ब्रह्म महा पुराण
97 - श्रीविष्णुमें भक्ति होनेका क्रम और कलि - धर्मका निरूपण
मुनियोंने कहा- महामते ! हमने भगवान् श्रीकृष्णके समीप जागरणपूर्वक गीत सुनानेका फल सुना , जिससे वह चाण्डाल परम गतिको प्राप्त हुआ । अब जिस तपस्या अथवा कर्मसे भगवान् विष्णुमें हमारी भक्ति हो सके , वह हमें बताइये इस समय हम यही विषय सुनना चाहते हैं।
व्यासजी बोले – मुनिवरो ! भगवान् श्रीकृष्णकी भक्ति महान् फल देनेवाली है । वह मनुष्यको जिस प्रकार होती है , वह सब क्रमशः बतलाता हूँ ; ध्यान देकर सुनो । ब्राह्मणो ! यह संसार अत्यन्त घोर और समस्त प्राणियोंके लिये भयंकर है । नाना प्रकारके सैकड़ों दुःखोंसे व्याप्त और मनुष्योंके हृदयमें महान् मोहका संचार करनेवाला है । इस जगत्में पशु- पक्षी आदि हजारों योनियोंमें बारंबार जन्म लेनेके पश्चात् देहधारी जीव कभी किसी प्रकार मनुष्यका जन्म पाता है । मनुष्यों में भी ब्राह्मणत्व , ब्राह्मणत्वमें भी विवेक , विवेकसे भी धर्मनिष्ठ बुद्धि और बुद्धिसे भी कल्याणमय मार्गोंका ग्रहण होना अत्यन्त दुर्लभ है । मनुष्योंके पूर्वजन्मका संचित पाप जबतक नष्ट नहीं हो जाता , तबतक जगन्मय भगवान् वासुदेवमें उनकी भक्ति नहीं होती । अतः ब्राह्मणो श्रीकृष्णमें जिस प्रकार भक्ति होती है , वह सुनो I अन्य देवताओंके प्रति मनुष्यकी जो मन , वाणी क्रियाद्वारा तद्गतचित्तसे भक्ति होती है , उससे यज्ञमें उसका मन लगता है ; फिर वह एकाग्रचित्त होकर अग्निकी उपासना करता है । अग्निदेवके संतुष्ट होनेपर भगवान् भास्करमें उसकी भक्ति होती है । तबसे वह निरन्तर सूर्यदेवकी आराधना करने लगता है । भगवान् सूर्यके प्रसन्न होनेपर उसकी भक्ति भगवान् शंकरमें होती है , फिर वह बड़े यत्नके साथ विधिपूर्वक महादेवजीकी पूजा करता । जब महादेवजी संतुष्ट होते हैं , तब मनुष्यकी भक्ति भगवान् श्रीकृष्णमें होती है । तब वह वासुदेवसंज्ञक अविनाशी भगवान् जगन्नाथका पूजन - करके भोग और मोक्ष दोनों प्राप्त कर लेता है ।
मुनियोंने पूछा – महामुने ! संसारमें जो अवैष्णव मनुष्य देखे जाते हैं , वे श्रीविष्णुका पूजन क्यों नहीं करते ? इसका कारण बतलाइये ।
व्यासजी बोले- मुनिवरो ! इस संसारमें दो प्रकारके भूतसर्ग विख्यात हैं- एक आसुर और दूसरा दैव । पूर्वकालमें इन दोनोंकी सृष्टि ब्रह्माजीने की थी । दैवी प्रकृतिका आश्रय लेनेवाले मनुष्य भगवान् विष्णुका पूजन करते हैं और आसुरी प्रकृतिको प्राप्त हुए लोग श्रीहरिकी निन्दा किया करते है। ऐसे लोग मनुष्योंमें अधम हैं । श्रीहरिकी मायासे उनकी बुद्धि मारी गयी है । ब्राह्मणो ! वे श्रीहरिको न पाकर नीच गतिमें जाते हैं । भगवान्की माया बड़ी गूढ़ है । देवताओं और असुरोंके लिये भी उसका ज्ञान होना कठिन है । वह मनुष्योंके हृदयमें महान् मोहका संचार करती है । जिन्होंने मनको वशमें नहीं किया है , ऐसे लोगोंके लिये उस मायाको पार करना कठिन है। मुनियोंने कहा - महर्षे ! अब हम आपसे जगत्के संहारकी कथा सुनना चाहते हैं । कल्पके अन्तमें जो महाप्रलय होता है , उसका वर्णन कीजिये।
