ब्रह्म पुराण

30 - मार्कण्डेयेश्वर शिव, वटवृक्ष, श्रीकृष्ण, बलभद्र एवं सुभद्राके दर्शन-पुजनका महात्म्य

ब्रह्माजी कहते हैं - ब्राह्मणो! अब मैं पञ्चतीर्थकी विधि बतलाऊँगा तथा स्नान, दान और देव-दर्शन से जो फल होता हिया, उसका वर्णन करूँगा। मार्कण्डेयहृदमें जाकर मनुष्य उत्तराभिमुख हो तीन बार डुबकी लगाये और निम्नाङ्कित मन्त्रका उच्चारण करे-

संसारसागरे मग्नं पापग्रस्तमचेतनम् ।

त्राहि मां भगनेत्रघ्न त्रिपुरारे नमोऽस्तु ते ॥

नम: शिवाय शान्ताय सर्वपापहराय च ।

स्नानं करोमि देवेश मम नश्यतु पातकम् ॥

'भगके नेत्रोंका नाश करनेवाले त्रिपुरशत्रु भगवान् शिव! में संसार-सागरमें निमग्न, पापग्रस्त एवं अचेतन हूँ। आप मेरी रक्षा कीजिये। आपको नमस्कार है। समस्त पापोंको दूर  करनेवाले शान्तस्वरुप शिवको नमस्कार है। देवेश्वर! मैं यहाँ स्नान करता हूँ। मेरा सारा पातक नष्ट हो जाय।'

यों कहकर बुद्धिमान् पुरुष नाभि के बराबर जलमेंस्नान करने के पश्चात् देवताओं और ऋषियोंका विधिपूर्वक तर्पण करे। फिर तिल और जल लेकर पितरोंकीभी तृप्ति करे। उसके बाद आचमन करके शिव-मंदिरोंमें जाय। उसके भीतर प्रवेश करके तीन बार देवताकी परिक्रमा करे। तदनन्तर 'मार्कडेयेश्वराय नम:' इस मूलमन्त्रसे अथवा अघोर१मन्त्र से शंकरजीकी पूजा करके उन्हें प्रणामकरे और निम्नाङ्कित मन्त्र पढ़कर उन्हें प्रसन्न करे-

त्रिलोचन नमस्तेऽस्तु नमस्ते शशिभूषण ।

त्राहि मां त्वं विरूपाक्ष महादेव नमोऽस्तु ते ॥

'तीन नेत्रोंवाले शंकर! आपको नमस्कार है, चन्द्रमाको भूषणरूप में धारण करनेवाले! आपको नमस्कार है। विकट नेत्रोंवाले शिवजी! आप मेरी रक्षा कीजिये। महादेव! आपको नमस्कार है।'

इस प्रकार मार्कण्डेयहृदमें स्नान करके भगवान् शंकरका दर्शन करनेसे मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो शिवके लोकमें जाता है।

वहाँ से कल्पान्तस्थायी वटवृक्षके पास जाकर उसकी तीन परिक्रमा करे। फिर निम्नाङ्कित मन्त्र द्वारा बड़ी भक्तिके साथ उस वटकी पूजा करे-

ॐ नमोऽव्यक्तरूपाय महाप्रलयकारिणे ।

महद्रसोपविष्टाय न्यग्रोधाय नमोऽस्तु ते ॥

अमरस्त्वं सदा कल्पे हरेश्चायतनं वट ।

न्यग्रोध हर मे पापं कल्पवृक्ष नमोऽस्तु ते ॥

'अव्यक्तस्वरुप महाप्रलयकारी एवं महान् रससे युक्त आप वटवृक्ष को नमस्कार है। हे वट! आप प्रत्येक कल्प में अमर हैं। आपपर भगवान् श्रीहरिका निवास है। न्यग्रोध! मेरे पाप हर लीजिये। कल्पवृक्ष! आपको नमस्कार है।'

