ब्रह्म पुराण

29 - मार्कण्डेय मुनिको प्रलयकाल में बालमुकुन्दका दर्शन और उनका वरदान प्राप्त होना

ब्रह्माजी कहते हैं - मुनिवरो! कल्पके अन्त में जब महासंहार आरम्भ हुआ, चन्द्रमा, सूर्य और वायुका नाश हो गया, स्थावर-जङ्गम समस्त प्राणी नष्ट होने लगे, उस समय की बात बतलाता हूँ। पहले प्रलयकालीन प्रचण्ड सुर्यकी उदय होता है, फिर मेघों की घोर गर्जना होने लगती है। बिजली गिरती है, जिससे वृक्ष और पर्वत टूट-फूट जाते हैं। सारे जगत् का संहार हो जाता है। उल्कापात होता रहता है, सरोवरों और नदियों का सारा जल सूख जाता है। फिर वायु का सहारा पाकर संवर्तक नामक अग्नि समस्त विश्व में फ़ैल जाती है। ऊपरसे बाहर सूर्य तपने लगते हैं। वह आग पृथ्वीको भेदकर रसातल में भी पहुँच जाति है और देवता, दानव तथा यक्षों को अत्यन्त भय देने लगती है। पृथ्वी पर जो कुछ रहता है, वह सब जलाकर नागलोकको भी दग्ध करती है और फिर क्रमशः नीचे के समस्त लोकों को तत्काल नष्ट कर देती है। बीस लाख योजनतक फैली हुई वायु और संवर्तक-अग्नि देवता, असुर, गन्धर्व, यक्ष, नाग और राक्षस- सबको भस्म कर डालती है। ऐसी घोर महाप्रलय के समय परम धर्मात्मा मार्कण्डेय मुनि अकेले ध्यानस्थ होकर बैठे थे। प्रलयाग्नि लपट उनके पास भी पहुँची। उनके कण्ठ, तालु और ओठ सूख गये। उस महाभयानक अग्निको देखकर वे भय से विह्वल हो उठे और कोई रक्षक न पा सकने के कारण इधर-उधर भागने लगे। उन्हें कहीं भी शान्ति नहीं मिली। वे सोचने लगे- क्या करूँ, समझ में नहीं आता; किसकी शरण में जाऊँ? किस प्रकार सनातन देव पुरुषेशका दर्शन करूँ? इस प्रकार एकाग्रभाव से चिन्तन करते-करते वे महाप्रलय के कारणभूत सनातन दिव्य पद पुरुषेश नमक वटराज के पास पहुँच गये। उस दिव्य वटको सामने देख मुनि बड़ी उतावलीके साथ उसके निकट गये और उसकी जड़पर जा बैठे। वहाँ न तो कालाग्निका भय था, न अँगारोंकी वर्षाका। न वहाँ संवर्तक अग्नि आ सकती थी और न वज्रपात आदिका ही डर था।

तदनन्तर विद्युन्मालाओं से विभूषित गजराजों के समान कान्तिवाले महामेघ आकाश में घुमड़+ आये। उन्होंने समूचे आकाशको ढक लिया और इतनी वृष्टि की कि पर्वत, वन और आकरोंसहित समस्त पृथ्वी जलराशि में डूब गयी। सम्पूर्ण दिशाएँ पानी से भर गयीं। मूसलाधार वृष्टि करके वसुंधराको डुबोनेवाले मेघोंने उस भयंकर संवर्तकाग्निको बुझा दिया। इस प्रकार बारह वर्षों तक भारी वृष्टि होती रही। समुन्द्र ने अपनी मर्यादा छोड़ दी, पर्वत गल-गलकर बह गये और पृथ्वी पानी में डूब गयी। तत्पश्चात् प्रचण्ड आँधी उठी। उस प्रबल प्रभञ्जन के वेग