व्यासजी बोले- मुनिवरो ! कल्पके अन्तमें तथा प्राकृत प्रलयमें जो जगत्का संहार होता है , उसका वर्णन सुनो । सत्ययुग , त्रेता , द्वापर और कलि- ये चार युग हैं , जो देवताओंके बारह हजार दिव्य वर्षों में समाप्त होते हैं । समस्त चतुर्युग स्वरूपसे एक से ही होते हैं । सृष्टिके आरम्भमें सत्ययुग होता है तथा अन्तमें कलियुग रहता है । ब्रह्माजी प्रथम कृतयुगमें जिस प्रकार सृष्टिका आरम्भ करते हैं , वैसे ही अन्तिम कलियुगमें उसका उपसंहार करते हैं ।
मुनियोंने कहा – भगवन् ! कलिके स्वरूपका विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिये , जिसमें चार चरणोंवाले स्वेच्छाचारिणी भगवान् धर्म खण्डित हो जाते हैं ।
व्यासजी बोले- निष्पाप मुनियो ! तुम जो मुझसे कलिका स्वरूप पूछते हो , वह तो बहुत बड़ा है ; तथापि मैं संक्षेपसे बतलाता हूँ , सुनो कलियुगमें मनुष्योंकी वर्ण और आश्रमसम्बन्धी आचारमें प्रवृत्ति नहीं होगी । सामवेद , ऋग्वेद और यजुर्वेदकी आज्ञाके पालनमें भी कोई प्रवृत्त न होगा । कलियुगमें विवाहको धर्म नहीं माना जायगा शिष्य गुरुके अधीन नहीं रहेंगे । पुत्र भी अपने धर्मका पालन नहीं करेंगे । अग्निहोत्रका नियम उठ जायगा । कोई किसी भी कुलमें क्यों न उत्पन्न हुआ हो- जो बलवान् होगा , वही कलियुगमें सबका स्वामी होगा । सभी वर्णोंके लोग कन्या बेचकर जीवन निर्वाह करेंगे । ब्राह्मणो ! कलियुगमें जिस किसीका जो भी वचन होगा , सब शास्त्र ही माना जायगा । कलियुगमें सब देवता होंगे और सबके लिये सब आश्रम होंगे । अपनी - अपनी रुचिके अनुसार अनुष्ठान करके उसमें उपवास , परिश्रम और धनका व्यय करना धर्म कहा जायगा । कलियुगमें थोड़े - से ही धनसे मनुष्योंको बड़ा घमंड होगा । स्त्रियोंको अपने केशोंपर ही रूपवती होनेका गर्व होगा । सुवर्ण , मणि और रत्न आदि तथा वस्त्रोंके भी नष्ट हो जानेपर स्त्रियाँ केशोंसे ही शृङ्गार करेंगी । कलियुगकी स्त्रियाँ धनहीन पतिको त्याग देंगी । उस समय धनवान् पुरुष ही युवतियोंका स्वामी होगा । जो - जो अधिक देगा , उसे उसे ही मनुष्य अपना मालिक मानेंगे । उस समय लोग प्रभुताके ही कारण सम्बन्ध रखेंगे । द्रव्यराशि घर बनानेमें ही समाप्त हो जायगी । उससे दान - पुण्यादि न होंगे । बुद्धि द्रव्योंके संग्रहमात्र में ही लगी रहेगी । उसके द्वारा आत्मचिन्तन न होगा । सारा धन उपभोगमें ही समाप्त हो जायगा । उससे धर्मका अनुष्ठान न होगा । कलियुगकी स्त्रियाँ स्वेच्छाचारिणी होंगी । हाव - भाव - विलासमें ही उनकी स्पृहा रहेगी । अन्यायसे धन पैदा करनेवाले पुरुषोंमें ही उनकी आसक्ति होगी । सुहृदोंके निषेध करनेपर भी मनुष्य एक - एक पाईके लिये भी दूसरोंके स्वार्थकी हानि कर देंगे ।
