ब्रह्म पुराण

60 - खड्गतीर्थ और आत्रेयतीर्थकी महिमा

ब्रह्माजी कहते हैं - गौतमी के उत्तर-तटपर खड्गतीर्थ है, जहाँ स्नान और दान करनेसे मनुष्य मोक्षका भागी होता है। नारद! मैं वहाँ का वृत्तान्त बतलाता हूँ। पैलूष नाम से विख्यात एक ब्राह्मण थे, जो कवषके पुत्र थे। वे कुटुम्बके भारसे विवश हो धनके लिए इधर-उधर दौड़ा करते थे, किन्तु उन्हें कहीं से भी कुछ नहीं मिलता था। दैव तो अत्यन्त विमुख था ही, पुरुषार्थ भी निष्फल हो गया। इससे पैलूषको बड़ा वैराग्य हुआ। वे सोचने लगे- 'यह तृष्णा मुझे बलपूर्वक पापकी ओर खींचता है। तृष्णे! तूने मेरे अज्ञानवश बड़ा अपकार किया है, किन्तु अब तुझे दूरसे ही नमस्कार है।' यह सोचकर बुद्धिमान् पैलूषने मन-ही-मन विचार किया- 'इस तृष्णाका नाश करनेके लिए क्या होना चाहिये?' फिर उन्होंने अपने पिता कवषसे पूछा- 'तात! मैं ज्ञानरुपी खड्गसे क्रोध और लोभ का तथा अत्यन्त दुस्तर संसार का कैसे छेदन करूँ? इसका उपाय बतलाइये।'

कवषने कहा - वैदिक श्रुतिका कथन है कि ईश्वरसे ज्ञानकी इच्छा करे; अत: तुम महादेवीजी की आराधना करो। उससे तुम्हें ज्ञान प्राप्त होगा।

'बहुत अच्छा' कहकर पैलूषने ज्ञान-प्राप्तिके उद्देश्यसे महेश्वरकी अर्चना की। इससे संतुष्ट होकर उन्होंने ब्राहमण को ज्ञान प्रदान किया। ज्ञान प्राप्त होनेपर परम बुद्धिमान् कवषने इस प्रकार मुक्तिदायिनी गाथा का गान किया- 'मनुष्यका पहला शत्रु है क्रोध। उसका फल तो कुछ भी नहीं है, उलटे वह शरीरका नाश करता है; अत: ज्ञानरुपी खड्गसे उसका नाश करके परम आनन्दको प्राप्त करे। नान प्रकारकी तृष्णा बन्धन में डालनेवाली माया है, वह पाप कराती है; अत: ज्ञानरूपी खड्गसे उसका नाश कर देनेपर मनुष्य सुखसे रहता है।* आसक्तिद देवता आदि के लिये भी बहुत बड़ा अधर्म है। आत्मा असङ्ग है, उसके लिये भी आसक्ति महान् शत्रु है। ज्ञानरूपी खड्गसे इस आसक्तिका नाश करके शिव-सायुज्य प्राप्त करे। संशय महानाश का कारण अहि। वह धर्म और अर्थका भी विनाश करनेवाला है। उस संशयका नाश करके जीव अपने परम अभीष्टकी सिद्धि कर सकता है। आशा पिशाचीकी भाँति चित्त में प्रवेश करती है और सम्पूर्ण सुखों को भस्म कर डालती है। पूर्ण अहंता (अपरिच्छिन्न आत्मबोध)- रुपी खड्गसे उसका नाश करके जीवनमुक्ति प्राप्त करनी चाहिये।'

तदनन्तर पैलूष ज्ञान प्राप्त करके गङ्गा-तटपर रहने लगे। ज्ञानरुपी खड्गसे उनका मोह नष्ट हो गया था, अत: उन्होंने मोक्ष प्राप्त कर लिया। तबसे वह स्थान खड्गतीर्थके नाम से प्रसिद्ध हुआ। ज्ञानतीर्थ, कवषतीर्थ, पैलूषतीर्थ और सर्वकामदतीर्थ आदि छ: हजार तीर्थ वहाँ वास करते हैं, जो पापराशि के नाशक और अभीष्ट वस्तुओं के दाता हैं।

