ब्रह्म पुराण

101 - योग और सांख्यका वर्णन

मुनियोंने कहा- महर्षे ! अब हमें योगका उपदेश दीजिये , जो दुःखोंको दूर करनेवाली ओषधि है तथा जिस अविनाशी योगको जानकर हम भगवान् पुरुषोत्तमका संयोग प्राप्त कर सकें ।

 व्यासजी बोले- विप्रवरो ! मैं संसार - बन्धनका नाश करनेवाले योगका वर्णन करता हूँ , सुनो । उसका अभ्यास करके योगी पुरुष परम दुर्लभ मोक्ष प्राप्त कर लेता है । पहले गुरुकी भक्तिपूर्वक आराधना करके बुद्धिमान् पुरुष योगशास्त्र , इतिहास , पुराण और वेदोंका श्रवण करे । तत्पश्चात् आहार , योगके दोष , देश और कालका ज्ञान प्राप्त करके निर्द्वन्द्व एवं परिग्रहशून्य होकर योगका अभ्यास करे । सत्तू , जौका माँड़ , मट्ठा , मूल , फल , दूध , जौका हलुआ , खुद्दी और तिलकी खली- इन सब वस्तुओं का भोजन योगकी सिद्धि करनेवाला है । जिस समय मन व्याकुल न हो , कानोंमें किसी प्रकारका शब्द न आता हो , भूख - प्यासका कष्ट न हो , हर्ष , शोक आदि द्वन्द्व , सर्दी , गर्मी तथा वायु बाधा न पहुँचाती हो , ऐसे समयमें योगसाधन करना चाहिये। जहाँ कोई शब्द होता हो तथा जो जलके समीप हो , ऐसे स्थानमें , टूटी - फूटी पुरानी गोशालामें , चौराहेपर , साँप बिच्छू आदिके स्थानमें , श्मशान भूमिमें , नदीके तटपर , अग्निके समीप , देववृक्षके नीचे , बाँबीपर , भयदायक स्थानमें , कुएँके समीप तथा सूखे पत्तोंपर कभी योगाभ्यास नहीं करना चाहिये । जो मूर्खतावश इन स्थानोंकी परवा न करके वहीं योग - साधन करता है , उसके सामने विघ्नकारक दोष आते हैं । उन दोषोंका वर्णन करता हूँ , सुनो । बहरापन , जडता , स्मरणशक्तिका लोप , गूँगापन , अन्धापन , ज्वर तथा अज्ञान - जनित दोष- ये सभी उसे प्राप्त होते हैं । अतः योगवेत्ता पुरुषको सदा सब प्रकारसे शरीरकी रक्षा करनी चाहिये ; क्योंकि शरीर ही धर्म , अर्थ , काम और मोक्ष- चारों पुरुषार्थोंका साधन है । एकान्त आश्रममें , गूढ स्थानमें , शब्द और भयसे रहित पर्वतीय गुफामें , सूने घरमें , अथवा पवित्र रमणीय तथा एकान्त देवमन्दिरमें बैठकर रातके पहले और पिछले पहरमें अथवा दिनके पूर्वाह्न और मध्याह्नकालमें एकाग्रचित्त होकर योग - साधन करे । भोजन थोड़ा और नियमके अनुकूल हो । इन्द्रियोंपर पूरा नियन्त्रण रहे । सुन्दर आसनपर पूर्वाभिमुख बैठकर योगाभ्यास करना उचित है । आसन सुखद और स्थिर हो । अधिक ऊँचा या अधिक नीचा न हो । योगके साधकको निःस्पृह , सत्यवादी और पवित्र होना चाहिये । वह निद्रा और क्रोधको अपने वशमें रखे । सम्पूर्ण भूतोंके हितमें तत्पर रहे । सब प्रकारके द्वन्द्वोंको सहन करे । शरीर , चरण और मस्तकको समान स्थितिमें रखे । दोनों हाथ नाभिपर रखकर शान्त हो पद्मासनसे बैठे दृष्टिको नासिकाके अग्रभागपर लगाकर प्राणायामपूर्वक मौन रहे । मनके द्वारा इन्द्रिय समुदायको विषयोंकी ओरसे हटाकर हृदयमें स्थापित करे । दीर्घस्वरसे प्रणवका उच्चारण करते हुए मुखको बंद रखे और स्वयं भी स्थिर रहे । योगी पुरुष नेत्र बंद करके बैठे । वह तमोगुणकी वृत्तिको रजोगुणसे और रजोगुणकी वृत्तिको सत्त्वगुणसे आच्छादित करके निर्मल एवं शान्त हृदयकमलकी कर्णिकामें लीन , सर्वव्यापी , निरञ्जन , मोक्षदायक भगवान् पुरुषोत्तमका निरन्तर चिन्तन करे । योगवेत्ता पुरुष पहले अन्तःकरणसहित इन्द्रियों और पञ्चभूतोंको क्षेत्रज्ञमें स्थापित करे और क्षेत्रज्ञको परमात्मामें नियुक्त करे । तत्पश्चात् योगाभ्यास करे । | जिस पुरुषका चञ्चल मन समस्त विषयोंका परित्याग करके परमात्मामें लीन हो जाता है , उसके सामने योगसिद्धि प्रकाशित होती है । जब योगयुक्त पुरुषका | चित्त समाधिकालमें सब विषयोंसे निवृत्त हो परब्रह्ममें एकीभूत हो जाता है , उस समय वह परमपदको प्राप्त होता है । जब योगीका चित्त परमानन्दको प्राप्तकर किसी भी कर्ममें आसक्त नहीं होता , उस समय वह निर्वाणपदको प्राप्त होता है । योगी अपने योगबलसे शुद्ध , सूक्ष्म , गुणातीत तथा सत्त्वगुणसम्पन्न पुरुषोत्तमको प्राप्त करके निस्संदेह मुक्त हो जाता है । सम्पूर्ण भोगोंकी ओरसे निःस्पृह , सर्वत्र प्रेमपूर्ण दृष्टि रखनेवाला तथा सब अनात्मपदार्थोंमें अनित्य बुद्धि रखनेवाला योगी ही मुक्त हो सकता है । जो योगवेत्ता पुरुष वैराग्यके कारण इन्द्रियोंके विषयोंका सेवन नहीं करता और निरन्तर अभ्यासयोगमें लगा रहता है , उसकी मुक्तिमें तनिक भी संदेह नहीं है । केवल पद्मासन लगानेसे और नासिकाके अग्रभागपर दृष्टि रखने से ही योगकी सिद्धि नहीं होती । वास्तवमें मन और इन्द्रियोंके संयोग – उनकी एकाग्रताको ही योग कहते हैं । मुनिवरो ! इस प्रकार मैंने संसार - बन्धनसे मुक्तिके साधनभूत मोक्षदायक योगका वर्णन किया ।

