने लगते थे। वे दोनों बालक एक ही स्थान पर साथ-साथ खेलते और अत्यन्त चपलता दिखाते थे। एक दिन जब यशोदा उन्हें किसी प्रकार रोक न सकीं, तब उनके मनमें कुछ क्रोध हो आया। उन्होंने अनायास ही बड़े-बड़े कार्य करनेवाले श्रीकृष्णकी कमरमें रस्सी कस दी और उन्हें ऊखलसे बाँध दिया। उसके बाद कहा- 'ओ चञ्चल! तू बहुत ऊधम मचा रहा था। अब तुझमें सामर्थ्य हो तो जा।' यों कहकर गृहस्वामिनी यशोदा अपने काम-काज में लग गयीं। जब यशोदा घर के काम-धंधेमें फंस गयीं, तब कमलनयन श्रीकृष्ण ऊखलको घसीटते हुए दो अर्जुन वृक्षोंके बीच से जा निकले। वे दोनों वृक्ष जुड़वें उत्पन्न हुए थे। उन वृक्षों के बीच में तिरछी पड़ी हुई ऊखलीको ज्यों ही उन्होंने खींचा, उसी समय ऊँची शाखाओंवाले वे दोनों वृक्ष जड़से उखड़कर गिर पड़े। वृक्षोंके उखड़ते समय बड़े जोरसे कड़कड़ाहटकी आवाज़ हुई। उसे सुनकर समस्त व्रजवासी कातरभाव से वहाँ दौड़ आये। आनेपर सबने देखा वे दोनों महावृक्ष पृथ्वीपर गिरे पड़े हैं। उनकी मोटी-मोटी डालियाँ और पतली शाखाएँ भी टूट-टूटकर बिखर गयी हैं। उन दोनों के बीच में बालक कृष्ण मन्द-मन्द मुस्करा रहा है। उसके खुले हुए मुखमें थोड़े-से दाँत झलक रहे हैं। उसकी कमर में खूब कसकर रस्सी बँधी हुई है। उदरमें दाम (रस्सी) बँधने के कारण ही श्रीकृष्ण की दामोदर के नामसे प्रसिद्धि हुई।
तदनन्तर नन्द आदि समस्त बड़े-बूढ़े गोप, जो बड़े-बड़े उत्पातों के कारण बहुत डर गये थे, उद्विग्र होकर आपस में सलाह करने लगे- 'अब हमें इस स्थानपर रहने की कोई आवश्यकता नहीं है। किसी दूसरे महान् वन में चलना चाहिये। यहाँ नाशके हेतुभूत अनेक उत्पात देखे जाते हैं- जैसे पूतनाका विनाश, छकड़ेका उलट जाना और बिना आँधी-वर्षा के ही दिनों वृक्षोंका गिरना आदि। अत: अब हम विलम्ब न करके शीघ्र ही यहाँ से वृन्दावन को चल दें। जब तक कोई भूमिसम्बन्धी दूसरा महान् उत्पात व्रजको नष्ट न कर दे, तबतक ही हमें उसकी व्यवस्था कर लेनी चाहिये।' इस प्रकार वहाँ से चले जानेका निश्चय करके समस्त व्रजवासी अपने-अपने कुटुम्ब के लोगों से कहने लगे- 'शीघ्र चलो, विलम्ब न करो।' फिर तो एक ही क्षणमें छड़को और गौओं के साथ सब लोग वहाँ से चल दिये। बछड़ोंके चरवाहे झुंड-के-झुंड एक साथ होकर उन बछड़ों को चरते हुए चलते थे। व्रजका वह खाली किया हुआ स्थान अन्नके दाने बिखरे होनेके कारण क्षणभर में कौए आदि पक्षियों से व्याप्त हो गया। लीलापूर्वक सब कार्य करनेवाले भगवान् श्रीकृष्ण ने गौओं के अभ्युदय की कामना से अपने शुद्ध अन्त:कारण के द्वारा नित्य वृन्दावन धामका चिन्तन किया। अत: अत्यन्त रुक्ष ग्रीष्मकाल में भी वहाँ सब ओर वर्षाकालकी भाँति नयी-नयी घास जम गयी। वृन्दावन में पहुँचकर वह समस्त गोप-गौओं का समुदाय चारों ओरसे अर्धचन्द्राकार छकड़ों की बाड़ लगाकर बस गया।
तत्पश्चात् बलराम और श्रीकृष्ण बछड़ोंकी चरवाही करने लगे। गोष्ठ में रहकर वे दोनों भाई अनेक प्रकार की बाललीलाएँ किया करते थे। मोरके पंख का मुकुट बनाकर पहनते, जंगली पुष्पों को कानों में धारण करते, कभी मुरली बजाते और कभी पत्तों को लपेटकर उन्हीं के छिद्रोंसे तरह-तरहकी ध्वनि निकलते थे। दोनों काक-पक्षधारी बालक हँसते-खेलते हुए उस महान् वन में विचरण करते थे। कभी आपस में ही एक-दूसरे को हँसते हुए खेलते और कभी दूसरे ग्वालबालों के साथ बालोचित क्रीड़ाएँ करते-फिरते थे। इस प्रकार कुछ समय बीतनेपर बलराम और श्रीकृष्ण सात वर्ष के हो गये। जो सम्पूर्ण जगत्का पालन करनेवाले हैं, वे उस महावज्र में बछड़ोंके पालक बने हुए थे। धीरे-धीरे ग्रीष्म-ऋतु के बाद वहाँ वर्षा का समय आया। मेघों की घटा से सम्पूर्ण आकाश आच्छादित हो गया। निरंतर धारावाहिक वृष्टि होनेसे सम्पूर्ण दिशाएँ एक-सी जान पड़ती थीं। पानी पड़ने से नयी-नयी घास उग आयी। स्थान-स्थान पर बियरबहूटियों से पृथ्वी आच्छादित हो गयी। जैसे पन्नेके फर्शपर लाल मणि की ढेरी शोभा पाती है, उसी प्रकार बियरबहूटियों से ढकी हुई हरी-भरी पृथ्वी सुशोभित होती थी। जैसे नूतन सम्पत्ति पाकर उध्दत मनुष्यों के मन कुमार्ग में प्रवृत्त होने लगते हैं, उसी प्रकार वर्षं के जल से भरी हुई नदियों का पानी बाँध तोड़कर तटके ऊपरसे बहने लगा। संध्या होनेपर महाबली राम और श्रीकृष्ण इच्छानुसार व्रजमें लौट आते और अपने समवयस्क ग्वाल-बालों के साथ देवताओं की भाँति क्रीड़ा करते थे।
Summary of chapter 70 of the [[BOOK_TITLE]] is as follows:
The sages assembled at Naimiṣāraṇya raise profound philosophical doubts about the nature of the divine, the relationship between the unmanifest Brahman and its manifest forms, and how the supreme reality takes on embodied form for the world's benefit. These questions provide the occasion for the extended theological discourse on Viṣṇu's incarnations (avatāras) and their cosmic purpose that occupies the following chapters.