ब्रह्म पुराण

41 -  क्षुधातीर्थ और अहल्या-संगम-तीर्थका माहात्म्य

ब्रह्माजी कहते हैं - नारद! अब क्षुधातीर्थका वर्णन करता हूँ, एकाग्रचित होकर सुनो। वह परम पुण्यमय तीर्थ मनुष्योंकी समस्त कामनाओंको पूर्ण करनेवाला है। पूर्वकाल में  कण्व नाम से प्रसिद्ध एक ऋषि थे। वे वेदवेत्ताओंमें श्रेष्ठ और तपस्वी थे। महर्षि कण्व भूख से पीड़ित होकर अनेक आश्रमोंपर घूमा करते थे। एक दिन वे गौतमके पवित्र आश्रम पर आये। वह आश्रम अन्न और जलसे सम्पन्न  था। अपनेको क्षुधासे पीड़ित और गौतम को वैभवशाली देख कण्वका मन विरक्तिसे भर गया। वे सोचने  लगे- 'गौतम भी एक श्रेष्ठ ब्राह्मण हैं और में भी उन्हींकी भाँति तपोनिष्ठ हूँ। बराबरवाले के पास याचना करना कदापि उचित नहीं है। अत: यद्यपि मैं भूखसे व्याकुल हूँ और मेरे शरीर में पीड़ा भी हो रही है, तथापि गौतमके घर में भोजन नहीं करूँगा। एक समय गौतमीके घर में भोजन नहीं करूँगा। इस समय गौतमी गङ्गाके तटपर चलूँ और उन्हींसे सम्पत्ति माँगूँ।' ऐसा निश्चय करके महर्षि कण्व परम पावन गङ्गाजी के तटपर गये और स्नान करके पवित्र एवं संयतचित्त हो कुशासन पर बैठकर गौतमी गङ्गा तथा क्षुधादेवीकी स्तुति करने लगे।

कण्व बोले - भारी पीड़ाओंको हरनेवाली भगवती गङ्गा! तुम्हें नमस्कार है तथा सब लोगोंको पीड़ा देनेवाली क्षुधादेवी! तुमको भी नमस्कार है।  महादेव जी की जटासे प्रकार हुई कल्याणमयी गौतमी! तुम्हें नमस्कार है तथा  महामृत्युके मुखसे निकली हुई क्षुधादेवी! तुम्हें भी नमस्कार है। देवि! तुम्हीं पुण्यात्माओंके लिए शान्तिरूपा और दुरात्माओंके लिए क्रोधस्वरूपा हो। नदीके रूप से सबके पाप-ताप हर लेती हो और क्षुधारूप में आकार सबको पाप-ताप देती रहती हो। कल्याणकारिणी देवी! तुम्हें नमस्कार है। पापोंका दमन करनेवाली गङ्गा! तुम्हें प्रणाम है। भगवती शान्तिकरी! तुम्हें नमस्कार है। दरिद्रताका विनाश करनेवाली देवी! तुम्हें प्रणाम है!

कण्वके इस प्रकार स्तुति करनेपर उनके सामने दो रूप प्रकट हुए- 'एक तो गङ्गाका मनोहर स्वरुप और दूसरी क्षुधाकी भयानक मूर्ति द्विजश्रेष्ठ कण्वने पुन: हाथ जोड़कर नमस्कार करते हुए कहा- 'देवि गोदावरी! तुम सम्पूर्ण मङ्गलोंके लिए भी मङ्गममयी हो। शुभे! ब्राह्मी, माहेश्वरी, वैष्णवी और त्र्यम्बका- ये सब तुम्हारे ही नम हैं। तुम्हें नमस्कार है। भगवान् त्र्यम्बीकी जटासे प्रकट होकर महर्षि गौतमीका पाप नष्ट करनेवाली गोदावरी! तुम सात धाराओंमें विभक्त होकर समुद्रमें मिलती हो। तुम्हें नमस्कार है। क्षुधादेवी! तुम समस्त पापियों के लिए पापमयी, दु:खमयी और लोभमयी हो। धर्म, अर्थ और काम का नाश करनेवाली भी तुम्हीं हो। तुम्हें बारंबार नमस्कार है।'

