10 - प्लक्ष आदि छ: द्वीपों का वर्णन और भूमिका मान

लोमहर्षणजी कहते हैं - जिस प्रकार जम्बूद्वीप खारे पानी के समुद्र से घिरा हुआ है, उसी प्रकार उस समुद्र को भी घेरकर प्लक्षद्वीप स्थित है। जम्बूद्वीप का विस्तार एक लाख योजन बताया गया है। प्लक्षद्वीप विस्तार उससे दुगुना है। प्लक्षद्वीप स्वामी राजा मेधातिथि के सात पुत्र हुए। उनमें ज्येष्ठ पुत्र का नाम शान्तमय है। उससे छोटे क्रमशः शिशिर, सुखोदय, आनन्द, शिव, क्षेमक तथा ध्रुव हैं। ये सभी प्लक्षद्वीप के राजा हुए। इन्हीं के नाम पर उस द्वीप सात वर्ष हैं। उनकी सीमा बनानेवाले सात ही वर्षपर्वत हैं। उनके नाम बतलाता हूँ, सुनो। गोमेद, चन्द्र, नारद, दुन्दुभि, सोमक, सुमना तथा वैभ्राज- ये सत वर्षपर्वत हैं। इन रमणीय पर्वतों पर देवताओं और गन्धर्वोंसहित वहाँ की प्रजा निवास करती है। उन सबमें पवित्र जनपद हैं, वीर पुरुष हैं, वहाँ किसी की मृत्यु नहीं होती। मानसिक चिन्ताएँ तथा व्याधियाँ भी नहीं सतातीं। वहाँ हर समय सुख मिलता है। प्लक्षद्वीप के वर्षों में सात ही ऐसी नदियाँ हैं, जो समुद्र में जा मिलती हैं। अनुतत्ता, शिखा, विप्रशा, त्रिदिवा, क्रमु, अमृता तथा सुकृता- ये सात वहाँ की नदियाँ हैं। इस प्रकार प्लक्षद्वीप के प्रधान-प्रधान पर्वतों और नदियों का वर्णन किया गया। छोटी-छोटी नदियाँ और छोटे-छोटे पहाड़ तो वहाँ हजारों हैं। उन वर्षों में युगों की व्यवस्था नहीं है। वहाँ सदा ही त्रेतायुग के समान समय रहता है। प्लक्षद्वीप से लेकर शाकद्वीपतक के लोग पाँच हजाए वर्षों तक नीरोग जीवन व्यतीत करते हैं। उन द्वीपों में वर्णाश्रम- विभागपूर्वक चार प्रकार का धर्म है तथा वहाँ चार ही वर्ण हैं, जिनके नाम इस प्रकार हैं- आर्यक, कुरु, विविश्व तथा भावी। ये क्रमशः ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र की कोटि के हैं। उस द्वीप के मध्यभाग में प्लक्ष (पाकड़) नाम का बहुत विशाल वृक्ष है, जो जम्बूद्वीप में स्थित जम्बू (जामुन) वृक्ष के बराबर है। उसी के नाम पर उस द्वीप का प्लक्षद्वीप नाम रखा गया है। प्लक्षद्वीप में आर्यक आदि वर्णों के लोग जगत्स्त्रष्टा सर्वेश्वर भगवान् श्रीहरि का चन्द्रमा के रूप में यजन करते हैं। प्लक्षद्वीप अपने ही बराबर विस्तार वाले मण्डलाकार इक्षुरस के समुद्र से घिरा हुआ है। अब शाल्मयद्वीप का वर्णन सुनो।

शाल्मयद्वीप के स्वामी वीर वपुष्मान् हैं। उनके सात पुत्र हैं और उन्हीं नाम पर वहाँ सात वर्ष स्थित हैं। जिनके नाम इस प्रकार हैं- श्वेत, हरित, जीमूत, रोहित, वैद्युत, मानस तथा सुप्रभ। इक्षुरस का जो समुद्र बताया गया है, वह ओने दुगुने विस्तार वाले शाल्मयद्वीप के द्वारा सब ओर से घिरा हुआ है। वहाँ भी सात ही वर्ष पर्वत हैं, जहाँ रत्नों खानें हैं। नदियाँ भी सात ही हैं। पहले पर्वतों के नाम सुनो- कुदुम, उन्नत, वलाहक, द्रोण, कङ्क, महषि तथा पर्वत श्रेष्ठ ककुद्य्मान्- ये सात पर्वत हैं। इनमें द्रोणपर्वत पर कितनी ही महौषधियाँ हैं। नदियों के नाम इस प्रकार हैं- श्रोणी, तोय, वितृष्णा, चद्र, शुक्रा, विमोचनी तथा निवृत्ति। वहाँ श्वेत आदि सात वर्ष हैं, जिनमें चारों वर्णों के लोग निवास करते हैं। शाल्मलद्वीप में कपिल, अरुण, पीत तथा कृष्ण वर्ण के लोग होते हैं, जो क्रमशः ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र मने जाते हैं। वे सब लोग यज्ञपरायण हो सबके आत्मा, अविनाशी एवं यज्ञ में स्थित भगवान् विष्णु की वायुरूप में आराधना करते हैं। इस अत्यन्त मनोहर द्वीप में देवताओं का सांनिध्य बना रहता हिया। वहाँ शाल्मलि नाम का महान् वृक्ष है, जो उस द्वीप के नामकरण का कारण बना है। यह द्वीप अपने समान विस्तारवाले सुराके समुद्र से घिरा हुआ है और वह सुराका समुद्र शाल्मलद्वीप से दुगुने विस्तारवाले कुशद्वीप द्वारा सब ओर से आवृत है। कुशद्वीप में ज्योतिष्मान् राजा हैं; अब उनके पुत्रों के नाम बतलाये जाते हैं, सुनो- उभ्दिद्, वेणुमान्, सुरथ, रन्धन, धृति, प्रभाकर और कपिल। इन्हीं के नामों पर वहाँ के सात वर्ष प्रसिद्ध हैं। वहाँ मनुष्यों के साथ-साथ दैत्य, दानव, देवता, गन्धर्व, यक्ष और किंनर आदि भी निवास करते हैं। वहाँ के मनुष्यों में भी चार ही वर्ण हैं, जो अपने-अपने कर्तव्य के पालन में तत्पर रहते हैं। उन वर्णों के नाम इस प्रकार हैं- दमी, शुष्मी, स्नेह तथा मन्देह। ये क्रमशः ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र की श्रेणी में बताये गये हैं। वे शास्त्रोक्त कर्मों का ठीक-ठीक पालन करते और अपने अधिकार के आरम्भक कर्मों का क्षय होने के लिए कुशद्वीप में ब्रह्मारुपी भगवान् जनार्दन का यजन करते हैं। विद्रुम, हेमशैल, द्युतिमान्, पुष्टिमान्, कुशेशय, हरि और मन्दराचल- ये सात उस द्वीप के वर्षपर्वत हैं। नदियाँ भी सात ही हैं, जिनके नाम इस प्रकार हैं- धूतपापा, शिव, पवित्रा, सम्मति, विद्युत्, अम्भस् तथा मही। ये सब पापों का अपहरण करनेवाली नदियाँ हैं। इनके अतिरिक्त भी वहाँ बहुत-सी छोटी-छोटी नदियाँ और पर्वत हैं। कुशद्वीप में कुशों का बहुत बड़ा वन है, अत: उसी के नाम पर उस द्वीप की प्रसिद्धि हुई है। वह द्वीप अपने ही बराबर विस्तार वाले घी के समुद्र से घिरा हुआ है।

मुनिवरो! उपर्युक्त घी का समुद्र क्रोञ्चद्वीप से घिरा हुआ है। उसका विस्तार कुशद्वीप से दुगुना है। क्रोञ्चद्वीप के राजा द्युतिमान् हैं। महात्मा द्युतिमान् के सात पुत्र हैं। महामना द्युतिमान् ने अपने पुत्रों के ही नाम से कौञ्चद्वीप के सात वोभाग किये, जिनके नाम ये हैं- कुशग, मन्दग, उष्ण, पीवर, अन्धकारक, मुनि और दुन्दुभि। कौञ्चद्वीप में भी बड़े ही मनोरम सात वर्षपर्वत हैं, जिनपर देवता और गन्धर्व निवास करते हैं कौञ्चद्वीप उनके नाम ये है- कौञ्च, वामन, अन्धकरक, देवव्रत, धर्म, पुण्डरीकवान् तथा दुन्दुभि। ये एक-दूसरे से दुगुने बड़े हैं। जितने द्वीप है, द्वीपों में जितने पर्वत हैं तथा पर्वतों द्वारा सिमित जितने वर्ष हैं, उन सभी रमणीय प्रदेशों में