व्यासजी कहते हैं - मुनिवरो! पुरुषोत्तमक्षेत्र सम्पूर्ण जीवों के लिये सुखदायी है। वह धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष- चारों पुरुषार्थोंका फल देनेवाला है। उस तीर्थमें कण्डु नाम के एक महातेजस्वी मुनि रहा करते थे, जो परम धार्मिक, सत्यवादी, पवित्र, जितेन्द्रिय और समस्त प्राणियों के हित में तत्पर रहनेवाले थे। उन्होंने इन्द्रियोंको जीतकर क्रोधपर अधिकार प्राप्त कर लिया था। वे वेद-वेदाङ्गों के पारंगत विद्वान थे और भगवान् पुरुषोत्तमकी आराधना करके उत्तम सिद्धि प्राप्त कर चुके थे। उनके सिवा और भी बहुत-से मुनि वहाँ उत्तम व्रतका पालन करते हुए सिद्ध हो चुके हैं।
मुनियों ने पूछा - साधुशिरोमणे! कण्डु कौन थे और उन्होंने किस प्रकार वहाँ परमगति प्राप्त की? हम उनका चरित्र सुनना चाहते हैं, बताइये।
व्यासजी बोले - मुनीश्वरो! कण्डुमुनिकी कथा वादी मनोहर है। मैं संक्षेप से ही कहूँगा, सुनो। गोतमी नदीके परम मनोरम एकान्त तटपर, जहाँ कांड, मूल, फल, समिधा, पुष्प और कुश आदिकी अधिकता थी, कण्डुमुनिका आश्रम था। वहाँ सभी ऋतुओंके फल और फूल सुलभ थे। केलोंका उद्यान उस आश्रम की शोभा बढ़ा रहा था। वहाँ कण्डुमुनिने व्रत, उपवास, नियम, स्नान, मौन और संयम आदि के द्वारा बड़ी भारी एवं अत्यन्त अद्भुत तपस्या की। वे ग्रीष्म-ऋतु में पञ्चाग्निका ताप सहते, वर्षा में खुली वेदीपर सोते और हेमन्त-ऋतु में भीगे वस्त्र धारण करके कठोर तपस्या करते थे। मुनि की तपस्याका बढ़ता हुआ प्रभाव देख देवता, गन्धर्व, सिद्ध और विद्याधरों को बड़ा विस्मय हुआ। वे कहने लगे- 'इनका महान् धैर्य अद्भुत है। इनकी कठोर तपस्या नितान्त आश्चर्यजनक है।' उन्हें तपस्या में स्थित देख इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवता उनके भयसे व्याकुल हो आपस में परामर्श करने लगे। वे उनकी तपस्या में विघ्न डालना चाहते थे। त्रिभुवन स्वामी इन्द्र देवताओंका अभिप्राय जानकर एक सुन्दरी अप्सरासे बोले- 'प्रम्लोचे! तुम शीघ्र कण्डुमुनिके आश्रम पर जाओ। मुनि वहाँ तपस्या करते हैं। उनकी तपस्या में विघ्न डालने के लिये ही तुम्हें भेजा जाता है। सुन्दरी! तुम शीघ्र ही उनके चित्तमेंक्षोभ उत्पन्न कर दो।'
प्रम्लोचा बोली - सुरश्रेष्ठ! मैं सदा आपकी आज्ञा का पालन करती हूँ। किन्तु इस कार्य में तो मेरे जीवन का ही संदेह है। मैं मुनिवर कण्डुसे बहुत डरती हूँ। वे ब्रह्मचर्यव्रतके पालन में स्थित हैं। अत्यन्त उग्र हैं। उनकी तपस्या बहत तीव्र है। वे अग्नि और सूर्य के समान तेजस्वी हैं। मुझे अपनी तपस्या में विघ्न डालने आयी हुई जानकर परम तेजस्वी कण्डुमुनि कुपित हो उठेंगे और दु:सह शाप दे देंगे।
यह सुनकर इन्द्रने कहा - 'सुन्दरी! मैं कामदेव, ऋतुराज वसन्त और दक्षिण समीरको तुम्हारी सहायता में देता हूँ। इन सबके साथ उस स्थानपर जाओ, जहाँ वे महामुनि रहते हैं।' इन्द्रका यह कथन सुनकर मनोहर नेत्रोंवाली प्रम्लोचा कामदेव आदिके साथ आकाशमार्गसे कण्डुमुनि के आश्रमपर गयी। वहाँ पहुँचकर उसने एक बहुत सुन्दर वन देखा। तीव्र तपस्या में लगे हुए पापरहित मुनिवर कण्डु भी आश्रमपर ही दिखायी दिये। प्रम्लोचा और कामदेव आदि ने देखा- वह वन नन्दनवन के समान रमणीय था। सभी ऋतुओं में विकसित होनेवाले सुंदर पुष्प उसकी शोभा बढ़ा रहे थे। नाना प्रकार के पक्षी वृक्षों पर बैठकर अपने श्रवणसुखद कलरवों से उस वनको मुखरित कर रहे थे। अप्सरा ने क्रमशः सम्पूर्ण वन का निरीक्षण किया। उस परम अद्भुत मनोहर