व्यासजी कहते हैं - नरकासुर के सेवकों ने जो हाथी, घोड़े, धन, रत्न तथा स्त्रियों को द्वारका में पहुँचाया था, वह सब श्रीकृष्ण ने ले लिया।शुभ मुहूर्त्त आनेपर जनार्दन ने नरकासुर के महल से लायी हुई समस्त कन्याओं के सतह विवाह किया।एक ही समय श्रीगोविन्द ने अनेक रूप धारण करके उन सबका स्वधर्म के अनुसार विधिपूर्वक पाणिग्रहण किया। सोलह हजार एक सौ स्त्रियाँ थीं, अत: भगवान् मधुसूदन ने भी उतने ही रूप धारण किये थे। प्रत्येक कन्या यह समझती थी कि भगवान् श्रीकृष्ण केवल मेरा पाणिग्रहण किया है। जगत्की सृष्टि करनेवाले विश्वरूप धारी श्रीहरि रात्रि के समय उन सभी स्त्रियों के महलों में निवास करते थे।
श्रीहरिके रुक्मिणी के गर्भ से उत्पन्न हुए प्रद्युम्न आदि पुत्रों की चर्चा पहले की जा चुकी है। सत्यभामा ने भानु आदि पुत्रों को जन्म दिया। जाम्बवती से साम्ब आदि का जन्म हुआ। नागनजिती (सत्य)- से भद्रविन्द आदि और शैब्या (मित्रविंदा)- से संग्रामजित् आदि पुत्र उत्पन्न हुए। माद्रीके गर्भसे वृक आदिका जन्म हुआ। लक्ष्मणा ने गात्रवान् आदि पुत्र प्राप्त किये। कालिन्दी से श्रुत आदि की उत्पत्ति हुई। इसी प्रकार भगवान् की अन्य पत्नियों के गर्भ से जो पुत्र उत्पन्न हुए थे, उन सबकी संख्या अठ्ठासी हजार आठ सौ लगभग थी। रुक्मिणीनन्दन प्रद्युम्न श्रीकृष्ण के समस्त पुत्रों में श्रेष्ठ थे। प्रद्युम्नसे अनुरुद्ध और अनिरुद्धसेवज्रका जन्म हुआ। अनुरुद्ध संग्राम में कभी रुकते नहीं था। वे बड़े बलवान् थे। उन्होंने बलिकी पौत्री और बाणासुर की पुत्री उषा के साथ विवाह किया था। उस विवाह में भगवान् श्रीकृष्ण तथा शंकर में बड़ा भयंकर युद्ध हुआ था। उसस अमे श्रीर्किष्ण ने चक्र से बाणासुर की सहस्त्र भुजाएँ काट डालीं।
मुनियों ने पूछा - ब्रह्मन्! उषाके लिए महादेवजी तथा श्रीकृष्ण में युद्ध क्यों हुआ तथा श्रीहरि ने बाणासुर की भुजाओं का उच्छेद क्यों किया? महाभाग! आप यह सम्पूर्ण वृतान्त हमें बताइये। इस सुन्दर कथाको सुनने के लिये हमें बड़ा कौतूहल हो रहा है।
व्यासजी ने कहा - ब्राह्मणों! बाणासुरकी पुत्री उषाको स्वप्नमें किसी पुरुष ने आलिङ्गन किया। उषा का भी उसके प्रति अनुराग हो गया। इतने में ही उसकी नींद खुल गयी। जागनेपर उस पुरुष को न देखने के कारण उषा उत्कण्ठित होकर बोल उठी- 'प्यारे! तुम कहाँ चके गये?' उस समय उसे लज्जा का ध्यान न रहा। बाणासुर के मन्त्री कुम्भाण्ड के एक कन्या थी, जिसका नाम चित्रलेखा था। वह उषाकी सखी थी। उसने पूछा- 'राजकुमारी! तुम किसे पुकारती हो?' यह सुनकर वह लाज से गड-सी गयी। मुँहसे एक शब्द भी बोल न सकी। तब चित्रलेखा ने उसे बहुत विश्वास दिलाया और सब बातें उसके मुखसे निकलवा लीं। चित्रलेखा को जब यथार्थ बात मालूम हो गयी, तब उषा ने उससे कहा- 'पार्वतीदेवी ने मुझे इसी प्रकार पतिकी प्राप्ति होनेका वरदान दिया है; अत: तुम उस पुरुष को प्राप्त करने के लिये जो उपाय हो सके, उसे करो।'
