ब्रह्म महा पुराण
79 - भगवान् की माता-पितासे भेंट, उग्रसेनका राज्याभिषेक, श्रीकृष्ण-बलरामका विद्याध्ययन, गुरुपुत्रको यमपुरसे लाना, जरासंधकी पराजय, कालयवनका संहार तथा मुचुकुन्दद्वारा भगवान्का स्तवन
व्यासजी कहते हैं - भगवान् के अलौकिक कर्म देखकर वसुदेव और देवकीको उनके भगवद्भावका ज्ञान हो गया, यहे देख भगवान् श्रीहरि ने यदुवंशियोंको मोहने के लिये वैष्णवी माया फैलाई और कहा- 'माता और पिताजी! मैं तथा भैया बलराम बहुत दिनों से आपके दर्शन के लिये उत्कण्ठित थे, आज दीर्घ काल के बाद हमें आपका दर्शन मिला है। जिसका समय माता-पिता की सेवा किये बिना ही बीतता है, उस पुत्रका जीवन व्यर्थ है; वह जननीको कष्ट देनेवाला माना गया है। साधु पुरुषों में उसकी निन्दा होती है। तात! जो गुरु, देवता, ब्राह्मण और माता-पिता का पूजन-सत्कार करते हैं, उन्हीं का जन्म सफल होता है। पिताजी! हम लोग कंसके बल और प्रताप से पराधीन हो गये थे; अत: हमारे द्वारा जो अपने कर्तव्य का उल्लङ्घन हुआ है, वह सब आप क्षमा करें।'
यों कहकर दोनों भाइयोंने माता-पिता को प्रणाम किया। फिर क्रमशः यदुकुलके सभी बड़े-बूढोंका चरणस्पर्श किया। इस प्रकार अपने विनयपूर्ण बर्तावसे समस्त पुरवासियोंके मन में अपने प्रति स्नेहका संचार कर दिया। कंस के मारे जानेपर उसकी पत्नियाँ और माताएँ शोक और दु:ख में डूब गयीं तथा उसको सब ओरसे घेरकर अनेक प्रकारसे विलाप करनेलगीं। उन्हें घबरायी हुई और दु:खी देख श्रीकृष्ण ने स्वयं भी नेत्रों से आँसू बहाते हुए उन सबको सान्त्वना दी, उग्रसेन को कैदसे छुड़ाया और अपने राजपदपर अभिषिक्त कर दिया। राज्यसनपर बैठनेके बाद उग्रसेन ने अपने पुत्रके तथा अन्य मरे हुए व्यक्तियोंके पारलौकिक कार्य किये। मृतकों की और्व्धदैहिक क्रिया करनेके पश्चात जब उग्रसेन पुन: सिंहासन पर बैठे, तब श्रीकृष्ण ने उनसे कहा- 'महाराज! जो भी आवश्यक कार्य हो, उसके लिए मुझे नि:शङ्क होकर आज्ञा दें। जबतक मैं आपकी सेवा में मौजूद हूँ तबतक आप देवताओंको भी आज्ञा दे सकते हैं, फिर इस पृथ्वीके राजाओं की तो बात ही क्या है।'
उग्रसेन से यों कहकर श्रीकृष्ण वायुदेवतासे बोले- 'वायो! तुम इन्द्रके पास जाओ और उनसे मेरा यह संदेश कहो- 'इन्द्र! तुम अभिमान छोड़कर महाराज उग्रसेन को सुधर्मा सभा दे दो। श्रीकृष्ण कहते हैं, यह राजा के योग्य उत्तम रत्न है; अत: सुधर्मा सबह में यदुवंशियोंका बैठना सर्वथा उचित है।´भगवान् के यों कहनेपर वायुदेव ने शचीपति इन्द्र से सब कुछ कहा। इन्द्र ने वायुको सुधर्मा सभा दे दी। वह दिव्य सभा सब रत्नों सेसम्पन्न थी। गोविन्दकी भुजाओंकी छत्र-छाया में रहनेवाले यादव वायुद्वारा लायी हुई उस सभा का उपभोग करनेलगे। श्रीकृष्ण और बलभद्र सम्पूर्ण विद्याओं के ज्ञाता तथा पूर्ण ज्ञानस्वरुप थे, तथापि शिष्य और आचार्य की परम्परा को सुरक्षित रखनेके लिये उन्होंने काश्यगोत्र में उत्पन्न अवन्तीपुर निवासी