ब्रह्म पुराण

40 - दशाश्वमेधिक और पैशाचतीर्थका माहात्म्य

ब्रह्माजी कहते हैं - गोदावरी गङ्गामें कार्तिकेजी का भी एक तीर्थ है, जो बहुत उत्तम है। वह कौमार-तीर्थके नामसे भी प्रसिद्ध है। उसका नाम सुननेमात्रसे मनुष्य कुलीन और रूपवान् होता है। उसके आगे कृत्तिकातीर्थ है, जिसके श्रवणमात्रसे सोमपानका फल मिलता है। महामुने! अब दशाश्वमेधिक तिर्थ्का माहात्म्य सुनो। उसके श्रवणमात्र से अश्वमेध-यज्ञ के फलकी प्राप्ति होती है। विश्वकर्माके पुत्र महाबली विश्वरूप हुए। विश्वरूप के प्रथम नामक पुत्र हुआ। उसके पुत्रका नाम भौवन हुआ। महाबाहु भौवन सार्वभौम राजा हुए। उनके पुरोहित कश्यप थे, जो सब प्रकारके ज्ञान में निपूर्ण थे। एक दिन महाबाहु भौवन अपने पुरोहित से पूछा- 'मुने! मैं एक ही साथ दस अश्वमेध-यज्ञ करना चाहता हूँ। वह यज्ञ कहाँ करूँ?' कश्यप ने प्रयागका नाम लिया और उन-उन स्थानों पर यज्ञ करनेको बताया, जहाँ श्रेष्ठ द्विजोंने पूर्वकाल में बड़े-बड़े यज्ञोंका अनुष्ठान किया था। राजाके यज्ञ में बहुत-से ऋषि ऋत्विज हुए। पुरोहितने एक ही साथ दस अश्वमेध-यज्ञ आरम्भ किये, किन्तु उनमें से एक भी पूर्ण न हुआ। यह देखकर राजा को बड़ी चिन्ता हुई। उन्होंने प्रयाग छोड़कर अन्य स्थानोंमें उन यज्ञोंका आरम्भ किया, किन्तु वहाँ भी विघ्न-दोष आ पहुँचे। इस प्रकार अपने यज्ञोंको अपूर्ण डेक राजा ने पुरोहित से कहा- 'देश और काल के दोषसे अथवा मेरे और आपके दोषसे हमारे दस अश्वमेध-यज्ञ पूर्ण नहीं हो पाते।' यों कहकर दु:खी हुए राजा भौवन अपने पुरोहित कश्यपके साथ बृहस्पतिजीके ज्येष्ठ भ्राता संवर्तके पास गये और इस प्रकार बोले- 'भगवन्! मुझे ऐसा कोई उत्तम प्रदेश बतलाइये, जहाँ एक ही साथ आरम्भ किये हुए दस अश्वमेध-यज्ञ पूर्ण हो जाएँ।' तब मुनिश्रेष्ठ संवर्तने कुछ कालतक ध्यान करके महाराज भौवनसे कहा- 'ब्रह्माजीके पास जाओ। वे ही उत्तम प्रदेश बतायेंगे।'

महाबुद्धिमान् भौवन महात्मा कश्यपको साथ ले मेरे पास आ पहुँचे और मुझसे भी उत्तम देशआदि के विषय में प्रश्न करने लगे। उस समय मैंने भौवन और कश्यपसे कहा- 'राजेन्द्र! तुम गोदावरीके तटपर जाओ। वही यज्ञ के लिए पुण्यवान् प्रदेश है। वेदों के पारगामी विद्वान् ये महर्षि कश्यप ही श्रेष्ठ गुरु हैं। इनकी कृपा और गौतमी गङ्गाके प्रसाद एक ही अश्वमेधसे अथवा वहाँ स्नान करनेमात्रसे तुम्हारे दस अश्वमेध-यज्ञ सिद्ध हो जाएँगे।' यह सुनकर राजा भौवन कश्यप जी के साथ गौतमीके तटपर आये और वहाँ अश्वमेध-यज्ञकी दीक्षा ग्रहण की। वह महायज्ञ आरम्भ होकर जब पूर्ण हो गया, तब राजा इस पृथ्वीका दान करनेको उद्यत हुए। उसी समय आकाशवाणी हुई- 'राजन्! तुमने पुरोहित कश्यपजीको पर्वत, वन और काननोंसहित पृथ्वी देनेकी कामना करके सब कुछ दान कर दिया। अब भूमिदान की अभिलाषा छोड़कर अन्नदान करो। वह महान् फल देनेवाला है। तीनों लोकों में अन्नदान के समान दूसरा पुण्यकार्य नहीं है। विशेषत: गङ्गाजी के तटपर श्रद्धाके साथ किये हुए अन्नदान की महिमा अकथनीय है।*