तब चित्रलेखा ने एक पटपर प्रधान-प्रधान देवताओं, दैत्यों, गन्धर्वों और मनुष्यों का छोत्र लिखकर उषा को दिखाया। उषा ने गन्धर्वों, नागों देवताओं और दैत्यों को छोड़कर मनुष्यों की ओर दृष्टि दी। उनमें भी अन्धक और वृष्णिवंशों के लोगों पर विशेष श्यान दिया। श्रीकृष्ण और बलराम के चित्रों को द्केह्कर वह सुन्दरी कुछ लज्जित हो गयी। प्रद्युम्न को देखने पर उसने लज्जा से आँखें फेर लीं, परंतु अनिरुद्धपर दृष्टि पड़ते ही न जाने उसकी लज्जा कहाँ चली गयी। वह सहसा बोल उठी- 'ये ही हैं, ये ही मेरे प्रियतम हैं।' उषा के यों कहनेपर योगगामिनी चित्रलेखा उसे सान्त्वना दे द्वारकापुरी को गयी।
एक बार बाणासुर ने भगवान् शंकरको प्रणाम करके कहा था- 'देव! युद्ध के बिना इन हजार भुजाओं से मुझे बड़ा खेद हो रहा है; क्या कभी ऐसे युद्धका अवसर आएगा, जब कि ये मेरी भुजाएँ सफल होंगी?' यदि युद्ध न हो तो इन भुजाओंसे क्या लाभ। फिर तो ये मेरे लिये भाररूप ही सिद्ध होंगी। यह सुनकर महादेवजी ने कहा- 'जिस समय तुम्हारी मयूर- चिह्नवाली ध्वजा टूट जाएगी, उसस समय तुम्हें वैसा युद्ध प्राप्त होगा।' इससे बाणासुरको बड़ी प्रसन्नता हुई।वह भगवान शिव को प्रणाम करके घर चला आया। कुछ काल के बाद उसकी मयूर-ध्वजा टूटकर गिर गयी। यह देखकर उसके हर्षकी सीमा न रही। इसी समय चित्रलेखा अपनी योगविद्या के बल से अनिरुद्ध कन्याके अन्त:पुर में उषाके साथ विहार करने लगे। यह बात अन्त:पुर के रक्षकों को मालूम हो गयी। उन्होंने दैत्यराजसे सब हाल कह सुनाया। बाणासुर ने अपने सेवकों को अनुरुद्धसे युद्ध करनेकी आज्ञा दी, किन्तु शत्रुवीरोंका दमन करनेवाले अनिरुद्धने लोहे का परिघ लेकर उन सबको मार डाला। सेवकों के मारे जानेपर बाणासुर स्वयं ही रथपर आरुढ़ हो अनिरुद्धका वध करनेके लिए उद्यत हुआ। अपनी शक्तिभर युद्ध करनेपर भी जब उसे वीरवर अनिरुद्धजी ने परास्त कर दिया, तब वह मन्त्री की प्रेरणासे मायाद्वारा युद्ध करने लगा। इस प्रकार उसने यदुनन्दन अनुरुद्ध को नागपाशसे बाँध लिया।
उधर द्वारका में अनिरुद्ध की खोज हो रही थी। समस्त यदुवंशी आपस में कह रहे थे कि 'अनिरुद्ध सहसा कहाँ चले गये?' उसी समय देवर्षि नारद जी द्वारका में पहुँचे और उन्होंने बताया कि 'आनिरुद्धको बाणासुर ने शोणितपुर में बाँध रखा है। उन्हें योग विद्या में चतुर युवती चित्रलेखा अपने साथ ले गयी थी।' यदुवंशियों को इस बातपर विश्वास हो गया। फिर तो भगवान् श्रीकृष्ण ने गरुड़ का आवाहन किया। वे स्मरण करते ही आ पहुँचे। भगवान् श्रीकृष्ण बलराम और प्रद्युम्न के साथ गरुड़ पर आरूढ़ हो बाणासुर के नगर में गये। पुरीमें प्रवेश करते समय महाबली प्रमथों के साथ उनका युद्ध हुआ। श्रीहरि उन सबका प्रमथों के साथ उनका युद्ध हुआ। श्रीहरि उन सबका संहार करके बाणासुर के भवन के निकट गये। तत्पश्चात् तीन पैर और तीन मस्तक वाले महेश्वर ज्वर ने बाणासुर की रक्षा के लिये शार्ङ्गधन्वा श्रीकृष्ण के साथ युद्ध किया। उसके फेंके हुए भस्म के स्पर्श से