ब्रह्माजी कहते हैं - महामते! भगवान् शंकरकी जटामें जो दिव्य जल आकर स्थित हुआ, उसके दो भेद हुए; क्योंकि उसे पृथ्वीपर उतारनेवाले दो व्यक्ति थे। उस जल के एक भाग को तो व्रत, दान और समाधिमें तत्पर रहनेवाले गौतम नामक ब्राह्मणने भगवान् शिवकी आराधना करके भूतलतक पहुँचाया, जो सम्पूर्ण लोक में विख्यात हुआ; तथा दूसरा भाग बलवान् क्षत्रिय रजा भगीरथने इस पृथ्वी पर उतारा। इसके लिए उन्हें नियमोंका पालन करते हुए तपस्याद्वारा भगवान् शंकरकी आराधना करनी पड़ी थी। इस प्रकार एक ही गङ्गाके दो स्वरुप हो गये।
एक समय की बात है, महर्षि गौतम कैलासपर्वतपर गये और मौनभाव से कुषा बिछाकर उसपर बैठे; फिर पवित्र होकर इस स्तोत्रका गान करने लगे।
गौतम बोले - भोग की अभिलाषा रखनेवाले जीवोंको मनोवाञ्छित भोग प्रदान करनेके लिये पार्वतीसहित भगवान् शंकर उत्तम गुणोंसे युक्त आठ विराट् स्वरुप धारण करते हैं। इस प्रकार विद्वान पुरुष प्रतिदिन भगवान् महादेवजी की स्तुति किया करते हैं। महेश्वरका जो पृथ्वीमय शरीर है, वह अपने विषयोंद्वारा सुख पहुँचाने, समस्त चराचर जगत् का भरण-पोषण करने, उसकी सम्पत्ति बढ़ाने तथा सबका अभ्युदय करनेके लिये है। शान्तिमय शरीरवाले भगवान् शिवने जगत् की सृष्टि, पालन और संहार करनेके लिये पृथ्वीके आधारभूत जलका स्वरुप धारण किया है। उनका वह लोक-प्रतिष्ठित रूप सब लोगों को सुख पहुँचाने तथा धर्म की सिद्धि करनेका भी हेतु है। महेश्वर! आपने समयकी व्यवस्था करने, अमृतका स्त्रोत बहाने, जीवोंने सृष्टि, पालन और संहार करने तथा प्रजाको मोह, सुख एवं उन्नतिका अवसर देनेके लिये सूर्य, चन्द्रमा तथा अग्निका शरीर धारण किया है। ईश! आपने जो वायु का रूप ग्रहण किया है, उसमें भी एक रहस्य है। सब लोग प्रतिदिन बढ़ें, चलें, फिरें, शक्तिका उपार्जन करें, अक्षरोंका उच्चारण कर सकें, जीवन कायम रहे और अनेक प्रकार के आमोद-प्रमोदकी सृष्टि हो, इसीलिये आपका वह रूप है। भगवान्! इसमें तनिक भी संदेह नहीं कि अपने-आपको आप ही ठीक-ठीक जानते हैं। भेद (अवकाश)- के बिना न कोई क्रिया हो सकती है न धर्म हो सकता है, न अपने या परायेका बोध होगा न दिशा, अन्तरिक्ष, द्युलोक, पृथ्वी तथा भोग और मोक्षका ही अन्तर जान पड़ेगा; अत: महेश्वर! आपने यह आकाशरूप ग्रहण किया है। धर्म की व्यवस्था करनेका निश्चय करके आपने ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद, उनकी शाखाओं और शास्त्रोंका विभाग किया हिया तथा लोक में भी इसी उद्देश्यसे गाथाओं, स्मृतियों और पुराणोंका प्रसार किया है। ये सब शब्दस्वरुप ही हैं। शम्भो! यजमान, यज्ञ. यज्ञोंके साधन, ऋत्विक्, यज्ञका स्थान, फल, देश और काल- ये सब आप ही हैं। आप ही परमार्थतत्त्व हैं। विद्वान् पुरुष आपके शरीर को यज्ञाङ्गमय बतलाते हैं। केवल वाग्विलास करनेसे क्या लाभ- कर्ता, दाटा, प्रतिनिधि, दान, सर्वज्ञ, साक्षी, परम पुरुष, सबका अन्तरात्मा तथा परमार्थस्वरुप सब कुछ आप ही हैं। भगवन्! वेद, शास्त्र और गुरु भी आपके तत्त्वका भली-भाँति उपदेश नहीं कर सके हैं। निश्चय ही आपतक बुद्धि आदिकी भी पहुँच