सांदीपनिजी के यहाँ विद्याध्ययन के लिये यात्रा की। बलराम और श्रीकृष्ण दोनों भाई शिष्यता ग्रहण करके निरंतर गुरु-सेवा मियन लगे रहते थे। उन्होंने अपने आचरणद्वारा सबको शिष्य के कर्तव्यका उपदेश दिया। चौंसठ दिनों में ही रहस्य और संग्र (अस्त्रों के उपसहार) -सहित धनुर्वेद का उन्हें पूर्ण ज्ञान हो गया। यह एक अद्भुत बात थी। उनके आलौकिक और अन्होने कर्मों को देखकर गुरुने ऐसा समझा कि साक्षात् सूर्य और चन्द्रमा इन दोनों के रूप में मेरे यहाँ आये हैं। एक बार बतानेमात्र से ही सम्पूर्ण अस्त्र-शस्त्रोंका उन्हें ज्ञान हो गया। पूरी विद्या पढ़कर उन्होंने गुरुसे कहा- 'भगवन्! आपको क्या गुरुदाक्षिणा दी जाए? बताइये।' परम बुद्धिमान् गुरु ने भी उनसे अलौकिक कर्मका विचार करके अपने मरे हुए पुत्र को माँगा, जो प्रभासक्षेत्र में समुद्रके भीतर डूब गया था। तब बलराम और श्रीकृष्ण हथियार लेकर समुद्रतट गये और समुद्रसे बोले- 'मेरे गुरुके पुत्र को ले आओ।' समुद्र ने हाथ जोड़कर कहा - 'भगवन्! मैंने सांदीपनिके पुत्र का अपहरण नहीं किया है। मेरे भीतर पञ्चजन नाम का एक दैत्य रहता हिया, उसका आकार शङ्खका-सा है। उसीने उस बालक को पकड़ लिया था। वह दैत्य आज भी मेरे जल में मौजूद है।' समुद्र के यों कहनेपर भगवान् ने जल में प्रवेश करके पञ्चजनको मार डाला और उसकी हड्डियों का उत्तम शङ्ख ग्रहण किया। उसका शब्द सुनकर दैत्योंका बल क्षीण होता, देवताओंकी शक्ति बढ़ती और अधर्म का नाश होता है। तदनन्तर भगवान् श्रीकृष्ण और बलवान् बलराम जी यमपुरीमें गये; वहाँ उन्होंने शङ्ख-नाद किया और वैवस्वत यमको जीतकर गुरुके पुत्रको प्राप्त कर लिया। वह बेचारा वहाँ नरक की यातना भोग रहा था। उसे पहले-जैसा शरीर प्रदानआकर दोनों भाइयों ने गुरु को अर्पित किया। तत्पश्चात् वे दोनों बन्धु उग्रसेन द्वारा पालित मथुरापुरी में चले आये। उनके आगमन से मथुरा के सभी स्त्री-पुरुष प्रसन्न हो गये।
महाबली कंस ने जरासंध की पुत्री अस्ति और प्राप्ति से विवाह किया था। जरासंध मगधदेशका बलवान् राजा था। वह बहुत बड़ी सेना साथ लेकर अपने दामादको मारनेवाले यदुवंशियोंसहित श्रीकृष्णका वध करनेके लिये क्रोधपूर्वक आया। मथुरा के पास पहुँचकर उसने उस पुरीको चारों ओरसे घेर लिया। उसके साथ तेईस अक्षौहिणी सेना थी। बलराम और श्रीकृष्ण थोड़े-से सैनिकोंको साथ ले नगरसे बाहर निकले और उसके बलवान् योद्धाओंके साथ युद्ध करने लगे। उस समय उन्हें अपने पुरातन आयुधों को ग्रहण करनेकी इच्छा हुई। उनके मन में ऐसा संकल्प आते ही सुदर्शन चक्र, शार्ङ्गधनुष, बाणोंसे भरा हुआ अक्षय तूणीर और कौमोदकी गदा- ये सभी अस्त्र श्रीकृष्ण के हाथ में आ गये। इसी प्रकार बलदेवजी के हाथ में भी उनके अभीष्ट अस्त्र हल और मुसल आ गये। उन दिव्य अस्त्रों को पाकर श्रीकृष्ण और बलरामने महाराज जरासंध को सेनासहित युद्धमें परास्त कर दिया और फिर वे अपनी पुरी में लौट आये। दुराचारी जरासंध परास्त होकर भी जीते-जी लौट गया था।