व्यासजी कहते हैं – जगन्माता पार्वती अपने स्वामीकी कही हुई सब बातें आदिसे ही सुनकर बहुत प्रसन्न हुईं । उस समय वहाँ तीर्थयात्राके प्रसङ्गसे जो मुनि उस पर्वतपर गये थे , उन्होंने भी शूलपाणि महादेवजीका पूजन और प्रणाम करके सब लोकोंके हितके लिये प्रश्न किया।
मुनियोंने कहा — त्रिलोचन ! आपको नमस्कार है । इस रोमाञ्चकारी महाभयंकर संसारमें अज्ञानी पुरुष चिरकालसे भटक रहे हैं , वे जन्म - मृत्युरूप संसारबन्धनसे किस उपायसे मुक्त हो सकते हैं ? बताइये । हम यही सुनना चाहते हैं।
महादेवजी बोले- द्विजो ! कर्मबन्धनमें बँधकर दुःख भोगनेवाले मनुष्योंके लिये मैं भगवान् वासुदेवसे बढ़कर दूसरा कोई उपाय नहीं देखता । जो शङ्ख , चक्र और गदा धारण करनेवाले भगवान् वासुदेवका मन , वाणी और क्रियाद्वारा विधिपूर्वक पूजन करते हैं, वे परम गतिको प्राप्त होते हैं । जिनका मन जगन्मय भगवान् वासुदेवमें नहीं लगा , उनके जीवनसे और पशुओंकी भाँति चेष्टासे क्या लाभ हुआ।
मुनियोंने कहा- सर्वलोकवन्दित पिनाकधारी भगवान् शंकर ! हम भगवान् वासुदेवका माहात्म्य सुनना चाहते हैं ।
महादेवजी बोले- सनातन पुरुष श्रीहरि ब्रह्माजीसे भी श्रेष्ठ हैं । उनका श्रीविग्रह श्यामवर्ण है , उनकी कान्ति जाम्बूनद नामक सुवर्णके समान है । वे मेघरहित आकाशमें सूर्यकी भाँति प्रकाशित होते हैं । उनके दस भुजाएँ हैं । वे महातेजस्वी और देवशत्रुओंके नाशक हैं । उनके वक्षःस्थलमें श्रीवत्सका चिह्न शोभा पाता है । वे इन्द्रियोंके नियन्ता और सम्पूर्ण देववृन्दके अधिपति हैं । उनके उदरसे ब्रह्माका और मस्तकसे मेरा प्रादुर्भाव हुआ है सिरके बालोंसे नक्षत्र और ग्रह तथा रोमावलियोंसे देवता और असुर उत्पन्न हुए । उनके शरीरसे ऋषि और सनातन लोक प्रकट हुए हैं । वे साक्षात् ब्रह्माजी तथा सम्पूर्ण देवताओंके निवासस्थान हैं वे ही इस सम्पूर्ण पृथ्वीके रचयिता और तीनों लोकोंके स्वामी हैं । स्थावर जङ्गम भूतोंका संहार करनेवाले वे ही हैं । वे देवताओंके भी देवता और रक्षक हैं । शत्रुओंको ताप देनेवाले , सर्वज्ञ सर्वस्रष्टा सर्वव्यापी और सब ओर मुखवाले हैं तीनों लोकोंमें उनसे बढ़कर दूसरी कोई वस्तु नहीं है । वे सनातन महाभाग गोविन्दके नामसे विख्यात हैं । देवताओंके कार्यकी सिद्धिके लिये मानव- शरीरमें अवतीर्ण होकर वे समस्त भूपालोंका युद्धमें संहार करेंगे । भगवान् विष्णुके बिना देवगण अनाथ हैं । अतः उनके बिना वे संसारमें देव - कार्यकी सिद्धि नहीं कर सकते। सम्पूर्ण भूतोंके नायक भगवान् विष्णु समस्त प्राणियोंद्वारा वन्दित हैं । वे देवताओंके नाथ , कार्य - कारण - ब्रह्मस्वरूप और ब्रह्मर्षियोंको शरण देनेवाले हैं । ब्रह्माजी उनकी नाभिमें हैं