कण्वका यह वचन सुनकर गङ्गा और क्षुधा दोनों ही बहुत प्रसन्न हुईं और बोलीं- 'सुव्रत! तुम मनोवाञ्छित वर माँगो।' तब कण्वने गङ्गाजी को प्रणाम करके कहा- 'देवि! मुझे मनके अनुकूल भोग, वैभव, आयु, धन और मोक्ष प्रदान कीजिये।' गङ्गा यों कहकर द्विजश्रेष्ठ कण्वने क्षुधादेवीसे कहा- 'क्षुधे! तुम तृष्णा एवं दरिद्रतारूपिणी, अत्यन्त पापमयी अट्टहा रुक्ष स्वभाववाली हो। मेरे अथवा मेरे वंशजोंके यहाँ तुम कभी न रहना। जो क्षुधातुर मनुष्य इस स्तोत्रसे तुम्हारी स्तुति करें, उनके दारिद्र्य और  दु:खका नाश हो जाए।* जो लोग इस परम पुण्यमय तीर्थमें भक्तिपूर्वक स्नान, दान और जप आदि करें, वे धन-सम्पत्तिके भागी हों। जो तीर्थ अथवा अपने घर में इस स्तोत्रका पाठ करे, उसे दरिद्रता और दु:खसे कभी भय न हो।'

'एवमस्तु' कहकर गङ्गा और क्षुधा दोनों अपने-अपने स्थानको चली गयीं। तबसे उस तीर्थके तीन  नाम हो गये- काण्वतीर्थ, गाङ्गतिढ़त और क्षुधा तीर्थ। नारद! वह तीर्थ सब पापोंको दूर करनेवाला और पितरोंकी प्रसन्नताको बढ़ानेवाला है।

गोदावरीमें अहल्यासंगम नामक एक तीर्थ है, जो तीनों लोकों को पवित्र करनेवाला है। मुनिश्रेष्ठ! उस तीर्थकी उत्पत्तिका वृत्तान्त सुनो। पूर्वकालकी वाट है, मैंने अत्यन्त कौतूहलवश कुछ सुन्दरी कन्याओंकी सृष्टि की। उनमें से एक कन्या सबसे श्रेष्ठ और उत्तम लक्षणों से युक्त थी। उसके सब अङ्ग अब्दे मनोहर तथा रूप  और गुणोंसे सम्पन्न थे। उस समय मेरे मन में यह विचार हुआ कि कौन पुरुष इस कन्या का पालन-पोषण करनेमें समर्थ है। सोचनेपर महर्षि गौतमही मुझे समस्त गुणोंमें श्रेष्ठ, तपस्वी, बुद्धिमान्, समस्त शुभ लक्षणोंसे सुशोभित और वेद-वेदाङ्गोंके ज्ञाता प्रतीत हुए। अत: उन्हींको मैंने वह कन्या दे दी और कहा- 'मुनिश्रेष्ठ! जबतक यह युवती न हो जाय, तबतक तुम्हीं इसका पालन-पोषण करना। युवावस्था होनेपर पुन: इस साध्वी कन्यको मेरे पास ले आना।' यों कहकर मैंने गौतमीको वह कन्या समर्पित कर दी। गौतमी अपने तपोबल से निष्पाप हो चुके थे। उन्होंने विधिपूर्वक उस कन्याका पालन-पोषण किया और युवती होनेपर उसे वस्त्रभूषणोंसे सुसज्जित करके मेरे पास ले आये। उस समय उनके मन में कोई विकार नहीं था। अहल्याको देखकर इन्द्र, अग्नि और वरुण आदि सब देवता बारी-बारीसे मेरे पास आये और  कहने लगे- 'सुरेश्वर! यह कन्या मुझे दे दीजिये।' इन्द्रका तो उसके लिए विशेष आग्रह था महर्षि गौतमीकी महत्ता, गंभीरता और धीरताका विचार करके मुझे बड़ा विषमय हुआ। मैंने सोचा- 'यह सुमुखी कन्या गौतमीको ही देने योग्य है और किसीको नहीं। अत: उन्हींको दूँगा।' ऐसा निश्चय करके मैंने देवताओं और ऋषियों से कहा- 'यह सुन्दरी कन्या उसी को दी जायगी, जो सारी पृथ्वीकी परिक्रमा करके सबसे पहले यहाँ उपस्थित हो जाए; दूसरे किसीको नहीं मिलेगी।

