ब्रह्म महा पुराण
96 - श्रीवासुदेवके पूजनकी महिमा तथा एकादशीको भगवान्के मन्दिरमे जागरण करनेका माहात्म्य - ब्रह्मराक्षस और चाण्डालकी कथा
मुनियोंने कहा – महर्षे ! हमने भगवान् श्रीकृष्णका अद्भुत माहात्म्य सुना। वह सब पापोंको दूर करनेवाला , पुण्यमय , धन्य एवं संसारबन्धनका नाश करनेवाला है। महामुने ! श्रीवासुदेवके पूजनमें संलग्न रहनेवाले मनुष्य उनका विधिपूर्वक भक्तिभावसे पूजन करके किस गतिको प्राप्त होते हैं ?
व्यासजी बोले — मुनिवरो ! तुमने बहुत अच्छी बात पूछी है । यह वैष्णवोंको सुख देनेवाला विषय है , ध्यान देकर सुनो । वैष्णवोंके लिये स्वर्ग और मोक्ष दुर्लभ नहीं हैं । वैष्णव पुरुष जिन - जिन दुर्लभ भोगोंकी अभिलाषा करते हैं , उन सबको प्राप्त कर लेते हैं । जैसे कोई पुरुष कल्पवृक्षके पास पहुँच जानेपर अपनी इच्छाके अनुसार फल पाता है , उसी प्रकार भगवान् श्रीकृष्णसे सम्पूर्ण अभीष्ट वस्तुओंकी प्राप्ति होती है । भक्त मनुष्य श्रद्धा और विधिके साथ जगद्गुरु भगवान् वासुदेवका पूजन करके धर्म , अर्थ , काम और मोक्ष– चारों पुरुषार्थोंके फलस्वरूप स्वयं भगवान्को प्राप्त कर लेते हैं । जो लोग सदा भक्तिपूर्वक अविनाशी वासुदेवकी पूजा करते हैं , उनके लिये तीनों लोकोंमें कुछ भी दुर्लभ नहीं है । संसारमें वे मनुष्य धन्य हैं , जो समस्त मनोवाञ्छित फलोंके देनेवाले सर्वपापहारी श्रीहरिका सदा पूजन करते हैं । ब्राह्मण , क्षत्रिय , वैश्य , स्त्री , शूद्र और अन्त्यज सभी सुरश्रेष्ठ भगवान् वासुदेवका पूजन करके परम गतिको प्राप्त होते हैं।*
दोनों पक्षोंकी एकादशीको उपवासपूर्वक एकाग्रचित्त हो विधिपूर्वक स्नान करके धुले हुए वस्त्र पहने । इन्द्रियों को अपने काबूमें रखे और पुष्प , गन्ध , धूप , दीप , नैवेद्य , नाना प्रकारके उपहार , जप , होम , प्रदक्षिणा , भाँति - भाँतिके दिव्य स्तोत्र , मनोहर गीत , वाद्य , दण्डवत् प्रणाम तथा ' जय ' शब्दके उच्चारणद्वारा श्रद्धापूर्वक भगवान् विष्णुकी विधिवत् पूजा करे । पूजनके पश्चात् रात्रिमें जागरण करके श्रीकृष्णका चिन्तन करते हुए उनकी कथा वार्ता करे । अथवा भगवत्सम्बन्धी पदोंका गान करे । यों करनेवाला मनुष्य भगवान् विष्णुके परम धामको जाता है — इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है ।
मुनियोंने पूछा- महामुने ! भगवान् विष्णुके लिये जागरण करके गीत गानेका क्या फल है बताइये । उसका श्रवण करनेके लिये हमारे मनमें बड़ी उत्कण्ठा है ।