से सारे मेघ छिन्न-भिन्न हो गये। उसके बाद भगवान् विष्णु उस भयंकर वायु को पीकर एकार्णव में शयन करने लगे। उस समय समस्त स्थावर-जङ्गम का अभाव हो गया था। देवता, असुर, मनुष्य, यक्ष और राक्षस भी नष्ट हो गये थे। उस समय मार्कण्डेय मुनि ने विश्राम के अनन्तरश्रीपुरुषोत्तमका ध्यान करने के पश्चात् जब आँखें खोलीं, तब पृथ्वी को जल में निमग्न पाया। वह वटवृक्ष, पृथ्वी, दिशा आदि, सूर्य, चन्द्रमा, अग्नि, वायु, देवता, असुर और नाग आदि कोई भी दिखायी नहीं देते थे। मुनिवर मार्कण्डेय भी स्वयं जल में गोते खाने लगे। तब उन्होंने तैरना आरंभ किया। वे आर्तभाव से इधर-उधर तैरते हुए भटकने लगे। उन्हें कोई अपना रक्षक नहीं मिलता था। उनके ध्यान करनेसे भगवान् पुरुषोत्तमको प्रसन्नता हुई थी। अत: मुनिको भय से व्याकुल देख वे कृपापूर्वक बोले - 'उत्तम व्रतका पालन करनेवाले बेटा मार्कण्डेय! तुम अभी बालक हो। थक गये होगे। आओ,आओ। शीघ्र मेरे पास चले आओ। अब तुम्हें डरने की आवश्यकता नहीं है। मेरे सामने आ गये हो।'

भगवान् की यह बात सुनकर मुनि चिंता में निमग्न हो गये। सोचने लगे, क्या मैंने स्वप्न देखा है अथवा मुझपर यह मोह छा गया है? यह विचार आते ही उनके मन में दु:खनाशक बुद्धिका उदय हुआ। उन्होंने यह निश्चय किया कि में भक्तिपूर्वक भगवान् पुरुषोत्तम की शरण में जाउँगा। इस निश्चयके अनुसार मार्कण्डेय मुनि मन-ही-मन भगवान् का स्मरण करते हुए उनकी शरण में गये। तब उन्होंने जल के ऊपर पुन:उस विशाल वटवृक्षको देखा। उसके ऊपर सुन्दर दिव्य पलंग बिछा हुआ था, जिसपर बालरुपीधारी भगवान् श्रीकृष्ण विराजमान थे। वे कोटि-कोटि सूर्योंके समान तेजस्वी शरीर से देदीप्यमान हो रहे थे। चार भुजा, सुंदर अङ्ग पद्मपत्र के समान विशाल नेत्र, श्रीवत्सचिह्नसे विभूषित वक्ष:स्थल और हाथों में शङ्ख, चक्र एवं गदा थे। हृदय वनमाला सेआवृत था। वे दिव्य कुण्डल धारण किये हुए थे। गले में बहुत-से हार शोभा पाते थे। दिव्य रत्नों से उनका श्रृङ्गार किया गया था। भगवान् को इस रूप में देखकर मार्कण्डेय मुनि के नेत्र आश्चर्य से खिल उठे। उनका शरीर रोमाञ्चित हो गया। वे भगवान् को प्रणाम करके बोले- अहो! इस भयानक एकार्णव में यह बालक कैसे निर्भय रहता है। इस प्रकार विचार करते हुए वे इधर-उधर बह रहे थे। उनकी चेतना लुप्त होती जा रही थी। वे अपे उद्धार के लिए व्याकुल हो गये। उस समय उन्हें बड़ा खेद हुआ। इधर वटवृक्षपर सोया हुआ बालक बालसूर्य के समान प्रकाशित हो रहा था। वह अपनी महिमामें ही स्थित था। मार्कण्डेय मुनि उस समौर्ण तेजोमय बालककी