ब्राह्मणो ! कलियुगमें सब लोग सदा सबके साथ समानताका दावा करेंगे । गायोंके प्रति तभीतक गौरव रहेगा , जबतक कि वे दूध देती रहेंगी । कलियुगकी प्रजा प्रायः अनावृष्टि और क्षुधाके भयसे व्याकुल रहेगी । सबके नेत्र आकाशकी ओर लगे रहेंगे । वर्षा न होनेसे दुःखी मनुष्य तपस्वी - जनोंकी भाँति मूल फल और पत्ते खाकर रहेंगे और कितने ही आत्मघात कर लेंगे । कलिमें सदा अकाल ही पड़ता रहेगा । सब लोग सदा असमर्थ होकर क्लेश भोगेंगे । कभी किन्हीं मानवोंको थोड़ा सुख भी मिल जायगा । सब लोग बिना स्नान किये ही भोजन करेंगे । अग्निहोत्र , देवपूजा , अतिथि सत्कार , श्राद्ध और तर्पणकी क्रिया कोई नहीं करेंगे । कलियुगकी स्त्रियाँ लोभी , नाटी , अधिक खानेवाली , बहुत संतान पैदा करनेवाली और मन्द भाग्यवाली होंगी । वे दोनों हाथोंसे सिर खुजलाती रहेंगी । गुरुजनों तथा पतिकी आज्ञाका भी उल्लङ्घन करेंगी तथा पर्देके भीतर नहीं रहेगी । अपना ही पेट पालेंगी , क्रोधमें भरी रहेंगी । देह-शुद्धिकी ओर ध्यान नहीं देंगी और असत्य एवं कटु वचन बोलेंगी । इतना ही नहीं , वे दुराचारिणी होकर दुराचारी पुरुषोंसे मिलनेकी अभिलाषा करेंगी । कुलवती स्त्रियाँ भी अन्य पुरुषोंके साथ व्यभिचार करेंगी। ब्रह्मचारी लोग वेदोक्त व्रतका पालन किये बिना ही वेदाध्ययन करेंगे । गृहस्थ पुरुष न तो हवन करेंगे और न सत्पात्रको उचित दान ही देंगे । वानप्रस्थ आश्रम में रहनेवाले लोग वनके कन्द - मूल आदिसे निर्वाह न करके ग्रामीण आहारका संग्रह करेंगे और संन्यासी भी मित्र आदिके स्नेह- बन्धनमें बँधे रहेंगे । कलियुग आनेपर राजालोग पुरुषोंकी प्रजाकी रक्षा नहीं करेंगे , अपितु कर लेनेके बहाने कलियुगकी प्रजाके ही धनका अपहरण करनेवाले होंगे । * उस समय जिस जिसके पास हाथी , घोड़े और रथ होंगे ,वही- वही राजा होगा और जो - जो निर्बल होंगे , वे ही सेवक होंगे । वैश्यलोग कृषि , वाणिज्य आदि अपने कर्मोंको छोड़कर शूद्र - वृत्तिसे रहेंगे शिल्प - कर्मसे जीवन निर्वाह करेंगे । इसी प्रकार शूद्र भी संन्यासका चिह्न धारण करके भिक्षापर जीवन निर्वाह करेंगे । वे अधम मनुष्य संस्कारही होते हुए भी लोगोंको ठगनेके लिये पाखण्ड वृत्तिका आश्रय लेंगे । दुर्भिक्ष और करकी पीड़ासे अत्यन्त उपद्रवग्रस्त होकर प्रजाजन ऐसे देशोंमें चले जायँगे , जहाँ गेहूँ और जौ आदिकी अधिकता होगी। उस समय वेदमार्गका लोप , पाखण्डकी अधिकता और अधर्मकी वृद्धि होनेसे लोगोंकी आयु बहुत थोड़ी होगी । कलियुगमें पाँच , छ : अथवा सात वर्षकी स्त्री और आठ , नौ या दस वर्षके पुरुषोंके ही संतानें होने लग जायँगी । बारह वर्षकी अवस्थामें ही बाल सफेद होने लगेंगे । घोर कलियुग आनेपर कोई मनुष्य बीस वर्षतक जीवित नहीं रहेगा । उस समय लोग मन्दबुद्धि , व्यर्थ चिह्न धारण करनेवाले और दुष्ट अन्तःकरणवाले होंगे ; अतः वे थोड़े ही समयमें नष्ट हो जायँगे । ब्राह्मणो ! जब - जब इस जगत्में पाखण्ड - वृत्ति दृष्टिगोचर होने लगे , तब तब विद्वान् पुरुषोंको कलियुगकी वृद्धिका अनुमान करना चाहिये। जब जब वैदिक मार्गका अनुसरण करनेवाले साधु पुरुषोंकी हानि हो , तब तब बुद्धिमान् पुरुषों को कलियुगकी वृद्धिका अनुमान करना चाहिये । जब धर्मात्मा मनुष्योंके आरम्भ किये हुए कार्य शिथिल हो जायँ , तब उसमें विद्वानोंको कलियुगकी प्रधानताका अनुमान करना चाहिये।+ जब-जब यज्ञोंके अधीश्वर भगवान् पुरुषोत्तमका लोग यज्ञोंद्वारा यजन न करें तब तब यह समझना चाहिये कि कलियुगका बल बढ़ रहा है । द्विजवरो ! जब वेदवादमें प्रेम हो और पाखण्डमें अनुराग बढ़ता जाय , तब विद्वान् पुरुषोंको कलियुगकी वृद्धिका अनुमान करना चाहिये । ब्राह्मणो ! कलियुगमें पाखण्डसे दूषित चित्तवाले मनुष्य सबकी सृष्टि करनेवाले जगत्पति भगवान् विष्णुकी आराधना नहीं करेंगे उस समय पाखण्डसे प्रभावित मनुष्य ऐसा कहेंगे कि ' देवताओंसे क्या लेना है । ब्राह्मणों और वेदोंसे क्या लाभ है । जलसे होनेवाली शुद्धिमें क्या रखा है।’१ कलियुगमें मेघ थोड़ी वृष्टि करेंगे । खेतीमें बहुत कम फल लगेंगे और वृक्षोंके फल सारहीन होंगे । कलिमें प्रायः लोग घुटनोंतक वस्त्र पहनेंगे वृक्षोंमें शमीकी ही अधिकता होगी । चारों वर्णोंके सब लोग प्रायः शूद्रवत् हो जायँगे।२ कलियुगके आनेपर प्रायः छोटे - छोटे धान्य होंगे । अधिकतर बकरियोंका दूध मिलेगा और उशीर ( खस ) ही एकमात्र अनुलेपन होगा। कलियुगमें अधिकतर सास और ससुर ही लोगोंके गुरुजन होंगे । मुनिवरो ! उस समय मनोहारिणी भार्या और साले आदि ही सुहृद् समझे जायँगे। लोग अपने ससुरके अनुगामी होकर कहेंगे कि ' कौन किसकी माता है और कौन किसका पिता । सब जीव अपने कर्मोंके अनुसार ही जन्मते और मरते हैं।३ उस समय थोड़ी बुद्धिवाले मनुष्य मन , वाणी और शरीरके दोषोंसे प्रभावित होकर प्रतिदिन बारंबार पाप करेंगे। सत्य , शौच और लज्जासे रहित मनुष्योंके लिये जो जो दुःखकी बात हो सकती है , वह सब कलिकालमें होगी । संसारमें स्वाध्याय , वषट्कार , स्वधा और स्वाहाका शब्द नहीं सुनायी देगा । उस समय स्वधर्मनिष्ठ ब्राह्मण कोई विरला ही होगा । एक विशेषता अवश्य है , कलियुगमें थोड़ा सा ही प्रयत्न करनेपर मनुष्य वह उत्तम पुण्यराशि प्राप्त कर सकता है , जो सत्ययुगमें बहुत बड़ी तपस्यासे साध्य हो सकती है। ब्राह्मणो ! कलियुग धन्य है , जहाँ थोड़े ही क्लेशसे महान् फलकी प्राप्ति होती है तथा स्त्री और शूद्र भी धन्य हैं । इसके सिवा और भी सुनो। सत्ययुगमें दस वर्षतक तपस्या , ब्रह्मचर्य और जप आदिका अनुष्ठान करनेसे जो फल मिलता है , वह त्रेतामें एक वर्ष , द्वापरमें एक मास तथा कलियुगमें एक दिन रातके ही अनुष्ठान मिल जाता है । इसीलिये मैंने कलियुगको श्रेष्ठ बताया । सत्ययुगमें ध्यान , त्रेतामें यज्ञोंद्वारा यजन और द्वापरमें पूजन करनेसे मनुष्य जिस फलको पाता है , वही कलियुगमें केशवका नाम - कीर्तन करनेमात्रसे मिल जाता है। धर्मज्ञ ब्राह्मणो ! इस कलियुगमें थोड़े - से परिश्रमसे ही मनुष्यको महान् धर्मकी प्राप्ति हो जाती है । इसीलिये मैं कलियुगसे अधिक संतुष्ट हूँ।४
