ब्राह्मण बोले - सूतजी! हमलोग पूरु द्रुह्य, अनु, यदु तथा तुर्वसुके वंशो का पृथक्-पृथक् वर्णन सुनना चाहते हैं।
लोमहर्षणजी ने कहा - मुनिवरो! आप लोग महात्मा पूरु के वंश का विस्तारपूर्वक वर्णन सुनें, में क्रमशः सुनाता हूँ। पूरु के पुत्र सुवीर हुए, उनके पुत्र का नाम मनस्यु था। मनस्यु के पुत्र राजा अभयद थे। अभयद के सुधन्वा, सुधन्वा के सुबाहु, सुबाहु के रौद्राश्व तथा रौद्राश्व के दशार्णेयु, कृकणेयु, कक्षेयु, स्थण्डिलेयु, संनतेयु, ऋचेयु, जलेयु, स्थलेयु, धनेयु एवं वनेयु- ये दस पुत्र हुए। इसी प्रकार भद्रा, शूद्रा, मद्रा, शलदा, मलदा, खलदा, नलदा, सुरसा, गोचपला तथास्त्रीरत्नकूटा- ये दस कन्याएँ हुईं। अत्रिकुल में उत्पन्न महर्षि प्रभाकर उन सबके पति हुए। उन्होंने भद्रा के गर्भ से परम यशस्वी सोम को पुत्र रूप में उत्पन्न किया। राहु से आहत होकर जब सूर्य आकाश से पृथ्वी पर गिरने लगे और समस्त संसार में अन्धकार छा गया, उस समय प्रभाकर ने ही अपनी प्रभा फैलायी। महर्षि ने गिरते हुए सूर्य को 'तुम्हारा कल्याण हो' यह कहकर आशीर्वाद दिया। उनके इस कथन से सूर्य पृथ्वी पर नहीं गिरे। महातपस्वी प्रभाकर ने सब गोत्रों में अत्रि को ही श्रेष्ठ बनाया। अत्रि के यज्ञ में देवताओं ने उनके बल की प्रतिष्ठा की। उन्होंने रौद्राश्व की कन्याओं से दस पुत्र उत्पन्न किये, जो महान् सत्त्वशाली तथा उग्र तपस्या में तत्पर रहने वाले थे। वे सभी वेदों के पारङ्गत विद्वान् तथा गोत्रप्रवर्तक हुए। स्वस्त्यात्रेय नाम से उनकी ख्याति हुई। कक्षेयु के सभानर, चाक्षुष तथा परमन्यु- यह तीन महारथी पुत्र हुए। सभानर के पुत्र कालानल तथा कालानल के धर्मज्ञ सृञ्जय हुए। सृञ्जय के पुत्र वीर राजा पुरञ्जय थे। पुरञ्जय के पुत्र का नाम जनमेजय हुआ। जनमेजय के' पुत्र महाशाल थे, जो देवताओं में भी विख्यात हुए और इस पृथ्वी पर भी उनका यश फैला था। महाशाल के पुत्र महामान के नाम से विख्यात थे। देवताओं ने भी उनका सत्कार किया था। उन्होंने धर्मज्ञ उशीनर तथा महाबली तितिक्षु- ये दो पुत्र उत्पन्न किये। उशीनर की पाँच पत्नियाँ थीं, जो राजर्षियों के कुल में उत्पन्न हुई थीं। उनके नाम इस प्रकार हैं- नृगा, कृमि, नवा, दर्वा तथा दृषद्वती। उनसे उशीनर के पाँच पुत्र हुए- नृगा के पुत्र नृग थे, कृमि के गर्भ से कृमि का ही जन्म हुआ था। नवा के नव तथादर्वा के सुव्रत हुए। दृषद्वती के गर्भ से उशीनरकुमार शिबि की उत्पत्ति हुई। शिबि को शिबि देश का राज्य मिला। नृग के अधिकार में यौधेय प्रदेश आया। नव को नवराष्ट्र तथा कृमि को कृमिलापुरी का राज्य प्राप्त हुआ। सुव्रत के अधिकार में अम्बष्ठ देश आया। शिबि के विश्वविख्यात चार पुत्र हुए- वृषदर्भ, सुवीर, केकय तथा मद्रक। उनके समृद्धिशाली जनपद उन्हीं के नाम से प्रसिद्ध हुए।