मेरी बात सुनकर सब देवता अहल्याकी प्राप्तिके लिए पृथ्वीकी परिक्रमा करने चले गये। इसी बीचमें कामधेनु सुरभि बच्चा देने लगी। अभी बच्चेका आधा शरीर ही बाहर निकला था। उसी अवस्था में गौतमने उसे देखा और उसी को पृथ्वीभाव से देखतेहुए उसकी परिक्रमा ही। साथ ही उन्होंने शिवलिङ्ग भी प्रदक्षिणा की। इसके बाद सोचा, सम्पूर्ण देवताओं ने अभी पृथ्वीकी एक परिक्रमा भी पूरी नहीं की और  मेरे द्वारा दो परिक्रमाएँ पूरी हो गयीं। ऐसा निश्चय करके वे मेरे समीप आये और मुझे प्रणाम करके बोले- 'कमलासन! विश्वात्मन्! आपको बारंबार नमस्कार है। ब्राह्मन्! मैंने सारी वसुधाकी प्रदक्षिणा कर ली।' मैंने ध्यानके द्वारा सब बातें जानकर गौतमसे कहा- 'ब्रह्मर्षे! तुम्हींको यह सुन्दरी कन्या दी जाति है। वास्तव में तुमने पृथ्वीकी परिक्रमा पुरी कर ली। जो वेदों के लिये भी दुर्बोध है, उस धर्मका स्वरूप तुम जानते हो। जो गाय आधा प्रसव कर चुकी हो, वह सात द्वीपोंवाली पृथ्वीके तुल्य है। उसकी परिक्रमा कर ली जाय तो समूची पृथ्वीकी परिक्रमा हो जाती है। शिवलिङ्गकी प्रदक्षिणाका भी यही फल है। अत: उत्तम व्रतका पालन करनेवाले गौतम! मैं तुम्हारे धैर्य, ज्ञान और तपस्यासे बहुत संतुष्ट हूँ।' यों कहकर मैंने गौतम को अहल्या सौंप दी। उन दोनोंका विवाह हो जानेपर देवतालोग पृथ्वीकी परिक्रमा करके धीरे-धीरे आने लगे। आनेपर सबने अहल्याके साथ गौतमका विवाह हुआ देखा। इससे उन्हें बड़ा आश्चर्य हुआ। अन्त में सब देवता स्वर्ग में चले गये, परन्तु इन्द्रके मन में इससे बड़ी ईर्ष्या हुई। मैंने प्रसन्न होकर महात्मा गौतम को रहनेके लिए ब्रह्मगिरि प्रदान किया, जो परम पवित्र, समस्त अभिलषित वस्तुओंको देनेवाला तथा मङ्गलमय है। मुनिश्रेष्ठ गौतम वहाँ अहल्याके साथ विहार करने लगे।

इन्द्र स्वर्गमें भी गौतमकी पवित्र कथा सुनी। अत: मुनिको, उनके आश्रम को और उनकी सुन्दरी पत्नीको देखनेके लिए वे ब्राह्मणका वेष धारण करके आये। वहाँ आने पर उन्होंने मन में पापकी भावना लेकर अहल्याको देखा। उस समय वे अपने-आपको भी भूल गये। देश-कालकी भी सुध न रही और ऋषिके शाप का भय भी उन्होंने भुला दिया। उनका हृदय कामके वशीभूत हो रहा था। एक समय महर्षि गौतम मध्याह्रसे पहलेकी क्रिया समाप्त करके शिष्योंके साथ आश्रम से बाहर गये। उस समय अवसर देखकर इन्द्रने अपने मन के अनुकूल कार्य किया। वे गौतमका रूप धारण करके आश्रम में आये और सर्वाङ्गसुन्दरी अहल्यासे बोले- 'प्रिये! मैं तुम्हारे गुणोंसे आकृष्ट हूँ। तुम्हारे रूप का स्मरण करके मेरा मन विचलित हो गया है। पाँव लड़खड़ा रहे हैं।' यों कहकर हँसते-हँसते उन्होंने अहल्याका हाथ पकड़ लिया और आश्रमके भीतर चले गये। अहल्याने उन्हें गौतम ही समझा। यह कोई जार पुरुष है- यह बात उसके ध्यानमें नहीं आयी। वह इन्द्रके साथ सुखपूर्वक रमण करने लगी। इतने में ही महर्षि गौतम पुन: अपने शिष्योंके साथ लौट आये। प्रतिदिन का ऐसा नियम था कि जब वे बारहसे आश्रम पर आते तब प्रियवादिनी अहल्या आगे बढ़कर उनका स्वागत करती, प्रिय लगनेवाली बातें कहती और अपने सद्गुणोंसे उन्हें संतुष्ट करती थी। उस दिन अहल्याको न देखकर परम बुद्धिमान् गौतमको ऐसा जान पड़ा मानो कोई बड़ी अद्भुत बात हो गयी। मुनिश्रेष्ठ गौतम द्वारपर खड़े हैं और सब लोग उनकी ओर देखते हैं। अग्निहोत्र और शालाके रक्षक तथा घर में कामकाज करनेवाले अनुचर उन्हें देखकर बड़े विस्मयमें पड़े और भयभीत होकर बोले- 'भगवन्! यह कैसी विचित्र बात हैं कि आप भीतर और बाहर दोनों जगह देखे जाते हैं। अहो! आपकी तपस्याका ही यह प्रभाव है कि आप अनेक रूप धारण करके विचरते हैं।'

