मुनियोंने पूछा - ब्रह्माजी! भगवान् श्री कृष्णका स्नान किस समय और किस विधि से होता है? विधिज्ञोंमें श्रेष्ठ! हमें उसकी विधि बताइये।
ब्रह्माजी बोले - मुनियो! श्रीकृष्ण, बलराम और सुभद्राका स्नान परम पुण्यमय और सब पापोंका नाशक है। मैं उसकी विदि आदिका वर्णन करता हूँ, सुनो। ज्येष्ठामासमें पूर्णिमाको ज्येष्ठा नक्षत्र आनेपर वहाँ हर समय श्रीहरिका स्नान होता है। वहाँ सर्वतीर्थमाय कूप है, जो अत्यन्त निर्मल और पवित्र माना गया है। उक्त पूर्णिमाको उसमें भगवती गङ्गा प्रत्यक्षरूपसे प्रकट होती हैं। अत: ज्येष्ठकी पूर्णिमा को सुवर्णमय कलशोंसे श्रीकृष्ण, बलभद्र और सुभद्रा के स्नानके लिये उस कूपसे जल निकाला जाता है। इसके लिये एक सुंदर मञ्च बनवाकर उसे पताका आदि से अलंकृत किया जाता है। वह सुदृढ़ और सुखपूर्वक चलने योग्य बना होता है। वस्त्र और फूलोंसे उसे सजाया जाता है। वह खूब विस्तृत होता है और धूपसे सुवासित किया जाता है। उसपर श्रीकृष्ण और बलराम को स्नान करानेके लिए श्वेत वस्त्र बिछाया जाता है। उसे सजाने के लिए मोतीके हार लटकाये जाते हैं। भाँति-भाँति वाद्योंकी ध्वनि होती रहती है। उस मञ्च एक ओर भगवाण श्रीकृष्ण और दूसरी ओर भगवान् बलराम विराजते रहते हैं। बीच में सुभद्रादेवीको पधराकर जय-जयकार और मङ्गलघोष के साथ स्नान कराया जाता है। उस समय ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र तथा अन्य जातिके लाखों स्त्री-पुरुष उन्हें घेरे रहते हैं। गृहस्थ, स्नानतक, संन्यासी और ब्रह्मचारी- सभी मञ्चपर विराजमान भगवान् श्रीकृष्ण और बलराम को स्नान कराते हैं। पूर्वोत्तर सम्पूर्ण तीर्थ अपने पुष्पमिश्रित जालों में पृथक् भगवान् को स्नान कराते हैं। फिर शङ्ख, भेरी, मृदङ्ग, झाँझ और घंटा आदि वाद्योंकी तुमुल ध्वनिके साथ स्त्रियोंके मङ्गलगीत, स्तुतियोंके मनोहर शब्द, जय-जयकार, वीणारव तथा वेणुनादका महान् शब्द समुद्रकी गर्जनाके समान जान पड़ता है। उस समय मुनिलोग वेद-पाठ और मन्त्रोच्चारण करते हैं। सामगानके साथ भाँति-भाँतिकी स्तुतियोंके पुण्यमय शब्द होते रहते हैं। यति, स्नानतक, गृहस्थ और ब्रह्मचारी स्नानके समय बड़ी प्रसन्नताके साथ भगवान् का स्तवन करते हैं। श्रीकृष्ण और बलराम के ऊपर रत्न-दण्डविभूषित चँवर डुलाये जाते हैं। आकाशमें यक्ष, विद्याधर, सिद्ध, किंनर, अप्सराएँ, देव, गन्धर्व, चारण, आदित्य, वसु, रूद्र, साध्य, विश्वेदेव, मरुद्रण, लोकपाल तथा अन्य लोग भी भगवान् पुरुषोत्तमकी स्तुति करते हैं- 'देवदेवेश्वर! पुराणपुरुषोत्तम! आपको नमस्कार है। जगत्पलक भगवान् जगन्नाथ! आप सृष्टि, स्थिति और संहार करनेवाले हैं। जो त्रिभुवनको धारण करनेवाले, ब्राहमणभक्त, मोक्षके कारणभूत और समस्त मनोवाञ्छित फलों के दाता हैं, उन भगवान् को हम प्रणाम करते हैं।' इस प्रकार आकाश में खड़े हुए देवता श्रीकृष्ण, महाबली बलराम तथा सुभद्रादेवीकी स्तुति करते, गन्धर्व गाते और अप्सराएँ नृत्य करती हैं। देवताओंके बाजे बजते और शीतल वायु चलती है। उस समय आकाश में उमड़े हुए मेघ पुष्पमिश्रित जलकी वर्षा करते हैं। मुनि, सिद्ध और चारण जय-जयकार करते हैं।