अब शूद्रोंकी विशेषताका वर्णन सुनो। द्विजोंको पहले ब्रह्मचर्य- व्रतका पालन करते हुए वेदाध्ययन करना पड़ता है। फिर धर्मतः प्राप्त हुए धनके द्वारा विधिपूर्वक यज्ञ करना पड़ता है । इसमें भी व्यर्थ वार्तालाप , व्यर्थ भोजन और व्यर्थ धन द्विजोंके पतनके कारण होते हैं; इसलिये उन्हें सदा संयमी रहना आवश्यक है। यदि वे सभी वस्तुओंमें विधिका पालन न करें तो उन्हें दोष लगता है यहाँतक कि भोजन और पान आदि भी उनकी इच्छाके अनुसार नहीं प्राप्त होते। वे समस्त कार्योंमें परतन्त्र होते हैं । इस प्रकार विनीत भावसे महान् क्लेश उठाकर वे उत्तम लोकोंपर अधिकार प्राप्त करते हैं ; परन्तु मन्त्रहीन पाक - यज्ञका अधिकारी शूद्र केवल द्विजोंकी सेवा करनेमात्रसे अपने लिये अभीष्ट पुण्यलोकोंको प्राप्त कर लेता है इसलिये शूद्र अन्य वर्णोंकी अपेक्षा अधिक धन्यवादका पात्र है । स्त्रियाँ क्यों धन्य हैं , इसका कारण बतलाया जाता है । पुरुषोंको अपने धर्मके विपरीत न चलकर सदा ही धनोपार्जन करना , उसे सुपात्रों को देना और विधिपूर्वक यज्ञ करना आवश्यक है धनके उपार्जन और संरक्षणमें महान् क्लेश उठाना पड़ता है तथा उसे उत्तम कार्यमें लगानेके लिये मनुष्योंको जो गहरी चिन्ता करनी पड़ती है , वह सबको विदित है । ये तथा और भी बहुत से क्लेश सहन करके पुरुष क्रमशः प्राजापत्य आदिशुभ लोक प्राप्त करते हैं; परंतु स्त्री मन, वाणी और क्रियाद्वारा केवल पतिकी सेवा करनेमात्रसे उसके समान लोकोंपर अधिकार प्राप्त कर लेती है। वे महान् क्लेशके बिना ही उन्हीं लोकोंमें जाती हैं , जिनमें क्लेश साध्य उपाय करके पुरुष जाता है; इसलिये तीसरी बार मैंने स्त्रियोंको साधुवाद दिया है । ब्राह्मणो ! यह मैंने कलियुग आदिकी श्रेष्ठताका कारण बताया है । अब तुमलोग जिस उद्देश्यसे यहाँ आये हो , उसे पूछो ; मैं तुम्हारे इच्छानुसार उसका भी वर्णन करूँगा । जो अपने सगुणरूपी जलसे समस्त पापरूपी पङ्कको धो चुके हैं ; उनके द्वारा थोड़े ही प्रयत्नसे कलियुगमें धर्मकी सिद्धि हो जाती है । मुनिवरो ! शूद्र केवल द्विजोंकी सेवामें तत्पर रहने तथा स्त्रियाँ पतिकी शुश्रूषा करनेमात्रसे अनायास ही पुण्यलोक प्राप्त कर लेती हैं । इसलिये इन तीनोंको ही मैंने परम धन्य माना है । द्विजातियोंको सत्य आदि तीनों युगोंमें धर्मका साधन करते समय अधिक क्लेश उठाना पड़ता है , किंतु कलियुगमें मनुष्य थोड़ी तपस्यासे शीघ्र ही सिद्धि प्राप्त कर लेते हैं । मुनिवरो ! जो कलियुगमें धर्मका आचरण करते वे धन्य हैं । * धर्मज्ञो ! तुम्हारा जो अभीष्ट विषय था , उसे मैंने बिना पूछे बता दिया ; अब और क्या करूँ ?