व्यासजी बोले- मुनिवरो ! भगवान् विष्णुके लिये जागरण करते समय गान करनेका जो फल बताया गया है , उसका क्रमशः वर्णन करता हूँ ; । इस पृथ्वीपर अवन्ती नामसे प्रसिद्ध एक नगरी थी , जहाँ शङ्ख , चक्र और गदा धारण करनेवाले भगवान् विष्णु विराजमान थे । उस नगरीके किनारे एक चाण्डाल रहता था , जो संगीतमें कुशल था । वह उत्तम वृत्तिसे धन पैदा करके कुटुम्बके लोगोंका भरण - पोषण करता था। भगवान् विष्णुके प्रति उसकी बड़ी भक्ति थी। वह अपने व्रतका दृढ़तापूर्वक पालन करता था । प्रत्येक मासकी एकादशी तिथिको वह उपवास करता और भगवान्के मन्दिरके पास जाकर उन्हें गीत सुनाया करता था । वह गीत भगवान् विष्णुके नामोंसे युक्त और उनकी अवतार-कथासे सम्बन्ध रखनेवाला होता था । गान्धार , षड्ज , निषाद , पञ्चम और धैवत आदि स्वरोंसे वह रात्रि जागरणके समय विभिन्न गाथाओंद्वारा श्रीविष्णुका यशोगान करता था द्वादशीको प्रातः काल भगवान्को प्रणाम करके अपने घर आता और पहले दामाद , भानजे और कन्याओंको भोजन कराकर पीछे स्वयं सपरिवार भोजन करता था । इस प्रकार विचित्र गीतोंद्वारा भगवान् विष्णुकी प्रसन्नताका सम्पादन करते हुए उस चाण्डालकी आयुका अधिकांश भाग बीत गया । एक दिन चैत्रके कृष्णपक्षकी एकादशी तिथिको वह भगवान् विष्णुकी सेवा करनेके लिये जंगली पुष्पोंका संग्रह करनेके निमित्त भक्तिपूर्वक उत्तम वनमें गया क्षिप्राके तटपर महान् वनके भीतर एक बहेड़ेका वृक्ष था । उसके नीचे पहुँचनेपर किसी राक्षसने उस चाण्डालको देखा और भक्षण करनेके लिये पकड़ लिया । यह देख चाण्डालने उस राक्षससे कहा- ' भद्र ! आज तुम मुझे न खाओ , कल प्रातः काल खा लेना । मैं सत्य कहता हूँ , फिर तुम्हारे पास लौट आऊँगा राक्षस ! आज मेरा बहुत बड़ा कार्य है , अतः मुझे छोड़ दो । मुझे भगवान् विष्णुकी सेवाके लिये रात्रिमें जागरण करना है । तुम्हें उसमें विघ्न नहीं डालना चाहिये ब्रह्मराक्षस ! सम्पूर्ण जगत्का मूल सत्य ही है अतः मेरी बात सुनो । मैं सत्यकी शपथ खाकर कहता हूँ , पुनः तुम्हारे पास लौट आऊँगा । परायी स्त्रियोंके पास जाने और पराये धनको हड़प लेनेवाले मनुष्योंको जिस पापकी प्राप्ति होती है ब्रह्महत्यारे , शराबी और गुरुपत्नीगामी तथा शूद्रजातीय स्त्रीसे सम्बन्ध रखनेवाले द्विजको जो पाप होता कृतघ्न , मित्रघाती , दुबारा ब्याही हुई स्त्रीके पति , क्रूरतापूर्ण कर्म करनेवाले पुरुष , कृपण तथा वन्ध्याके अतिथिको जो पाप लगता है , अमावस्या , अष्टमी , षष्ठी और दोनों पक्षोंकी चतुर्दशीमें स्त्रीसमागमसे जो पाप होता है , ब्राह्मण यदि रजस्वला स्त्रीके पास जाय अथवा श्राद्ध करके स्त्रीसमागम करे , उससे जो पाप लगता है , मल-भोजन करनेपर जिस पापकी प्राप्ति होती है , मित्रकी पत्नीके साथ सम्भोग करनेवालोंको जो दोष प्राप्त होता है , चुगलखोर , दम्भी , मायावी और मधुघातीको जिस पापकी प्राप्ति होती है , ब्राह्मणको कुछ देनेकी प्रतिज्ञा करके फिर उसे न देनेवालेको जो दोष लगता है , स्त्री-हत्या , बाल-हत्या और मिथ्याभाषण करनेवालेको जिस पापका भागी होना पड़ता है देवता , वेद , ब्राह्मण , राजा , मित्र और साध्वी स्त्रीकी निन्दा