तत्पश्चात् देवतागण मङ्गल-सामग्रियोंके साथ विधि और मन्त्रयुक्त अभिषेकोपयोगी द्रव्य लेकर भगवान् का अभिषेक करते हैं। इन्द्र, सूर्य, चद्रमा, धाता, विधाता, वायु, अग्नि, पूषा, भग, अर्यमा, त्वष्टा, दोनों पत्नियों सहित विवस्वान्, मित्र, वरुण, रूद्र, वसु, आदित्य, अश्विनीकुमार, विश्वेदेव, मरूद्गण, साध्य, पितर, विद्याधार, पितामह, पुलस्त्य, पुलह, अङ्गिरा, कश्यप, अत्रि, मरीचि, भृगु, क्रतु, हर, प्रचेता, मनु, दक्ष, धर्म, काल, यम, मृत्यु, यमदूत तथा अन्य अनेकों देवता भगवान् का अभिषेक करनेके लिए इधर-उधरसे आते हैं और सुवर्णमय कलशोंमें रखे हुए पुष्प-मिश्रित आकाशगङ्गाके जलसे श्रीकृष्ण, सुभद्रा तथा बलरामजी को स्नान कराते हैं तथा प्रसन्नतापूर्वक इस प्रकार उनकी स्तुति करते हैं-
सम्पूर्ण लोकोंका पालन करेवाले जगन्नाथ! आपकी जय हो! जय हो!! आप भक्तों के रक्षक तथा शरणागतवत्सल हैं। सम्पूर्ण भूतों में व्यापक आदिदेव! आपकी जय हो। नानात्वके कारणभूत वासुदेव! आप असुरोंके संहारक, दिव्य मत्स्यरूपधारण करनेवाले, समस्त देवताओं में श्रेष्ठ तथा समुद्र में शयन करेवाले हैं। योगिवर! आपकी जय हो, जय हो। सूर्य आपके नेत्र हैं तथा आप देवताओंके राजा हैं। वेदों में आप ही सर्वश्रेष्ठ बताये गये हैं। आपने कच्छप-अवतार धारण किया था। आप श्रेष्ठ यज्ञस्वरुप हैं। आपकी नाभिसे कमल उत्पन्न हुआ था, इसलिये आप पद्मनाभ कहलाते हैं। आप पहाड़ोंपर विचरनेवाले तथा योगशायी हैं। आपकी जय हो, जय हो। महान् वेग धारण करेवाले विश्वमूर्ते! चक्रधर! भूतनाथ! धरणीधर! शेषशायिन्! आपकी जय हो, जय हो। आप पीताम्बरधारी, चन्द्रमाके समान कान्तिमान्, योगमें वास करनेवाले, अग्निमुख, धर्म के आवासस्थान, गुणोंके भंडार, लक्ष्मीके निवास स्थान और गुरुडवाहन हैं। आपकी जय हो, जय हो। आप आनन्दनिकेतन, धर्मध्वज, पृथ्वीके आश्रयस्थान और दुर्बोध चरित्रवाले हैं। योगी पुरुष ही आपको जान पाते हैं। आप यज्ञों में निवास करेवाले तथा वेदों के वेद्य हैं। शान्ति प्रदान करेवाले और योगियोंके ध्येय हैं। आपकी जय हो, जय हो। आप ही सबका पालन-पोषण करते हैं। ज्ञान आपका स्वरुप है। आप लक्ष्मीनिधि हैं। भाव-भक्ति से आपका ज्ञान होना सम्भव है। मुक्ति आपके हाथ में है। आपका शरीर निर्मल है। आप सत्त्वगुण के अधिष्ठान, समस्त गुणों से समृद्धिशाली, यज्ञकर्ता, निर्गुण तथा मोक्ष प्रदान करनेवाले हैं। भूमण्डल को शरण देनेवाले परमेश्वर! आपकी जय हो, जय हो। आप दिव्य कान्तिसे सम्पन्न, समस्त लोकोंको शरण देनेवाले, भगवती लक्ष्मीसे संयुक्त, कमलके-से नेत्रोंवाले, सृष्टीकारक, योगयुक्त, अलसी के फूलकी भाँति श्याम अङ्गोंवाले, समुद्रके भीतर शयन करेवाले, लक्ष्मीरुपी कमल के भ्रमर तथा भक्तोंको अधीन रहनेवाले हैं। लोककान्त! आपकी जय हो, जय हो। आप परम शान्त, परम सारभूत, चक्र धारण करेवाले, सर्पोंके साथ रहनेवाले, नीलवस्त्रधारी, शान्तिकरक, मोक्षदायक तथा समस्त पापोंको दूर करनेवाले हैं। आपकी जय हो, जय हो। बलराम जी के छोटे भाई जगदीश्वर श्रीकृष्ण! आपकी जय हो; पद्मपत्रके समान नेत्रोंवाले तथा इच्छानुसार फल देनेवाले प्रभो! आपकी जय हो। चक्र और गदा धारण करनेवाले नारायण! आपका वक्ष:स्थल वनमालासे आच्छादित है। आपकी जय हो। लक्ष्मीकांत विष्णो! आपको नमस्कार है। आपकी जय हो।