देवताओं सहित समस्त प्रजा बेखट के निवास करती है। क्रोञ्चद्वीप में पुष्कल, पुष्कर, धन्य तथा ख्यात- ये चार वर्ण हैं, जो क्रमशः ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य एवं शूद्र की कोटि के माने गये हैं। वहाँ छोटी-बड़ी सैकड़ों नदियाँ हैं, जिनमें सात प्रधान हैं- गौरी, कुमुद्वती, संध्या, रात्रि, मनोजवा, ख्याति तथा पुण्डरीका। क्रोञ्च के निवासी इन्हीं नदियों का जल पीते हैं। वहाँ पुष्कर आदि वर्णों के लोग यज्ञ के समीप ध्यानयोग के द्वारा रूद्रस्वरुप भगवान् जनार्दन का यजन करते हैं। क्रोञ्चद्वीप अपने समान परिमाण वाले दधिमण्डोद नामक समुद्र से घिरा हुआ है तथा वह समुद्र भी शाकद्वीप से आवृत है। शाकद्वीप का विस्तार क्रोञ्चद्वीप से दूना है। उसके स्वामी महात्मा भव्य हैं। उनके सात पुत्र हैं, जिन्हें राजा ने उस द्वीप के सात विभाग करके वहाँ का राज्य दिया है। राजपुत्रों के नाम ये हैं- जल्द, कुमार, सुकुमार, मनीरक, कुसुमोद, मोदाकि तथा महाद्रुम। इन्हीं के नामों पर वहाँ के सात वर्ष प्रसिद्ध हुए हैं। वहाँ भी सात पर्वत हैं, जो जलद आदि वर्षों की सीमा निर्धारित करते हैं। उनके नाम इस प्रकार हैं- उदयगिरि, जलधार, रैवतक, श्याम, अम्भोगिरि, आस्तिकेय तथा केसरी। वहाँ शाक (सागवान) का बहुत बड़ा वृक्ष है, जहाँ सिद्ध और गन्धर्व निवास करते हैं। उसके पत्तों को छूकर बहनेवाली वायुका स्पर्श होने से बड़ा आनन्द मिलता है। वहाँ के पवित्र जनपद चार वर्णों के लोगों से सुशोभित हैं। शाकद्वीप में महात्मा पुरुष निर्भय एवं नीरोग होकर निवास करते हैं। वहाँ की नदियाँ भी परम पवित्र तथा सब पापों का नाश करनेवाली हैं। उनके नाम ये हैं- सुकुमारी, कुमारी, नलिनी, रेणुका, इक्षु, धेनुका तथा गभस्ति। इनके अतिरिक्त वहाँ छोटी-छोटी हजारों नदियाँ हैं। पर्वत भी सहस्त्रों की संख्या में हैं, जल्दादि वर्षों के निवासी बड़ी प्रसन्नता के साथ पूर्वोक्त नदियों का जल पीते हैं। मग, मागध, मानस तथा मन्दग- ये ही वहाँ के चार वर्ण हैं- मग ब्राह्मण, मागध क्षत्रिय, मानस वैश्य तथा मन्दग शूद्र जानने चाहिये। शाकद्वीप में रहनेवाले लोग अपने मन और इन्द्रियों को संयम में रखकर शास्त्रोक्त सत्कर्मों के द्वारा सूर्यरूप धारी भगवान् विष्णु का पूजन करते हैं। शाकद्वीप अपने ही बराबर विस्तारवाले क्षीरसागर द्वारा सब ओर से घिरा हुआ है।

क्षीरसागर को पुष्करद्वीप ने चारों ओर से घेर रखा है। उसका विस्तार शाकद्वीप से दुगुना है। पुष्कर के महाराज सवन को दो पुत्र हुए- म्हावीत और धातकि। उन्हीं दोनों के नाम पर उस उस द्वीप के दो विभाग हुए हैं एक का नाम महावीत वर्ष और दूसरे का धातकि वर्ष है। उस द्वीप में एक ही वर्ष-पर्वत है, जो मानसोत्तर के नाम से विख्यात है। मानसोत्तरपर्वत पुष्करद्वीप के मध्यभाग में वलयाकार स्थित है। उसकी ऊँचाई पचास हजार योजन की है, चौड़ाई भी उतनी ही है। वह उस द्वीप के चारों ओर मण्डलाकार स्थित है। वह पुष्करद्वीप को बीच से चीरता