यह सुनकर गौतम के मन में बड़ा आश्चर्य हुआ। वे सोचने लगे- आश्रमके भीतर कौन गया है। उन्होंने पुकारा- 'प्रिय! अह्ल्ये! आज तुम मुझसे बोलती क्यों नहीं?' महर्षिका वचन सुनकर अहल्याने उस जार से कहा- 'अरे! तू कौन हैं, जो मुनिका रूप धारण करके तूने मेरे साथ यह पापकर्म किया है?' यह कहती हुई वह भयके मारे शय्यासे सहसा उठकर खड़ी हो गयी। पापाचारी इन्द्र भी मुनिके भयसे बिलाव बन गया। अहल्या थर-थर काँप रही थी। उसके वेष-भूषा बिगड़ चुके थे। अपनी प्यारी पत्नीको कलङ्कित हुई देख महर्षि ने क्रोध में आकर कहा- 'तुमने यह दु:साहस कैसे किया?' उनके इस प्रकार पूछनेपर देवी अहल्याने लज्जावश कोई उत्तर नहीं दिया। तब मुनि उस जारकी खोज करने लगे। इतने में उस बिलावपर उनकी दृष्टि पड़ी। अरे! ठीक-ठीक बता, तू कौन है? यदि झूठ बोलेगा तो मैं तुझे अभि भस्म कर दूँगा।'

इन्द्र हाथ जोड़कर खड़ा हो गया और बोला- 'तपोधन! मैं शचीका स्वामी इन्द्र हूँ, मुझसे ही यह पाप हो गया है। मैंने जो कुछ कहा है, वह सत्य है। ब्रह्मन्! कामदेव के बाणोंसे जिनका हृदय विदीर्ण हो चुका है, वे कौन-सा दुष्कर्म नहीं करते। आप करुणा के सागर हैं, मुझ महापापीको क्षमा करें। साधु पुरुष अपराधीपर भी कठोरता नहीं दिखाते।'

गौतम बोले - इन्द्र! तूने स्त्रीकी योनिमें आसक्त होकर यह पापकर्म किया है, अत: तेरे शरीरमें योनिके सहस्त्रों चिह्न हो जायँगे।

इसके बाद मुनिने अहल्यासे भी कुपित होकर कहा- 'तू सूखी नदी हो जा।'

अहल्या बोली - भगवन्! जो पापिनि स्त्रियाँ मन से भी दूसरे पुरुष की कामना करती हैं, वे तथा उनके समस्त पूर्वज भी अक्षय नरकोंमें पड़ते हैं। आप कृपा करके मेरी बातों पर ध्यान दें। यह इन्द्र आपका रूप धारण करके मेरे पास आया था। ये सब लोग इस बात के साक्षी हैं।

राक्षकों ने कहा - 'ऐसी ही बात है। अहल्या ठीक कहती हैं।' मुनिने भी ध्यानके द्वारा सच्ची बात को जान लिया और शान्त होकर अपनी पतिव्रता पत्नीसे कहा- 'कल्याणी! नदी होनेपर जब तुम सरिताओं में श्रेह्स्थ गौतमी गङ्गासे मिलोगी, उस समय पुन: अपने स्वरुपको प्राप्त कर लोगी।' महर्षि का वचन सुनकर पतिव्रताअहल्याने वैसा ही किया। गौतमी गङ्गासे मिलने पर पुन: उसका वही स्वरुप हो गया, जैसा मैंने बनाया था। तत्पश्चात् देवराज इन्द्रने हाथ जोड़कर महर्षि गौतमीसे कहा- 'मुनिश्रेष्ठ! अपने घरपर आये हुए मुझ पापिष्ठकी रक्षा कीजिये।' यों कहकर इन्द्र उनके चरणों में गिर पड़े। यह देख महर्षिने कृपापूर्वक कहा- 'पुरंदर! तुम्हारा कल्याण हो। तुम गोदावरी के तटपर जाओ और उसमें स्नान करो। इससे तुम्हारे सरे पाप क्षणभर में धुल जायँगे। तुम्हारे शरीर में योनिके जो सहस्त्रों चिह्न हैं, वे नेत्रों के रूप में परिणत हो जाएँगे। तुम सहस्त्रक्ष हो जाओगे। नारद! गौतमीके प्रभावसे ये दो आश्चर्यजनक बातें मैंने देखि हैं- अहल्या नदी होकर पुन: अपने स्वरुप को प्राप्त हुई और शचीपति इन्द्र सहस्त्राक्ष हो गये। तबसे वह तीर्थ अहल्या-संगम नामसे विख्यात हुआ, उसे इन्द्रतीर्थ भी कहते हैं। वह मनुष्यों की समस्त कामनाओंको पूर्ण करनेवाला है।

* मयि मद्वंशजे चापि क्षुधे तृष्णे दरिद्रिणि। याहि पापतरे रुक्षे न भूयास्त्वं कदाचन ॥

अनेन स्तवेन ये वै त्वां स्तुवन्ति क्षुधातुरा:। तेषां दारिद्र्यदु:खानि न भवेयुर्वरोऽपर: ॥

(८५ । २०-२१)