और मैं शरीरमें सम्पूर्ण देवता भी उनके शरीरमें सुखपूर्वक स्थित हैं । वे भगवान् कमलके समान नेत्र धारण करते हैं । उनके गर्भमें श्रीका निवास है । वे सदा लक्ष्मीजीके साथ रहते । शार्ङ्ग नामक धनुष , सुदर्शन चक्र और नन्दक नामक खड्ग उनके आयुध हैं । सम्पूर्ण नागोंके शत्रु गरुड उनकी ध्वजामें विराजमान हैं । उत्तम शील , शौच , इन्द्रियसंयम , पराक्रम , वीर्य , सुदृढ़ शरीर , ज्ञान , सरलता , कोमलता , रूप और बल आदि सभी गुणोंसे वे सुशोभित हैं । उनके पास सम्पूर्ण दिव्यास्त्रोंका समुदाय है । उनके योगमायामय सहस्रों नेत्र हैं । वे विकराल नेत्रोंवाले भी हैं । उनका हृदय विशाल है । वे अपनी वाणीसे मित्रजनोंकी प्रशंसा करते हैं । कुटुम्बी और बन्धुजनोंके प्रेमी । क्षमाशील , अहंकारशून्य और वेदोंका ज्ञान प्रदान करनेवाले हैं । वे भयातुरोंके भयका अपहरण और मित्रोंके आनन्दकी वृद्धि करनेवाले हैं । समस्त प्राणियोंको शरण देनेवाले और दीनोंके पालक । शास्त्रोंके ज्ञाता और ऐश्वर्यसम्पन्न हैं । शरणमें आये हुए मनुष्योंके उपकारी और शत्रुओंको भय देनेवाले हैं । नीतिज्ञ , नीतिसम्पन्न , ब्रह्मवादी , जितेन्द्रिय और उत्कृष्ट बुद्धिसे युक्त हैं ।
वे देवताओंके अभ्युदयके लिये महात्मा मनुके वंशमें अवतार लेंगे । उस अवतारमें वे ब्राह्मणोंका सत्कार करनेवाले , ब्रह्मस्वरूप और ब्राह्मणोंके प्रेमी होंगे । यदुकुलमें अवतीर्ण भगवान् श्रीकृष्ण राजगृहमें जरासंधको जीतकर उसकी कैदमें पड़े हुए राजाओंको छुड़ायेंगे । पृथ्वीके समस्त रत्न उनके पास संचित होंगे । वे अत्यन्त पराक्रमी होंगे । भूतलपर दूसरा कोई वीर उन्हें पराक्रमद्वारा परास्त न कर सकेगा । वे विक्रमसे सम्पन्न समस्त राजाओंके भी राजा और वीरमूर्ति होंगे । भगवान् वासुदेव द्वारकामें रहते हुए दुर्बुद्धि दैत्योंको पराजित करके इस पृथ्वीका पालन करेंगे । आप सब लोग ब्राह्मणों तथा श्रेष्ठ पूजन - सामग्रियोंके साथ भगवान्की सेवामें उपस्थित हो सनातन ब्रह्माजीकी उनका यथायोग्य पूजन करें । जो मेरा तथा पितामह ब्रह्माका दर्शन करना चाहता हो , उसे परम प्रतापी भगवान् वासुदेवका दर्शन अवश्य करना चाहिये उनका दर्शन होनेसे ही मेरा भी दर्शन हो जाता है – इसमें कोई अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये तपोधनो ! भगवान् वासुदेव ही ब्रह्मा हैं , ऐसा जानो । जिनपर कमलनयन भगवान् विष्णु प्रसन्न होंगे , उनपर ब्रह्मासहित सम्पूर्ण देवता भी प्रसन्न हो जायँगे । संसारमें जो मानव भगवान् केशवकी शरण लेगा , उसे कीर्ति , यश और स्वर्गकी प्राप्ति होगी । इतना ही नहीं , वह धर्मात्मा होनेके साथ ही धर्मका उपदेश करनेवाला आचार्य होगा । महातेजस्वी