अब महामना के दूसरे पुत्र तितिक्षु की संतानों का वर्णन किया जाता है। तितिक्षु पूर्व दिशा के राजा थे। उनके पुत्र महापराक्रमी उषद्रथ हुए। उषद्रथ के पुत्र फेन, फेन के सुतपा तथा सुतपा के बलि हुए। राजा बलि सोने का तरकस रखते थे। वे बहुत बड़े योगी थे। उन्होंने इस भूतल पर वंश की वृद्धि करनेवाले पाँच पुत्र उत्पन्न किये। उनमें सबसे पहले अङ्गकी उत्पत्ति हुई। तत्पश्चात् क्रमशः- वङ्ग, सुह्म, पुण्डर तथा कलिङ्ग उत्पन्न हुए। ये सब लोग बालेय क्षत्रिय कहलाते हैं। बलि के कुल में बालेय ब्राह्मण भी हुए, जो वंश की वृद्धि करनेवाले थे। ब्रह्माजी ने प्रसन्न होकर बलि को यह वर दिया कि ' तुम महायोगी होओगे। एक कल्प की तुम्हारी आयु होगी। बल में तुम्हारी समानता करनेवाला कोई न होगा। तुम धर्म-तत्त्व के ज्ञाता होओगे। संग्राम में तुम्हें कोई जीत न सकेगा। धर्म में तुम्हारी प्रधानता होगी। तुम तीनोंलोकों की देखभाल करोगे। सर्वत्र श्रेष्ठ माने जाओगे और चारों वर्णों को मर्यादा भीतर स्थापित करोगे।'
भगवान् ब्रह्माजी के यों कहने पर बलि को बड़ी शान्ति मिली। वे दीर्घ काल के बाद मरकर स्वर्ग को गये। उनके पाँच पुत्रों के अधिकार में जो जनपद थे, उनके नाम इस प्रकार हैं- अङ्ग, वङ्ग सुह्म, कलिङ्ग और पुण्डरक। अब अङ्ग की संतान का वर्णन करता हूँ। अङ्ग के पुत्र महाराज दधिवाहन हुए। दधिवाहन के पुत्र राजा दिविरथ। दिविरथ के इन्द्र्तुल्य पराक्रमी और विद्वान् धर्मरथ तथा धर्मरथ के पुत्र चित्ररथ हुए। राजा धर्मरथ जब कालञ्जर पर्वत पर यज्ञ करते थे, उस समय महात्मा इन्द्र ने उनके साथ बैठकर सोमपान किया था। चित्ररथ के पुत्र दशरथ हुए, जो लोमपाद के नाम से विख्यात थे। उन्हीं की पुत्री शान्ता थी। दशरथ के पुत्र महायशस्वी वीर चतुरङ्ग हुए, जो ऋष्यश्रृङ्ग मुनि की कृपा से उत्पन्न हुए थे। चतुरङ्ग के पुत्र का नाम पृथुलाक्ष था। पृथुलाक्ष के पुत्र महायशस्वी चम्प थे। चम्प की राजधानी चम्पा थी, जो पहले मालिनी के नाम से प्रसिद्ध थी। चम्प के पुत्र हर्यश्व हुए। हर्यश्व के पुत्र वैभाण्डकि थे, जिनका वाहन इन्द्र का ऐरावत हाथी था। उन्होंने मन्त्र द्वारा उस उत्तम हाथी को पृथ्वी पर उतारा था। हर्यश्व के पुत्र राजा भद्ररथ हुए, भद्ररथ के बृहत्कर्मा के ब्रिह्द्र्भ और ब्रिह्द्र्भ से बृहन्मनाकी उत्पत्ति हुई थी। महाराज बृहन्मना ने जयद्रथ नामक पुत्र उत्पन्न किया। जयद्रथ के दृढरथ, दृढरथ के विश्वविजयी जनमेजय। उनके पुत्र वैकर्ण, वैकर्ण के विकर्ण तथा विकर्ण के सौ पुत्र हुए, जो अङ्गवंशी राजा बतलाये गये, जो सत्यव्रती, महात्मा, पुत्रवान् तथा महारथी थे।