ओर देखने में भी असमर्थ हो गये। मुनिको अपनी ओर आते देख बालक ने हँसते हुए मेघके समान गम्भीर वाणी में कहा- 'बेटा! जानता हूँ, तुम बहुत थक गये हो और अपनी रक्षा के लिये मेरे पास आये हो। अब शीघ्र ही मेरे शरीर में प्रवेश कर जाओ। यहाँ तुम्हें पूर्ण विश्राम मिलेगा।' बालक की बात सुनकर मार्कण्डेय मुनि कुछ बोल न सके। वी भगवान् की माया से मोहित हो विवश होकर बालक के खुले हुए मुँह में प्रवेश कर गये। उसके उदरमें प्रवेश करने पर उन्होंने वहाँ अनेक जनपदों से घिरी हुई समूची पृथ्वी देखी। खारे पाई, ईख के रस, घी, दही और मीठे जल के समुद्रों को देखा। जम्बू, प्लक्ष, शाल्मल, कुश, क्रौञ्च, शाक और पुष्कर नामक द्वीपोंका अवलोकन किया।भारत आदि सम्पूर्ण वर्ष और पर्वतोंका निरीक्षण किया। सब रत्नों से सम्पन्न सुवर्णमय मेरुगिरिको भी देखा, जो अनेक प्रकार के रत्नमय शिखरों से विभूषित, अनेक कन्दराओंसे युक्त, नाना मुनिजनों से व्याप्त, भाँति-भाँति के वृक्षों और वनों से परिपूर्ण, अनेक जीव-जन्तुओं से सेवित, अनेकानेक आश्चर्योंसे युक्त, बाघ, सिंह, सूअर, चँवरी गाय, भैंस, हातही, हरिन, वानर तथा अन्य जीव-जन्तुओं स सुशोभित एवं अत्यन्त मनोहर था। इन्द्र आदि अनेक देवता, सिद्ध, चारण, नाग, मुनि, रक्ष, अप्सरा तथा अन्य स्वर्गवासिओंसे उस पर्वतकी पपूर्ण शोभा हो रही थी। I प्रकार शोभामय सुमेरु पर्वत को देखते हुए वे बालक के उदरमें भ्रमण करने लगे। उन्होंने क्रमशः हिमवान्, हेमकूट, निषध, गन्धमादन, श्वेत, दुर्धर, नील, कैलास, मन्दरगिरि, महेन्द्र, मलय, विन्ध्य, पारियात्र, अर्बुद, सह्य, शुक्तिमान् तथा मैनाक आदि बहुत-से पर्वतोंको देखा। उन्होंने इस लोकमें जितने भी चराचर भूत देखे थे, वे सब उन्हें भगवान् की कुक्षिमें दृष्टिगोचर हुए। अथवा बहुत कहनेकी क्या आवश्यकता, ब्रह्मा से लेकर कीटपर्यन्त सम्पूर्ण स्थावर-जङ्गम जगत्- भूर्लोक, भुवर्लोक, स्वर्लोक, महर्लोक, जनलोक, तपलोक, सत्यलोक, अतल, वितल, सुतल, पाताल, रसातल और महातलरूप ब्रह्माण्डको उन्होंने बालरूपधरै भगवान् के उदर में देखा। उस समय मार्कण्डेयजी की सर्वत्र बेरोकटोक गति थी। भगवान् की कृपा से उनकी स्मरण-शक्तिका लोप नहीं होता था। वे भगवान् के उदरमें सम्पूर्ण जगत्का अवलोकन करते हुए सहमते फिरे, किंतु उनके शरीरका कहीं अन्त नहीं मिला। तब वे वरदायक देवता श्रीहरिकी शरणमेंगये। इसी समय सहसा वे वायु के वेग से खिंचकर भगवान् के खुले हुए मुखसे बाहर निकल आये।