हुआ-सा खड़ा है। उसी से विभक्त होकर उस द्वीप के दो खण्ड हो गये हैं। प्रत्येक खण्ड गोलाकार है और उन दोनों खण्डों के बीच में वह महापर्वत स्थित है। वहाँ के मनुष्य दस हजार वर्षों तक जीवित रहते हैं। वे सब लोग रोग-शोक से वर्जित तथा राग-द्वेष से शून्य होते हैं। उनमें ऊँच-नीचका कोई भेद नहीं है। वहाँ न कोई वध्य है, न वधिक। वहाँ के लोगों में ईर्ष्या, असूया, भय, रोष, दोष और लोभ आदि नहीं होते। महावीतवर्ष मानसोत्तरपर्वत के बाहर है और धातकिवर्ष भीतर। उसमें देवता और दैत्य आदि सभी निवास करते हैं। पुष्करद्वीप में सत्य और असत्य नहीं हैं। उसके दोनों खण्डों में न कोई नदी है न दूसरा पर्वत। वहाँ के मनुष्य देवताओं के समान रूप और वेषवाले होते हैं। उन दोनों वर्षों में वर्ण और आश्रम का आचार नहीं है। वहाँ किसी के धर्म का अपहरण नहीं होता। वेदत्रयी, वार्ता (कृषि-वाणिज्य आदि), दण्डनीति तथा शुश्रूषा आदि का व्यवहार भी नहीं देखा जाता; अत:उक्त दोनों वर्ष भूमण्डल के उत्तम स्वर्ग समझे जाते हैं। वहाँ का प्रत्येक समय सबके लिये सुखद होता है। किसी को जरा-अवस्था या रोगका कष्ट नहीं होता। पुष्करद्वीप में एक बरगद का विशाल वृक्ष है, जो ब्रह्माजी का उत्तम स्थान माना गया है। उसके नीचे देवता और असुरों से पूजित भगवान् ब्रह्मा निवास करते हैं। पुष्करद्वीप अपने समान विस्तारवाले मीठे जल के समुद्र से घिरा है। इस प्रकार सातों द्वीप सान समुद्रों से आवृत हैं। एक द्वीप और समुद्र का विस्तार समान माना गया है। उसकी अपेक्षा दूसरे समुद्र और द्वीप दुगुने बड़े हैं। सब समुद्रों में सदा समान जल रहता है। उसमें कभी न्यूनता या अधिकता नहीं होती। जैसे बटलोई में रखा हुआ जल आगका संयोग होने से उफन उठता है, उसी प्रकार चन्द्रमा की वृद्धि होने पर समुद्र के जल में ज्वार आता है। उसका जल बढ़ता है और फिर घट जाता है; तथापि उसमें न्यूनता या अधिकता नहीं होती। शुक्ल और कृष्णपक्ष में चन्द्रमा के उदय और अस्त होने पर समुद्र के जलका उत्थान पंद्रह सौ अंगुल ऊँचेतक देखा गया है। उत्थान के बाद जल पुन: उतार में आ जाता है। पुष्करद्वीप में सबके लिये भोजन स्वत: उपस्थित हो जाता है। वहाँ की समस्त प्रजा सदा षड्रसयुक्त भोजन करती है। स्वादिष्ठ जल वाले समुद्र के दोनों तटों पर लोकों की स्थिति देखी जाति है। उसके आगे की भूमि सुवर्णमयी है, जिसका विस्तार पुष्करद्वीप से दुगुना है। वहाँ किसी भी जीव-जन्तु का निवास नहीं है। उसके आगे लोकालोकपर्वत है, जो दस हजार योजनतक फैला हुआ है। उसकी ऊँचाई भी उतने ही योजनों की है। लोकालोकपर्वत के बाद अन्धकार है, जो उस पर्वत को सब ओर से आच्छादित करके स्थित है। अन्धकार भी अण्डकटाह के द्वारा सब ओर से घिरा है। इस प्रकार अण्डकटाह, द्वीप तथा पर्वतों सहित इस सम्पूर्ण पृथ्वी का विस्तार पचास करोड़ योजन है अण्डकटाह यह भूमि सबका धारण-पोषण करनेवाली है। इसमें सब भूतों की अपेक्षा अधिक गुण हैं। यह सम्पूर्ण जगत् की आधारभूता है।