करनेसे जो पाप होता है , गुरुको झूठा कलङ्क देने , वनमें आग लगाने , गौकी हत्या करने , ब्राह्मणाधम होने और बड़े भाईके अविवाहित रहते स्वयं विवाह कर लेनेपर जो पाप लगता है तथा भ्रूणहत्या करनेवाले मनुष्योंको जिस पापकी प्राप्ति होती है-अथवा यहाँ बहुत-से शपथोंका वर्णन करनेसे क्या लाभ राक्षस ! एक भयंकर शपथ सुन लो; यद्यपि वह कहने योग्य नहीं है तो भी कहता हूँ-अपनी कन्याको बेचकर जीविका चलानेवाले , झूठी गवाही देने एवं यज्ञके अनधिकारीसे यज्ञ करानेवाले मनुष्योंको जिस पापका भागी होना पड़ता है तथा संन्यासी और ब्रह्मचारीको कामभोगमें आसक्त होनेपर जिस पापकी प्राप्ति होती है , उक्त सभी पापोंसे मैं लिप्त होऊँ , यदि तुम्हारे पास लौटकर न आऊँ। ' चाण्डालकी यह बात सुनकर ब्रह्मराक्षसको बड़ा विस्मय हुआ । उसने कहा — ' जाओ , सत्य द्वारा अपनी की हुई प्रतिज्ञाका पालन करना । ' राक्षसके यों कहनेपर चाण्डाल फूल लेकर भगवान् विष्णुके मन्दिरपर आया । उसने सभी फूल ब्राह्मणको दे दिये । ब्राह्मणने उन्हें जलसे धोकर उनके द्वारा भगवान् विष्णुका पूजन किया और अपने घरकी राह ली ; किंतु चाण्डालने मन्दिरके बाहर ही भूमिपर बैठकर उपवासपूर्वक गीत गाते हुए रातभर जागरण किया । रात बीती , सबेरा हुआ और चाण्डालने स्नान करके भगवान्को नमस्कार किया ; फिर अपनी प्रतिज्ञा सत्य करनेके लिये वह राक्षसके पास चल दिया। उसे जाते देख किसी मनुष्यने पूछा – ‘ भद्र ! कहाँ जाते हो ? ' चाण्डालने सब बातें कह सुनायीं । तब वह मनुष्य फिर बोला- ' यह शरीर धर्म , अर्थ , काम और मोक्ष- चारों पुरुषार्थोंका साधन है ; अतः विद्वान् पुरुषको बड़े यत्नसे इसका पालन करना चाहिये । मनुष्य जीवित रहे तो वह धर्म , अर्थ , सुख और श्रेष्ठ मोक्ष - गतिको प्राप्त कर लेता है। जीवित रहनेपर वह कीर्तिका भी उपार्जन करता है । संसारमें मरे हुए मनुष्यकी कोई चर्चा ही नहीं करता । ' उसकी बात सुनकर चाण्डालने युक्तियुक्त वचनोंमें उत्तर दिया- ' भद्र मैंने शपथ खायी है , अतः सत्यको आगे करके राक्षसके पास जाता हूँ । ' तब उस मनुष्यने फिर कहा — ' साधो ! तुम ऐसी मूर्खता क्यों करते हो क्या तुमने मनुजीका यह वचन नहीं सुना है— ' गौ स्त्री और ब्राह्मणकी रक्षाके लिये , विवाहके समय रतिके प्रसङ्गमें , प्राण - संकटकालमें , सर्वस्वका अपहरण होते समय - इन पाँच अवसरोंपर असत्यभाषणसे पाप नहीं लगता । * उस मनुष्यका कथन सुनकर चाण्डालने पुनः उत्तर दिया- ' आपका कल्याण हो , आप ऐसी बात मुँहसे न निकालें । संसारमें सत्यका ही आदर होता है । भूतलपर जो कुछ भी सुख - सामग्री है , वह सत्यसे ही प्राप्त होती है । सत्यसे ही सूर्य तपता है , सत्यसे ही जलमें रसकी स्थिति है , सत्यसे ही आग जलती और सत्यसे ही वायु चलतीमनुष्योंको सत्यसे ही धर्म , अर्थ , काम और दुर्लभ मोक्षकी प्राप्ति होती है ; अतः सत्यका परित्याग न करे । लोकमें सत्य ही परब्रह्म है , यज्ञोंमें भी सत्य ही सबसे उत्तम है तथा स स्वर्गसे आया हुआ है ; इसलिये सत्यको कभी नहीं छोड़ना चाहिये । ' †