काननकी शोभा देख उसके नेत्र आश्चर्य-चकित हो उठे। उसने वायु, कामदेव और वसन्त से कहा- 'अब आप लोग पृथक्-पृथक् मेरी सहायता करें।' उन्होंने 'बहुत अच्छा' कहकर स्वीकृति दे दी। तब प्रम्लोचा बोली 'अब मैं मुनि के पास जाऊँगी। जो इन्द्रियरुपी आश्वोंसे जुटे हुए देहरूपी रथ के सारथि बने हुए हैं, उन्हें आज कामबाण से आहत करके ऐसी दशा को पहुँचा दूँगी कि मनरूपी बागडोर उनके काबू से बाहर हो जाएगी। इस प्रकार उन्हें मैं अयोग्य सारथि सिद्ध कर दिखाऊँगी।' यों कहकर वह उस स्थान की ओर चल दी, जहाँ मुनि निवास करते थे। मुनि की तपस्या के प्रभाव से वहाँ के हिंसक जीव भी शान्त हो गये थे। नदी के तटपर, जहाँ कोयलकी मीठी तान सुनायी देती थी, वह ठहर गयी। थोड़ी देर तक तो वह खड़ी रही, फिर उसने संगीत छेड़ दिया। इसी समय वसन्त ने भी अपना पराक्रम दिखाया। समय नहीं होनेपर भी समस्त कानन में मधु-ऋतु की मनोहर शोभा छा गयी। कोकिलकी काकली से माधुर्यकी वर्षा होने लगी। मलयवायु मनिहार सुगन्ध लिये मन्द-मन्द गति से बहने लगी और छोटे-बड़े सभी वृक्षों के पवित्र पुष्प धीरे-धीरे भूतलपर गिरने लगे। कामने अपने फूलोंका बाण सँभाला और मुनि के समीप जाकर उनके मन को विचलित कर दिया। संगीतकी मधुर ध्वनि सुनकर मुनिके मनमें बड़ा आश्चर्य हुआ। वे कामबाण से अत्यन्त पीड़ित हो जहाँ सुन्दरी अप्सरा गीत गा रही थी, गये। मुनि ने अप्सरा को देखा और अप्सरा ने भी मुनि पर दृष्टिपात किया। उनके नेत्र आश्चर्य से खिल गये। चादर खिसककर गिर पड़ी। मुनिके मन में विकलता छा गयी। उनके शरीरमें रोमाञ्च हो आया। वे पूछने लगे- 'सुन्दरी! तुम कौन हो? किसकी हो? तुम्हारी ,मुसकान बड़ी मनोहर है। सुभ्रू! तुम मेरे मनको मोहे लेती हो। सुमध्यमे! अपना सच्चा परिचय दो।'
प्रम्लोचा बोली - मुने! मैं आपकी सेविका हूँ और फूल लेने के लिए यह आयी हूँ। शीघ्र आज्ञा दीजिए।मैं आपकी क्या सेवा करूँ?
अप्सरा की यह बात सुनकर मुनिका धैर्य छूट गया। उन्होंने मोहित होकर उसका हाथ पकड़ लिया और उसे साथ लेकर अपने आश्रम में प्रवेश किया। यह देख कामदेव, वायु और वसन्त कृत कृत्य हो जैसे आये थे, उसी प्रकार स्वर्ग को लौट गये। वहाँ पहुँचकर उन्होंने इन्द्र से प्रम्लोचा और मुनि की सारी चेष्टा कह सुनायी। सुनकर इन्द्र और सम्पूर्ण देवताओं का चित्त प्रसन्न हो गया। कण्डु ने अप्सरा के साथ आश्रम में प्रवेश करते ही अपना रूप कामदेव के समान मनोहर एवं तरुण बना लिया। दिव्य वस्त्र और आभूषण धारण कर लिए। देखने में उनकी अवस्था सोलह वर्षों की जान पड़ती थी। मुनि की वह शक्ति देखकर प्रम्लोचा को बड़ा आश्चर्य हुआ। 'अहो, इनकी तप:शक्ति अद्भुत है!' यों कहकर वह बहुत प्रसन्न हुई। कण्डुमुनि स्नान, संध्या, जप, होम, स्वाध्याय, देवपूजन, व्रत, उपवास, नियम और ध्यान- सब छोड़कर रात-दिन उसी के साथ विहार करने लगे। इसी में वे आनन्द मानते थे। उनका हृदय कामदेव के वशीभूत हो गया था। अत: वे अपनी तपस्या की हानी नहीं समझ पाते थे। इसी प्रकार कण्डुमुनि उसके साथ सांसारिक विषयभोग में आसक्त हो सौसे कुछ अधिक वर्षो तक मन्दराचल की गुफ़ा में पड़े रहे। एक दिन प्रम्लोचन महाभाग कण्डुमुनि से कहा- 'ब्राह्मन! अब मैं स्वर्ग में जाना चाहती हूँ। आप प्रसन्न होकर मुझे जाने की आज्ञा दें। मुनि का मन तो उसी में आसक्त हो रहा था। उसके इस प्रकार पूछने पर वे बोले- 'कल्याणी! कुछ दिन और ठहरो।' तब उसने पुन: सौ वर्षों से कुछ अधिक कालतक उन कण्डुमुनि के साथ विषय भोगा। तदनन्तर उसने