श्रीकृष्ण का शरीर संतप्त हो उठा और उससे छू जानेपर बलदेवजी ने भी शिथिल होकर अपने नेत्र मूँद लिए। इस प्रकार श्रीकृष्ण के साथ युद्ध करते हुए महेश्वर ज्वरपर शीघ्र ही वैष्णव ज्वरने आक्रमण किया और उसको भगवान् के शरीर से बाहर निकाल दिया। उस समय भगवान् नारायण की भुजाओं के आघात से माहेश्वर ज्वर को बड़ी पीड़ा हुई। वह व्याकुल हो उठा। यह देख पितामह ब्रह्माजी ने आकार कहा- 'भगवन्! इसे क्षमा कीजिये।' भगवान् बोले- 'अच्छा, मैंने क्षमा कर दिया।' यों कहकर उन्होंने वैष्णव ज्वरको अपने में ही लीन कर लिया। तब महेश्वर ज्वरने कहा- 'भगवन्! जो मनुष्य आपके साथ मेरे युद्धका स्मरण करेंगे, वे ज्वरहीन हो जायेंगे।' यों कहकर वह चला गया।
तदनन्तर भगवान् श्रीकृष्ण ने पाँच अग्नियों को जीतकर उन्हें नष्ट कर डाला और दानवों किसना का खेल-खेल में ही विध्वंस कर दिया, यह देख बालिकुमार बाणासुर सम्पूर्ण दैत्यों की सेना साथ ले भगवान् से युद्ध करने लगा। भगवान् शिव तथा कार्तिकेयजी ने भी उसका साथ दिया। शिरहरि तथा शंकरजी में बड़ा भयंकर युद्ध हुआ। उनके चलाये हुए नाना प्रकार के अस्त्र-शस्त्रों की मार से पीड़ित हो समस्त लोक क्षुब्ध हो उठे। उस महायुद्ध को होते देख देवताओं ने समझा 'निश्चय ही समस्त संसार के लिये प्रलयकाल आ गया।' तब भगवान् श्रीकृष्ण ने जृम्भणास्त्र के द्वारा शंकर जी को स्तब्ध कर दिया। वे युद्ध छोड़कर जँभाई लेने लगे। यह देख दैत्य और प्रमथगण चारों दिशाओं में भाग गये। भगवान् शंकर जृम्भासे विवाद हो रथ के पिछले भाग में बैठ गये। उस समय वे अन्यास ही सब कुछ करनेवाले श्रीकृष्ण के साथ युद्ध न कर सके। गरुड़ ने कार्तिकेयकी भुजाओं को क्षत-विक्षत कर दिया। प्रद्युम्न ने भी अपने अस्त्र-शस्त्रों से उन्हें पीड़ित किया तथा श्रीकृष्ण के हुंकार से उनकी शक्ति नस्त हो गयी; अत: वे युद्धसे भाग गये।
इस प्रकार जब महादेवजी जँभाई लेने लगे, दैत्यसेना नष्ट हो गयी, कार्तिकेयजी परास्त हो गये और प्रमथों (रूद्रके गणों) - का संहार हो गया, तब श्रीकृष्ण, प्रद्युम्न और बलरामजी के साथ युद्ध करने के लिए एक विशाल रथ पर आरुढ़ हो बाणासुर वहाँ आया। साक्षात् नन्दीश्वर सारथि बनकर उसके घोड़ों की बागडोर सँभाले हुए थे। महापराक्रमी बलभद्र और प्रद्युम्न ने अनेकों बाणों से बाणासुर की सेनाको बींध डाला। वह सेना वीरधर्म से भ्रष्ट होकर रणभूमि से भागने लगी। बाणासुर ने देखा उसकी सेना को बलरामजी हल से खींचकर मूसल से मारते हैं और भगवाना श्रीकृष्ण भी उसे अपने बाणों का निशाना बनाते हैं। तब उसका श्रीकृष्ण के साथ घमासान युद्ध छिड़ गया। दोनों एक-दूसरे पर कवच को भी छेद डालनेवाले तेजस्वी बाण छोड़ने लगे। भगवाना श्रीकृष्ण ने बाणासुर के चलाये हुए बाणों को अपने सायकों से छिन्न-भिन्न कर डाला।