इस प्रकार श्रीकृष्ण, बलराम और सुभद्राका स्तवन, दर्शन और वन्दन करके देवतालोग अपने-अपने स्थानको चले जाते हैं। उस समय जो मनुष्य मञ्चपर विराजमान पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण, बलभद्र और सुभद्राका दर्शन करते हैं, वे अविनाशी पदको प्राप्त होते हैं। सहस्त्र गो-दान, विधिवत्भूमिदान, अर्घ्य और आतिथ्यपूर्वक अन्न-दान, विधिवत् वृषोत्सर्ग, ग्रीष्मकालमें जल-दान, चान्द्रायण-व्रतके अनुष्ठान तथा शास्त्रोक्त विधि से एक मासतक उपवास करनेसे जो फल होता है, वही मञ्चपर विराजमान श्रीकृष्ण दर्शन करनेसे मिल जाता है अथवा अधिक कहनेकी क्या आवश्यकता, सम्पूर्ण तीर्थोंमें व्रत और दान जो फल बतलाया गया है, वह मञ्चस्थ श्रीकृष्ण, सुभद्रा और बलराम का दर्शन करने मात्रसे प्राप्त हो जाता है। अत: स्त्री हो या पुरुष, सबको उस समय पुरुषोत्तमका दर्शन करना चाहिये। इससे सब तीर्थों में स्नान आदि करनेका फल मिलता है। भगवान् के स्नान किये हुए शेष जलको अपने शरीरपर छिडकना चाहिये। इससे पुत्र की इच्छा करनेवाली स्त्रीको पुत्रकी प्राप्ति होती है। सुख चाहनेवाली को सौभाग्य मिलता है। रोगार्त नारी रोग से मुक्त हो जाती है और धन की अभिलाषा रखनेवाली स्त्रीको धन मिलता है। अत: भगवान् श्रीकृष्ण के स्नानावशेष जलको अपने अङ्गोंपर छिड़कना चाहिये। वह सम्पूर्ण अभिलकषित वस्तुओंको देनेवाला है। जो स्नानके पश्चात् दक्षिणाभिमुख जाते हुए भगवान् श्रीकृष्ण का दर्शन करते हैं, वे निश्चय ही ब्रह्महत्या आदि पापों से मुक्त हो जाते हैं। शास्त्रों में पृथ्वीकी तीन परिक्रमा करनेका जोफल बताया गया है, वही दक्षिणाभिमुख यात्रा करते हुए श्रीकृष्णका दर्शन करनेसे प्राप्त होता है। अधिक क्या कहा जाय- वेद, शास्त्र, पूरा, महाभारत तथा समस्त धर्मशास्त्रोंमें पुण्यकर्मका जो कुक भी फल बताया गया है, वह सब सुभद्राके साथ दक्षिणाभिमुख यात्रा करनेवाले भगवान् श्रीकृष्ण और बलरामका दर्शन करनेमात्रसे मिल जाता है।
Summary of chapter 33 of the [[BOOK_TITLE]] is as follows:
Śiva, wishing to test the steadfastness of Pārvatī's devotion, sends the Saptarṣis in disguise to dissuade her from her vow, enumerating Śiva's inauspicious characteristics — his ash-covered body, wandering lifestyle, lack of wealth, and association with ghosts. Pārvatī firmly rebuts each objection, declaring her unconditional devotion. Śiva himself then appears disguised as a brahmacārin and argues further against his own worthiness, only to be firmly rejected, thus proving Pārvatī's steadfastness beyond doubt.