पुन: जाने की आज्ञा माँगी, किन्तु मुनि ने स्वीकार नहीं किया। अत: उसे लगभग दो सौ वर्षों तक और ठहरना पड़ा। वह जब-जब उनसे देवलोक में जाने की आज्ञा माँगती, तब-तब वे उसे यही उत्तर देते- कुछ दिन और ठहरो। प्रम्लोचा एक तो मुनि के शाप से डरती थी। दूसरे उसमें दक्षिण नायिका की स्वाभाविक उदारता थी और तीसरे वह प्रणयभङ्ग पीड़ा को जनती थी। इसलिये मुनिको छोड़ न सकी। महर्षि कामभोग में आसक्त हो दिन-रात उसके साथ रमण करते रहे। किन्तु तृप्ति न हुई। उसके प्रति नित्य नूतन प्रेम बढ़ता गया।
एक दिन कण्डुमुनि बड़ी उतावली के साथ आश्रम से बाहर जाने लगे। अप्सरा ने पूछा- 'कहाँ चले?' मुनि ने उत्तर दिया- 'शुभे! दिन बीत चला है। संध्योपासन कर लूँ, नहीं तो कर्म का लोप हो जाएगा।' प्रम्लोचाको बड़ी प्रसन्नता हुई। उसने हँसकर पूछा- 'सब धर्मों के ज्ञाता महात्माजी! क्या आज ही आपका दिन बीता है? आपकी यह बात सुनकर किसको आश्चर्य न होगा।'
मुनि बोले - कल्याणी! अभी प्रात:काल ही तो तुम इस नदीके सुन्दर तटपर आयी हो। उसी समय मैंने तुम्हें देखा, परिचय पूछा और तुम मेरे साथअ आश्रम में आयी। अब वा दिन बीता है और यह संध्या का समय उपस्थित हुआ है। फिर यह परिहास किसलिए? सच्ची बात बताओ।
प्रम्लोचाने कहा - ब्रह्मन्! यह ठीक है कि मैं प्रात: काल में ही आयी थी: इसमें तनिक भी मिथ्या नहीं है। किन्तु आज तबसे सैकड़ों वर्ष बीत गये।
यह सुनकर मुनि को बड़ा भय हुआ। उन्होंने विशाल नेत्रोंवाली अप्सरा से पूछा- भीरु! बताओ तो सही, तुम्हारे साथ निरंतर रमण करते हुए अब तक मेरा कितना समय बीता है?'
प्रम्लोचा बोली - मुने! मेरे साथ आपके नौ सौ सात वर्ष, छ: महीने और तीन दिन बीते हैं।
ऋषिने कहा - शुभे! क्या यह सत्य कहती हो अथवा परिहासकी बात है? मुझे तो ऐसा जान पड़ता है कि तुम्हारे साथ एक ही दिन रहा हूँ।
प्रम्लोचा बोली - ब्रह्मन! आपके समीप मैं झूठ कैसे बोलूँगी। विशेषत: ऐसे अवसरपर, जबकि आप धर्म-मार्गका अनुसरण करते हुए पूछ रहे हैं।
अप्सराकी बात सुनकर मुनिको बड़ा कष्ट हुआ। वे स्वयं ही अपनी निन्दा करते हुए बोले- 'हाय, मुझ दुराचारी को धिक्कार है। हाय, मेरी तपस्या नष्ट हो गयी। ब्रह्मवेत्ताओंका जो धन है, वह चला गया और मेरा विवेक भी छिन गया। जान पड़ता है, मनुष्योंको मोह में डालने के लिए ही किसी ने युवती नारिकी सृष्टि की है। मुझे तो अपने मन को जीतकर क्षुधा-पिपासा, राग-द्वेष और जरा-मृत्यु-इन छहों ऊर्मियोंसे अतीत परब्रह्मका ज्ञान प्राप्त करना चाहिये। इसके विपरीत जिसने मेरी ऐसी दुर्गति की है, उस कामरूपी महान् ग्रहको धिक्कार है। यह काम नरकग्राम में ले जानेवाला मार्ग है। इसने आज मेरे सम्पूर्ण वेदों के स्वाध्याय, व्रत और समस्त साधनों पर पानी फेर दिया।'
इस प्रकार स्वयं ही अपनी निन्दा करके वे धर्म के ज्ञाता मुनि पास ही बैठी हुई उस अप्सरा से बोले- 'पापिनी! तेरी जहाँ इच्छा हो, चलीजा। तुझे जो करना था, उसे तूने पूरा कर लिया। मैं तुझे अपने क्रोधकी प्रचण्ड आग से जो भस्म नहीं करता, इसमें एक कारण है- सत्पुरुषोंकी मैत्री सात पग एक साथ चलनेसे ही हो जाती है। मैं तो तेरे साथ चिरकाल तक निवास कर चुका हूँ। अथवा तेरा क्या दोष है? तेरी क्या हानि करूँ? सारा दोष तो मेरा ही है, क्योंकि मैं ही ऐसा अजितेन्द्रिय निकला! तू तो इन्द्रका प्रिय करनेके लिए आयी थी और मेरी तपस्याका सत्यानाश कर चुकी। अपने कटाक्ष महामोहमय मन्त्र से तूने मुझे घृणित बना दिया। अरि, अब जा! जा! चली जा!!'