नहीं है। आप अजन्मा, अप्रमेय और शिव-शब्दसे वाच्य हैं, आप ही सत्य हैं। आपको नमस्कार है। किसी समय भगवान् शिवने अपनी प्रकृतिको इस भाव से देखा कि यह मेरी सम्पत्ति है; उसी समय वे एकसे अनेक हो गये, विश्वरूप में प्रकट हो गये। वास्तव में उनका प्रभाव अतर्क्य और अचिन्त्य है। भगवान् शिवकी प्रिया शिवा देवी भी नित्य हैं। भव (भगवान् शंकर)- में उनका भाव (हार्दिक अनुराग) पूर्णरूपसे बढ़ा हुआ है; वे इस भव (संसार)-की उत्पत्तिमें स्वयं कारण हैं तथा सर्वकारण महेश्वरके आश्रित हैं। शिवा समस्त शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न अट्टहा विश्वविधाता शिवकी विलक्षण शक्ति हैं। संसारकी उत्पत्ति, स्थिति, अन्नकी वृद्धि तथा लय- ये सनातन भाव जहाँ होते रहते हैं, वह एकमात्र पार्वतीदेवीका ही स्वरुप है। वे भगवान् शंकर की प्राणवल्ल्भा हैं। उनके लिए कुछ भी असाध्य नहीं है। समस्त जीव जिनके लिए अन्नदान देते और तपस्या करते हैं, वे जगज्जननी माता पार्वती ही हैं। उनकी उत्तम कीर्ति बहुत बड़ी है। वे शिवकी प्रियतमा हैं। इन्द्र भी जिनकी कृपादृष्टि चाहते हैं, जिनका नाम लेनेसे मङ्गल प्राप्ति होती है, जो सम्पूर्ण विश्वमें व्याप्त हो इसे निर्मल बनती हैं, वे भगवती उमा ही हैं। उनका रूप सदा चन्द्रमाके समान ही मनोरम है। जिनके प्रसादसे ब्रह्मा आदि चराचर जीवोंकी बुद्धि, नेत्र, चेतना और मन में सदा सुखकी प्राप्ति होती है, वे जगदुरु शिवकी सुन्दरी शक्ति शिव वाणीकी अधीश्वरी हैं। आज ब्रह्माजीका भी मन मलिन हो रहा है, फिर अन्य जीवों की तो बात ही क्या- यह सोचकर जगन्माता उमाने अनेक उपायोंसे सम्पूर्ण जगत्को पवित्र करनेके लिए गङ्गाका अवतार धारण किया है। श्रुतियोंको देखकर तथा सब प्रमाणोंसे भगवान् शंकर की प्रभुतापर विश्वास करके लोग जो धर्मोंका अनुष्ठान करते और उनके फलस्वरूप जो उत्तम भोग भोगते हैं, यह भगवान् सदाशिवकी ही विभूति है। वैदिक अथवा लौकिक कार्य, क्रिया, कारक और साधनोंका जो सबसे उत्तम एवं प्रिय साध्य है, वह अनादि कर्त्ता शिवकी प्राप्ति ही है। जो सर्वश्रेष्ठ ब्रह्म, परप्रधान, सारभूत और उपासनाके योग्य है, जिसका ध्यान तथा जिसकी प्राप्ति करके श्रेष्ठ योगी पुरुष मुक्त हो जाते- पुन: संसार में जन्म नहीं लेते, वे भगवान् उमापति हो मोक्ष हैं। माता पार्वती! भगवान् शंकर जगत् का कल्याण करनेके लिए जैसे-जैसे अपार मायामय रूप धारण करते हैं, वैसे-ही-वैसे तुम भी उनके योग्य रूप धारण करती हो। इस प्रकार तुममें पातिव्रत्य जाग्रत् रहता है।
गौतमजी के इस प्रकार स्तुति करनेपर वृषभाङ्कित ध्वजावाले साक्षात् भगवान् शिव उनके सामने प्रकट हुए और प्रसन्न होकर बोले- 'गौतम! तुम्हारी भक्ति, स्तुति तथा उत्तम व्रतसे में बहुत संतुष्ट हूँ। माँगो, तुम्हें क्या दूँ? जो वस्तु देवताओंके लिए भी दुर्लभ हो, वह भी तुम माँग सकते हो।'