अब रौद्राश्वकुमार राजा ऋचेयुके वंश का वर्णन करूँगा, सुनो। ऋचेयुके पुत्र राजा मतिनार हुए। मतिनार के तीन बड़े धर्मात्मा पुत्र थे- वसुरोध, प्रतिरथ और सुबाहु। ये सभी वेदवेत्ता तथा सत्यवादी थे। मतिनार की एक कन्या भी थी, जिसका नाम इला था। वह ब्रह्मवादिनी थी। उसका विवाह तंसु से हुआ। तंसु के पुत्र राजर्षि धर्मनेत्र हुए। इनकी स्त्री उपदानवी थी। उपदानवी से उन्होंने चार पुत्र उत्पन्न किये- दुष्यन्त, सुष्मन्त, प्रवीर और अनघ। दुष्यन्त के पुत्र पराक्रमी भरत हुए, जो सर्वदमन के नाम से विख्यात थे। उनमें दस हजार हाथियों का बल था। वे शकुन्तला के गर्भ से उत्पन्न चक्रवर्ती राजा थे। उन्हीं के नाम पर इस देश को भारतवर्ष कहते हैं। अङ्गिरानन्द बृहस्पतिजी के पुत्र महामुनि भरद्वाज ने भरत से पुत्रोत्पत्ति के लिये बड़े-बड़े यज्ञों का अनुष्ठान कराया। इसके पहले पुत्र-जन्म का सारा प्रयास व्यर्थ हो चुका था। अत: भरद्वाज के प्रयत्न से जो उत्पन्न हुआ, उसका नाम वितथ हुआ। वितथ के जन्म के बाद राजा भरत स्वर्गवासी हो गये, तब भरद्वाजजी वितथ को राज्य पर अभिषिक्त करके वन में चले गये। वितथ ने पाँच पुत्र उत्पन्न किये- सुहोत्र, सुहोता, गय, गर्ग तथा महात्मा कपिल। सुहोत्र के दो पुत्र थे- महासत्यवादी काशिक तथा राजा गृत्समति। गृत्समति के पुत्र ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य- तीनों वर्णों के लोग हुए।
मुनिवरो! अब आजमीढ नामक दूसरे वंश का वर्णन सुनो। सुहोत्र का एक पुत्र था- बृहत्। उसके तीन पुत्र हुए- अजमीढ, द्विमीढ और पुरुमीढ। अजमीढ से नीली के गर्भ से सुशान्ति नामक पुत्र उत्पन्न हुआ। सुशान्ति से पुरुजाति और पुरुजाति से ब्रह्याश्व का जन्म हुआ। ब्रह्याश्व के पाँच पुत्र हुए, जो समृद्धिशाली पाँच जनपदों से युक्त थे। उनके नाम यों हैं- मुद्रल, सृञ्जय, राजा बृहदिषु, पराक्रमी यवीनर तथा कृमिलाश्व। ये पाँचों देशों की रक्षा के लिये अलम् (समर्थ) थे; इसलिये उनके अधिकार में आये हुए जनपद पञ्चाल कहलाये। मुद्रल के पुत्र महायशस्वी मौद्रल्य थे। महात्मा सृञ्जय के पुत्र पञ्चजन हुए। पञ्चजन के सोमदत्त, सोमदत्त के सहदेव और सहदेव के सोमक हुए। सोमक के पुत्र का नाम जंतु था, जिसके सौ पुत्र हुए। उन सबमें छोटे पृषत् थे, जिनके पुत्र द्रुपद हुए। ये सभी आजमीढ तथा सोमक क्षत्रिय कहलाते हैं। अजमीढ के एक और पत्नी