इस प्रकार मुनिवर कण्डुने जब क्रोधपूर्वक उसे फटकारा, तब वह काँपती हुई आश्रम से बाहर निकली और आकाशमार्ग से जाने लगी। उसके अङ्ग-अङ्गसे पसीने की बूँदें निकल रही थीं और वह वृक्षों के पल्लवों से उन्हें पोंछती जाति थी। ऋषि ने उसके उदरमें जो गर्भ स्थापित किया था, वह पसीनेके रूप में ही बाहर निकल गया। वृक्षों ने उन स्वेद-बिन्दुओं को ग्रहण किया और वायु ने इन सबको एकत्रित करके एक गर्भ का रूप दिया। फिर चद्रमा ने अपनी अमृतमयी किरणों से उस गर्भ को धीरे-धीरे पुष्ट किया। उससे मारिषा नाम की कन्या उत्पन्न हुई, जो वृक्षों की पुत्री कहलायी। उसके नेत्र बड़े मनोहर थे। वही प्राचेतसोंकी पत्नी और दक्षकी जननी हुई।
इधर महर्षि कण्डु तपस्या क्षीण होनेपर श्रीविष्णु के निवास-स्थान पुरुषोत्तमक्षेत्र हो गये। वहाँ सम्पूर्ण देवताओं से सुशोभित श्रीहरि का दर्शन किया। ब्राह्मण आदि चारों वर्णों और आश्रमों के लोग भगवान् की सेवा में उपस्थित थे। पुरुषोत्तमक्षेत्र और भगवान् पुरुषोत्तम का दर्शन करके मुनिने अपनेको कृतकृत्य माना और वहाँ अपनी दोनों बाँहें ऊपर उठाकर एकाग्रचित्तसे ब्रह्मपारस्तोत्रका जप करते हुए वे भगवान् की आराधना करने लगे।
मुनि बोले - व्यासजी! हम परम कल्याणमय ब्रह्मपारस्तोत्र को श्रवण करना चाहते हैं, जिसका जप करते हुए कण्डुमुनि ने भगवान् विष्णुकी आराधना की थी।
व्यासजी ने कहा - भगवान् विष्णु सबके परम पार (अन्तिम प्राप्य) हैं; वे अपार भवसागरसे पार उतारनेवाले, पर-शब्द-वाच्य, आकाश आदि पञ्च महाभूतोंसे परे और परमात्मस्वरुप हैं। वेदोंकी भी पहुँचसे परे होनेके कारण उन्हें ब्रह्मपार कहते हैं। वे दूसरोंके लिये पारस्वरूप हैं- उन्हें पाकर सब प्राणी सदा के लिये पार हो जाते हैं। वे पर के भी पर- इन्द्रिय, मन आदिके भी अगोचर हैं। सबके पालक और सबकी कामनाओं को पूर्ण करनेवाले हैं। वे कारण में स्थित होते हुए भी स्वयं ही कारणरूप हैं। कारण के भी कारण हैं। परम कारणबहुत प्रकृति के कारण भी वे ही हैं। कार्यों में भी उन्हीं की स्थित है। इस प्रकार कर्म और कर्ता आदि अनेक रूप धारण करके वे सम्पूर्ण विश्वकी रक्षा करते हैं। ब्रह्म ही प्रभु है, ब्रह्म ही सर्वस्वरुप है, ब्रह्म ही प्रजापति तथा अपनी महिमा से कभी च्युत न होनेवाला है। वह ब्रह्म अविनाशी, नित्य और अजन्मा है। वही क्षय आदि सम्पूर्ण विकारों के सम्पर्कसे रहित भगवान् विष्णु है। वे भगवान् पुरुषोत्तम ही अविनाशी, अजन्मा एवं नित्य ब्रह्म हैं। उनके प्रभाव से मेरे राग आदि समस्त दोष नष्ट हो जाएँ।
मुनिके उस ब्रह्मपारस्तोत्रका जप सुनकर और उनकी सुदृढ़ पराभक्ति को जानकार भक्तवत्सल भगवान् पुरुषोत्तम बड़े प्रसन्न हुए और उनके पास जाकर बोले- 'मुने! तुम्हारे मन में जो अभिलाषा हो, उसे कहो। मैं तुम्हें वर देनेके लिये आया हूँ। सुव्रत! तुम कोई वर माँगो।' देवाधिदेव भगवान् चक्रपाणिके ये वचन सुनकर मुनिने सहसा आँखें खोल दीं और देखा, भगवान् सामने खड़े हैं। उनका श्रीअङ्ग तीसीके फूल की भाँति श्याम है। नेत्र पद्यपत्र के समान विशाल हैं। हाथों में शङ्ख, चक्र और गदा शोभा पाते हैं। माथेपर मुकुट और भुजाओं में भुजबन्ध सुशोभित हैं। चार भुजाएँ हैं। अङ्ग-अङ्ग से उदारता टपकती है। सुन्दर शरीरपर पीताम्बर शोभा दे रहा है। श्रीवत्स-चिह्न से युक्त वक्ष:स्थल वनमाला से विभूषित है। श्रीहरि समस्त शुभ लक्षणों से युक्त दिखायी देते हैं। उनके अङ्गों में सब प्रकार के रत्नमय आभूषण शोभा पाते हैं। श्रीअङ्ग में दिव्य चन्दन लगा है और दिव्य हार उनकी शोभा बढ़ा रहा है।