यों कहकर वह चाण्डाल उस मनुष्यको चुप कराकर उस स्थानपर गया , जहाँ प्राणियोंका वध करनेवाला ब्रह्मराक्षस रहता था। चाण्डालको आया देख ब्रह्मराक्षसके नेत्र आश्चर्यसे चकित हो उठे ।उसने सिर हिलाकर कहा- ' महाभाग ! तुम्हें साधुवाद तुम वास्तवमें सत्य वचनका पालन करनेवाले हो तुम तो सत्यस्वरूप हो । मैं तुम्हें चाण्डाल नहीं मानता । तुम्हारे इस कर्मसे मैं तुम्हें पवित्र ब्राह्मण समझता हूँ । तुम्हारे मुखमें कल्याणका निवास है अब मैं तुमसे धर्म सम्बन्धी कुछ बातें पूछता बताओ । ' तुमने भगवान् विष्णुके मन्दिरमें कौन- सा कार्य किया ? ' मातङ्गने कहा- ' सुनो , मैंने मन्दिरके नीचे बैठकर भगवान्के सामने मस्तक झुकाया और उनका यशोगान करते हुए सारी रात जागरण किया । ' ब्रह्मराक्षसने फिर पूछा- ' बताओ , तुम्हें इस प्रकार भक्तिपूर्वक विष्णुमन्दिरमें जागरण करते कितना समय व्यतीत हो गया ? 'चाण्डालने हँसकर कहा- ' राक्षस ! मुझे प्रत्येक मासकी एकादशीको जागरण करते बीस वर्ष व्यतीत गये ! ' यह सुनकर ब्रह्मराक्षसने कहा- ' साधो अब मैं तुमसे जो कुछ कहता हूँ , वह करो मुझे एक रातके जागरणका फल अर्पण करो । महाभाग ऐसा करनेसे तुम्हें छुटकारा मिल जायगा ; अन्यथा मैं तीन बार सत्यकी दुहाई देकर कहता हूँ कि तुम्हें कदापि नहीं छोडूंगा । ' यों कहकर वह चुप हो गया ।
चाण्डालने कहा — ' निशाचर ! मैंने तुम्हें अपना शरीर अर्पित कर दिया है । अतः अब दूसरी बात करनेसे क्या लाभ | तुम मुझे इच्छानुसार खा जाओ । तब राक्षसने फिर कहा - ' अच्छा , रातके दो ही पहरके जागरण और संगीतका पुण्य मुझे दे दो तुम्हें मुझपर भी कृपा करनी चाहिये । ' यह सुनकर चाण्डालने राक्षससे कहा- ' यह कैसी बेसिर पैरकी बात करते हो । मुझे इच्छानुसार खा लो मैं तुम्हें जागरणका पुण्य नहीं दूँगा । ' चाण्डालकी बात सुनकर ब्रह्मराक्षसने कहा – ' भाई ! तुम तो अपने धर्म - कर्मसे सुरक्षित हो ; कौन ऐसा अज्ञानी और दुष्ट बुद्धिका पुरुष होगा , जो तुम्हारी ओर देखने , तुमपर आक्रमण करने अथवा तुम्हें पीड़ा देनेका साहस कर सके। दीन, पापग्रस्त विषयविमोहित , नरकपीड़ित और मूढ़ जीवपर साधु पुरुष सदा ही दयालु रहते हैं । महाभाग ! तुम मुझपर कृपा करके एक ही यामके जागरणका पुण्य दे दो अथवा अपने घरको लौट जाओ । चाण्डालने फिर उत्तर दिया- ' न तो मैं अपने घर लौटूंगा और न तुम्हें किसी तरह एक याम जागरणका पुण्य ही दूँगा । ' यह सुनकर ब्रह्मराक्षस हँस पड़ा और बोला- ‘ भाई ! रात्रि व्यतीत होते समय जो तुमने अन्तिम गीत गाया हो , उसीका फल मुझे दे दो और