ब्रह्म पुराण

73 - कालिय नागका दमन

व्यासजी कहते हैं - एक दिन की बात है-  श्रीकृष्ण अपने बड़े भाई बलरामजी को साथ लिये बिना ही वृन्दावन के भीतर गये और ग्वाल-बालों के साथ विचरने लगे। जंगली पुष्पोंका हार पहनने के कारण वे बड़े सुंदर दिखायी देते थे। घूमते-घूमते श्रीकृष्ण चञ्चल लहरों से सुशोभित यमुना के तटपर गये, जो तटपर लगे हुए फेनों के रूप में मानो सब ओर हास्यकी छटा बिखेर रही थी। उस यमुना में एक कालिय नागका कुण्ड था, जो विषाग्नि के कणोंसे दूषित होने के कारण अत्यन्त भयंकर हो गया था। श्रीकृष्ण ने उस भयानक कुण्डको देखा। उसकी फैलती हुई विषाग्नि से तटके बड़े-बड़े वृक्ष दग्ध हो गये थे। वायु के आघात से जो जल में हिलोर उठती थी और उससे जो जल के छींटे चारों ओर पड़ते थे, उनका स्पर्श हो जानेपर पक्षी जलकर भस्म हो जाते थे। वह महाभयंकर कुण्ड मृत्युका दूसरा मुख था। उसे देखकर भगवान् मधुसूदन ने सोचा- 'इस कुण्ड के भीतर दुष्ट्त्मा कालिय नाग रहता है, जिसका विष ही शस्त्र है। इसने यहाँ सागरगामिनी यमुनाका सारा जल दूषित कर दिया है। प्यास से पीड़ित मनुष्य अथवा गौएँ इस जलका उपयोग नहीं कर सकते। अत: मुझे नागराज कालियका दमन करना चाहिये, जिससे सदा भयभीत रहनेवाले व्रजवासी यहाँ सुखपूर्वक विचर सकें। मैंने मनुष्यलोक में इसीलिये अवतार धारण किया है कि इन कुमार्गगामी दुरात्माओं को दण्ड देकर राहपर लाऊँ। वहाँ पास ही बहुत-सी शाखाओं से सम्पन्न कदम्बका वृक्ष है। उसीपर चढ़कर जीवोंका नाश करनेवाले इस सर्पके कुण्ड में कूदूँगा।'

ऐसा निश्चय करके भगवान् ने अच्छी तरह कमर कस ली और वे वेगपूर्वक नागराज के कुण्ड में कूद पड़े। उनके कूदने से वह महान् कुण्ड क्षुब्ध हो उठा। पानी की ऐसी हिलोर उठी कि बहुत दूरके वृक्ष भी भीग गये। सर्पकी

 विषाग्निद्वारा तपे हुए जलसे भीगने के कारण वे सभी वृक्ष सहसा जल उठे। चारों दिशाओं में आग की लपटें फ़ैल गयीं। उस नागकुण्ड में पहुँचकर श्रीकृष्ण ने अपनी भुजाओं पर ताल ठोंकी। उसका शब्द सुनकर नागराज उनके पास आया। उसके नेत्र क्रोध से लाल हो रहे थे। उसके फणों से विषाग्नि की लपटें निकल रही थीं। और भी बहुत-से विषैले नाग उसे घेरे हुए थे। सैकड़ों नागपत्नियाँ भी वहाँ उपस्थित थी, जो मनोहर हार पहनकर बड़ी शोभा पा रही थीं। उनके अङ्गो हिलने-डुलनेसे कानों के चञ्चल कुण्डल झिलमिला रहे थे। सर्पों ने श्रीकृष्ण को अपने शरीर में लपेट लिया और वे विष की ज्वाला से भरे हुए मुखों द्वारा उन्हें डसने लगे। श्रीकृष्ण को कुण्ड में पकड़कर नाग के फणों से पीड़ित होते देख ग्वाल-बाल व्रज में दौड़े आये और शोकाकुल होकर रोते हुए बोले- 'व्रजवासियो! श्रीकृष्ण कालियहृदमें डूबकर मुर्च्छित हो गये हैं। नागराज उन्हें खाये लेता है। तुम जल्दी आओ, विलम्ब न करो।'