मुनि बोले- द्विज श्रेष्ठ ! आपके मुखरूपी समुद्रसे निकले हुए वचनामृतका पान करनेसे हमें तृप्ति होती नहीं दिखायी देती । अतः पुनः मोक्षदायक योग और सांख्यका विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिये । तपस्या , ब्रह्मचर्य , सर्वस्वत्याग और बुद्धि - जिस उपायसे मन और इन्द्रियोंकी एकाग्रता प्राप्त हो सके , वह बतलानेकी कृपा कीजिये ।

 व्यासजीने कहा- विद्या , तप , इन्द्रियनिग्रह और सर्वस्वत्यागके बिना कोई भी सिद्धि नहीं पा सकता । सम्पूर्ण महाभूत विधाताकी पहली सृष्टि है । वे प्राणियोंके शरीरमें भरे हुए हैं । पृथ्वी से देहका निर्माण हुआ है । चिकनाहट और पसीने आदि जलके अंश हैं । अग्निसे नेत्र तथा वायुसे प्राण और अपान उत्पन्न हुए हैं । नाक , कान आदिके छिद्र आकाशतत्त्वके स्वरूप हैं । चरणोंमें विष्णु , हाथोंमें इन्द्र और उदरमें अग्नि देवता भोक्तारूपसे स्थित रहते हैं । कानोंमें श्रोत्र इन्द्रिय और दिशाएँ हैं । जिह्वामें वाक् - इन्द्रिय और सरस्वती देवताका निवास है । कान , त्वचा , नेत्र , जिह्वा और नासिका - ये पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ हैं ; उन्हें | विषयानुभवका द्वार बतलाया गया है । शब्द , स्पर्श , रूप , रस और गन्ध- ये इन्द्रियोंके विषय हैं । इस महान् आत्माका दर्शन नेत्रों अथवा सम्पूर्ण इन्द्रियोंसे नहीं हो सकता । यह विशुद्ध मनरूपी दीपकसे ही बुद्धिमें प्रकाशित होता है । परमात्मा शब्द , स्पर्श ,  रूप , रस और गन्धसे हीन , अविकारी तथा शरीर और इन्द्रियोंसे रहित है तो भी शरीरके भीतर ही | इसका अनुसंधान करना चाहिये । जो इस विनाशशील शरीरमें अव्यक्तभावसे स्थित परमपूजित परमेश्वरका | ज्ञानमयी दृष्टिसे निरन्तर साक्षात्कार करता रहता है , वह मृत्युके पश्चात् ब्रह्मभावको प्राप्त होता है । ज्ञानीजन विद्या विनयसम्पन्न ब्राह्मणमें तथा गौ , हाथी , कुत्ते और चाण्डालमें भी समभावसे ही देखनेवाले होते हैं।* जिससे यह सम्पूर्ण जगत् व्याप्त है , वह परमात्मा समस्त चराचर प्राणियोंके भीतर निवास करता है । जब जीवात्मा सम्पूर्ण | प्राणियों में अपनेको और अपनेमें सम्पूर्ण प्राणियोंको स्थित देखता है , उस समय वह ब्रह्मभावको प्राप्त हो जाता है । अपने शरीरके भीतर जैसा आत्मा है , वैसा ही दूसरोंके शरीरमें भी है- जिस पुरुषको निरन्तर ऐसा ज्ञान बना रहता है , वह अमृतत्व ( मोक्ष ) को प्राप्त होता है । जो सम्पूर्ण प्राणियोंका |+ आत्मा होकर सबके हितमें लगा हुआ है , जिसका अपना कोई मार्ग नहीं है तथा जो ब्रह्मपदको प्राप्त करना चाहता है , उसके मार्गकी खोज करनेमें देवता भी मोहित हो जाते हैं । जैसे आकाशमें चिड़ियोंके और जलमें मछलियोंके चलनेके चिह्न दिखायी नहीं पड़ते , उसी प्रकार ज्ञानियोंकी मतिका भी किसीको पता नहीं चलता।  काल सम्पूर्ण प्राणियों को पकाता ( नष्ट करता ) है ; किंतु जहाँ काल भी पकाया जाता है - जो कालका भी काल है , उस आत्माको कोई नहीं जानता । परब्रह्म परमात्मा न ऊपर है न नीचे है , न इधर - उधर है और न बीचमें ही ; कोई किसी अंशमें उसको ग्रहण कर सकता है । सम्पूर्ण लोक उसके भीतर ही स्थित हैं । उसके बाहर कुछ भी नहीं है । यद्यपि कोई धनुषसे छूटे हुए बाण अथवा मनके समान वेगसे निरन्तर आगेकी ओर दौड़ता रहे तो भी कभी उस परमेश्वरका अन्त नहीं पा सकता । उससे अधिक सूक्ष्म तथा उससे बढ़कर स्थूल दूसरी कोई वस्तु नहीं है । उसके सब ओर हाथ - पैर हैं , सब ओर नेत्र हैं तथा सब ओर सिर , मुख और कान हैं। वह संसारमें सबको व्याप्त करके स्थित है । छोटे - से - छोटा और बड़े - से - बड़ा भी वही है। यद्यपि वह सब प्राणियोंके भीतर निश्चय ही स्थित रहता है तो भी वह किसीको दिखायी नहीं देता।* क्षर और अक्षर- ये पुरुषके दो भेद हैं। सम्पूर्ण भूत तो क्षर ( विनाशी ) हैं और दिव्य अमृतस्वरूप चेतन आत्मा अक्षर ( अविनाशी ) है । नौ द्वारोंवाले पुर ( शरीर ) का निर्माण करके जितेन्द्रिय तथा नियमपरायण हंस ( आत्मा ) उसमें वास करता है । समस्त चराचर भूतोंका आत्मा ऐसा ही है । अजन्मा आत्मा भाँति - भाँतिके विकल्पोंका त्याग और शरीरोंका संचय करता है , इसलिये पारदर्शी विद्वानोंने उसे ' हंस ' कहा है। 'हंस' नामसे जिस अविनाशी जीवात्माका प्रतिपादन किया गया है, वह कूटस्थ अक्षर ही है । इस प्रकार जो विद्वान् उस अक्षर आत्माको जान लेता है , वह जन्म