अत: श्रीकृष्ण ने उसे हारा हुआ नहीं समझा। वह पुन:बहुत बड़ी सेना के साथ मथुरा पर चढ़ आया और बलराम तथा श्रीकृष्ण से परास्त होकर भाग खड़ा हुआ। इस प्रकार अत्यन्त दुर्मद मगधराज ने श्रीकृष्ण आदि यदुवंशियोंके साथ अठारह बार लोहा लिया। परंतु प्रत्येक युद्धमें उसे यदुवंशियोंद्वारा मुँह की खानी पड़ी। यद्यपि उसके पास सेना अधिक थी तो भी थोड़ी-दी सेनावाले यादवोंने उसे मार भगाया। इस अनेक युद्धों में लड़नेपर भी जो यदुवंशियों की सेना सुरक्षित रह गयी, यह चक्रपाणि भगवान् विष्णु के अंशभूत श्रीकृष्णके सामीप्यकी महिमा थी। भगवान् श्रीकृष्ण शत्रुओंपर जो अनेक प्रकार के अस्त्र चलाते थे, यह मनुष्यधर्मका पालन करनेवाले जगदीश्वर की लीला थी। जो मन से ही संसारकी सृष्टि और संहार करते हैं, उन्हें शत्रुपक्षका विनाश करने में कितने उद्म की आवश्यकता है; तथापि मनुष्यों के धर्मका अनुसरण करते हुए बलवानों से संधि और हीं बलवालों के साथ युद्ध करते थे। कहीं साम,
दान और कहीं भेदकी नीति दिखाते हुए कहीं-खिन पर दण्डनीतिका भीप्रयोग करते थे और आवश्यकता होनेपर खिन युद्ध से पलायन भी करते थे। इस प्रकार वे मानव-शरीर की चेष्टाका अनुसरण करते थे। वास्तव में यह जगदीश्वर की लीला है, जो उनकी इच्छा के अनुसार होती
है।
दक्षिण में एक यवनों का राजा रहता था, उसने अपने पुत्र कालयवन को अपने राज्यपर अभिषिक्त किया और स्वयं वन में चला गया। कालयवन बल के मदसे उन्मत्त रहता था। एक बार उसने नारदजी से पूछा- 'पृथ्वीपर बलवान् राजा कौन-कौन से हैं?' नारदजी ने यादवों को बतलाया। उसने हाथी, घोड़े और रथसहित खरबों म्लेच्छोंकी सेना साथ लेकर याद्वों पर आक्रमण की तैयारी की। वह प्रतिदिन अविच्छिन्न गतिसे यात्रा करता हुआ मथुरा को गया। यादवों के प्रति उसके हृदय में बड़ा अमर्ष था। उसके आक्रमण समाचार जानकर श्रीकृष्ण ने सोचा- 'यदि कालयवन ने आकर यादवों की सेना का संहार कर दिया तो अवसर देखकर मगधराज जरासंध भी आक्रमण करेगा और यदि पहले जरासंध ने ही आकार हमारी सेनाको क्षीण कर दिया तो बलवान् कालयवन बचे-खुचे सैनिकों को मार डालेगा। अहो! यदुवंशियों पर दोनों प्रकार से संकट उपस्थित है; अत: इससे बचनेके लिये मैं यादवों के निमित्त अत्यन्त दुर्जय दुर्गका निर्माण करूँगा, जहाँ रहकर स्त्रियाँ भी युद्ध कर सकती हैं, फिर वृष्णियों और यादवों की तो बात ही क्या। यदि मैं सोया अथवा बाहर गया होऊँ तो भी उस दुर्ग में रहनेपर दुष्ट शत्रु यादवों को अधिक कष्ट न दे सकें।' यह सोचकर गोविन्द ने समुद्र से बाहर योजन भूमि माँगी और उसी में द्वाराका पुरीका निर्माण किया। उसमें बड़े-बड़े उद्यान शोभा पाते थे। उसकी चारदीवारी बहुत ऊँची थी। सैकड़ों सरोवरों से वह पुरी सुशोभित हो रही थी। उसमें सैकड़ों परकोटे बने हुए थे। वह पुरी इन्द्र की अमरावती-सी मनोहर जान पड़ती थी। भगवान् श्री