ब्रह्म पुराण

36 - तीर्थोंके भेद, वामनका बलिसे भूमिदान-ग्रहण तथा गङ्गाजी का महेश्वरकी जटामें गमन

ब्रह्माजी कहते हैं - द्विजवरो! सब तीर्थो और क्षेत्रों में जो जप, होम, व्रत और तपस्या तथा दानके फल प्राप्त होते हैं, उनमेंसे कोई ऐसा नहीं दिखायी देता, जो पुरुषोत्तमक्षेत्र में रहनेके फलकी समानता कर सके। अब बारंबार अधिक कहनेकी क्या आवश्यकता, वह पुरुषोत्तमक्षेत्र सबसे महान् है- यह बात सत्य है, सत्य है। समुद्र के जल से घिरे हुए पुरुषोत्तमतीर्थका एकबार भी दर्शन कर लेनेपर तथा ब्रह्मविद्याका एक बार बोध हो जानेपर मनुष्य फिर गर्भमें नहीं आता। जहाँ भगवान् विष्णुका संनिधान है, उस उत्तम पुरुषोत्तमक्षेत्रमें एक वर्ष अथवा एक मासतक भगवान्की उपासना करे। ऐसा करनेवाले पुरुष ने जप, होम तथा भारी तपस्या की है। वह उस परम धाम में जाता है, जहाँ साक्षात् योगेश्वर श्रीहरि विराजमान रहते हैं।

मुनियों ने कहा - भगवन्! हमे तीर्थकी महिमा का विस्तारपूर्वक श्रवण करनेपर भी तृप्ति नहीं होती। आप पुन: किसी गोपनीय तीर्थका वर्णन करें।

ब्रह्माजी बोले - श्रेष्ठ ब्राह्मणो! पूर्वकाल में देवर्षि नारदने मुझसे यही प्रश्न पूछा था। उस समय मैंने प्रयत्नपूर्वक जो कुछ उनसे कहा था, वही तुम्हें भी बतलाता हूँ।

नारदजीने पूछा - जगत्पते! स्वर्गलोक, मर्त्यलोक और रसातल में कुल कितने तीर्थ हैं तथा सब तीर्थों में सदा कौन सबसे बढ़कर है?

ब्रह्माजी बोले - देवर्षे! स्वर्गलोक, मर्त्यलोक और रसातलमें चार प्रकारके तीर्थ अं- दैव, आसुर, आर्ष और मानुष। ये तीनों लोकों में विख्यात हैं। जम्बूद्वीपमें भारतवर्ष तीर्थभूमि है। वह तीनों लोकों में विख्यात है। बेटा! वह कर्मभूमि है, इसलिये उसे तीर्थ कहते हैं। पहले मैंने तुम्हें जो बताये हैं, वे सब तीर्थ भारतवर्षमें ही हैं। हिमालय और विन्ध्यपर्वतके बीच में छ: ऐसी नदियाँ हैं, जिनका प्राकट्य ब्रह्मा, विष्णु तथा शिव- इन देवताओं से हुआ है। इसी प्रकार दक्षिणसमुद्र तथा विन्ध्यपर्वतके बीच में भी छ: देवसम्भव नदियाँ हैं। ये बारह नदियाँ प्रधानरूप से बतलायी गयी हैं। गोदावरी, भीमरथी, तुङ्गभद्रा, कृष्णवेणी, तापी और पयोष्णी- ये विन्ध्यपर्वत के दक्षिणकीनदियाँ हैं। भागीरथी, नर्मदा, यमुना, सरस्वती, विशोका और वितस्ता- ये विन्ध्याचल और हिमालय पर्वत से सम्बन्ध रखनेवाली नदियाँ हैं। इन पुण्यमयी नदियोंको देवतीर्थ बताया गया है। गय, कोल्लासुर, वृत्त, त्रिपुर, अन्धक, ह्यमूर्धा, लवण, नमुचि, श्रृङ्गक, यम, पातालकेतु, मय तथा पुष्कर- इनके द्वारा आवृत तीर्थ आसुर कहलाते हैं। प्रभास, भार्गव, अगस्ति, नर-नारायण, वसिष्ठ, भरद्वाज, गौतम और कश्यप- इन ऋषि-मुनियों द्वारा सेवित तीर्थ ऋषितीर्थ हैं। अम्बरीष, हरिश्चन्द्र, मान्धाता, मनु, कुरु, कनखल, भद्राश्व, सगर, अश्वयूप, नचिकेता, वृषाकपि तथा अरिन्दम आदि मानवोंद्वारा निर्मित तीर्थ मानुष कहलाते हैं। ये सब यश तथा उत्तम फलकी सिद्धिके लिए निर्मित हुए हैं। तीनों लोकों में कहीं भी जो स्वत: प्रकट हुए दैव तीर्थ हैं, उन्हें पुण्यतिरत कहा गया है। इस प्रकार मैंने तीर्थ-भेद बतलाये हैं।