 मृत्युके बन्धनसे छुटकारा पा जाता है।

 ब्राह्मणो ! इस प्रकार तुम्हारे पूछनेपर मैंने ज्ञानयुक्त सांख्यका यथावत् वर्णन किया। अब योगकी बातें बताऊँगा , सुनो। इन्द्रिय , मन और बुद्धिकी वृत्तियोंको सब ओरसे रोककर व्यापक आत्माके साथ उनकी एकता स्थापित करना ही योगशास्त्रके मतमें उत्तम ज्ञान है। योगी पुरुषको शमदमसे सम्पन्न होना चाहिये। वह अध्यात्मशास्त्रका अनुशीलन करे , आत्मामें ही अनुराग रखे , शास्त्रोंका तत्त्व जाने और निष्कामभावसे पवित्र कर्मोंका अनुष्ठान करे। इस प्रकार साधनसम्पन्न होकर योगोक्त उत्तम ज्ञानको प्राप्त करे। काम , क्रोध , लोभ , भय और स्वप्न ये पाँच योगके दोष हैं; इन्हें विद्वान् पुरुष जानते हैं । इन सभी दोषोंका उच्छेद करके अपनेको योगका अधिकारी बनाये । धीर पुरुष मनको वशमें रखनेसे क्रोधपर और संकल्पका त्याग करनेसे कामपर विजय पाता है।

सत्त्वगुणका सेवन करनेसे वह निद्राका नाश कर सकता है । धैर्यके द्वारा योगी शिश्न और उदरकी रक्षा करे । नेत्रोंकी सहायतासे हाथ और पैरोंकी रक्षा करे । मनके द्वारा नेत्र और कानोंकी तथा कर्मके द्वारा मन और वाणीकी रक्षा करे। प्रमादके त्यागसे भयका और विद्वान् पुरुषों के सेवनसे दम्भका त्याग करे।+  इस प्रकार योगके साधकको आलस्य छोड़कर इन योग सम्बन्धी दोषोंको जीतनेका प्रयत्न करना चाहिये। वह अग्नि , ब्राह्मण तथा देवताओंको सदा प्रणाम करे । मनपर प्रभाव डालनेवाली हिंसायुक्त उद्दण्डतापूर्ण वाणी न बोले। तेजोमय ब्रह्म ही वीर्य ( सबका आदि कारण ) है , यह सम्पूर्ण जगत् उसीका कार्य है । समस्त चराचर जगत् उस ब्रह्मके ही ईक्षण

( संकल्प )-का परिणाम है। ध्यान , वेदाध्ययन,दान,सत्य,लज्जा,सरलता,क्षमा,शौच, आत्मशुद्धि एवं इन्द्रियसंयम – इनसे तेजकी वृद्धि होती है और पापका नाश होता है।* 

योगीको चाहिये कि वह सम्पूर्ण प्राणियोंमें समान भाव रखे ; जो कुछ मिल जाय , उसी से निर्वाह करे । पापरहित , तेजस्वी , मिताहारी और जितेन्द्रिय होकर, काम और क्रोधको वशमें करके ब्रह्मपदका सेवन करे । योगी रातके पहले और पिछले पहरमें मन एवं इन्द्रियोंको एकाग्र करके ध्यानस्थ हो मनको आत्मामें लगावे । जैसे मशकमें एक जगह भी छेद हो जानेपर सारा पानी बह जाता है , उसी प्रकार यदि साधककी पाँच इन्द्रियोंमेंसे एक इन्द्रिय भी विकृत हो विषयोंकी ओर चली जाय तो वह अपनी बुद्धि और विवेक खो बैठता है । जैसे मछुआ पहले जाल काटनेवाली मछलीको पकड़कर पीछे अन्य मछलियोंको पकड़ता है, उसी प्रकार योगवेत्ता साधक पहले अपने मनको वशमें करे। तत्पश्चात् कान , नेत्र , जिह्वा तथा नासिका आदि इन्द्रियोंका निग्रह करे। इन सबको अधीन करके मनमें स्थापित करे और मनको भी संकल्प विकल्पसे हटाकर बुद्धिमें स्थिर करे। इस प्रकार पाँचों इन्द्रियोंको मनमें और मनको बुद्धिमें स्थापित करनेपर जब ये इन्द्रिय और मन स्थिर हो जाते हैं , उस समय इनकी मलिनता दूर होकर इनमें स्वच्छता आ जाती है ।  फिर अन्तःकरणमें ब्रह्मका साक्षात्कार हो जाता है । योगी धूमरहित अग्नि , दीप्तिमान् सूर्य तथा आकाशमें चमकती हुई बिजलीकी भाँति आत्माका हृदयदेशमें दर्शन करता है । सब कुछ आत्मामें है और आत्मा सबमें व्यापक है ; इसलिये वह सर्वत्र दृष्टिगोचर होता है । जो महात्मा ब्राह्मण मनीषी , धैर्यवान् , महाज्ञानी और सम्पूर्ण प्राणियोंके हितमें तत्पर रहनेवाले हैं , वे ही उस आत्माका दर्शन कर पाते हैं । जो योगी एकान्तमें बैठकर कठोर नियमोंका पालन करते हुए थोड़े समय भी इस प्रकार योगाभ्यास करता है , वह अक्षर ब्रह्मकी समानताको प्राप्त हो जाता है ।

 योग - साधनामें अग्रसर होनेपर मोह , भ्रम और आवर्त आदि विघ्न प्राप्त होते हैं । दिव्य सुगन्ध आती है , दिव्य वाणीका श्रवण तथा दिव्य रूपोंके दर्शन होते हैं । अद्भुत बातें देखनेमें आती हैं । अलौकिक रस और स्पर्शका अनुभव होता है। इच्छानुकूल सर्दी और गर्मी प्राप्त होती है। वायुकी भाँति आकाशमें चलने फिरनेकी शक्ति आ जाती है । प्रतिभा बढ़ जाती है और उपद्रवोंका अभाव हो जाता है । योगसे इन  सिद्धियोंके प्राप्त होनेपर भी तत्त्ववेत्ता पुरुष उनकी उपेक्षा करके समभावसे ही उन्हें लौटा दे । वह योगका ही अभ्यास बढ़ाये और नियमपूर्वक रहते हुए पहाड़की चोटीपर , शून्य देवमन्दिरमें अथवा वृक्षोंके नीचे बैठकर योगका अभ्यास करे ।  इन्द्रिय-समुदायको संयममें रखकर एकाग्रचित्त हो  निरन्तर आत्माका चिन्तन करता रहे । योगसे मनको उद्विग्न न होने दे । जिस उपायसे चञ्चल मनको रोका जा सके,उसमें तत्परतापूर्वक लग जाय और साधनासे कभी विचलित न हो । अपने रहनेके लिये शून्य गृहको स्वीकार करे , क्योंकि वहाँ चित्त एकाग्र रह सकता है । योगका साधक मन , वाणी अथवा क्रियाद्वारा भी कहीं आसक्त न हो । वह सबकी ओरसे उपेक्षाका भाव रखे , नियमित भोजन करे तथा लाभ और अलाभको समान समझे । जो उस योगीकी निन्दा करे और जो उसको मस्तक झुकाये , उन दोनोंके ही प्रति वह समान भाव रखे । वह किसी एककी बुराई या भलाई न सोचे । कुछ लाभ होनेपर हर्षसे फूल न उठे और लाभ न होनेपर चिन्ता न करे। अपितु वायुका सहधर्मी १   होकर सब प्राणियोंके प्रति समान भाव रखे।२

इस प्रकार स्वस्थचित्त होकर सर्वत्र समान दृष्टि रखनेवाला साधक यदि छः महीने भी निरन्तर योगके अभ्यासमें लगा रहे तो  उसे ब्रह्मका साक्षात्कार हो जाता है । दूसरे लोग धनकी इच्छा या संग्रह करनेके कारण अत्यन्त विकल हैं , यह देखकर उसकी ओरसे विरक्त हो जाय। मिट्टीके ढेले , पत्थर और सुवर्णको समान समझे । इस प्रकार योग मार्गपर चलनेवाला साधक मोहवश कभी उससे विचलित न हो । कोई नीच वर्णका पुरुष अथवा स्त्री ही क्यों न हो , यदि उसे धर्म करनेकी अभिलाषा हो तो वह भी इस योगमार्गसे परम गतिको प्राप्त कर सकता है । योगी पुरुष अजन्मा , पुरातन , जरावस्थासे रहित , सनातन , इन्द्रियातीत एवं अगोचर ब्रह्मको प्राप्त होते हैं । जो मनीषी पुरुष इस योगकी पद्धतिपर दृष्टिपात करके इसे अपनाते हैं , वे ब्रह्माजी के समान हो उस उत्तम गतिको प्राप्त करते हैं , जहाँसे  पुनः इस संसारमें नहीं आना पड़ता ।

 * विद्याविनयसम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि । शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः ॥

                                                                                                               ( २३५ ।२० )

 ↑ सर्वभूतेषु चात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि । यदा पश्यति भूतात्मा ब्रह्म सम्पद्यते तदा॥

   यावानात्मनि वेदात्मा तावानात्मा परात्मनि । य एवं सततं वेद सोऽमृतत्वाय कल्पते ॥

                                                                                                           ( २३५।२२-२३)