इसके बाद भक्तिपूर्वक परिक्रमा करके उस कल्पान्तस्थायी वटको नमस्कार करे। ऐसा करनेवाला मनुष्य केंचुलसे छूटे हुए सर्पकी भाँति सहसा पापोंसे मुक्त हो जाता है। उस वृक्षकी छायामें पहुँच जानेपर मनुष्य ब्रह्महत्यासे भी मुक्त हो जाता है, फिर अन्य पापों की तो बात ही क्या है। भगवान् श्रीकृष्ण के अङ्ग से प्रकट हुए ब्रह्यतेजोमय वटवृक्षरुपी विष्णुको प्रणाम करके मानव राजसूय और अश्वमेध-यज्ञ से भी अधिक फल पाता है और अपने कुलका उद्धार करके विष्णुलोक में जाता है। भगवान श्रीकृष्ण के सामने खड़े हुए गरुड़को जो नमस्कार करता है, वह सब पापों से मुक्त हो श्रीविष्णुके वैकुण्धाममें जाता है। वटवृक्ष और गुरुडका दर्शन करनेके पश्चात् जो पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण, बलभद्र और सुभद्रादेवीका दर्शन करता है, वह परम गति को प्राप्त होता है। जगन्नाथ श्रीकृष्णके मंदिर में प्रवेश करके तीन बार प्रदक्षिणा करे। फिर नाममन्त्रसे बलभद्रजीका भक्तिपूर्वक पूजन करके निम्नाङ्कित रूप से प्रार्थना करे-

नमस्ते हलधृग्राम नमस्ते मुसलायुध ।

नमस्ते रेवतीकांत नसते भक्तवत्सल ॥

नमस्ते बलिनां श्रेष्ठ नमस्ते धरणीधर ।

प्रलम्बारे नमस्तेऽस्तु त्राहि मां कृष्णपूर्वज ॥

'हलधारण करनेवाले राम! आपको नमस्कार है। मूसलको आयुध रूप में रहनेवाले! आपको नमस्कार है। रेवतीरमण! आपको नमस्कार है। भक्तवत्सल! आपको नमस्कार है। बलवानोंमें श्रेष्ठ! आपको नमस्कार है। पृथ्वी को मस्तक पर धारण करनेवाले शेषजी! आपको नमस्कार है। प्रलम्बशत्रो! आपको नमस्कार है। श्रीकृष्ण के अग्रज! मेरी रक्षा कीजिये।'