गौतम ने कहा - जगदीश्वर! समस्त लोकोंको पवित्र करनेवाली इन पावन देवीको, जो आपकी जटा में स्थित और आपको परम प्रिय हैं, ब्रह्मगिरिपर छोड़ दीजिये। ये समुद्रमें मिलनेतक सबके लिए तीर्थरूप होकर रहें। इसमें स्नान करनेमात्रसे मन, वाणी और शरीरद्वारा किये हुए ब्रह्महत्या आदि समस्त पाप नष्ट हो जाएँ। चन्द्रग्रहण, सूर्यग्रहण, अयनारम्भ, विषुवयोग, संक्रान्ति अट्टहा वैधृतियोग आने पर अन्य पुण्यतीर्थोंमें स्नान करने से जो फल मिलता हिया, वह इनके स्मरणमात्रसे ही प्राप्त हो जाय। ये समुद्र में पहुँचनेतक जहाँ-जहाँ जाएँ, वहाँ-वहाँ आप अवश्य रहें। यह श्रेष्ठ वर मुझे प्राप्त हो तथा इनके तटसे एक योजनसे लेकर दस योजनतक की दूरीके भीतर आये हुए महापातकी मनुष्य भी यदि स्नान किये बिना ही मृत्युको प्राप्त हो जाएँ तो वे भी मुक्तिके भागी हों।
ब्रह्माजी कहते हैं - गौतमी की यह बात सुनकर भगवान् शंकर बोले- 'इससे बढ़कर दूसरा कोई तीर्थ न तो हुआ है न होगा; यह बात सत्य है, सत्य है और वेदमें भी निश्चित की गयी है कि गौतमी गङ्गा (गोदावरी) सब तीर्थोंसे अधिक पवित्र हैं। यों कहकर वे अन्तर्धान हो गये। लोकपूजित भगवान् शिव के चले जानेपर गौतमने उनकी आज्ञासे जटासहित सरिताओंमें श्रेष्ठ गङ्गा को साथ ले देवताओंसे घिरकर ब्रह्मगिरिमें प्रवेश किया। उस समय महाभाग महर्षि, ब्राह्मण तथा क्षत्रिय भी आनन्दमग्न होकर जय-जयकार करते हुए ब्रह्मर्षि गौतमकी प्रशंसा करने लगे।
पवित्र एवं संयत चित्तवाले गौतमने जटाको ब्रह्मगिरिके शिखरपर रखा और भगवान् शङ्खरका स्मरण करते हुए गङ्गाजीसे हाथ जोड़कर कहा- 'तीन नेत्रोंवाले भगवान् शिवकी जटासे प्रकट हुई माता गङ्गा! तुम सब अभीष्टोंको देनेवाली और शान्त हो। मेरा अपराध क्षमा क्रो और सुखपूर्वक यहाँसे प्रवाहित होकर जगत्का कल्याण करो। देवि! मैंने तीनों लोकों का उपहार करनेके लिये तुम्हारी याचना की है और भगवान् शंकरने भी इसी उद्देश्यकी सिद्धिके लिए तुम्हें दिया है। अत: हमारा यह मनोरथ असफल नहीं होना चाहिये।'
गौतमका यह वचन सुनकर भगवती गङ्गाने उसे स्वीकार किया और अपने-आपको तीन स्वरूपोंमें विभक्त करके स्वर्गलोक, मर्त्यलोक एवं रसातल में फ़ैल गयीं। स्वर्गलोक में उनके चार रूप हुए, मर्त्यलोकमें वे साथ धाराओंमें बहने लगीं तथारसातलमें भी उनकी चार धाराएँ हुईं। इस प्रकार एक ही गङ्गा देवी सर्वत्र हैं, सर्वभूतस्वरूपा हैं, सब पापोंका नाश करनेवाली तथा सम्पूर्ण अभीष्ट वस्तुओंको देनेवाली हैं। वेदमें सदा उन्हींके यशका गान किया जाता है। जिनकी बुद्धि अज्ञानसे मोहित है, वे मर्त्यलोक निवासी समझते हैं कि गङ्गा केवल मर्त्यलोकमें ही हैं, पाताल अथवा स्वर्गमें नहीं हैं। भगवती गङ्गा जहाँतक पहुँचकर सागर में मिली हैं, वहाँ तक वे देवमयी मानी गयी हैं। महर्षि गौतमके छोड़नेपर वे पूर्वसमुद्र की ओर चली गयीं। उस समय देवर्षियोंद्वारा सेवित कल्याणमयी जगन्माता गङ्गाकी मुनिश्रेष्ठ गौतमने परिक्रमा की। इसके बाद उन्होंने देवेश्वर भगवान् त्र्यम्बका पूजन किया। उनके स्मरण करते ही करुणासिन्धु भगवान् शिव वहाँ प्रकट हो गये। पूजा करके महर्षि गौतामने कहा- 'देवदेव महेश्वर! आप सम्पूर्ण लोकों के हित के लिये मुझे इस तीर्थ में स्नान करनेकी विधि बताइये।'