बाहर निकालनेपर उन्हें पुन: मनुष्योंसे शून्य सारी पृथ्वी एकार्णवके जलमें निमग्न दिखायी दी। साथ ही वटवृक्षi शाखापर पलंगके ऊपर विराजमान शिशुरूपधारी भगवान् का भी दर्शन हुआ, जो सम्पूर्ण जगत् को अपने उदर में लेकर विराजमान थे। उनका वक्ष:स्थल श्रीवत्सचिह्नसे सुशोभित, नेत्र पद्मपत्रके समान विशाल और श्रीअङ्ग पीताम्बरसे आच्छादित तह। उनकी चार भुजाएँ शोभा पा रही थीं। भगवान् ने देखा मार्कण्डेय मुनि मुखसे निकलकर जलमें तैरते हुए अचेत-से हो रहे हैं। तब उन्होंने हँसकर कहा- 'बेटा! क्या तुमने मेरे उदरमें रहकर विश्राम कर लिया? वहाँ घूमते समय तुमने क्या-क्या आश्चर्य देखा? मुनिश्रेष्ठ! एक तो तुम मेरे भक्त, दूसरे थके-माँदे और तीसरे मेरे शरणागत हो। अत: तुम्हारा उपकार करने के लिये में तुमसे बातचीत करता हूँ। इधर मेरी ओर देखो तो सही।'

भगवान् का यह वकाहं सुकर मार्कण्डेय मुनिका रोम-रोम हर्षसे खिल उठा। यद्यपि दिव्य रत्नों से अलंकृत तेजोमय भगवान् की ओर देखा अत्यन्त कठिन था तो भी उन्होंने उनको देखा। भगवान् की कृपा से उन्हें क्षणभर में नूतन, प्रसन्न एवं निर्मल दृष्टि प्राप्त हो गयी। तब मार्कण्डेयजी ने भगवान् के देववन्दित चरणों को, जिनकी अँगुलियाँ और तलवे लाल-लाल थे, मस्तक झुकाकर प्रणाम किया। हर्षसे युक्त और विस्मित होकर बारंबार उनकी ओर देखा तथा हाथ जोड़कर हर्षगद्रद वाणी में उन परमात्मा का स्तवन आरम्भ किया।

मार्कण्डेयजी बोले - मायासे बाल-रूप धारण करनेवाल देवदेव जगन्नाथ! कमलके समान सुंदर नेत्रोंवाले सुरश्रेष्ठ पुरुषोत्तम! में दु:खित होकर आपकी शरणमें आया हूँ। मेरी रक्षा कीजिये।  संवर्तक नामक अग्निने मुझे संतप्त कर रखा है। मैं अँगारोंकी वर्षासे भयभीत हो रहा हूँ, मेरा उद्धार कीजिये। देवेश! पुरषोत्तम! मैंने आपके उदरमें चराचर जगत्का अवलोकन किया है। इससे मुझे बड़ा विस्मय हुआ है। मैं विषादग्रस्त तो हूँ ही। मेरी रक्षा कीजिये। पुरुषोत्तम! इस अवलम्बशून्य संसार में आपके सिवा दूसरा कोई सहारा देनेवाला नहीं है। मुझपर प्रसन्न होइये। सुश्रेष्ठ! प्रसन्न होइये। विबुधप्रिय! प्रसन्न होइये। देवताओं के नाथ! प्रसन्न होइये। देवताओं के निवासस्थान! प्रसन्न होइये। जगत् के कारणों के भी कारण सर्वलोकेश्वर! मुझपर प्रसन्न होइये। सबकी सृष्टि करनेवाले देव! प्रसन्न होइये। धरणीधर! मुझपर प्रसन्न होइये। जल में निवास करनेवाले परमेश्वर! मुझोअर प्रसन्न होइये। मधुसूदन! मुझपर प्रसन्न होइये। कमलाकान्त! प्रसन्न होइये। त्रिदशेश्वर! प्रसन्न होइये। कंस और केशीका नाश करनेवाले श्रीकृष्ण! प्रसन्न होइये। अरिष्टासुरका नाश करनेवाले गोविन्द! प्रसन्न होइये। दैत्यनाश