थीं, जिनका नाम था- धुमिनी। रानी धुमिनी बड़ी पतिव्रता थीं। ये पुत्र की कामना से व्रत करने लगीं। दस हजार वर्षों तक अत्यन्त दुष्कर तपस्या करके उन्होंने विधिपूर्वक अग्नि में हवन किया तथा पवित्रतापूर्वक नियमित भोजन करके वे अग्निहोत्र के कुशों पर ही लेट गयीं। उसी अवस्था में राजा अजमीढ ने धूमिनीदेवी के साथ समागम किया। इससे ऋक्ष नामक पुत्र की उत्पत्ति हुई। ऋक्ष धूम्र के समान वर्णवाले एवं दर्शनीय पुरुष थे। ऋक्ष से संवरण और संवरण से कुरु उत्पन्न हुए, जिन्होंने प्रयाग से जाकर कुरुक्षेत्र की स्थापना की। वह बड़ा ही पवित्र एवं रमणीय क्षेत्र है। कितने ही पुण्यात्मा पुरुष उसका सेवन करते हैं। कुरुका महान् वंश उन्हीं के नामपर कौरव कहलाया। कुरु के चार पुत्र हुए- सुधन्वा, सुधनु, परीक्षित् और अरिमेजय। परीक्षित् के पुत्र जनमेजय, श्रुतसेन, अग्रसेन और भीमसेन हुए। ये सभी बलशाली और पराक्रमी थे। जनमेजय के पुत्र सुरथ हुए, सुरथ के विदूरथ, विदूरथ के महारथी ऋक्ष हुए। ये दूसरे ऋक्ष थे। इस सोमवंश में दो ऋक्ष, दो ही परीक्षित्, तीन भीमसेन तथा दो जनमेजय नाम के राजा हुए। द्वितीय ऋक्ष के पुत्र भीमसेन थे। भीमसेन से प्रतीप और प्रतीप से शान्तनु, देवापि तथा बाह्लिक- ये तीन महारथी पुत्र हुए।
अब राजर्षि बाह्लिक के वंश का वृत्तान्त सुनो। बाह्लिक के पुत्र महायशस्वी सोमदत्त थे। सोमदत्त से भूरि, भूरिश्रवा और शल- ये तीन पुत्र हुए। देवापि देवताओं के उपाध्याय और मुनि हुए। शान्तनु कौरववंश का भार वहन करनेवाले राजा हुए। अब मैं शान्तनु के त्रिभुवनविख्यात वंश का वर्णन करूँगा। शान्तनु ने गङ्गा के गर्भ से देवव्रत नामक पुत्र उत्पन्न किया। देवव्रत ही भीष्म नाम से विख्यात पाण्डवों के पितामह थे। तत्पश्चात् शान्तनु की काली नामवाली पत्नी ने विचित्रवीर्य नामक पुत्र उत्पन्न किया, जो पिता का प्यारा तथा धर्मात्मा था। विचित्रवीर्य की स्त्रियों से श्रीकृष्ण द्वैपायनने धृतराष्ट्र, पाण्डु तथा विदुर को जन्म दिया। धृतराष्ट्र ने गान्धारी गर्भ से सौ पुत्र उत्पन्न किये। उन सबमें दुर्योधन ज्येष्ठ था। पाण्डु के पुत्र अर्जुन हुए। अर्जुन से सुभद्राकुमार अभिमन्यु की उत्पत्ति हुई। अभिमन्यु से परीक्षित् और परीक्षित् से जनमेजय का जन्म हुआ। जनमेजय के काश्या नाम की पत्नी से चन्द्रापीड़ तथा सूर्यापीड़ नामक दो पुत्र हुए। उनमें सुर्यपीड़ मोक्ष-धर्म के ज्ञाता थे। चन्द्रापीड़ के महान् धनुर्धर सौ पुत्र थे। ये सब इस पृथ्वी पर जानमेजय क्षत्रिय के नाम से प्रसिद्ध हुए। उन सौ पुत्रों में सबसे बड़ा सत्यकर्ण था, जो हस्तिनापुर