ब्रह्म पुराण

62 - किष्किन्धातीर्थ और व्यासतीर्थकी महिमा

ब्रह्माजी कहते हैं - किष्किन्धातीर्थ बहुत विख्यात है। वह मनुष्यों की सम्पूर्ण कामनाओंको पूर्ण करनेवाला और समस्त पापोंको शान्त करनेवाला है। वहाँ भगवान् शंकर निवास करते हैं। नारद! उस तीर्थ के स्वरुपका वर्णन करता हूँ, भक्तिपूर्वक सुनो। पूर्वकाल में दशरथनन्दन भगवान् श्रीराम ने किष्किन्धानिवासी वानरोंको साथ लेकर जब समस्त लोकों को रुलानेवाले रावणको युद्धमें सेना और पुत्रों सहित मार डाल, तब सीताको पुन: प्राप्त करके अपने भाई लक्ष्मण, महाबली वानर, बलवान् विभीषण और देवताओं के साथ वे स्वस्तिवाचनपूर्वक पुष्पकविमानसे अयोध्याकी ओर लौटे। पुष्पकविमानसे अयोध्याकी ओर लौटे। पुष्पकविमान कुबेरका था। वह शीघ्रगामी और इच्छानुसार चलनेवाला था। भगवान् राम शत्रुओंका संहार करनेवाले और शरणार्थी पुरुषोंको शरण देनेवाले थे। उन्होंने विमानसे अयोध्या लौटते समय मार्ग में लोकपावनी गौतमी गङ्गाको देखा, जो समस्त अभीष्ट वस्तुओंको देनेवाली तथा मैन और नेत्रोंके संताप निवारण करनेवाली हैं। गङ्गाजी का दर्शन करके महाराज श्रीराम उनके तटपर उतरे और हनुमान् आदि सम्पूर्ण वानरोंको सम्बोधित करके हर्षगद्गद वाणी में कहने लगे- 'ये गौतमी गङ्गा सम्पूर्ण जीवों की जननी हैं। ये भोग तो देती ही हैं, मोक्ष भी दे सकती हैं। भयंकर पापोंका भी संहार कर डालती हैं। इनकी समानता करनेवाली दूसरी कौन नदी है, जिन्हें महर्षि गौतमने सबको शरण देनवाले भगवान् शंकर की आराधना करके जटासहित प्राप्त किया था। ये सम्पूर्ण अभिलक्षित फलों की जननी और अमङ्गलोंका नाश करनेवाली हैं। ये समस्त संसारको पवित्र करनेमें समर्थ हैं। समस्त सरिताओंकी जननी गङ्गाका आज प्रत्यक्ष दर्शन हुआ। मैं मन, वाणी और शरीरद्वारा सदा ही इन शरणागतवत्सला गङ्गाजी की शरण लेता हूँ।'

भगवान् श्रीराम का यह वाकां सुनकर समस्त वानरोंने गङ्गाजी में डुबकी लगायी और सम्पूर्ण लौकिक उपहारों तथा अनेक प्रकार के पुष्पोंद्वारा उनकी विधिवत् पूजा की। महाराज श्रीरामचन्द्रजी ने श्रीमहादेवजी की यथावत् पूजन करके सर्वभावोपयुक्त वाक्यों द्वारा स्तवन किया। सम्पूर्ण वानरों ने भी प्रसन्न होकर नृत्य और गान किया। भगवान् श्रीराम ने अपनी प्रिया जानकी तथा प्रेमी वानरोंके साथ सुखपूर्वक वह रात व्यतीत की। सबेरे उठकर भगवान् अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक गोदावरी देविकी स्तुति करने लगे। फिर अपने भृत्यगणोंका सम्मान करके वे वहाँ अनिर्वचनीय आनन्दका अनुभव करनेलगे। उस निर्मल प्रभात में सूर्योदय होनेपर विभीषणने दशरथनन्दन श्रीराम से कहा- 'भगवन्! हमलोग इस तीर्थमें रहनेसे अभी तृप्त नहीं हुए। अत: कुछ समय और निवास करें। मेरा विचार है, चार रात और यहाँ ठहरें। फिर सब लोग साथ ही अयोध्या चलेंगे।' विभीषणकी बात का वानरोंने भी अनुमोदन किया। फिर भगवान् शिव की पूजा करते हुए चार रात और ठहरे। वहाँ महादेव जी सिद्धेश्वरके नामसे प्रसिद्ध थे और उन्हींके प्रभावसे रावण अत्यन्त प्रबल हो गया था। इस प्रकार सब लोग अपने द्वारा स्थापित किये हुए शिवलिङ्गकी पूजा करते हुए पाँच दिनों तक वहाँ ठहरे रहे। श्रीराम ने अपने सम्पूर्ण सहायकोंके साथ शुद्धातिशुद्ध हृदयसे सम्पूर्ण शिवलिङ्गोंको मस्तक झुकाया। किष्किन्धानिवासी सभी वानरोंद्वारा सेवित होनेके कारण वह स्थान किष्किन्धातीर्थ कहलाया। वहाँ स्नान करनेमात्रसे बड़े-बड़े पाप भी नष्ट हो जाते हैं। भगवान् गौतमी गङ्गाको भक्तिपूर्वक प्रणाम किया उअर कहा- 'माता गौतमी! मुझपर प्रसन्न होओ।' इस तरह बारंबार कहकर वे विस्मित चित्त से गोदावरीको देखते और उन्हें प्रणाम करते जाते थे। तबसे विद्वान पुरुष उस पुण्यमय तीर्थको किष्किन्धातीर्थ कहने लगे। जो इस प्रसङ्गका पाठ, स्मरण अथवा भक्तिपूर्वक श्रवण करता है, उसके पाप को भी यह तीर्थ हर लेता है। फिर जो लोग वहाँ स्नान और दान करते हैं, उनके लिए तो कहना ही क्या है।