श्रीकृष्ण! प्रसन्न होइये। दानवोंका अन्त करनेवाले वासुदेव! प्रसन्न होइये। मथुरावासी हरे! प्रसन्न होइये। यदुनन्दन! प्रसन्न होइये। इन्द्र के छोटे भाई उपेन्द्र्! प्रसन्न होइये। वरदायक अविनाशी देव! प्रसन्न होइये। भगवन्! आप ही पृथ्वी, आप ही जल, आप ही अग्नि और आप ही वायु हैं। जगत्पते! आकाश, मन, अहंकार, बुद्धि, प्रकृति तथा सत्त्वादि गुण भी आप ही हैं। आप सम्पूर्ण विश्व में व्यापक पुरुष हैं। पुरुष से भी उत्तम पुरुषोत्तम हैं। प्रभो! आप ही सम्पूर्ण इन्द्रियाँ और उनके शब्द आदि विषय हैं। आप ही दिक्पाल, धर्म, वेद, दक्षिणासहित यग्य, इन्द्र, शिव, देवता, हविष्य और अग्नि हैं। वासु, रूद्र, आदित्य और ग्रह भी आपके ही स्वरुप हैं और जितनी भी जातियाँ हैं, जो कुछ भी जीव-नामधारी पदार्थ है, वह सब आप ही हैं। अधिक कहनेकी क्या आवश्यकता, ब्रह्मासे लेकर तिनकेतक जो कुछ भी भूत, भविष्य और वर्तमान चराचर जगत् है, वह आप ही हैं। देव! आपका जो परमस्वरूप है, वह कूटस्थ, अचल एवं ध्रुव है। उसे ब्रह्मा आदि देवता भी नहीं जान पाते। फिर हम- जैसे छोटी बुद्धिवाले मनुष्य कसे उसका तत्व समझ सकते हैं। भगवन्! आप शुद्धस्वभाव, नित्य, प्रकृति से परे, अव्यक्त, शाश्वत, अनन्त एवं सर्वव्यापी महेश्वर हैं। आप ही आकाशस्वरुप, परम शान्त, अजन्मा, व्यापक एवं अविनाशी हैं। इस प्रकार आपके निर्गुण एवं निरञ्जन (मायारहित शुद्ध) रूपकी स्तुति कौन कर सकता है। देव! अविनाशी देवदेवश्वर! मैंने जो विकल एवं अल्पज्ञान होने के कारण आपके स्तवनकी धृष्टता की है, उसे आप क्षमा करने की कृपा करें।

मार्कण्डेय इस प्रकार स्तुति करनेपर भगवान् बहुत प्रसन्न हुए और मेघकेसमान गम्भीर वाणी में बोले- 'मुनिश्रेष्ठ! तुम्हारे मन में जो अभिलाषा हो, उसे कहो। ब्रह्मर्षे! तुम मुझसे जो कुछ चाहोगे, वह सब तुम्हें दूँगा।'

मार्कण्डेयजी बोले - देव! मैं आपको और आपकी माया को जानना चाहता हूँ। देवेश! आपी कृपासे मेरी स्मरणशक्ति लुप्त नहीं हुई है। पुण्डरीकाक्ष! आप अव्यय हैं, मैं आपके तत्वको समझना चाहता हूँ। इस सम्पूर्ण जगत् को पीकर आप साक्षात् परमेश्वर यहाँ बालरूपसे क्यों रहते हैं? ये सब बातें बताने की कृपा करें।

मुनि के इस प्रकार पूछने पर परम कान्तिमान् देवाधिदेव श्रीहरिने उन्हें सान्त्वना देते हुए कहा- 'ब्राह्मन्! देवता भी मुझे ठीक-ठीक नहीं जानते; किन्तु तुमपर प्रेम होने के कारण मैं अपना रहस्य बतलाऊँगा कि कैसे इस जगत् की सृष्टि करता हूँ। ब्रह्मर्षे! तुम पितृभक्त हो और मेरी शरण में आये हो; इसीलिये तुम्हें मेरे स्वरुप का प्रत्यक्ष