में रहा करता था। महाबाहु सत्यकर्ण प्रचुर दक्षिणा देने वाले थे। सत्यकर्ण के पुत्र प्रतापी श्वेतकर्ण हुए। वे पुत्र न होने के कारण तपोवन में चले गये। वहाँ सुचारू की पुत्री मालिनी, जो यदुकुल में उत्पन्न हुई थी, वन में आयी थी। उसने श्वेतकर्ण से गर्भ धारण किया। उस गर्भ के स्थापित हो जाने पर राजा श्वेतकर्ण पहले के किये हुए संकल्प के अनुसार महाप्रस्थान को चले। अपने प्रियतम को जाते देख मालिनी भी उनके पीछे लग गयी। मार्ग में उसने एक सुकुमार शिशु को जन्म दिया, किन्तु उसको भी छोड़कर वह पतिव्रता पति के पीछे चल दी। नवजात शिशु पर्वत की घाटी पर रो रहा था। तब उस पर कृपा करने के लिए आकाश में मेघ प्रकट हो गये। श्रविष्ठा के दो पुत्र थे- पैप्पलादि और कौशिक। वे दोनों उस शिशु को देख दया से द्रवीभूत हो गये। उन्होंने उसे उठाकर जल से धोया और रक्त में डूबे हुए उसके पार्श्वभाग को शिला पर रगड़कर साफ किया। रगड़ने पर उसकी दोनों पसलियाँ बकरे की भाँति श्यामवर्ण की हो गयीं। इसलिये उन दोनों ने उस बालक का नाम अजपार्श्व रख दिया। उसे रेमक की शाला में दो ब्राह्मणों ने पाल-पोसकर बड़ा किया। रेमक की पत्नी ने अपना पुत्र बनाने के लिए उसे गोद ले लिया। तबसे वह रेमकी का पुत्र माना जाने लगा। दोनों ब्राह्मण उसके सचिव हुए। उन सबके पुत्र और पौत्र एक ही समय में- समान आयु वाले हुए। यह महात्मा पाण्डवों का पौरववंश बतलाया गया। नहुषनन्दन ययाति ने अपनी वृद्धावस्था का परिवर्तन करते समय अत्यन्त प्रसन्न हो यह उद्रार प्रकट किया था- 'सम्भव है यह पृथ्वी चन्द्रमा, सूर्य और ग्रहों के प्रकाश से रहित हो जाय; किन्तु पौरववंश से सूनी यह कभी नहीं होगी।' इस प्रकार मैंने राजा पूरु के विख्यात वंश का वर्णन किया। अब तुर्वसु, द्रुह्य, अनु और यदु के वंश का वर्णन करूँगा।
तुर्वसु के पुत्र वह्नि, वह्नि के गोभानु, गोभानु के राजा त्रैशानु, त्रैशानु के करंधम तथा करंधम के मरुत्त हुए। अवीक्षित्- नन्दन राजा मरुत्त इस मरुत्त से भिन्न हैं। करंधमकुमार मरुत्त के कोई पुत्र नहीं था। उन्होंने बहुत दक्षिणा देकर यज्ञ किया, उसमें उन्होंने दक्षिणा के रूप में महात्मा संवर्त को अपनी संयता नाम की कन्या दे दी। तत्पश्चात् उन्होंने पूरुवंशी दुष्यन्त को गोद ले लिए। इस प्रकार ययाति के शापवश जब तुर्वसुका वंश नहीं चला, तब उसमें पौरववंश का प्रवेश हुआ। दुष्यन्त के पुत्र राजा करुरोम हुए। करुरोम से अहृीद की उत्पत्ति हुई। अहृीद के चार पुत्र हुए- पाण्ड्य, केरल, कोल तथा चोल। द्रुह्य के पुत्र बभ्रुसेतु, बभ्रुसेतु के अङ्गारसेतु और अङ्गारसेतु