ब्रह्म महा पुराण
70 - मुनियोंका भगवान् के अवतार के सम्बन्ध में प्रश्न और श्रीव्यासजी द्वारा उसका उत्तर
मुनि बोले - पुरुषश्रेष्ठ व्यासजी! आपने भारतवर्ष तथा पुरुषोत्तमक्षेत्र के अद्भुत गुणों का वर्णन किया। उस क्षेत्रके उत्तम महात्म्यको सुनकर हमें बड़ी प्रसन्नता हुई है। हमारे मन में बहुत दिनों से एक संदेह है।उसका निवारण करनेवाला आपके सिवा दूसरा कोई नहीं है। हम भूतल श्रीकृष्ण, बलदेव और सुभद्रा के अवतार का रहस्य सुनना चाहते हैं। वीरवर श्रीकृष्ण और बलभद्र किसलिए अवतीर्ण हुए थे? वे वसुदेव के पुत्र होकर नन्द के घर में क्यों रहे? यह मर्त्यलोक सर्वथा नि:सार है। इसमें अधिकतर दु:ख ही भरा है। यह पानी के बुलबुल की भाँति अत्यन्त चञ्चल- क्षणभङ्गुर है। इसकी भयंकरता इतनी बढ़ी हुई है कि उसका विचार आते ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं। ऐसे संसार में उन्हें जन्म ग्रहण करने की आवश्यकता थी? इस भूतलपर अवतीर्ण हो उन्होंने जो-जो लीलाएँ किन, उनका विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिये। उनका सम्पूर्ण चरित्र अद्भुत और अलौकिक है। भगवान् सम्पूर्ण देवताओं के स्वामी एवं सुरश्रेष्ठ हैं और पृथ्वी को उत्पन्न करनेवाले तथा अविनाशी परमात्मा हैं। उन्होंने अपने दिव्य स्वरुप को मनुष्यों के बीच में कैसे प्रकट किया? जो भगवान् सम्पूर्ण जङ्गम प्राणियों की गति हैं, वे मानव- शरीर में कैसे आये? इसे देवता और दैत्य भी बड़े आश्चर्य की बात मानते हैं। महामुने! आप भगवान् विष्णु के आश्चर्यजनक अवतार की कथा सुनाइये। भगवान् के बल और पराक्रम विख्यात हैं। उनके तेज की कोई माप नहीं है। वे अपने अलौकिक चरित्रों के द्वारा आश्चर्यरूप जान पड़ते हैं। आप उनके तत्व का वर्णन कीजिये। भगवान् पुरुषोत्तम देवताओं की पीड़ा दूर करनेवाले और सर्वव्यापी हैं। जगत् के रक्षक और सर्वलोकमहेश्वर हैं। संस्सर की सृष्टि, पालन और संहार- सब वे ही करते हैं। वे ही सब लोकों को सुख देनेवाले हैं। वे अक्षय, सनातन, अनन्त, क्षय और वृद्धि से रहित, निर्लेप, निर्गुण, सूक्ष्म, निर्विकार, निरञ्जन, समस्त उपाधियों से रहित, सत्तामात्र रूप से स्थित, अविकारी, विभु, नित्य, अचल, निर्मल, व्यापक, नित्यतृप्त, निरामय तथा शाश्वत परमात्मा हैं। सत्ययुग में उनका विशुद्ध 'हरि' नाम सुना जाता है। देवताओं में वे वैकुण्ठ और मनुष्यों में श्रीकृष्ण नाम से विख्यात हैं। उन्हीं परमेश्वर की भूत और भविष्य लीलाओं को, जिनका रहस्य अत्यन्त गहन है, हम सुनना चाहते हैं।