भगवान् विष्णुने प्रजावर्गका हित करनेकी इच्छासे धर्मानुष्ठानके लिये कोटि - कोटि ऋषियोंको उत्पन्न किया । वे सनत्कुमार आदि ऋषि गन्धमादन पर्वतपर विधिपूर्वक तपस्यामें संलग्न हैं । इसलिये धर्मज्ञ एवं प्रवचन- कुशल भगवान् विष्णु सबके लिये नमस्कार करनेयोग्य हैं । वे वन्दित होनेपर स्वयं वन्दना करते हैं और सम्मानित होनेपर स्वयं भी सम्मान देते हैं । जो प्रतिदिन उनका दर्शन करता है , उसपर वे भी सदा कृपादृष्टि रखते हैं । जो उनकी शरणमें जाता है , उसकी ओर वे भी बढ़ आते हैं । जो उनकी अर्चना करता है , उसकी वे भी सदा अर्चना करते इस प्रकार आदिदेव भगवान् विष्णु अनिन्ध हैं साधु पुरुषोंने उनकी आराधनाके लिये बड़ी भारी तपस्या की है । देवताओंने भी सनातन देव श्रीहरिका सदा ही पूजन किया है । भगवान्के अनुरूप निर्भयता युक्त हो उनकी शरणमें जाकर उनकी आराधनामें मन लगाया है । सम्पूर्ण द्विजोंको चाहिये कि वे , वाणी और क्रियाद्वारा भगवान् देवकी नन्दनकी सेवामें उपस्थित हो यत्नपूर्वक उनका दर्शन और नमस्कार करें । मुनिवरो ! मैंने इसी मार्गका अनुष्ठान किया है । उन सर्वदेवेश्वर भगवान्का दर्शन कर लेनेपर सम्पूर्ण देवताओंका दर्शन हो जाता है । उन महावराहरूपधारी सर्वलोकपितामह जगत्पति भगवान् विष्णुको मैं नित्यप्रति प्रणाम करता हूँ । उन्हीं श्रीकृष्णके बड़े भाई हलधर बलरामजी होंगे , जिनका श्वेतगिरिके समान गौर वर्ण होगा पृथ्वीको धारण करनेवाले शेषनाग ही उनके रूपमें अवतीर्ण होंगे । वे भगवान् शेष बड़ी प्रसन्नता साथ सर्वत्र विचरण करते हैं । वे अपने फणसे पृथ्वीको लपेट करके स्थित हैं । ये जो भगवान् विष्णु कहलाते हैं , वे ही इस पृथ्वीको धारण करनेवाले भगवान् अनन्त हैं । जो बलराम वही समस्त इन्द्रियोंके स्वामी धरणीधर अच्युत हैं । वे दोनों पुरुषसिंह दिव्य रूप एवं दिव्य पराक्रमी हैं । उन दोनोंका दर्शन और आदर करना चाहिये क्रमशः चक्र और हल धारण करनेवाले हैं तपोधनो ! मैंने तुमलोगोंसे भगवान्के अनुग्रहका यह उपाय बताया है , अतः तुम सब लोग प्रयत्नपूर्वक यदुश्रेष्ठ भगवान् वासुदेवका पूजन करो ।
Summary of chapter 93 of the [[BOOK_TITLE]] is as follows:
The demon Naraka (Bhauma), who has conquered the three worlds and imprisoned sixteen thousand royal daughters, is confronted by Kṛṣṇa at Indra's behest. Satyabhāmā accompanies Kṛṣṇa into battle; Kṛṣṇa kills Naraka with his Sudarśana discus. The earrings of Aditi and the white umbrella of Indra are restored; the imprisoned princesses — unable to return to their families — are married by Kṛṣṇa as an act of protection and honor.