के मरुत्पति हुए, जो युद्ध में युवनाश्वकुमार मान्धाता के हाथ से मारे गये। अङ्गारसेतु के पुत्र राजा गान्धार हुए, जिनके नाम पर गान्धार प्रदेश विख्यात है। गान्धार देश के घोड़े सब घोड़ों से अच्छे होते हैं। अनु के पुत्र धर्म, धर्म के द्यूत, द्यूत के वनदुह, वनदुह के प्रचेता और प्रचेता के सुचेता हुए। ये अनु के वंशज बतलाये गये। यदु के पाँच पुत्र हुए, जो देवकुमारों के समान सुन्दर थे। उनके नाम हैं- सहस्त्राद, पयोद, क्रोष्टु, नील और अञ्जिक। सहस्त्राद के तीन परम धर्मात्मा पुत्र हुए- हैहय, हय तथा वेणुहय। हैहयका पुत्र धर्मनेत्र हुआ। धर्मनेत्र के कार्त और कार्त के साहञ्ज नामक पुत्र हुए। साहञ्ज ने साहञ्जनी नाम की नगरी बसायी। साहञ्ज का दूसरा नाम महिष्मान् भी था साहञ्ज उनके पुत्र प्रतापी भद्रश्रेण्य थे। भद्रश्रेण्य के दुर्दम और दुर्दम के कनक हुए। कनक के चार पुत्र हुए, जो सम्पूर्ण विश्व में विख्यात थे। उनके नाम इस प्रकार हैं- कृतवीर्य, कृतौजा, कृतधन्वा तथा कृताग्नि। कृतवीर्य से अर्जुन की उत्पत्ति हुई, जो सहस्त्र भुजाओं से युक्त हो सात द्वीपों का राजा हुआ। उसने अकेले ही सूर्य के समान तेजस्वी रथ द्वारा सम्पूर्ण पृथ्वी को जीत लिया था। उसने दस हजार वर्षों तक अत्यन्त कठोर तपस्या करके दत्तात्रेयजी की आराधना की। दत्तात्रेयजी ने उसे कई वरदान दिये। पहले तो उसने युद्धकाल में एक हजार भुजाएँ माँगी। युद्ध करते समय किसी योगीश्वर की भाँति उसके एक सहस्त्र भुजाएँ प्रकट हो जाती थीं, उसने द्वीप, समुद्र और नगरों सहित सम्पूर्ण पृथ्वी को कठोरतापूर्वक जीता तथा सात द्वीपों में सात सौ यज्ञ किये, उन सभी यज्ञों में एक-एक लाख की दक्षिणा दी गयी थी। सब में सोने के यूप गड़े थे, सोने की ही वेदियाँ बनी थीं। वहाँ दिव्य वस्त्राभूषणों से अलंकृत देवताओं और गन्धर्वों के साथ महर्षिगण भी विमानपर बैठकर सुशोभित होते थे। कार्तवीर्य के यज्ञ में नारद नामक गन्धर्व ने इस गाथा का गान किया- 'अन्य राजालोग यज्ञ, दान, तपस्या, पराक्रम और शास्त्र-ज्ञान में कार्तवीर्य अर्जुन की स्थिति को नहीं पहुँच सकते।' वह योगी था; इसलिये सातों द्वीपों में ढाल, तलवार, धनुष-बाण और रथ लिये सदा चारों ओर विचरता दिखायी देता था, धर्मपूर्वक प्रजा की रक्षा करनेवाले महाराज कार्तवीर्य के प्रभाव से किसी का धन नष्ट नहीं होता था, किसी को रोग नहीं सताता था तथा कोई भ्रम में नहीं पड़ता था। वे सब प्रकार के रत्नों से सम्पन्न चक्रवर्ती सम्राट् थे। वे ही पशुओं तथा खेतों के भी रक्षक थे और वे ही योगी होने के कारण वर्षा करते हुए मेघ बन जाते थे। जैसे शरद्-ऋतु में भगवान् भास्कर अपनी सहस्त्रों किरणों से शोभायमान होते हैं, उसी प्रकार राजा कार्तवीर्य अर्जुन अपनी सहस्त्रों भुजाओं से शोभा पाते थे। उन्होंने कर्कोटक नाग के पुत्रों को जीतकर उन्हें अपनी नगरी माहिष्मतीपुरी में मनुष्यों के साथ बसाया था। वे वर्षाकाल में समुद्र में जलक्रीड़ा करते समय अपनी भुजाओं से रोककर उसकी जलराशि के वेग को पीछे की ओर लौटा देते थे। उनकी राजधानी को घेरकर बहनेवाली नर्मदा नदी में जब वे जलक्रीड़ा करते समय लोटते थे, उस समय वह नदी अपनी सहस्त्रों चञ्चल लहरों के साथ डरती-डरती उनके पास आती थी। महासागर में जब वे अपनी सहस्त्रों भुजाएँ पटकते थे, उस समय पातालनिवासी महादैत्य निश्चेष्ट होकर भय से छिप जाते थे। ऊँची उठती हुई उत्ताल तरङ्गें विचूर्णित हो जाती थीं। बड़े-बड़े मीन और तिमि आदि जलजन्तु छटपटाने लगते थे। सागर के जल में फेन जम जाता था। समुद्र बड़ी-बड़ी भँवरों के कारण क्षुब्ध दिखायी देता था। देवताओं और असुरों के डाले हुए मन्दराचल पर्वत से क्षीरसमुद्र की जो दशा हुई थी; वही दशा वे अपने सहस्त्र बाहुओं से महासागर की कर देते थे। उस समय मन्दराचल के द्वारा समुद्र-मन्थन की बात सोचकर चकित और अमृतोत्पत्ति से आशङ्कित हुए बड़े-बड़े नाग सहसा ऊपर उछलकर देखते और भयंकर कार्तवीर्य नरेशपर दृष्टि पड़ते ही मस्तक झुकाकर निश्चेष्ट पड़ जाते थे। जैसे संध्या के समय वायु के झोंके से कदलीखण्ड काँपते हैं, उसी प्रकार वे भी काँपने लगते थे। राजा कार्तवीर्य ने अभिमान से भरे हुए लङ्कापति रावण को अपने पाँच ही बाणों से सेनासहित मुर्च्छित करके धनुष की प्रत्यञ्चासे बाँध लिया और माहिष्मतीपुरी में लाकर बंदी बना लिया। यह समाचार सुनकर महर्षि पुलस्त्य उनके पास गये। महर्षि के याचना करनेपर उन्होंने रावण को मुक्त कर दिया। अर्जुन की हजार भुजाओं में धारण किये हुए धनुषों की प्रत्यञ्चा का इतना घोर शब्द होता था, मानो प्रलयकालीन मेघ गर्जते हों अथवा व्रज फट पड़ा हो। अहो! परशुरामजी का पराक्रम धन्य है, जिन्होंने सुवर्णमय तालवन के समान राजा कार्तवीर्य की सहस्त्रों भुजाओं को काट डाला था। एक दिन की बात है. प्यासे अग्निदेव ने राजा कार्तवीर्य से भिक्षा माँगी। उन्होंने सातों द्वीप, नगर, गाँव, गोष्ठ तथा सारा राज्य उन्हें भिक्षा में दे दिये। अग्निदेव सर्वत्र प्रज्वलित हो उठे और महाराज कार्तवीर्य के प्रभाव से समस्त पर्वतों एवं वनों को जलाने लगे। उन्होंने वरुणपुत्र के रमणीय आश्रम को भी जला दिया। पूर्वकाल में वरुण ने जिस तेजस्वी महर्षि को अपने पुत्ररूप में