पापसे मेरा उद्धार करो । तब चाण्डालने उससे कहा — ' यदि तुम आजसे किसी प्राणीका वध न करो तो मैं तुम्हें पिछले गीतका पुण्य दे सकता हूँ ; अन्यथा नहीं । बहुत अच्छा ' कहकर ब्रह्मराक्षसने उसकी बात मान ली । तब चाण्डालने उसे आधे मुहूर्तके जागरण और गानका फल दे दिया । उसे पाकर ब्रह्मराक्षसने चाण्डालको प्रणाम किया और प्रसन्न होकर तीर्थोंमें श्रेष्ठ पृथूदकतीर्थकी ओर चल दिया । वहाँ निराहार रहनेका संकल्प लेकर ब्रह्मराक्षसने प्राण त्याग दिया । उस गीतके फलसे पुण्यकी वृद्धि होनेके कारण उसका उस राक्षसयोनिसे उद्धार हो गया । पृथूदकतीर्थके प्रभावसे दुर्लभ ब्रह्मलोकमें जाकर उसने दस हजार वर्षोंतक वहाँ निर्भय निवास किया । अन्तमें वह जितेन्द्रिय ब्राह्मण हुआ और उसे पूर्वजन्मका स्मरण बना रहा । अब चाण्डालकी शेष कथा कहता हूँ , सुनो ! राक्षसके चले जानेपर किया वह बुद्धिमान् एवं संयमी चाण्डाल अपने घर आया । उस घटनासे चाण्डालके मनमें बड़ा वैराग्य हुआ । उसने अपनी पत्नीकी रक्षाका भार पुत्रोंपर डाल दिया और स्वयं पृथ्वीकी परिक्रमा आरम्भ कर दी । कोकामुखसे लेकर जहाँ भगवान् स्कन्दके दर्शन होते हैं , वहाँतक गया । स्कन्दका दर्शन करके वह धारा नगरीमें गया । वहाँ भी प्रदक्षिणा करके वह पर्वतोंमें श्रेष्ठ विन्ध्याचलपर जाकर पापमोचनतीर्थमें पहुँचा । वहाँ उस चाण्डालने स्नान किया , जो सब पापोंको दूर करनेवाला है । फिर पापरहित हो वह उत्तम गतिको प्राप्त हुआ ।
* धन्यास्ते पुरुषा लोके येऽर्चयन्ति सदा हरिम् । सर्वपापहरं देवं सर्वकामफलप्रदम् ॥
ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्या स्त्रियः शूद्रान्त्यजातयः । सम्पूज्य तं सुरवरं प्राप्नुवन्ति परां गतिम् ॥
( २२६ । १३-१४ )
गोस्त्रीद्विजानां परिरक्षणार्थं विवाहकाले सुरतप्रसङ्गे प्राणात्यये
सर्वधनापहारे पञ्चानृतान्याहुरपातकानि ।।
( २२७ । ५० )
† सत्येनार्क: प्रतपति सत्येनापो रसात्मिका: । ज्वलत्यग्निश्च सत्येन वाति सत्येन मारुतः॥ धर्मार्थकामसम्प्राप्तिर्मोक्षप्राप्तिश्च दुर्लभा । सत्येन जायते पुंसां तस्मात् सत्यं न संत्यजेत् ॥ सत्यं ब्रह्म परं लोके सत्यं यज्ञेषु चोत्तमम् । सत्यं स्वर्गसमायातं तस्मात् सत्यं न संत्यजेत् ॥
( २२७।५३-५५ )
Summary of chapter 94 of the Brahma Mahā Purana is as follows:
Indra, humbled by witnessing Kṛṣṇa's cosmic power in the defeat of Naraka, composes a sincere prayer of gratitude and surrender. He worships Kṛṣṇa as the supreme Puruṣa whose grace is the ultimate shelter. The prayer affirms Kṛṣṇa's identity as Viṣṇu and acknowledges that all of Kṛṣṇa's activities — even those involving conflict — are manifestations of the divine will that sustains cosmic order.