व्यासजी बोले - जो सम्पूर्ण देवताओं के स्वामी, सबकी उत्पत्ति के कारण, पुराणपुरुष, सनातन, अविनाशी, चतुर्व्यूहस्वरूप, निर्गुण, गुन्रूप, परम, महान्, परम गुरु, वरेण्य, असीम, यज्ञाङ्ग और देवता आदि के प्रियतम हैं, उन भगवान् विष्णुको मैं नमस्कार करता हूँ। जिनसे लागु और जिनसे महान् दूसरा कोई नहीं है, जिन अजन्मा प्रभुने सम्पूर्ण चराचर जगत् को व्याप्त कर रखा है, जो आविर्भाव, तिरोभाव, दृष्ट और अदृष्ट से विलक्षण हैं, सृष्टि और संहार को भी जिनका स्वरुप बतलाया जाता है, उन आदिदेव परब्रह्म परमात्मा को मैं समाधिके द्वारा प्रणाम करता हूँ। जो सम्पूर्ण विक्रों से रहित, शुद्ध, नित्य, सदा एकरूप रहनेवाले और विजयी हैं, उन परमात्मा श्रीविष्णु को नमस्कार है। जो हिरण्यगर्भ, हरि, शंकर तथा वासुदेव कहलाते हैं, जिनसे समस्त प्राणियों का तरण-तारण होता है, जो सृष्टि, पालन और संहार करनेवाले हैं, उन भगवाना को नमस्कार है। जो एक होते हुए भी अनेक रूपों में प्रकट होते हैं, स्थूल और सूक्ष्म, व्यक्त और अव्यक्त जिनके स्वरुप हैं और जो मोक्ष के कारण हैं, उन भगवान् विष्णुको नमस्कार है। जो जगन्मय हैं, जगत् की सृष्टि, पालन और संहार के मूल कारण है, उन परमात्मा, भगवान् विष्णु को नमस्कार है। जो सूक्ष्मसे भी सूक्ष्मतर, सम्पूर्ण विश्वके आधारभूत, समस्त प्राणियों के भीतर विराजमान और अपनी महिमा से कभीच्युत न होनेवाले हैं, उन भगवान् पुरुषोत्तमको प्रणाम है। जो वास्तव में अत्यन्त निर्मल ज्ञानस्वरूप होते हुए भी भ्रमपूर्ण दृष्टि के कारण भिन्न-भिन्न पदार्थों के रूप में स्थित दिखायी देते हैं, जिनका आदि नहीं है, जो सम्पूर्ण जगत् के ईश्वर, अजन्मा, अक्षय और अविनाशी हैं, उन भगवान् श्रीहरिको नमस्कार करके मैं उनके अवतार की कथा आरम्भ करता हूँ।
पूर्वकाल में दक्ष आदि श्रेह्स्थ मुनियों के पूछने पर कमलयोनि भगवान् ब्रह्मा ने जो कुछ कहा था, वही मैं भी आप लोगों से कहूँगा। जो अपने चारों मुखों से ऋक्, साम आदि चारों वेदों का उच्चारण करते हुए तीनों लोकों को पवित्र करते हैं, जिनका प्रादुर्भाव एकार्णवके जलसे हुआ है, असुरगण जिनके यज्ञों का लोप नहीं कर पाते, उन भगवान् ब्रह्माजी को प्रणाम करके मैं उन्हीं की कही हुई कथा आरम्भ करता हूँ। जिन्होंने सृष्टि के उद्देश्य से धर्म आदिको प्रकट किया है, उन अव्यक्तजन्मा ब्रह्माजी के सम्पूर्ण मतका ही मैं वर्णन करूँगा। तत्वदर्शी मुनियों ने जल को 'नार' कहा है। वह नारा पूर्वकाल में भगवान् का अयन (निवासस्थान) हुआ। इसलिये वे नारायण कहलाते हैं। वे भगवान् नारायण कहलाते हैं। वे भगवान् नारायण सबको व्याप्त करके स्थित हैं। वे ही सगुण और निर्गुण कहलाते हैं। वे दूर भी हैं और समीप भी। उनकी 'वासुदेव' संज्ञा है। ममता का त्याग करनेपर ही उनका साक्षात्कार होता है। उनमें रूप और वर्ण आदि काल्पनिक भाव नहीं हैं। वे सदा शुद्ध, सुप्रतिष्ठित और एकरूप हैं। जब-जब धर्म की हानि और अधर्म का उत्थान होता है, तब-तब वे अपने-आपको संसार में प्रकट करते हैं। पूर्वकाल में उन्हीं प्रजापालक भगवान् ने वाराहरूप धारण करके थूथुनसे जलको हटाया और रसातल में डूबी हुई पृथ्वी को अपनी एक दाढ़ से कमल के फूल की भाँति ऊपर उठा लिया।