दर्शन हुआ है। तुम्हारा ब्रह्मचर्य महान् है। पूर्वकालमें मैंने जलको 'नारा' नाम दिया था, उस 'नारा' में मेरा सदा अयन (निवास) रहता हैं; इसलिये मैं 'नारायण' कहलाता हूँ। द्विजोत्तम! मैं नारायण ही सबकी उत्पत्तिका कारण, सनातन, अविनाशी, सम्पूर्ण भूतोंका स्त्रष्टा और संहर्ता हूँ। मैं ही विष्णु, मैं ही ब्रह्मा और मैं ही देवराज इन्द्र हूँ। यक्षराज कुबेर और प्रेतराज यम भी मैं ही हूँ। मैं ही सिव, चद्रमा, प्रजापति कश्यप, धाता, विधाता और यज्ञ हूँ। अग्नि मेरा मुख, पृथ्वी चरण, चद्रमा और सूर्य नेत्र, द्युलोक मस्तक, आकाश और दिशाएँ कान तथा जल स्वेद है। दिशाओं सहित आकाश मेरा शरीर और वायु मेरे मन में स्थित है। मैंने पर्याप्त दक्षिणावाले अनेकों यज्ञों का अनुष्ठान किया है। पृथ्वी पर वेद के विद्वान् देवयज्ञ में स्थित मुझ विष्णुका ही यजन करते हैं। स्वर्गकी इच्छा रखनेवाले मुख्य-मुख्य क्षत्रिय और वैश्य भी यज्ञ के द्वारा मेरी आराधना करते हैं। मैं ही शेषनाग होकर चारों ओरके समुद्रों और मेरुपर्वतसहित समस्त पृथ्वीको अकेलाही धारण करता हूँ। पूर्वकाल में वाराहरूप धारण करके मैंने ही जलमें डूबी हुई इस पृथ्वीका अपनी शक्तिसे उद्धार किया था। द्विजश्रेष्ठ! मैं ही बड़वानल होकर समुद्रका जल पीता और मेघरूप से उसकी वर्षा करता हूँ। ब्राह्मण मेरा मुख, क्षत्रिय मेरी भुजाएँ, वैश्य जाँघ और शूद्र चरण हैं। ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद मुझसे ही प्रकट होते और फिर मुझमें ही प्रवेश कर जाते हैं। ज्ञानपरायण सन्यांसी, संयमशील जिज्ञासु अट्टहा काम, क्रोध एवं द्वेषसे रहित, अनासक्त, निष्पात, सत्त्ववस्थ, अहंकारशून्य तथा अध्यात्मतत्त्वके ज्ञाता ब्राह्मण सदा मेरा ही चिन्तन करते हुए उपासना करते हैं। मैं ही संवर्तक ज्योति, मैं ही संवर्तक अग्नि, मैं ही संवर्तक सूर्य और मैं ही संवर्तक वायु हूँ। आकाश में जो ये तारे दिखायी देते हैं, इन सबको मेरे ही रोम-कूप समझो। रत्नों से भरे हुए समुद्र और चारों दिशाओं को मेरे ही स्वरुप जानो। मनुष्य जिस कर्मका अनुष्ठान करके कल्याण के भागी होते हैं, वह भी मेरा ही स्वरुप है। सत्य, दान, उग्र तपस्या और अहिंसा- ये मेरे बनाये हुए विधान के अनुसार ही विहित माने जाते हैं और मेरे ही स्वरुप में इनकी स्थिति है। जिनकी ज्ञानशक्ति मेरे द्वारा अभिभूत हो जाती है, वे इच्छानुसार चेष्टा नहीं कर पाते। वेदोंका सम्यक् स्वाध्याय करके भाँति-भाँति के यज्ञों द्वारा यजन करनेवाले शान्तचित्त एवं क्रोधपर विजय पानेवाले ब्राह्मण मुझे प्राप्त करते हैं। पापाचारी, लोभी, कृपण, अनार्य तथा मनको वशमें न रहनेवाले मनुष्योंको मैं कभी नहीं मिल सकता। जिनके अन्त:करण शुद्ध हैं, उन्हें प्राप्त होनेवाला महान् फल मुझे ही समझो। कुयोगसेवी मूढ़ मनुष्यों के लिये मैं अत्यन्त दुर्लभ हूँ। संतशिरोमणे! जब-जब धर्मकी हानि और अधर्म का उत्थान होता है तब-तब मैं अपने को प्रकट करता हूँ।