तुमने जो प्रचुर दक्षिणासे युक्त यह अश्वमेध-यज्ञ किया है, इससे तुम कृतार्थ हो गये। अब इस विषय में तुम्हें अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये। तिल, गौ, धन, धान्य- जो कुछ भी गोदावरीके तटपर दिया जाता है, वह सब अक्षय हो जाता है। यह सुनकर सम्राट् भौवनने ब्राह्मणोंको बहुत-सा अन्नदान किया। तबसे वह तीर्थ दशाश्वमेधिक के नामसे विख्यात हुआ। वहाँ स्नान करनेसे दस अश्वमेध-यज्ञोंका फल प्राप्त होता है।

उससे आगे पैशाचतीर्थ है, जो ब्रह्मावादी महर्षियों द्वारा सम्मानित है। यह गोदावरी के दक्षिण-तटपर स्थित है। अब मैं उसका स्वरुप बतलाता हूँ, सुनो। मुनिश्रेष्ठ नारद! ब्रह्मगिरिके पार्श्वभाग में अञ्जन नाम से प्रसिद्ध एक पर्वत है। वहाँ एक सुन्दरी अप्सरा शापभ्रष्ट होकर उत्पन्न हुई। उसका नाम अञ्जना था। उसके सब अङ्ग बहुत सुंदर थे, किंतु मुँह वानरीका था। केसर नामक श्रेष्ठ वानर अञ्जना के पति थे। केसरीके एक दूसरी भी स्त्री थी, जिसका नाम अद्रिका था। वह भी शापभ्रष्ट अप्सरा ही थी। उसके भी सब अङ्ग सुन्दर थे। किन्तु मुँह बिल्लीके समान था। अद्रिका भी अञ्जन पर्वतपर ही रहती थी। एक समय केसरी दक्षिणसमुद्रके तटपर गये थे। इसी बीच में महर्षि अगस्त्य अञ्जन पर्वत पर आये। अञ्जना और अद्रिका दोनों ने महर्षिका यथोचित पूजन किया। इसे प्रसन्न होकर महर्षिने कहा- 'तुम दोनों वार माँगो।' वे बोलीं- 'मुनीश्वर! हमें ऐसे पुत्र दीजिये, जो सबसे बलवान्, श्रेष्ठ और सब लोगोंका उपकार करनेवाले हों।' 'तथास्तु' कहकर मुनिश्रेष्ठ अगस्त्य दक्षिण दिशा में चले गये। कुछ काल के बाद अञ्जनाने वायु के अंशसे हनुमान्जी को जन्म दिया और अद्रिकाके गर्भ से निर्ऋतिके अंशसे पिशाचोंका राजा अद्रि उत्पन्न हुआ। इसके बाद उन दोनों स्त्रियोंने उक्त देवताओंसे कहा- 'हमें मुनिके वरदानसे पुत्र तो प्राप्त हुए, किन्तु इन्द्रके शाप से हमारा मुख कुरूप होने के कारण सारा शरीर ही विकृत हो गया है। इसे दूर करनेके लिए हम क्या उपाय करें- इसे आप दोनों बतायें।' तब भगवान् वायु और निर्ऋतिने कहा- 'गोदावरीमें स्नान और दान करनेसे तुम्हें शाप से छुटकारा मिल जाएगा।' यों कहकर वे दोनों वहीँ अन्तर्धान हो गये। तब पिशाचरूपधारी अद्रिने अपने भाई हनुमान् जी को प्रसन्न करनेके लिये माता अञ्जनाको लाकर गोदावरीमें नहलाया। इसी प्रकार हनुमान् जी भी अद्रिकाको लेकर बड़ी उतावलीके साथ गौतमी गङ्गाके तटपर आये। तबसे वह पैशाच और आञ्जनतीर्थ के नाम से विख्यात हुआ। वह समस्त अभीष्ट वस्तुओं को देनेवाला शुभ तीर्थ है। ब्रह्मगिरिसे तिरपन योजन पूर्वकी ओर मार्जार-तीर्थ है। मार्जार-तीर्थसे आगे हनुमत्-तीर्थ और वृषाकपि-तीर्थ है। उसके आगे फेना-संगमतीर्थ बताया गया है, जो समस्त कामनाओंको पूर्ण करनेवाला है। उसका स्वरुप और फल उसी के प्रसङ्गमें बताया जाएगा।

* भूमिदानस्पृहां त्यक्त्वा अन्नं देहि महाफलम्। नान्नदानसमं पुण्यं त्रिषु लोकेषु विद्यते ॥

विशेषतस्तु गङ्गाया श्रद्धया पुलिने मुने।

(८३ । २१-२२)