उसके बाद आत्रेयतीर्थ है। उसी को अन्विन्द्रतीर्थ भी कहते हैं। वह बहुत ही उत्तम है। वह खोये हुए राज्य की प्राप्ति करनेवाला है। उसका महात्म्य बतलाता हूँ, सुनो। एक बार गौतमीके उत्तर-तटपर आत्रेय ऋषि ने अनेकों ऋत्विज्ञ मुनियों के साथ सत्र आरम्भ किया। उसमें हावीवाहन अग्नि ही होता थे। इस प्रकार सत्र पूरा होनेपर महर्षिने माहेश्वरी इष्टिका अनुष्ठान किया। इससे अणिमा आदि आठ प्रकार के ऐश्वर्यकी प्राप्ति हुई तथा उनमें सर्वत्र आने-जानेकी शक्ति हो गयी। वे परम मनोहर इन्द्रभवन, स्वर्गलोक तथा रसातल में अपनी तपस्याके प्रभाव से आने-जाने लगे। एक समय वे इन्द्रलोक में गये। वहाँ उन्होंने देवताओं से घिरे हुए इन्द्रको देखा, जो अप्सराओंका उत्तम नृत्य देख रहे थे। सिद्धि और साध्यगण उनकी स्तुति कर रहे थे। वह सब देखकर पुन: अपने आश्रमपर लौट आये। कहाँ पवित्र गुणोंवाले रत्नों से भरी हुई अत्यन्त रमणीय इन्द्रपुरी और कहाँ श्रीहीन, सुवर्णरहित अपना आश्रम! यह देखकर ब्राह्मणको अपने आश्रम से वैराग्य-सा हो गयाउनके मन मेंशीघ्र ही देवताओं का राज्य प्राप्त करने की अभिलाषा हुई। तब उन्होंने अपनी प्रियासे कहा- 'देवि! अब मैं उत्तम-से उत्तम फल-मूल भी, चाहे वे कितने ही अच्छे ढंगसे क्यों न बने हों, नहीं कहा सकता। मुझे तो स्वर्गलोक के अमृत, परम पवित्र भक्ष्य-भोजन, श्रेष्ठ आसन, स्तुति, दान, सुंदर सभा, अस्त्र-शस्त्र, मनोहर वस्त्र, अमरावतीपुरी और नन्दनवनकी याद आती है।' यों कहकर महात्मा आत्रेय ने तपस्या के प्रभावसे विश्वकर्माको बुलाया और इस प्रकार कहा- 'महात्मन्! मैं इन्द्रका पद चाहता हूँ। आप शीघ्र ही यहाँ इन्द्रपुरीका निर्माण कीजिये। इसके विपरीत यदि आपने कोई बात मुँह से निकाली तो मैं निश्चय ही आपको भस्म कर डालूँगा।'

आत्रेयके यों कहने पर प्रजापति विश्वकर्माने तत्काल ही वहाँ मरूपर्वत, देवपुरी, कल्पवृक्ष, कल्पलता, कामधेनु, वज्र आदि मणियों से विभूषित, सुंदर तथा अत्यन्त चित्रकारी किये हुए गृह बनाये। इतना ही नहीं, उन्होंने सर्वाङ्गसुन्दरी शचीकी भी आकृति बनायी, जो कामदेव की विराहशाला-सी प्रतीत होती थी। क्षणभरमें सुधर्मा सभा, मनोहारिणी अप्सराएँ, उच्चै:श्रवा अश्व, ऐरावत हाथी, वज्र आदि अस्त्र और सम्पूर्ण देवताओं का निर्माण हो गया। अपनी पत्नीके मना करनेपर भी आत्रेयने शचीके समान रूपवाली उस स्त्री को अपनी भार्या बना लिया वज्र आदि स्त्रोंको भी धारण किया। नृत्य और संगीत आदि सब कुछ वहाँ उसी तरह से होने लगा, जिस प्रकार वह इन्द्रपुरी में देखा गया था। स्वर्गलोकका सम्पूर्ण सुख पाकर मुनिवर आत्रेयका चित्त बहुत प्रसन्न हुआ। आपातरमणीय विषयोंकी भी भला, किस पुरुषको अपेक्षा नहीं होती। दैत्यों और दानवोंने जबस्वर्ग का वैभव पृथ्वी पर उतरा हुआ सुना, तब उन्हें बड़ा क्रोध हुआ। वे परस्पर कहने लगे- 'क्या कारण है कि इन्द्र स्वर्गलोक को छोड़कर पृथ्वीपर सुख भोगनेके लये आया है? हम लोग अभि वृत्रासुरका बढ़ करनेवाले उस इन्द्रसे युद्ध करने के लिए चलें।' ऐसा निश्चय करके असुरोंने वहाँ आकर महर्षि आत्रेय को और उनके द्वारा निर्मित इन्द्रपुरी को भी घेर लिया। फिर तो उनपर बड़े-बड़े शस्त्रोंकी मार पड़ने लगी। इससे भयभीत होकर आत्रेयने कहा- 'मैं इन्द्र नहीं हूँ। मेरी यह भार्या भी शची नहीं है। न तो यह इन्द्रपुरी है और न यहाँ इन्द्रका नन्दवन है। वृत्रहन्ता, वज्रधारी और सहस्त्र नेत्रोंवाले इन्द्र तो स्वर्ग में ही हैं। मैं तो वेदवेत्ता ब्राह्मण हूँ और ब्राह्मणोंके साथ ही गौतमी के तटपर निवास करता हूँ। दुर्दैवकी प्रेरणा से मैंने यह कर्म कर डाला, जो न तो वर्तमान काल में सुख देनेवाला है और न भविष्यमें ही।'