* इस प्रकार भगवान् की झाँकी देखकर कण्डुमुनि के शरीर में रोमाञ्च हो आया। उन्होंने दण्डकी भाँति पृथ्वीपर गिरकर साष्टाङ्ग प्रणाम किया और कहा- 'आज मेरा जन्म सफल हुआ, आज मेरी तपस्या का फल मिल गया।' यों कहकर मुनिने भगवान् की स्तुति आरम्भ की।
कण्डु बोले - नारायण! हरे! श्रीकृष्ण! श्रीवत्साङ्क! जगत्पते! जगद्बीज! जगध्दाम! जगत्साक्षिन्! आपको नमस्कार है। अवयक्त विष्णो! आप ही सबकी उत्पत्ति के कारण हैं। प्रकृति और पुरुष दोनोंसे उत्तम होने के कारण आपको पुरुषोत्तम कहते हैं। कमलनयन गोविन्द! जगन्नाथ! आपको नमस्कार है। आप हिरण्यगर्भ, लक्ष्मीपति, पद्यनाभ और सनातन पुरुष हैं। यह पृथ्वी आपके गर्भ में है। आप ध्रुव और ईश्वर हैं। हृषीकेश! आपको नमस्कार है। आप अनादि, अनन्त और अजेय हैं। विजयी पुरुषोंमें श्रेष्ठ! आपकी जय हो। श्रीकृष्ण! आप अजित और अखण्ड हैं। श्रीनिवास! आपको नमस्कार है। आप ही बादल और धूम- वर्षा और गर्मी करनेवाले हैं। आपका पार पाना कठिन है। आप बड़ी कठिनाई से प्राप्त होते हैं। दु:ख और पीड़ाओं का नाश करनेवाले हरे! जल में शयन करनेवाले नारायण! आपको नमस्कार है। अव्यक्त परमेश्वर! आप सम्पूर्ण भूतों के पालक और ईश्वर हैं। भौतिक तत्वों से आप कभी क्षुब्ध होनेवाले नहीं हैं। सम्पूर्ण प्राणी आप में ही निवास करते हैं। आप सब भूतों के आत्मा हैं। सम्पूर्ण भूत आपके गर्भ में स्थित हैं। आपको नमस्कार है। आप यज्ञ, यज्वा, यज्ञधर, यज्ञधाता और अभय देनेवाले हैं। यज्ञ आपके गर्भ में स्थित है। आपका श्रीअङ्ग सुवर्ण के समान कान्तिमान् है। पृश्र्निगर्भ! आपको नमस्कार है। आप क्षेत्रज्ञ, क्षेत्रपालक, क्षेत्री, क्षेत्रहन्ता, क्षेत्रकर्ता, जितेन्द्रिय, क्षेत्रात्मा, क्षेत्ररहित और क्षेत्रके स्त्रष्टा हैं। आपको नमस्कार है। गुणालय, गुणावास, गुनाश्रय, गुनावह, गुणभोक्ता, गुणाराम और गुणत्यागी- ये सब आपके ही नाम हैं। आपको नमस्कार है। आप ही श्रीविष्णु हैं। आप ही श्रीहरि और चक्री कहलाते हैं। आप ही श्रीविष्णु और आप ही जनार्दन हैं। आप ही वषट्कार कहे गये हैं। भूत, भविष्य और वर्तमान के प्रभु भी आप ही हैं। आप भूतों के उत्पादक और अव्यक्त हैं। सबकी उत्पत्ति के कारण होनेसे आप 'भव' कहलाते हैं। आप सम्पूर्ण प्राणियों के भरण-पोषण करनेवाले हैं। आप ही भूतभावन देवता हैं। आपको अजन्मा और ईश्वर कहते हैं।