इस प्रकार कैलासशिखरके समान आकार और चन्द्रमासे भी कमनीय मुखवाले, नीलवस्त्रधारी, देवपूजित, अनन्त, अजेय, एक कुण्डलसे विभूषित, फणों के द्वारा विकट मस्तकवाले, महाबली हलधरको प्रसन्न करे। बलरामजी की पूजा के पश्चात् विद्वान् पुरुष एकाग्रचित हो द्वादशाक्षर- मन्त्र 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय'- से भगवान् श्रीकृष्णकी पूजा करे। जो द्वादशाक्षर- मन्त्रके द्वारा भक्तिपूर्वक सदा भगवान् पुरुषोत्तमकी पूजा करते हैं, वे मोक्षको प्राप्त होते हैं। देवता, योगी तथा सोमपान करनेवाले याज्ञिक भी जिस गतिको नहीं पाते, उसी को द्वादशाक्षर-मंत्रका जप करनेवाले पुरुष प्राप्त कर लेते हैं। अत: उसी मन्त्र से भक्तिपूर्वक गन्ध-पुष्प आदि सामग्रियोंद्वारा जगद्गुरु श्रीकृष्णकी पूजा करके उन्होंने प्रणाम करे। फिर इस प्रकार प्रार्थना करे- 'जगन्नाथ श्रीकृष्ण! आपकी जय हो। सब पापों का नाश करनेवाले प्रभो! आपकी जय हो। सब चाणूर और केशीके नाशक! आपकी जय हो। कंसनाशन! आपकी जय हो। कमललोचन! आपकी जय हो। चक्रगदाधर! आपकी जय हो। नीलमेघके समान श्यामवर्ण! आपकी जय हो। अबको सुख देनेवाले पमेश्वर! आपकी जय हो। जगत्पूज्य दव! आपकी जय हो। संसारसंहारक! आपकी जय हो। लोकपते नाथ! आपकी जय हो। मनोवाञ्छित फल देनेवाले देवता! आपकी जय हो। यह भयङ्कर संसारसागर सर्वथा नि:सार है। इसमें दु:खमय फेन भरा हुआ है। यह क्रोधरुपी ग्राहसे पूर्ण है। इसमें विषयरुपी जलराशि भरी हुई है। भाँति-भाँति के रोग ही इसमें उठती हुई लहरें हैं। मोहरूपी भँवरों के कारण यह अत्यन्त दुस्तर जान पड़ता है। सुरश्रेष्ठ! में इस घोर संसाररुपी समुद्र में डूबा हुआ हूँ। पुरुषोत्तम! मेरी रक्षा कीजिये।' इस प्रकार प्रार्थना करके जो देवेश्वर, वरदायक, भक्तवत्सल, सर्वपापहारी, समस्त अभिलषित फलोंके दाता, मोटे कंधे और द भुजाओंवाले, श्यामवर्ण, कमलपत्रके समान विशाल नेत्रोंवाले, चौड़ी छाती, विशाल भुजा, पीतवस्त्र और सुन्दर मुखवाले, शङ्ख-चक्र-गदाधर, मुकुटाङ्गदभूषित, समस्त शुभ लक्षणों से युक्त और वनमालाविभूषित भगवान् श्रीकृष्णका दर्शन और उन्हें प्रणाम करता है, वह हजारों अश्वमेध-यज्ञोंका और सब तीर्थोंमें स्नान और दान करनेका फल पाता है। सम्पूर्ण वेद, समस्त यज्ञ, सारे दान, व्रत, नियम, उग्र तपस्या और ब्रह्मचर्यके सम्यक् पालन से जो फल मिलता है, वही भगवान् श्री कृष्णके दर्शन और वन्दनसे प्राप्त होता है। शास्त्रोक्त आचारका पालन करनेवाले गृहस्थको, वनवासके नियमों का पालन करने से वानप्रस्थको और शास्त्रोक्त रीतिसे संन्यास-धर्मका पालन करने पर संन्यासीको जो फल प्राप्त होता है, वही श्रीकृष्णका दर्शन और उन्हें प्रणाम करेवाला मनुष्य प्राप्त कर लेता है। भगवद्दर्शन के महात्म्यके सम्बन्ध में अधिक कहनेकी क्या आवश्यकता, भगवान् श्रीकृष्ण भक्तिपूर्वक दर्शन करके मनुष्य दुर्लभ मोक्षतक प्राप्त कर लेता है।

तत्पश्चात् भक्तों पर स्नेह रखनेवाली सुभद्रादेवीका भी नाममन्त्रसे पूजन करके उन्हें प्रणाम करे और हाथ जोड़कर निन्माङ्कित रूप से प्रार्थना करे -

नमस्ते सर्वगे देवि नमस्ते शुभसौख्यदे ।

त्राहि मां पद्यपत्राक्षि कात्यायनि नमोऽस्तु ते ॥

'देवि! तुम सर्वत्र व्याप्त रहनेवाली और शुभ सौख्य प्रदान करनेवाली हो।  तुम्हें बारंबार नमस्कार है। पद्यपत्रके समान विशाल नेत्रोंवाली कात्यायनि! मेरी रक्षा करो। तुम्हें नमस्कार है।'

 इस प्रकार सम्पूर्ण जगत्को धारण करनेवाली, लोकहितकारिणी, वरदायिनी एवं कल्याणमयी बलभद्रभगिनी सुभद्रादेवीको प्रसन्न करके मनुष्य इच्छानुसार गतिसे चलनेवाले विमानके द्वारा श्रीविष्णुके वैकुण्ठधाम में जाता है।

१-ॐअघोरेभ्योऽथ घोरेभ्यो घोरघोरतरेभ्य: सर्वेभ्य: सर्वशर्वेभ्यो नमस्ते अस्तु रूद्ररूपेभ्य: ।