कृष्ण ने मथुरा के निवासियों को वहाँ पहुँचा दिया और जब कालयवन समीप आ गया, तब वे स्वयं मथुरा लौट आये। मथुरा के बाहर कालयवन की सेना का पड़ाव था। श्रीकृष्ण अस्त्र-शस्त्र लिये बिना ही मथुरा से बाहर निकले। कालयवन ने उन्हें देखा और यह जानकर कि ये ही वासुदेव हैं, बिना अस्त्र-शस्त्र के ही उनका पीछा किया। जिन्हें बड़े-बड़े योगी अपने मन के द्वारा भी नहीं प्राप्त कर सकते, उन्हीं भगवान् को पकड़नेके लिए कालयवन उनके पीछे-पीछे चला। उसके पीछा करनेपर श्रीकृष्ण भी एक बहुत बड़ी गुफ़ा में प्रवेश कर गये, जहाँ महापराक्रमी मुचुकुन्द सोये हुए थे। कालयवनने भी उस गुफ़ा में प्रवेश करके देखा, एक मनुष्य सो रहा है। उसे श्री कृष्ण समझकर उसे खोटी बुद्धिवाले यवन ने लात मारी। मुचुकुन्दकी आँख खुल गयी और वह यवन राजा की दृष्टि ही उनकी क्रोधाग्निसे जलकर भस्म हो गया।
पूर्वकाल में राजा मुचुकुन्द देवासुर-संग्राम में युद्ध करने के लिए गये थे। वहाँ
उन्होंने बड़े-बड़े दैत्यों को परास्त किया। युद्ध समाप्त होनेपर उन्होंने नींद सताने लगी। तब उन्होंने देवताओं से दीर्घ कालतक निद्रा में पड़े रहने का वरदान माँगा। देवताओं ने कहा- राजन्! जो तुम्हें सोतेसे उठा देगा, वह तुहारे शरीरसे उतोंन हुई अग्निसे तत्क्षण जलकर भस्म हो जाएगा।' इस प्रकार पापी कालयवन को भस्म करके राजा ने मधुसूदनसे पूछा- 'आप कौन हैं?" वे बोले- 'मैं चंद्रवंश के भीतर यदुकुल में उत्पन्न वसुदेव-पुत्र श्रीकृष्ण हूँ।' यह सुनकर उन्होंने सर्वेश्वर श्रीहरिको प्रणाम करके कहा- 'भगवन्! मैंने आपको पहचान लिया। आप श्रीहरिके अंशभूत साक्षात् परमेश्वर हैं। पूर्वकाल में गार्ग्यने कहा था- अट्ठाईसवें द्वापर के अन्त में यदुकुल में श्री हरि का अवतार होगा। वे अवतारधारी धरीहरि आप ही हैं, इसमें तनिक भी संदेह नहीं है। आप मर्त्यलोक के प्राणियों का उपकार करनेवाले हैं। आपके इस महान् तेजको मैं नहीं सह सकता। आपनी वाणी महामेघ की गंभीर गर्जना के समान है। देवासुर-संग्राम में दैत्यपक्ष के महान् योद्धा भी आपके जिस महान् तेजको सहन न कर सके, वही तेज आज मेरे लिये भी असह्य है। संसार-सागर में पड़े हुए जीवके लिये एकमात्र आप ही परमाश्रय हैं, शरणागतों की पीड़ा दूर करनेवाले हैं। भगवन्! मुझपर प्रसन्न होइये और मेरे अमङ्गल को हर लीजिये। आप ही समुद्र, पर्वत, नदी, वन, पृथ्वी, आकाश, वायु, जल, अग्नि तथा पुरुष हैं। पुरुष से भी परे जो व्यापक, जन्म आदि ब=विकारोंसे रहित, शब्द आदिसे शून्य, सदा नवीन तथा वृद्धि और क्षयसे रहितत तत्व है, वह भी आप ही हैं। देवता, पितृ, यक्ष, गन्धर्व, राक्षस, सिद्ध, अप्सरा, मनुष्य, पशु-पक्षी, सर्प, मृग तथा वृक्ष-सब आपसे ही उत्पन्न हुए हैं। इस चराचर जगत् में जो कुछ भी भूत या भविष्य, मूर्त्त या अमूर्त्त अथवा स्थूल या सूक्ष्मतर वस्तु है, वह सब आपके सिवा कुछ भी नहीं है। भगवन्! इस संसारचक्र में आध्यात्मिक आदि