उसके बाद व्यासतीर्थ और प्राचेतसतीर्थ हैं। उनका महात्म्य बतलाता हूँ, सुनो। मेरे दस मनस पुत्र हुए, जो जगत् की सृष्टी करनेवाले थे। वे पृथ्वीका अन्त कहाँ है- इस बातका पता लगाने के लिए चले गये। तब मैंने पुन: अन्य पुत्रोंको उत्पन्न किया, किन्तु वे भी अपने भाईयों की खोज करने के लिए चले गये। जो पहले के गये थे, वे तो गये ही थे; ये भी लौटकर नहीं आये। उस समय परम बुद्धिमान् दिव्य आङ्गिरस नामक मुनि उत्पन्न हुए, जो वेद-वेदाङ्गो के तत्त्वको जाननेवाले और सम्पूर्ण शास्त्रमें प्रवीण थे। वे अङ्गिराकी आज्ञासे पिता को नमस्कार करके तपस्या के लिए उद्यत हुए। गुरुजनोंमें गौरवकी दृष्टि माताका स्थान सबसे ऊँचा है तो भी माता से बिना पूछे ही आङ्गिरसोंने तपस्या करनेका निश्चय कर लिया। इससे कुपित्त होकर माता ने अपने पुत्रों को शाप दिया- 'जो पुत्र मेरी अवहेलना करके तपस्या में प्रवृत्त हुए है, उन्हें किसी प्रकार सिद्धि नहीं प्राप्त होगी।' आङ्गिरसों ने अनेकों देशों में जाकर तपस्या की, किन्तु उन्हें कहीं भी सिद्धि न मिली। वे सब इधर-उधर दौड़ते रहे, परन्तु सभी स्थानों में कोई-न-कोई विघ्न आ जाता था।कहीं राक्षसों से, कहीं मनुष्यों से, कहीं युवती स्त्रियोंसे और कहीं अपने शरीर के ही दोष से तपस्या में विघ्न पड़ जाता था। इस प्रकार भटकते हुए सब आङगिरस तपस्वियोंमें श्रेष्ठ अगस्त्यजी के पास गये और उन्हें नमस्कार करके विनीत भावसे बोले- 'भगवन्! हम अनेक उपायों से बारंबार प्रयत्न करते हैं तो भी किस दोष से हमारी तपस्या सिद्ध नहीं होती? आप तपस्या में सबसे बढ़े-चढ़े हैं; अत: कोई उपाय हो तो बताएँ। ब्रह्मन्! आप ज्ञानियों में भी ज्ञानी, वक्ताओं में भी श्रेह्स्थ वक्ता, संयमी पुरुषों में भी सबसे अधिक शान्त, दयावान्, प्रियकारी, क्रोधशून्य तथा द्वेषसे रहित हैं। अत: हमने जो पूछा है, उसे बताइये। जो अहंकारी, दयाहीन, गुरु-द=सेवारहित, असत्यवादी और क्रूर हैं, वे तत्त्वको नहीं जानते।'*

अगस्त्यने थोड़ी देर तक ध्यान किया, उसके बाद उन सब लोगों से धीरे-धीरे कहा- 'आपलोग शान्तचित्त महात्मा हैं। ब्रह्माजीने आपको प्रजापति बनाया है। अबतक आप लोगोंकी तपस्या पूर्ण नहीं हुई- इसमें कोई-न-कोई कारण अवश्य है। आपलोग उस कारणका स्मरण करें। ब्रह्माजी ने पहले जिन मानस पुत्रों को उत्पन्न किया था, वे चले गये और बहुत सुखी हुए; परन्तु जो उनकी खोज में गये, वे ही फिर आङ्गिरस हुए हैं। वे ही आप लोग हैं, जो समय पाकर इस रूप में आये हैं। आप धीरे-धीरे प्रयत्न करते रहें तो प्रजापतिसे भी बढ़-चढ़कर हो जाएँगे- इसमें तनिक भी संदेह नहीं है। यहाँ से तपस्या करनेके लिए आप त्रिभुवनपावनी गङ्गाके तटपर जाएँ। संसार में शिववल्लभा गङ्गाके सिवा दूसरा कोई सिद्धिका उपाय नहीं है। वहाँ पावन प्रदेश में आश्रम के भीतर ज्ञानद गुरुकी पूजा करें। वे आपलोगोंके सब संशयोंका निवारण करेंगे।'