आप विश्वकर्मा हैं, श्रीविष्णु हैं, शम्भु हैं और वृषभकी आकृति धारण करनेवाले हैं। आप ही शंकर, आप ही शुक्राचार्य, आप ही सत्य, आप ही तप और आप ही जनलोक हैं। आप विश्वविजेता, कल्याणमय, शरणागतपालक, अविनाशी, शम्भु, स्वयम्भू, ज्येष्ठ और परायण (परम आश्रम) हैं। आदित्य, ओंकार, प्राण, अन्धकारनाशक सूर्य, मेघ, सर्वत्र विख्यात तथा देवताओं के स्वामी ब्रह्मा भी आप ही हैं। ऋक्, यजु: और साम भी आप ही हैं। आप ही सबके आत्मा माने गये हैं। आप ही अग्नि, आप ही वायु, आप ही जल और आप ही पृथ्वी हैं। स्त्रष्टा, भोक्ता, होता, हविष्य, यज्ञ, प्रभु, विभु, श्रेष्ठ, लोकपति और अच्युत भी आप ही हैं। आप सबके द्रष्टा और लक्ष्मीवान् हैं। आप ही सबका दमन करनेवाले और शत्रुओं के नाशक हैं। आप ही दिन और आप ही रात्रि हैं, विद्वान् पुरुष आपको ही वर्ष कहते हैं। आप ही काल हैं। कला, काष्ठा, मुहूर्त्त, क्षण और लव- सब आपके ही स्वरुप हैं। आप ही बालक, आप ही वृद्ध तथा आप ही पुरुष, स्त्री और नपुंसक हैं। आप विश्वकी उत्पत्ति स्थान हैं। आप ही सबके नेत्र हैं। आप ही स्थाणु (स्थिर रहनेवाले) और आप ही शुचिश्रवा (पवित्र यशवाले) हैं। आप सनातन पुरुष हैं। आपको कोई जीत नहीं सकता। आप इन्द्र के छोटे भाई उपेन्द्र और सबसे उत्तम हैं। आप सम्पूर्ण विश्वको सुख देनेवाले हैं। वेदों के अङ्ग भी आप ही हैं।आप अविनाशी, वेदों के भी वेद (ज्ञेय तत्व), धाता, विधाता और समाहित रहनेवाले हैं। आप जलराशि समुद्र हैं। आप ही उसके मूल हैं। आप ही धाता और आप ही वसु हैं। आप वैद्य, आप धृतात्मा और आप इन्द्रियातीत हैं। आप सबसे आगे चलनेवाले और गाँव के नेता अहिं। आप ही गरुड़ और आप ही आदिमान् हैं। आप ही संग्रह (लघु) और आप ही परम महान हैं। अपने मन को वश में रखनेवाले और अपनी महिमासे कभी च्युत न होनेवाले भी आप ही हैं। आप यम और नियम हैं। आप प्रांशु (उन्नत शरीरवाले) और चतुर्भुज हैं। अन्न, अन्तरात्मा और परमात्मा भी आप ही कहलाते हैं। आप गुरु और गुरुतम हैं, वाम और दक्षिण हैं। आप ही पीपल एवं अन्य वृक्ष हैं। व्यक्त जगत् और प्रजापति भी आप ही हैं। आपकी नाभि से सुवर्णमय कमल प्रकट हुआ है। आप दिव्य शक्ति से सम्पन्न हैं। आप ही चन्द्रमा और आप ही प्रजापति हैं। आपके स्वरुप का वर्णन नहीं किया जा सकता। आप ही यम और आप ही दैत्यों के नाशक श्रीविष्णु हैं। आप ही संकर्षण देव हैं। आप ही कर्ता और आप ही सनातन पुरुष हैं। आप तीनों गुणों से रहित हैं।
आप ज्येष्ठ, वरिष्ठ और सहिष्णु हैं। लक्ष्मी के पति हैं। आपके सहस्त्रों मस्तक हैं। आप अव्यक्त देवता हैं। आपके सहस्त्रों नेत्र और सहस्त्रों चरण हैं। आप विराट् और देवताओं के स्वामी हैं। देवदेव! तथापि आप दस अंगुलके होकर रहते हैं। जो भूत है, वह आपका ही स्वरुप बताया गया है। आप ही अन्तर्यामी पुरुष, इन्द्र और उत्तम देवता हैं।जो भविष्य है, वह भी आप ही हैं। आप ही ईशान, आप ही अमृत और आप ही मर्त्य हैं। यह सम्पूर्ण संसार आपसे ही अङ्कुरित होता है, अत: आप परम महान् और सबसे उत्तम हैं। देव! आप सबसे ज्येष्ठ हैं, पुरुष हैं और आप ही दस प्राणवायुओं के रूप में स्थित हैं। आप विश्वरूप होकर चार भागों में स्थित हैं। अमृतस्वरुप होकर नौ भागों के साथ द्युलोक में रहते हैं और नौ भागों सहित सनातन पौरुषेय रूप धारण करके अंतरिक्ष में निवास करते हैं। आपके दो भाग पृथ्वी में स्थित हैं और चार भाग भी यहाँ हैं। आपसे यज्ञों की उत्पत्ति होती है, जो जगत् में वृष्टि करनेवाले हैं। आपसे ही विराट् की उत्पत्ति हुई, जो सम्पूर्ण जगत् के