यह बात सुनकर मानो गोपोंपर वज्र टूट पड़ा। समस्त गोप और यशोदा आदि गोपियाँ तुरंत कालियहृदपर दौड़ी आयीं। 'हाय, हाय, प्यारे कृष्ण कहाँ हैं?' इस प्रकार विलाप करती हुई गोपियाँ अत्यन्त व्याकुल हो उठीं और यशोदा के साथ गिरती-पड़ती हुई वहाँ आयीं। नंगोप, अन्य गोपगण तथा अद्भुत पराक्रमी बलराम भी श्रीकृष्ण को देखने के लिए तुरंत यमुनातटपर जा पहुँचे। पुत्रका मुँह देखकर नन्दगोप और माता यशोदा दोनों जडवत् हो गये। अन्यान्य गोपियाँ भी शोक से आतुर हो रोती हुई श्रीकृष्ण की ओर देखने लगीं। वे भयसे कातर हो गद्गद् वाणी में प्रेमपूर्वक बोलीं- 'हम सब लोग यशोदा के साथ नागराज के महान् कुण्ड में प्रवेश करें। अब व्रजमें लौटना हमारे लिए उचित नहीं है। भला, सूर्यके बिना दिन और चन्द्रमा के बिना रात कैसी। दूध के बिना गौएँ और श्रीकृष्ण के बिना व्रज किस कामका। हम श्रीकृष्ण के बिना गोकुल में नहीं जाएँगी।'

               गोपियाँ के ये वचन सुनकर रोहिणीनन्दन महाबली बलराम ने देखा- गोपगण बहुत दु:खी हैं। इनकी आँखें आसुओं से भीगी हुई हैं। नन्दजी भी पुत्र के मुखपर दृष्टि लगाये अत्यन्त कातर हो रहे हैं और यशोदा अपनी सुध-बुध खो बैठी हैं। तब उन्होंने अपनी संकेतमयी भाषा में श्रीकृष्ण को उनके महात्म्यका स्मरण दिलाते हुए कहा- 'देवदेवेश्वर! तुम क्यों इस प्रकार मानवभाव व्यक्त कर रहे हो। क्या इस बात को नहीं जानते कि तुम इन मानवों से भिन्न साक्षात् परमात्मा हो? तुम्हीं इस जगत् के केंद्र हो। देवताओं का आश्रय भी तुम्हीं हो। तुम्हीं त्रिभुवन की सृष्टि, पालन और संहार करनेवाले त्रयीमय परमेश्वर हो। हम दोनों इस समय यहाँ अवतीर्ण हुए हैं। इस व्रज में ये गोप-गोपियाँ ही हमारे बान्धव हैं। ये सब-के-सब तुम्हारे लिये दु:खी हो रहे हैं। फिर क्यों अपने इन बन्धुओंकी उपेक्षा करते हो। तुमने मनुष्यभाव अच्छी तरह दिखा लिया। बालोचित चपलता दिखाने में भी कोई कमी नहीं की। अब यह खेल रहने दो और दाँतोंसे ही अस्त्र-शस्त्रोंका काम लेनेवाले इस दुरात्मा नागका दमन करो।'

बलरामजी के द्वारा इस प्रकार स्मरण दिलाये जानेपर श्रीकृष्ण के होठ मंद मुसकान से खिल उठे। उन्होंने अँगडाई लेकर अपने शरीरको साँपों के बन्धन से छुड़ा लिया और दोनों हाथों से उसके बीच के फण को नीचे झुकाकर वे उसीपर चढ़ गये और शीघ्रतापूर्वक पैर चलाते हुए नृत्य करने लगे। श्रीकृष्ण के चरणों के अघात से उस नाग के फण में कई घाव हो गये। वह जिस फण को ऊपर उठाता, उसीको भगवान् अपने पैरों से झुकाकर दबा देते थे। श्रीकृष्ण के द्वारा कुचले जाने से नागको चक्कर आने लगा। वह मुर्च्छित होकर डंडेकी भाँति पृथ्वीपर गिर पड़ा। उसके मस्तक और गर्दन टेढ़े हो गये थे। मुखसे रक्तकी अजस्त्र धारा बह रही थी। यह देखकर नागराज की पत्नियाँ भगवाना मधुसूधन की शरण में गयीं।