असुर बोले - मुनिश्रेष्ठ आत्रेय! यह इन्द्रका अनुकरण छोड़कर यहाँ का सारा वैभव समेट लो, तभी तुम कुशल से रह सकते हो; अन्यथा नहीं।

आत्रेयने कहा - 'मैं अग्निकी शपथ खाकर सच-सच कहता हूँ- आपलोग जैसा कहेंगे, वैसा ही करूँगा।' दैत्योंसे यों कहकर वे पुन:विश्वकर्मासे बोले- 'प्रजापते! आपने मेरी प्रसन्नताके लिए जो इन्द्रपदका निर्माण किया था, इसका फिर उपसंहार कर लीजिये और ऐसा करके मुझ ब्राह्मण मुनिकी शीघ्र रक्षा कीजिये। मुझे फिर ओना वाही आश्रम लौटा दीजिये, जहाँ मृग, पक्षी, वृक्ष और जल हैं। मुझे इन दिव्य भोगों की कोई आवश्यकता नहीं है। शास्त्रीय मर्यादा का उल्लङ्घन करके प्राप्त की हुई कोई भी वस्तु सुखद नहीं होती।'

'बहुत अच्छा' कहकर प्रजापतिने उस इन्द्रपुरी के वैभव को समेट लिया। उस देश को निष्कण्टक बनाकर दैत्य फिर अपने स्थानको चले गये। विश्वकर्मा भी हँसते-हँसते अपने धाम को पधारे। आत्रेय भी अपने शिष्यों और पत्नी के साथ गौतमी-तटपर रहते हुए तपस्यामें संलग्न हो गये। उनका यो यज्ञ चल रहा था, उसमें उन्होंने लज्जित होकर कहा- 'अहो! मोह की कैसी महिमा है कि मेरे चित्त में भी भ्रान्ति आ गयी। यह क्या मैंने महेन्द्रपद ओआया और क्या-क्या उसके लिए किया।'

इस प्रकार लज्जित हुए आत्रेयसे देवताओंने कहा- 'महाबाहो! लज्जा छोड़ो। इससे तुम्हारी बड़ी ख्याति होगी। जो लोग इस आत्रेयतीर्थ में स्नान करेंगे, वे भविष्य में इन्द्र होंगे और इसके स्मरणसे उन्हें सुख की प्राप्ति होगी।' यों कहकर देवता चले गये और आत्रेय मुनि भी बहुत संतुष्ट हुए।

* क्रोधस्तु प्रथमं शत्रुर्निष्फलो देहनाशन:। ज्ञानखड्गेन तं छित्त्वा परमं सुखमाप्नुयात् ॥

तृष्णा बहुविधा माया बन्धनी पापकारिणी। छित्त्वैतां ज्ञानखड्गेन सुखं तिष्ठति मानव: ॥

(१३९।१३-१४)