हृदय में अन्तर्यामी पुरुषरूप से विराजमान हैं। वह विराट पुरुष अपने तेज, यश और ऐश्वर्य के कारण सम्पूर्ण भूतों से विशिष्ट है। आपसे ही देवताओं का आहार्भूट हवनीय घृत उत्पन्न हुआ। ग्राम्य और जंगली ओषधियाँ तथा पशु एवं मृग आदि भी आपसे ही प्रकट हुए हैं। देवदेव! आप ध्येय और ध्यानसे परे हैं। आपने ही ओषधियों को उत्पन्न किया है। आप ही सात मुखों वाले देदीप्यमान विग्रह से युक्त काल हैं। यह स्थावर और जङ्गम तथा चर और अचर सम्पूर्ण जगत् आपसे ही प्रकट हुआ है और आप में ही स्थित है। आप अनिरुद्ध, वासुदेव, प्रद्युम्न तथा दैत्यनाशक संकर्षण हैं। देव! आप सम्पूर्ण देवताओं में श्रेष्ठ और समस्त विश्व के परम आश्रम हैं। कमलनयन! मेरी रक्षा कीजिए। नारायण! आपको नमस्कार है। भगवन्! विष्णो! आपको नमस्कार है। पुरुषोत्तम! आपको नमस्कार है। सर्वलोकेश्वर! आपको नमस्कार है। कमलालय! आपको नमस्कार है। गुणालय! आपको नमस्कार है। गुणाकर! आपको नमस्कार है। वासुदेव! आपको नमस्कार है। सुरोत्तम! आपको नमस्कार है। जनार्दन! आपको नमस्कार है। सनातन! आपको नमस्कार है।
योगिगम्य परमेश्वर! आपको नमस्कार है। योग के आश्रयस्थान! आपको नमस्कार है। गोपते! श्रीपते! मरुत्पते! श्रीविष्णो! आपको नमस्कार है। जगपत्ये! आप जगत् को उत्पन्न करनेवाले और ज्ञानियों के स्वामी हैं। आपको नमस्कार है। दिवस्पते! आपको नमस्कार है। महीपते! आपको नमस्कार है। पुण्डरीकाक्ष! आप मधु दैत्यका वध करनेवाले हैं। आपको नमस्कार है, नमस्कार है। कैटभ को मरनेवाले नारायण! आपको नमस्कार है। सुब्रह्मण्य! आपको नमस्कार है। पीठपर वेदों को धारण करनेवाले महामत्स्यरूप अच्युत! आपको नमस्कार है। आप समुद्र के जल को मठ डालनेवाले और लक्ष्मीको आनन्द देनेवाले हैं। आपको नमस्कार है। विशाल नासिकावाले अश्वमुख भगवान् हयग्रीव! महापुरुषविग्रह! आप मधु और कैटभका नाश करनेवाले हैं, आपको नमस्कार है। प्रभो! आप पृथ्वी को ऊपर उठाने के लिए विशाल कच्छपका शरीर धारण करनेवाले हैं, आपने अपनी पीत्पर मन्दराचलको धारण किया था। महाकूर्मस्वरुप आप भगवान् को नमस्कार है। पृथ्वी का उद्धार करनेवाले महावराह को नमस्कार है। भगवन्! आपने ही पहले-पहल वराहरूप धारण किया था, अत: आप आदिवराह कहलाते हैं। आप विषरूप और विधाता हैं, आपको नमस्कार है। आप अनन्त, सूक्ष्म, मुख्य, श्रेष्ठ, परमाणुस्वरुप अट्टहा योगिगम्य हैं। आपको नमस्कार है। जो परम कारण (प्रकृति)- के भी कारण हैं, योगीश्वर-मण्डल के आश्रयस्थान हैं, जिनके स्वरुप का ज्ञान होने अत्यन्त कठिन है, जो क्षीरसागर के भीतर निवास करनेवाले महान् सर्प- शेषनाग की सुन्दर शय्यापर शयन करते हैं तथा जिनके कानों में सुवर्ण एवं रत्नों के बने हुए दिव्य कुण्डल झिलमिलाते रहते हैं, उन आप भगवान् विष्णु को नमस्कार है।
कण्डुमुनि के इस प्रकार स्तुति करनेपर भगवान् विष्णु ने प्रसन्न होकर कहा- 'मुनिश्रेह्स्थ! तुम मुझसे जो कुछ पाना चाहते हो, उसे शीघ्र कहो।'