तीनों तापों से पीड़ित हो सदा भटकते हुए मुझे कभी शान्ति नहीं मिली। नाथ! मैंने मृगतृष्णा से जल की आशा करके दु:खों को ही सुख समझकर ग्रहण किया, अत: वे सदा मेरे लिए संताप के ही कारण हुए। प्रभो! राज्य, पृथ्वी, सेना, कोष, मित्र, पुत्र, पत्नी, भृत्य और शब्द आदि विषय- यह सब कुछ मैंने सुख-बुद्धिसे ग्रहण किया; परन्तु देवेश्वर! परिणाम में ये सब मेरे लिये संतापप्रद ही सिद्ध हुए हैं। नाथ! देवलोककी उत्तम गति को प्राप्त देवताओं को भी जब मुझसे सहायता लेनेकी इच्छा हुई, तब वहाँ भी नित्य शान्ति कहाँ है। आप सम्पूर्ण जगत् के उद्यम-स्थान हैं। परमेश्वर! आपकी आराधना किये बिना सनातन शान्ति कौन पा सकता है। जिनका चित्त आपकी मायासे मोहित है, वे जन्म-मृत्यु और जरा आदि कष्टोंको भोगकर अन्तमें यमराज का दर्शन करते हैं। तदनन्तर सैकड़ों पाशों में आबद्ध हो नरकों में अत्यन्त दारुण दु:ख भोगते हैं। यह विश्व आपका स्वरूप है। परमेश्वर! मैं अत्यन्त विषयी हूँ और आपकी माया से मोहित होकर ममतासे अगाध गर्त्तमें भटक रहा हूँ। वही मैं आज अपार एवं स्तवन करने योग्य आप परमेश्वर की शरण में आया हूँ, जिससे भिन्न दूसरा कोई परम पद नहीं है। मेरा चित्त सांसारिक श्रमसे संतप्त है; अत: मैं निर्वाणस्वरूप आप परमधाम परमात्मा की अभिलाषा करता हूँ।
व्यासजी कहते हैं - परम बुद्धिमान् राजा मुचुकुन्दके इस प्रकार स्तुति करनेपर आदि-अन्तरहित, सर्वभूतेश्वर श्रीहरि ने कहा- 'नरेश्वर! तुम अपनी इच्छा के अनुसार दिव्य लोकों में जाओ और मेरे प्रसाद से उत्तम ऐश्वर्यसे सम्पन्न होकर वहाँके दिव्य भोग भोगो। तत्पश्चात् इस पृथ्वीपर श्रेष्ठ कुलमें तुम्हारा जन्म होगा। उस समय तुम्हें अपने पूर्वजन्म की स्मृति बनी रहेगी और मेरी कृपा से तुम मोक्ष प्राप्त कर लोगे।' यह सुनकर राजा ने जगदीश्वर भगवान् श्रीकृष्ण को प्रणाम किया और गुफ़ासे निकलकर देखा तो सब मनुष्य छोटे-छोटे दिखायी दिये। तब कलियुग आया जान वे तपस्या करनेके लिये गन्धमादन पर्वतपर भगवान् नर-नारायण के आश्रण में चले गये। श्रीकृष्ण ने भी युक्तसे शत्रुका वध कराकर मथुरा में आ हाथी, घोड़े और रथ सए सुशोभित उनकी सारी सेना अपने अधिकार में कर ली तथा द्वारा का में ले जाकर राजा उग्रसेन को समर्पित कर दी। अब सम्पूर्ण यादव शत्रुओं के आक्रमण की आशङ्का से निर्भय हो गये।
Summary of chapter 77 of the Brahma Mahā Purana is as follows:
Kṛṣṇa, sporting in the Yamunā, dives into the pool of the venomous serpent Kāliya whose poison has been polluting the river and killing birds and cattle. Kṛṣṇa dances on Kāliya's hoods until the serpent is humbled; Kāliya's wives plead for mercy. Kṛṣṇa, compassionate, spares Kāliya and commands him to go to the ocean, leaving the Yamunā pure. The cowherds who had feared Kṛṣṇa had drowned rejoice at his safe return.