नागपत्नियाँ बोलीं - देवदेवेश्वर! हमने आपको ओएह्चान लिया। आप सबके ईश्वर और सबसे उत्तम हैं। अचिन्त्य परमज्योति;स्वरुप जो ब्रह्म है, उसी के अंशभूत आप परमेश्वर हैं। देवता भी जिन स्वयम्भू प्रभु की स्तुति करनेमें समर्थ नहीं हैं, उन्हीं के स्वरूपका वर्णन हम=जैसी साधारण स्त्रियाँ कैसे कर सकती हैं। सम्पूर्ण पृथ्वी, आकाश, जल, अग्नि और वायुरूप यह ब्राह्माण्डजिनके छोटे-से अंशका भी अंश है, उस भगवान् की स्तुति हम कैसे कर सकती हैं। जगन्नाथ! इस बड़े कष्टमें पड़ गयी हैं। आप हमपर कृपा करें। यह नाग अब प्राण त्यागना चाहता है। हमें पतिकी भिक्षा दें।

उनके इस प्रकार स्तुति करनेपर कालिय नागको कुछ आश्वासन मिला। यद्यपि उसका शरीर अत्यन्त शिथिल हो गया था तो भी वह धीरे-धीरे बोला- 'देवदेव! मुझपर प्रसन्न हों। नाथ! आपमें अणिमा आदि आठ ऐश्वर्य स्वाभाविक हैं। आपसे बढ़कर अन्यत्र कहीं भी उनकी स्थिति नहीं है। ऐसे आप परमेश्वर की मैं क्या स्तुति करूँगा। आप पर हैं। पर (मूल-प्रकृति)- के भी आदि कारण हैं। परकी प्रवृत्ति भी आपसे ही हुई है। परात्मन्! आप पर से भी पर हैं। फिर मैं कैसे आपकी स्तुति कर सकता हूँ। ईश्वर! आपने जाति, रूप और स्वभाव से मुझे जैसा बनाया है, उसके अनुसार ही मैंने यह चेष्टा की है। देवदेव! यदि इन सबके विपरीत कोई चेष्टा करूँ तो मुझे दण्ड देना उचित हो सकता है क्योंकि आपका ऐसा ही आदेश है तथापि आप जगत् के स्वामी हैं। आपने मुझको जो दण्ड दिया है, उसे मैंने सहर्ष स्वीकार किया; क्योंकि आपसे मिला हुआ दण्ड भी वरदान है। अब मेरे लिए दूसरे वरकी आवश्यकता नहीं है। अच्युत! आपने मेरे बलका नाश किया, मेरे विषको भी हर लिया और पूर्णरूप से मेरा दमन भी कर दिया। अब एकमात्र जीवन रह गया है। उसे छोड़ दीजिए और कहिये, आपकी क्या सेवा करूँ?'

श्रीभगवान् बोले - 'सर्प! अब तुम्हें यहाँ यमुनाजल में कदापि नहीं रहनाचाहिये। अपने भृत्य और परिवार के साथ समुद्रके जल में चले जाओ। नाग! तुम्हारे मस्तकपर मेरे चरणचिह्न देखकर नागोंके शत्रु गरुड़ तुमपर प्रहार नहीं करेंगे।'

यों कहकर भगवान् श्रीहरि ने नागराज को छोड़ दिया। वह भी श्रीकृष्णको प्रणाम करके समुद्रको चला गया। उसने सके देखते-देकते सेवक, संतान, बन्धु-बांधव और पत्नियों के साथ सदा के लिए वह कुण्ड त्याग दिया। सर्पके चले जानेपर गोपोंने दौड़कर श्रीकृष्णको छातीसे लगा लिया, मानो वे मरकर पुन: लौट आये हों। उनके नेत्रोंसे आँसू निकलकर श्रीकृष्ण के मस्तक पर गिरने लगे। कुछ गोप विस्मित होकर श्रीकृष्ण की स्तुति करने लगे। यमुना नदीका जल विषसे रहित हो गया- यह देख समस्त गोपों को बड़ी प्रसन्नता हुई। गोपियाँ श्रीकृष्ण की मनोहर लीलाओं का गान करनेलगीं और ग्वाल-बाल उनके गुणों की प्रशंसा करने लगे।  उन सबके साथ श्रीकृष्ण व्रज में आये।