महादैत्य राजा बलि देवताओंके अजेय शत्रु हुए; उन्होंने धर्म, यश, प्रजापालन, गुरुभक्ति, सत्यभाषण, बल, पराक्रम, त्याग और क्षमा के द्वारा वह सम्मान प्राप्त किया, जिसकी तीनों लोकों में कहीं उपमा नहीं है। उनकी बढ़ती हुई समृद्धि देखकर देवताओंकोबदी चिन्ता हुई। ए आपस ऐ सलाह करने लगे कि हमबलिको कैसे जीतें। राजा बलि के शासनकाल में तीनों लोक निष्कण्टक थे। कहीं पर आधि-व्याधि अथवा शत्रुओंकी बाधा नहीं थी। अनावृष्टि और अर्धमका तो नाम भी नहीं था। स्वप्न में भी किसी को दुष्ट पुरुषका दर्शन नहीं होता था। देवताओंको उनकी उन्नति बाणकी तरह चुभती थी। बलिकी कीर्तिरुपी तलवारसे वे टुकड़े-टुकड़े हुए जाते थे तथा उनके शासनरुपी शक्ति से देवताओं के समस्त अङ्ग विदीर्ण हो रहे थे। अत: उन्हें कभी शान्ति नहीं मिलती थी। देवता उनसे द्वेष करने लगे। उनके यशरूपी अग्निसे जलने लगे। अत: वे व्याकुल होकर भगवान् विष्णु की शरणमें गये।

देवता बोले - शङ्ख, चक्र और गदा धारण करनेवाले जगन्नाथ! हम पीड़ित हैं। हमारी सत्ता छिन गयी है। आप हमारी ही रक्षा के लिए अस्त्र-शस्त्र धारण करते हैं। आप-जैसे स्वामी के होते हुए हमपर ऐसा दु:ख आ पड़ा है। हमारी जो वाणी आपको प्रणाम करती थी, वही एक दैत्यको कैसे नमस्कार करेगी। सुरेश्वर! आपके ऐश्वर्यसे पुष्ट हो अपने ही पराक्रमसे तीनों लोकों को जीतकर हम स्थिर होंगे। दैत्यको कैसे नमस्कार करें।

देवताओंका यह वचन सुनकर दैत्योंका संहार करनेवाले भगवान्ने देवकार्यकी सिद्धिके लिए इस प्रकार कहा-

श्रीभगवान् बोले - देवताओं! बलि मेरा भक्त है, उसे देवता और असुर कोई भी नहीं मार सकते। जैसे तुमलोग मेरे द्वारा पालन-पोषणके योग्य हो, वैसे बलि भी है। मैं बिना युद्ध के ही स्वर्गसे बलिका राज्य छीन लूँगा और बलिको बाँधकर तुम्हारा राज्य तुम्हें लौटा दूँगा।

ब्रह्माजी कहते हैं - 'बहुत अच्छा' कहकर देवता स्वर्गमें चले गये। इधर देवताओं के स्वामी भगवान् विष्णुने अदितिके गर्भमई प्रवेश किया। उनके जन्मके समय अनेक प्रकारके उत्सव होने लगे। यज्ञेश्वर यज्ञ[पुरुष स्वयं ही वामनरूपमें अवतीर्ण हुए। इसी समय बलवानोंमें श्रेष्ठ बलिने अश्वमेध-यज्ञi दीक्षा ली। प्रधान-प्रधान ऋषि तथा वेद-वेदाङ्गोंके ज्ञाता पुरोहित शुक्राचार्यने उस यज्ञका आरम्भ कराया। स्वयं शुक्र ही यज्ञके आचार्य थे। उस यज्ञ में हविष्यका भाग लेने के लिए जब सब देवता निकट आये, 'दान दो', 'भोजन करो', सबका सत्कार करो, 'पूर्ण हो गया', 'पूर्ण हो गया' इत्यादि शब्द यज्ञमण्डपमें गूँजने लगे, उसी समय विचित्र कुण्डल धारण किये साम-गान करते हुए वामनजी धीरे-धीरे यज्ञशालामें आये। आनेपर वे यज्ञकी प्रशंसा करने लगे। शुक्राचार्य ने उन्हें देखते ही समझ लिया कि ये ब्राह्मणरूपधारी वामन देवता वास्तवमें दैत्योंके विनाशक, यज्ञ और तपस्याके फल देनेवाले और राक्षसकुलका संहार करनेवाले साक्षात् विष्णु हैं। बलवानोंमें श्रेष्ठ महातेजस्वी राजा बलि क्षत्रिय-धर्मके अनुसार विजयी होकर भक्तिपूर्वक धनका दान करते हुए अपनी पत्नीके साथ यज्ञकी दीक्षा लेकर बैठे थे और हविष्यका हवन करते उए यज्ञपुरुषका ध्यान कर रहे थे। शुक्राचार्यजी ने वामनजीको पहचानकर तुरंत ही राजा बलिसे कहा- 'राजन्! ये जो बौने शरीरवाले ब्राह्मण तुम्हारे यज्ञमें आये हैं, वे वास्तवमें ब्राह्मण नहीं, यज्ञवाहन यज्ञेश्वर विष्णु हैं। प्रभो! इसमें तनिक संदेह नहीं कि ये देवताओंका हित करने के लिए बालकरूप धारणकर तुमसे कुछ याचना करने आये हैं। अत: पहले मुझसे सलाह लेकरपीछे इन्हें कुछ देना चाहिये।'

यह सुनकर शत्रुविजयी बलिने अपने पुरोहित शुक्राचार्यसे कहा- 'मैं धन्य हूँ, जिसके घरपर साक्षात् यज्ञेश्वर मूर्तिमान् होकर पधारते और कुछ याचना करते हैं। अब इसमें सलाह पधारते और कुछ याचना करते हैं। अब इसमें सलाह लेनेके योग्य कौन-सी बात रह जाती है।' यों कहकर पत्नी और पुरोहित शुक्राचार्य के साथ राजा बलि उस स्थानपर आये, जहाँ अदितिनन्दन वामनजी विराजमान थे। राजा ने हाथ जोड़कर पूछा- 'भगवान्! बताइये, आप क्या चाहते हैं?' तब वामनजीने कहा- 'महाराज! केवल तीन पग भूमि दे दीजिये और किसी धन की मुझे आवश्यकता नहीं है।' 'बहुत अच्छा' कहकर राजा बलि ने रत्नजटित कलशसे जल लिया और वामनजीको भूमि संकल्प करके दे दी। सभी महर्षि और शुक्राचार्य चुपचाप देखते रहे। वामनजी धीरेसे कहा- 'राजन!  स्वस्ति, आप सुखी रहें। मुझे मेरी आपी हुई तीन पग बुमी दे दीजिये।' बलि ने 'तथास्तु' कहकर ज्यों ही वामनजी की ओर देखा, वे विराट् रूप हो गये। चन्द्रमा और सूर्य उनकी छाती के सामने आ गये। उन्हें इस रूप में देखकर स्त्रीसहित दैत्यराज बलिने विनयपूर्वक कहा- 'जगन्मय विष्णो! आप अपनी शक्तिभर पैर बढ़ाइये!'