प्राप्त किया था, वे वसिष्ठ के नाम से विख्यात हुए। उन्हीं का नाम आपव भी है। महर्षि वसिष्ठ का शून्य आश्रम जलाया गया था, इसलिये उन्होंने शाप दिया- 'हैहय! तूने मेरे इस वन को भी जलाये बिना छोड़ा, अत: तेरे द्वारा यह महान् पाप हुआ है। इस कारण मेरे-जैसा एक दूसरा तपस्वी ब्राह्मण तेरा वध करेगा। जमदग्निनन्दन महाबाहु परशुराम, जो बलवान् और प्रतापी हैं, तेरा बलपूर्वक मान-मर्दन करके तेरी हजार भुजाओं को काट डालेंगे और तुझे मौत के घाट उतारेंगे।'
जो शत्रुओं के नाशक और धर्मपूर्वक प्रजा के रक्षक थे, जिनके प्रताप से किसी के धन का नाश नहीं होने पाता था, वे महाराज कार्तवीर्य महामुनि वसिष्ठ के शापवश परशुरामजी के हाथ से मृत्यु को प्राप्त हुए। उन्होंने स्वयं ही पहले इसी तरह का वर माँगा था। कार्तवीर्य के सौ पुत्र थे, किन्तु उनमें पाँच ही शेष बचे। वे सभी अस्त्र-शस्त्रों के ज्ञाता, बलवान्, शूर, धर्मात्मा और यशस्वी थे। उनके नाम ये हैं- शूरसेन, शूर, वृषण, मधुपध्वज और जयध्वज। जयध्वज अवन्ती के महाराज थे। जयध्वज के पुत्र महाबली तालजङ्घ हुए। उनके सौ पुत्र थे, जो तालजङ्घ के नाम से विख्यात थे। हैहयवंश में वीतिहोत्र, सुजात, भोज, अवन्ति, तौण्डिकेर, तालजङ्घ तथा भरत आदि क्षत्रियों का समुदाय हुआ। इनकी संख्या बहुत होने से पृथक्-पृथक् नाम नहीं बतलाये गये।
वृष आदि बहुत-से पुण्यात्मा यादव इस पृथ्वी पर उत्पन्न हुए। उनमें वृष वंश के प्रवर्तक थे। वृष के पुत्र मधु थे। मधु के सौ पुत्र हुए, जिनमें वृषण वंश चलानेवाले हुए; वृषण के वृष्णि और मधु के वंशज माधव कहलाये। इसी प्रकार यदु के नाम पर यादव तथा हैहय के नाम से हैहय क्षत्रिय कहलाते हैं। जो प्रतिदिन कार्तवीर्य अर्जुन के जन्म का वृत्तान्त यहाँ कहेगा, उसके धनका नाश नहीं होगा, उसका नष्ट हुआ धन भी मिल जायगा। इस प्रकार ययाति-पुत्रों के पाँच वंश यहाँ बतलाये गये, जो समस्त लोकों को धारण करते हैं। यदु के वंशधर पुण्यात्मा क्रोष्टुके, जिनके कुल में वृष्णिवंशावतंस श्रीहरि श्रीकृष्ण रूप में प्रकट हुए थे, वंश का वर्णन सुनकर मनुष्य सब पापों से मुक्त हो जाता है।
Summary of chapter 7 of the [[BOOK_TITLE]] is as follows:
The divine origin of Soma (the Moon) is narrated. Born of Atri's intense tapas, Soma illuminates the three worlds and is installed as lord of medicinal herbs, brāhmaṇas, and the night. The chapter describes how he became the progenitor of the Candravṃśa (Lunar Dynasty), setting the stage for subsequent genealogical narratives.