भगवान् शिव बोले - महर्षे! गोदावरीमें स्नान करनेकी सम्पूर्ण विधि सुनो। पहले नान्दीमुख श्राद्ध करके शरीरकी शुद्धि करे, फिर ब्राह्मणोंको भोजन कराये और उनसे स्नान करनेकी आज्ञा ले। तदनन्तर ब्रह्मचर्यका पालन करते हुए गोदावरी नदी में स्नान करनेके लिये जाय। उस समय पतित मनुष्यों के साथ वार्तालाप न करे। जिसके हाथ, पैर और मन भली-भाँति संयम में रहते हैं, वही तीर्थका पूरा फल पाता है। भावदोष (दुर्भावना)- का परित्याग करके अपने धर्म में स्थिर रहे और थके-माँदे, पीड़ित मनुष्योंकी सेवा करते हुए उन्हें यथायोग्य अन्न दे। जिनके पास कुछ नहीं है, ऐसे साधुओंको वस्त्र और कम्बल दे। भगवान् विष्णुकी तथा गङ्गाजी के प्रकट होनेकी दिव्य कथा सुने। इस विधिसे यात्रा करनेवाला मनुष्य तीर्थके उत्तम फलका भागी होता है।
गौतम! गोदावरी नदीमें दो-दो हाथ भूमिपर तीर्थ होंगे। उनमें में स्वयं सर्वत्र रहकर सबकी समस्त कामनाओं को पूर्ण करता रहूँगा। सरिताओंमें श्रेष्ठ नर्मदा अमरकण्टकपर्वतपर अधिक उत्तम मानी गयी हैं। यमुना का विशेष महत्त्त्व उस स्थानपर है, जहाँ वे गङ्गा से मिली हैं। सरस्वती नदी प्रभासतीर्थ में श्रेष्ठ बताई गयी हैं। तृष्णा, भीमरथी और तुङ्गभद्रा- इन तीन नदियों का जहाँ समागम हुआ है, वह तीर्थ मनुष्यों को मुक्ति देनेवाला है। इसी प्रकार पयोष्णी नदी भी जहाँ तपती (ताप्ती)- में मिली हैं, वह तीर्थ मोक्षदायक है; परंतु ये गौतमी गङ्गा मेरी आज्ञासे सर्वत्र सर्वदा और सब मनुष्यों को स्नान करनेपर मोक्ष प्रदान करेंगी। कोई-कोई तीर्थ किसी विशेष समयमें देवताका शुभागमन होनेपर अधिक पुण्यमय माना जाता है, किंतु गोदावरी नदी सदा ही सबके लिए तीर्थ है। मुनिश्रेष्ठ! दो सौ योजन के भीतर गोदावरी नदीमें साढ़े तीन करोड़ तीर्थ होंगे। ये गङ्गा निम्नाङ्कित नामोंसे प्रसिद्ध होंगी- माहेश्वरी, गङ्गा, गौतमी, वैष्णवी, गोदावरी, नन्दा, सुनन्दा, कामदायिनी, ब्रह्मतेज:समानीता तथा सर्वपापप्रणाशिनी। गोदावरी मुझे सदा ही प्रिय हैं। ये स्मरणमात्रसे पाप-राशिका विनाश करनेवाली हैं। पाँचों भूतोंमें जल श्रेष्ठ है! जलमें भी जो तीर्थका जल है, वह सर्वश्रेष्ठ माना गया है। तीर्थ-जलमें भी भागीरथी गङ्गा श्रेष्ठ हैं और उनसे भी गौतमी गङ्गा उत्कृष्ट मानी गयी हैं; क्योंकि वे भगवान् शंकरकी जटाके साथ लायी गयी थीं। अत: इनसे बढ़कर कल्याणकारी तीर्थ दूसरा कोई नहीं है। मुने! स्वर्ग, पृथ्वी और पातालमें भी गङ्गा सब मनोरथोंको पूर्ण करनेवाली हैं।
ब्रह्माजी कहते हैं - नारद! इस प्रकार साक्षात् भगवान् शंकरने संतुष्ट होकर महात्मा गौतमको गोदावरीका जो माहात्म्य बतलाया था। वही मैंने तुमको सुनाया है।
Summary of chapter 36 of the [[BOOK_TITLE]] is as follows:
After their sacred marriage, Śiva and Umā take leave of Himavat and Menā and depart for their abode on Kailāsa. The parting of Umā from her parents is described with tender emotion; Menā's grief at her daughter's departure is movingly depicted. The chapter celebrates the establishment of Śiva and Pārvatī as the cosmic couple ruling from Kailāsa.