* हिंसापरायण दैत्य तथा भयंकर राक्षस, जो बड़े-बड़े देवताओं के लिये भी अवध्य हैं, जब इस संसार में जन्म लेते हैं, तब मैं पुण्यात्मा पुरुषों के घरों में अवतार लेता हूँ। मनुष्य-देह में प्रवेश करके समस्त बाधाओंका शमन करता हूँ। देवता, मनुष्य, गन्धर्व, नाग ततः' राक्षसों और स्थावर भूतोंकी अपनी माया से सृष्टि करके में पुन: उनका संहार करता हूँ। फिर कर्मकाल में उनके योग्य शरीर का विचार करके सृष्टि करता हूँ। मेरा स्वरुपभूत धर्म सत्ययुग म अं श्वेत रहता है, त्रेतामें श्याम होता हिया, द्वापर आनेपर लाल हो जाता हिया और कलियुग में काला पड़ जाता है। प्रलयकाल आनेपर मैं ही अत्यन्त दारुण कालरूप हो अकेला ही समस्त त्रिलोकीका नाश करता हूँ। उत्पत्ति, पालन और संहार- ये तीन मेरे ही धर्म हैं। मैं सम्पूर्ण विश्वका आत्मा और सब लोकों का सुख पहुँचानेवाला हूँ। मेरा किसीसे पार्थक्य नहीं है। मैं सर्वव्यापी, अनन्त और इन्द्रियोंका नियन्ता हूँ। मेरे डग बहुत बड़े हैं। मैं अकेला ही काल-चक्रका संचालन करता हूँ। जो ब्रह्माका रूप है, वह मेरा ही है। वही सम्पूर्ण भूतोंको शान्ति देनेवाला है। उसका उद्यम सम्पूर्ण भूतों के हितके लिये ही होता है। मुनिश्रेष्ठ! इस प्रकार मेरा आत्मा सम्पूर्ण भूतों में संनिहित है। फिर भी मुझे कोई नहीं जनता। भक्तगण सब लोकों में सर्वथा मेरा पूजन करते हैं। ब्रह्मन्! मुझमें तुमने जो कुछ भी क्लेशका अनुभव किया है, वह सब तुम्हारे सुखके उदय और कल्याणकी प्राप्तिका कारण है। तुमने लोक में स्थावर-जङ्गमरूप जो कुछ भी देखा है, वह सब सम्पूर्ण भूतों को उत्पन्न करनेवाला मेरा आत्मा ही है, जिसे मैंने उस रूप में प्रकट किया है। मैं ही शङ्ख, चक्र और गदा धरान करनेवाला नारायण हूँ। जबतक एक हजार महायुगों का समय नहीं बीत जाता, तबतक सम्पूर्ण विश्वको मोहित करके यहाँ जल में शयन करता हूँ। मुनिश्रेष्ठ! जबतक ब्रह्मा सोकर उठ नहीं जाते, तबतक मैं हर समय यहाँ शिशुरूप में निवास करता हूँ। विप्रेन्द्र! मुझ ब्रह्मरूपि परमात्माने अनेक बार संतुष्ट होकर तुम्हें वरदान दिया है। समस्त चराचर जगत्का नाश होकर सब कुछ एकार्णव में मग्न हो जानेपर तुम मेरी ही आज्ञा से यहाँ आ निकले हो। फिर जब मेरे शरीर के भीतर प्रविष्ट हुए हो तब मैंने तुम्हें सम्पूर्ण जगत्का अवलोकन कराया है। वहाँ सम्पूर्ण लोकों को देखकर तुम विस्मय में पड़ गये और मुझे समझ नहीं पाये। तब तुरंत ही मैंने तुम्हें अपने मुखसे बाहर निकाल दिया और जो देवता और असुरों के लिये दुर्ज्ञेय है, उस अपने आत्मतत्त्वका तुमसे वर्णन किया है। ब्रह्मर्षे! जबतक महातपस्वी ब्रह्माजी जागते नहीं तबतक तुम यहीं निर्भय होकर सुखपूर्वक विचरो। उनके जागनेके बाद मैं अकेला ही समस्त भूतों और उनके शरीरों की सृष्टि करूँगा।"

इतना कहकर भगवान् ने मुनिवर मार्कण्डेयजी से पूछा- 'मुने! तुमने जिस अभिप्राय से मेरी स्तुति की है, उसे कहो। मैं तुम्हें शीघ्र ही उत्तम वरदान दूँगा।' भगवान् का यह कल्याणमय वचन सुनकर मार्कण्डेय मुनि सहसा उनके चरणोंमें गिर पड़े और इस प्रकार बोले- 'देवेश! मैनें आपके उत्कृष्ट स्वरुप का दर्शन किया, इससे मेरा सारा मोह दूर हो गया । नाथ! अब मैं आपकी कृपा से यह चाहता हूँ की सम्पूर्ण लोकोंके हित, भिन्न-भिन्न भावनाओंकी पूर्ति तथा शैव और वैष्णवों के विवाद-निवारण के लिये मैं इस परम उत्तम पवित्र पुरुषोत्तमतीर्थमें भगवान् शिव का बहुत बड़ा मन्दिर बनवाऊँ और उसमें शंकर जी की प्रतिष्ठा करूँ। इससे संसार के लोग यह जान लेंगे कि विष्णु और शिव एकरूप ही हैं।' यह सुनकर भगवान् जगन्नाथने पुन:महामुनि मार्कण्डेयजी से कहा- 'ब्रह्मन्! तुम मेरी आज्ञा से शीघ्र ही एक मन्दिर बनवाओ और उसमें नाना भावों की पूर्ति एवं आराधनाक लिये परम कारणभूत भुवनेश्वरलिङ्गकी स्थापना करो। उनके प्रभाव से तुम्हारा भगवान् शिव के लोक में अक्षय निवास होगा। शिव की स्थापना करनेपर मेरी ही स्थापना होती है। हम दोनों में तनिक भी अन्तर नहीं है। हम एक ही तत्व दो रूप में व्यक्त हुए हैं। जो रूद्र हैं, वही विष्णु हैं; जो विष्णु हैं वही महादेव हैं। वायु और आकाशकी भाँति हम दोनोंमें कोई अन्तर नहीं है। जो आज्ञान से मोहित है, वह इस बात को नहीं जनता कि जो गरुडध्वज हैं, वही वृषभध्वज हैं। अत: ब्रह्मन्! तुम अपने नामसे शिवालय बनवाओ और देवाधिदेव भगवान् से उत्तर की ओर एक सुंदर तीर्थ (सरोवर)- का निर्माण करो। वह तीर्थ मनुष्य-लोक में मार्कण्डेयहृदय के नाम से विख्यात होगा। उसमें स्नान करनेसे सब पापों का नाश हो जाएगा।'

मार्कण्डेय मुनिसे यों कहकर सर्वव्यापी जनार्दन वहीँ अन्तर्धान हो गये।           

* यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति सत्तम ॥ अभ्युत्थानमधर्मस्य तदाऽत्मानं सृजाम्यहम् ।

  (५६ । ६५-३६)