कण्डु बोले - जगन्नाथ! यह संसार अत्यन्त दुस्तर और रोमाञ्चकारि है। इसमें दु:खोंकी ही अधिकता है। यह अनित्य और केले के पत्ते की भाँति सारहीन है। इसमें न कहीं आश्रय है, न अवलम्ब। यह जल के बुलबुलों की भाँति चञ्चल है। इसमें सब प्रकार के उपद्रव भरे हुए हैं।यह दुस्तर होने के साथ ही अत्यन्त भयानक है। मैं आपकी आया से मोहित होकर चिरकालसे इस संसार में भटक रहा हूँ, किंतु कहीं भी शांति नहीं पाता। मेरा मन विषयों में आसक्त है। देवेश! इस संसार के भय से पीड़ित होकर आज मैं आपकी शरण में आया हूँ। श्रीकृष्ण! आप इस भवसागर से मेरा उद्धार कीजिये। सुरेश्वर! मैं आपकी कृपा से आपके ही सनातन परम पदको प्राप्त करना चाहता हूँ, जहाँ जाने से फिर इस संसार में नहीं आना पड़ता।
श्रीभगवान् बोले - मुनिश्रेष्ठ! तुम मेरे भक्त हो। सदा मेरी ही आराधना करते रहो। तुम्हें मेरे प्रसाद से अभीष्ट मोक्षपद की प्राप्ति होगी। विप्रवर! मेरे भक्त क्षत्रिय, वैश्य, स्त्री, शूद्र तथा अन्त्यज भी परम सिद्धिको प्राप्त होते हैं; फिर तुम- जैसे तपोनिष्ठ ब्राह्मण की तो बात ही क्या है! चाण्डाल भी यदि उत्तम श्रद्धा से युक्त एवं मेरा भक्त हो तो उसे अभीष्ट सिद्धि प्राप्त होती है; फिर औरोंकी तो चर्चा ही क्या है।*
व्यासजी कहते हैं - यों कहकर भक्तवत्सल भगवान् विष्णु वहीँ अन्तर्धान हो गये। उनके चले जानेपर मुनिवर कण्डु बहुत प्रसन्न हुए और समस्त कामनाओं का त्याग करके स्वस्थचित्त हो गये। समस्त इन्द्रियों को वश में करके ममता और अहंकार से रहित हो एकाग्रचित से भगवान् पुरुषोत्तमका ध्यान करने लगे। भगवान् के निर्लेप, निर्गुण, शान्त और सन्मात्र स्वरुप का चिन्तन करते हुए उन्होंने दुर्लभ मोक्ष प्राप्त कर लिया। जो महात्मा कण्डुकी कथा को पढ़ता अथवा सुनता है, वह सब पापों से मुक्त हो स्वर्गलोक में जाता है। मुनिवरो! इस प्रकार मैंने इस कर्मभूमि तथा मोक्षदायक पुरुषोत्तमक्षेत्रका वर्णन किया, जहाँ साक्षात् भगवान् पुरुषोत्तम निवास करते हैं। जो मनुष्य संसार जनित दु:खोंका नाश और मोक्ष प्रदान करनेवाले वरदायक भगवान् श्रीपुरुषोत्तमका भक्तिपूर्वक दर्शन, स्तवन और ध्यान करते हैं, वे समस्त दोषों से मुक्त हो भगवान् के अविनाशी धाम में जाते हैं।
* अतसीपुष्पसंकाशं पद्यपत्रायतेक्षणम्। शङ्खचक्रगदापाणिं मुकुटाङ्गदधारिणम् ॥
चतुर्बाहुमुदाराङ्ग पीतवस्त्रधरं शुभम्। श्रीवत्सलक्ष्मसंयुक्तं वनमालाविभूषितम्॥
सर्वलक्षणसंयुक्तं सर्वरत्नविभूषितम्। दिव्यचन्दनलिप्ताङ्गं दिव्यमाल्यविभूषितम्॥
(१७८।१२४-१२६)
* मभ्द्कता: क्षत्रिया वैश्या: स्त्रिय: शुद्रन्त्यजातिजा:। प्राप्नुवन्ति परां सिद्धिं किं पुनस्त्वं द्विजोत्तम॥
श्वपाकोऽपि च म्भद्क्त: सम्यक् श्रद्धासमन्वित:। प्राप्नोत्यभिमतां सिद्धिमन्येषां तत्र का कथा॥
(१७८।१८५-१८६)
Summary of chapter 67 of the [[BOOK_TITLE]] is as follows:
The divine glory of Ananta Vāsudeva — Viṣṇu in his aspect as the infinite, eternal Vāsudeva — is extolled with particular reference to his presence at the Puruṣottama kṣetra. The temple of Ananta Vāsudeva and its significance within the kṣetra's sacred geography are described, and the blessings — including liberation — accruing to those who worship and circumambulate this shrine are enumerated.