उन्होंने ही नृसिंहरूप धारण करके हिरण्यकशिपु का वध किया और विप्रचित्ति आदि अन्य दानवों को भी मार गिराया। फिर वामन अवतार लेकर माया से बलिको बाँधा और दैत्योंको जीतकर तीनों लोकों को अपने तीन पगों से ही नाप लिया। वे ही भृगु-वंश में परमप्रतापी जमदग्निकुमार परशुराम के रूप में उत्पन्न हुआ, जिन्होंने पिता के वधका बदला लेने के लिए क्षत्रियों का संहार कर डाला। उन्हीं भगवान् ने अत्रिकुमार प्रतापी दत्तात्रेय के रूप में अवतीर्ण हो महात्मा अलर्कको अष्टाङ्गयोग का उपदेश दिया। त्रेतामें दशरथनन्दन श्रीराम के रूप में प्रकट होकर उन्होंने ही त्रिभुवनको भय देनेवाले रावण का युद्ध में संहार किया।
प्रलयकाल में जब सारी दृष्टि एकार्णवमें निमग्न हो गयी, उस समय देवताओं के भी देवता जगत्पति श्रीविष्णु एक सहस्त्र युगोंतक शेषनाग की शय्यापर सोते रहे। वास्तव में वे योगनिद्रा का आश्रय ले अपनी योगमहिमा में स्थित हो गये थे। सम्पूर्ण चराचर जगत्को उन्होंने अपने उदरमें स्थापित कर रखा था। जनलोकनिवासी सिद्ध और महर्षि उनकी स्तुति करते थे। उसी समय उनकी नाभि से एक कमल प्रकट हुआ, जो दिशारुपी पत्रोंसे सुशोभित, अग्नि और सूर्य के समान तेजोमय और पर्वतरुपी केसरोंसे अलंकृत था। सुवर्णमय मेरुगिरि उसका किञ्जल्क (केसरका मध्यभाग) था। वह कमल ही पितामह ब्रह्माजी का सुंदर गृह था। उसी में चार मुखोंवाले देवाधिदेव ब्रह्माजी प्रकट हुए। उस समय भगवान विष्णु के कानोंकी मैलसे दो महाबली और महापराक्रमी दानव उत्पन्न हुए, जो ब्रह्माजी को मार डालने के लिये उद्यत हो गये। उनका नाम मधु और कैटभ था। भगवान् ने समुद्ररुपी शयनगृह से उठकर उन दोनों दुर्धर्ष दैत्यों का वध किया। ये तथा और भी भगवाना की असंख्य लीलाएँ हैं, जिनकी मैं गणना नहीं कर सकता। इस समय अजन्मा भगवान् के जिस अवतार का प्रसङ्ग चल रहा है, वह मथुरा में हुआ था। इस प्रकार भगवान् की जो सात्त्विक मूर्ति है, वाही अवतार धारण करती है। वह प्रद्युम्न नामसे विख्यात है और सदा रक्षाकार्य में संलग्न रहती है।वह भगवान् वासुदेव की इच्छा के अनुसार देवता, मनुष्य और तिर्यक् योनिमें अवतीर्ण होती है और उसी के अनुकूल स्वभाव बना लेती है। भक्त पुरुषोंद्वारा पूजित होनेपर वह उनकी मनोवाञ्छित कामनाओं को भी पूर्ण करती है। इस तरह मैंने यहाँ भगवाना के अवतार का रहस्य बतलाया है। भगवान् विष्णु यद्यपि कृतकृत्य हैं, उन्हें कुछ करना अथवा पाना नहीं है तो भी वे लोक-कल्याणके लिए ही मानवरूप में प्रकट हुए थे।
Summary of chapter 68 of the Brahma Mahā Purana is as follows:
The overall sanctity and supreme merit of the entire Puruṣottama kṣetra is summarized in a final comprehensive eulogy. The kṣetra is declared more sacred than all other tīrthas combined; death within its boundaries guarantees liberation; the accumulated merits of all sacred rivers flow together here; and Bhagavān himself resides here eternally as Puruṣottama, the Lord of the Universe.