तब आङ्गिरसोंने महर्षि अगस्त्यसे पूछा- 'ज्ञानद किसको कहते हैं? ब्रह्मा, विष्णु, महेश, आदित्य, चन्द्रमा, अग्नि और वरुण- इनमें कौन ज्ञानद है?' अगस्त्यजी ने फिर कहा- 'ज्ञानदका स्वरुप बतलाता हूँ' सुनो। जो जल है, वाही अग्नि है। जो अग्नि है, वही सूर्य कहलाता है। जो सूर्य हिया, वही विष्णु है और जो विष्णु है, वही सूर्य। जो ब्रह्मा हैं, वही रूद्र हैं। जो रूद्र हैं, वाही सब कुछ हैं। इस प्रकार जिसको एककी सर्वरूपताका ज्ञान हो, उसीको ज्ञानद कहते हैं। देशिक, प्रेरक, व्याख्याकार, उपाध्याय और शरीरका जनक आदि बहुत-से गुरु हैं; किन्तु उनमें जो ज्ञानदाता गुरु है, वह सबसे बड़ा है। यहाँ उस ज्ञानकी बात कही गयी है, जिससे भेद-बुद्धिका नाश हो। एकमात्र अद्वितीय शिव ही सब कुछ हैं। विद्वान ब्राह्मण उन्हीं का इन्द्र, इतर और अग्नि आदि अनेक नामों से वर्णन करते हैं। अनेक नाम और अनेक रूपों में जो भगवान् के तत्त्वका वर्णन किया जाता है, वह अज्ञानीजनोंका उपकार करनेके लिए है।'

मुनिका यह वचन सुनकर वे गाथा-गान करते हुए वहाँ से चले गये। उनमेंसे पाँच तो उत्तर-गङ्गा के तटपर गये और पाँच दक्षिण-गङ्गाके। वहाँ महर्षि अगस्त्यके बताये हुए देवताओंकी विधिपूर्वक पूजा करने लगे। विशेषत: आसनोंपर बैठकर वे तत्त्वका विचार किया करते थे। इससे उनके ऊपर समस्त देवता प्रसन्न हुए और बोले- 'विश्वयोनि ब्रह्माजीने युग के आदिमें जो स्त्रष्टाके पदकी कल्पना की थी, वह इसलिये कि अधर्मों की निवृत्ति हो, वेदों की स्थापना हो, सम्पूर्ण लोकों का उपकार हो, धर्म, अर्थ और काम की सिद्धि हो तथा पुराण, स्मृति, वेद और धर्मशास्त्रों के अर्थका ठीक-ठीक निश्चय हो। इसके अनुसार तुम सब लोगोंको जगत्-स्त्रष्टाका पद प्राप्त होगा। तुम सब उस पदके अनुरूप होओगे।' नारद! वे क्रमशः धीरे-धीरे प्रजापति होंगे। जब अधर्म बढ़ेगा, वेदों का पराभव होगा और उनपर संकट आएगा, उस समय वेदों का उद्धार करनेके लिए वे भावी व्यास होंगे। गङ्गाका उत्तम तट ही उनकी तपस्याका उत्तम स्थान होगा और वहाँ शिव, विष्णु, मैं, सूर्य, अग्नि और जल- ये सब उपस्थित रहेंगे। इनसे बढ़कर पवित्र और इनसे श्रेष्ठ कहीं कुछ भी नहीं है। केवल परब्रह्म ही इन सबके आकारों में प्रकट हुआ है। सर्वस्वरुप शिव, जो व्यापक तथा सम्पूर्ण भावपदार्थोंका रूप धारण करनेवाले हैं, समस्त प्राणियों पर कृपा करनेके लिए उस तीर्थ में विशेष रूप से रहते हैं। उनके साथ सम्पूर्ण देवता भी निवास करते हैं। भगवान् शिव सबपर अनुग्रह केनेवाले हैं। वे आङ्गिरस धर्मव्यास और वेदव्यास के नामसे प्रसिद्ध होंगे। उनका तीर्थ भी व्यासतीर्थ के नामसे ही तीनों लोकों में विख्यात है। व्यासतीर्थ बहुत ही उत्तम है। उसका जल पापरूपी कीचड़को धोनेवाला, मोहरूप अन्धकार और मदका नाश करनेवाला तथा मनुष्यों को सब प्रकार की सिद्धि देनेवाला है।

            * साहंकारा दयाहीना गुरुसेवाविवर्जिता:। असत्यवादिन: क्रूरा न ते तत्त्वं विजानते ॥

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