फिर बाणासुर ने श्रीकृष्ण को और श्रीकृष्ण ने बाणासुरको घायल किया। दोनों एक -दूसरे को जीतने की इच्छासे परस्पर अस्त्र-शस्त्रों की बौछार कर रहे थे। जब सम्पूर्ण अस्त्र-शस्त्र छिन्न-भिन्न हो गये तब भगवाना श्रीकृष्ण ने बाणासुर को मरने का निश्चय किया। उन्होंने सैकड़ों सूर्यों के समान तेजस्वी सुदर्शन चक्र हाथ में लिया और बाणासुर को लक्ष्य करके चला दिया। वे शत्रुकी भुजाओं को काट डालना चाहते थे। श्रीकृष्ण के द्वारा प्रेरित चक्र ने क्रमशः उस असुरकी भुजाओंका उच्छेद कर डाला। जब बाणासुरकी भुजाओंका जङ्गल कट गया तब भगवान् श्रीकृष्ण ने उसका नाश करनेके लिये चक्र हाथ में लिया वे उसे छोड़ना हो चाहते थे कि भगवान् शंकर को उनका मनोभाव ज्ञात हो गया। तब वे तुरंत कूदकर भगवान् के सामने आ गये। उन्होंने देखा भुजाओं के कट जानेसे बाणासुर के शरीर से रक्तकी धारा गिर रही है। तब शांतिपूर्वक भगवान् की स्तुति करते हुए कहा- कृष्ण! कृष्ण!! जगन्नाथ!!! मैं आपको जानता हूँ। आप पुरुषोत्तम, परमेश्वर, परमात्मा और आदि-अन्त से रहित परब्रह्म हैं। आप जो देवता, पशु-पक्षी तथा मनुष्यों की योनि में शरीर धारण करते हैं, यह आपकी लीलामात्र है। आपकी चेष्टा दैत्योंका वध करनेके लिए होती है। प्रभो! प्रसन्न होएये। मैंने बाणासुरको अभय दे रखा है। आपको भी मेरी बात असत्य नहीं करनी चाहिये। मेरा आश्रय पाने से यह दैत्य बहुत बढ़ गया है। वास्तव में यह आपका अपराधी नहीं है। मैंने ही इसे वरदान दिया था, अत मैं ही इसके लिए आपसे क्षमा चाहता हूँ।'
भगवान् शंकर के यों कह्नेपर भगवान् श्रीकृष्णका मुख प्रसन्न हो गया। बाणासुर के प्रति उनके मन में कोई अमर्ष नहीं रह गया। उन्होंने शिवजी से कहा- 'शंकर! यदि आपने इसे वर दे रखा है तो यह बाणासुर जीवित रहे। आपके वचनों का गौरव रखनेके लिए हमने अपना चक्र लौटा लिया है। शंकर! आपने जो अभयदान दिया है, वह मैंने भी दिया। आप अपने को मुझसे पृथक् न देखें। जो मैं हूँ, वही आप हैं और वही यह देवता, असुर तथा मनुष्यों सहित सम्पूर्ण जगत् भी है। जिनका चित्त अविद्या से मोहित है, वे ही पुरुष भेददृष्टि रखनेवाले होते हैं।'*
यों कहकर भगवान् श्रीकृष्ण अनुरुद्ध के पास गये। उनके जाते ही अनुरुद्ध को बाँधनेवाले नाग भाग खड़े हुए। गरुड़ के पंखों की हवा लगने से वे सूख गये थे। तदनन्तर पत्नीसहित अनिरुद्धको गरुड़पर चढ़ाकर भगवान् श्रीकृष्ण, बलराम और प्रद्युम्न द्वारकापुरी में आये।
* त्वया यद्भयं दत्तं तद्यत्तंभयं मया। मत्तोऽविभिन्नमत्मानं द्रष्तुमर्हसि शंकर ॥
योऽहं स त्वं जगच्चेदं सदेवासुरमानुषम्। अविद्यामोहितात्मान: पुरुषा भिन्नदर्शिन: ॥
(२०६।४७-४८)
Summary of chapter 80 of the [[BOOK_TITLE]] is as follows:
After the Govardhana episode, Indra himself descends to honor Kṛṣṇa and, accompanied by Surabhi (the divine cow), performs an abhiṣeka (coronation bath), installing Kṛṣṇa as lord of all cows and granting him the name Govinda. The chapter marks Kṛṣṇa's formal recognition by Indra as supreme and is a transitional moment moving toward Kṛṣṇa's departure from Vṛndāvana.