विष्णु बोले - दैत्यराज! डेको, मैं पैर बढ़ाता हूँ।

बलि ने कहा - बढ़ाइये, आवश्य बढ़ाइये।

तब भगवान् ने पृथ्वी के नीचे स्थित कच्छपकी पीठपर पैर रखकर पहला पग बलिके यज्ञमें रखा, किन्तु उनका दूसरा पग ब्रह्मलोकतक जा पहुँचा। उस समय उनोने बलि से कहा- 'दैत्यराज! मेरा तीसरा पग रखनेके लिये तो स्थान ही नहीं है, कहाँ रखूँ? स्थान दो।'

यह सुनकर बलिने हँसते हुए कहा- 'जगन्मय देवेश्वर! आपने ही तो जगत्की सृष्टि की है, मैं तो इसका स्त्रष्टा नहीं हूँ। यदि यह छोटा या थोड़ा हो गया तो इसमें आपका ही दोष है, मैं क्या करूँ। केशव! फिर भी मैं कभी असत्य नहीं बोलता, अत: मेरे सत्य की रक्षा करते हुए आप अपना तीसरा पग मेरी पीठपर ही रखिये।'

बलि का यह वचन सुनकर वेदत्रयीरूप देवपूजित भगवान् प्रसन्न होकर बोले- 'दैत्यराज! मैं तुम्हारी भक्तिसे बहुत प्रसन्न हूँ। तुम्हारा कल्याण हो, कोई वर माँगो।' तब बलिने जगत् के स्वामी भगवान् त्रिविक्रमसे कहा- 'अब मैं आपसे याचना नहीं करूँगा।' तब भगवान् ने स्वयं ही प्रसन्न होकर उन्हें मनोवाञ्छित वर दिया। वर्तमान समय में रसातलका राज्य, भविष्यमें इन्द्रपद, स्वतन्त्रता तथा अविनाशी यश आदि प्रदान किये। इस प्रकार दैत्यराज बलिको यह सब कुछ देकर भगवान् ने उन्हें पुत्र और पत्नीसहित रसातलमें भेज दिया और इन्द्रको देवताओंका राज्य अर्पित किया। इसी बीच में उनका जो दूसरा पग मेरे लोक में पहुँचा था, उसे देखकर मैंने सोचा, 'यह मेरे जन्मदाता भगवान् विष्णुका चरण है, जो सौभाग्यवश मेरे घरपर आ पहुँचा है। इसके लिए मैं क्या करूँ, जिससे मेरा कल्याण हो? मेरे पास जो यह श्रेष्ठ कमण्डलु है, इसमें भगवान् शंकरका दिया हुआ पवित्र जल है। यह जल उत्तम, वरदायक, शान्तिकरक, शुभद, भोग और मोक्षका दाता, विश्वके लिए मातृरूप, अमृतमय, पवित्र औषध, पावन, पूज्य, ज्येष्ठ, श्रेष्ठ, गुणमय तथा स्मरणमात्र से लोकों को पवित्र करनेवाला है। यह जल मैं अपने पिता को अर्घ्यरूपसे अर्पित करूँगा।' यह सोचकर मैंने वह जल भगवान् के चरणों में अर्घ्यरूप से चढ़ा दिया। वह मन्त्रयुक्त अर्घ्यजल भगवान् विष्णुके चरणोंमें गिरकर मेरुपर्वतपर पड़ा और चार भागोंमें बँटकर पूर्व, दक्षिण, पश्चिमी तथा उत्तर दिशा में पृथ्वीपर जा पहुँचा। दक्षिणमें गिरे हुए जलको भगवान् विष्णुने ग्रहण किया तथा पूर्व में जो जल गिरा, उसे देवताओं, पितरों और लोकपालोंने ग्रहण किया; अत: वह जल अत्यन्त श्रेष्ठ कहा जाता है। भगवान् विष्णुके चरणों से निकलकर दक्षिण दिशा में गया हुआ जल, जो भगवान् शंकरकी जटामें स्थित हुआ, पर्वके समय शुभोदय करनेवाला है। उसके प्रभावका स्मरण करनेसे समस्त अभिलषित वस्तुओंकी प्राप्ति होती है।