* अरक्षितारो हर्तारः शुल्कव्याजेन पार्थिवाः । हारिणो जनवित्तानां सम्प्राप्ते च कलौ युगे ॥
( २२ ९ । ३४ )
↑ यदा यदा हि पाखण्डवृत्तिरत्रोपलक्ष्यते । तदा तदा कलेर्वृद्धिरनुमेया विचक्षणैः ॥
यदा यदा सतां हानिर्वेदमार्गानुसारिणाम् । तदा तदा कलेर्वृद्धिरनुमेया विचक्षणैः ॥
प्रारम्भाचावसीदन्ति यदा धर्मकृतां नृणाम् । तदानुमेयं प्राधान्यं कलेविप्रा विचक्षणैः ॥
( २२ ९।४४-४६ )
१- किं देवैः किं द्विजैर्वेदैः किं शौचेनाम्बुजन्मना। इत्येवं प्रलपिष्यन्ति पाखण्डोपहता नराः ॥
( २२ ९ । ५० )
२-जानुप्रायाणि वस्त्राणि शमीप्राया महीरुहाः। शूद्रप्रायास्तथा वर्णा भविष्यन्ति कलौ युगे ॥
( २२ ९ । ५२ )
३ - कस्य माता पिता कस्य यदा कर्मात्मकः पुमान् । इति चोदाहरिष्यन्ति श्वशुरानुगता नराः॥
( २२ ९ ।५५ )
४-धन्ये कलौ भवेद्विप्रास्त्वल्पक्लेशैर्महत्फलम् । तथा भवेतां स्त्रीशूद्रौ धन्यौ न्यन्निबोधत ॥
यत्कृते दशभिर्वर्षैस्त्रेतायां हायनेन तत् । द्वापरे तच्च मासेन अहोरात्रेण तत्कलौ ॥
तपसो ब्रह्मचर्यस्य जपादेश्च फलं द्विजाः I प्राप्नोति पुरुषस्तेन कलिः साध्विति भाषितुम्॥
ध्यायन् कृते यजन् यज्ञैस्त्रेतायां द्वापरेऽर्चयन्। यदाप्नोति तदाप्नोति कलौ संकीर्त्य केशवम्॥
धर्मोत्कर्षमतीवात्र प्राप्नोति पुरुषः कलौ I स्वल्पायासेन धर्मज्ञास्तेन तुष्टोऽस्म्यहं कलौ ॥
( २२ ९।६१-६५ )
* अल्पेनैव प्रयत्नेन धर्मः सिद्धयति वै कलौ I नरैरात्मगुणाम्भोभिः क्षालिताखिलकिल्विषैः॥
शूद्रैश्च द्विजशुश्रूषातत्परैर्मुनिसत्तमाः । तथा स्त्रीभिरनायासात् पतिशुश्रूषयैव हि ॥
ततस्त्रितयमप्येतन्मम धन्यतमं मतम् । धर्मसंराधने क्लेशो द्विजातीनां कृतादिषु ॥
तथा स्वल्पेन तपसा सिद्धिं यास्यन्ति मानवाः। धन्या धर्मं चरिष्यन्ति युगान्ते मुनिसत्तमाः॥
( २२ ९।७८-८१ )
Summary of chapter 95 of the Brahma Mahā Purana is as follows:
The sixteen thousand royal daughters rescued from Naraka's captivity become the wives of Kṛṣṇa, who multiplies himself by his Yogamāyā to be simultaneously present with each of them. By this divine act of dharmic protection, Kṛṣṇa restores their dignity. Additionally, six other great queens — Satyabhāmā, Jāmbāvatī, Nāgnajitī, Kālindī, Mitravindhā, and Bhadrā — are enumerated as his principal wives.