ब्रह्म पुराण

105 - क्षर - अक्षर तथा योग और सांख्यका वर्णन

जनकने कहा- मुनिश्रेष्ठ ! क्षर और अक्षर ( प्रकृति और पुरुष ) दोनोंका सम्बन्ध तो पत्नी और पतिके सम्बन्धकी भाँति स्थिर जान पड़ता है । जैसे पुरुषके बिना स्त्री तथा स्त्रीके बिना पुरुष संतान नहीं उत्पन्न कर सकते , उसी प्रकार प्रकृति और पुरुष भी सदा एक दूसरेसे संयुक्त होकर ही सृष्टि करते हैं । ऐसी दशामें पुरुषका मोक्ष असम्भव जान पड़ता है । यदि मोक्षके निकट पहुँचनेवाला

(उसके स्वरूपका स्पष्ट बोध करानेवाला ) कोई दृष्टान्त हो तो बताइये ; क्योंकि आपको सब कुछ प्रत्यक्ष है । हमारे मनमें भी मोक्षकी अभिलाषा है । हम भी उस पदको प्राप्त करना चाहते हैं , जो अनामय , अजेय , बुढ़ापेसे रहित , नित्य , इन्द्रियातीत एवं परम स्वतन्त्र है ।

वसिष्ठजी बोले- राजन् ! तुम्हारा कहना ठीक है , तुमने वेद और शास्त्रोंका दृष्टान्त देकर अपना प्रश्न उपस्थित किया है । तथापि अभी ग्रन्थका यथार्थ तत्त्व तुम्हारे समझमें नहीं आया है । जो वेद और शास्त्रोंके ग्रन्थोंको रट लेता है किंतु उसके तत्त्वको नहीं समझता , उसका वह रटना व्यर्थ है । जो याद किये हुए ग्रन्थका अर्थ नहीं जानता , वह तो केवल उसका बोझ ढोता है । उसके तत्त्वका यथार्थ बोध होनेसे ही वह उसके अर्थको ग्रहण कर सकता है । जिसकी बुद्धि स्थूल और मन्द है , अतएव जो ग्रन्थके तत्त्वको ठीक ठीक जाननेके लिये उत्सुक नहीं है , वह उस ग्रन्थके विषयका निर्णय कैसे कर सकता है । जो मनुष्य ग्रन्थके तत्त्वको जाने बिना ही लोभ अथवा दम्भवश उसपर विवाद करता है , वह पापी नरकमें पड़ता है । इसलिये महाराज ! सांख्य और योगके ज्ञाता महात्मा पुरुषों के मतमें मोक्षका जैसा स्वरूप देखा जाता है , उसे मैं यथार्थरूपसे बतलाता हूँ ; सुनो । योगी जिस तत्त्वका साक्षात्कार करते हैं , सांख्यके विद्वान् भी उसीका ज्ञान प्राप्त करते हैं । जो सांख्य और योगको एक समझता है , वही बुद्धिमान् है । जैसे बीजसे बीजकी उत्पत्ति होती है , उसी प्रकार द्रव्यसे द्रव्य , इन्द्रियसे इन्द्रिय और देहसे देहकी प्राप्ति होती है । परंतु परमात्मा तो इन्द्रिय , बीज , द्रव्य और देहसे रहित तथा निर्गुण है ; अतः उसमें गुण कैसे हो सकते हैं । जैसे आकाश आदि गुण सत्त्वादि गुणोंसे उत्पन्न होते और उन्हींमें लीन हो जाते हैं , उसी प्रकार सत्त्वादि गुण भी प्रकृतिसे उत्पन्न होकर उसीमें लीन होते हैं । आत्मा तो जन्म - मृत्युसे रहित , अनन्त , सबका द्रष्टा एवं अद्वितीय है । वह सत्त्वादि गुणोंमें केवल आत्माभिमान करनेके कारण ही गुणस्वरूप कहलाता है । गुण तो गुणवान्में ही रहते हैं , निर्गुण आत्मामें गुण कैसे रह सकते हैं । अतः गुणोंके स्वरूपको जाननेवाले विद्वान् पुरुष ऐसा मानते हैं कि जब जीवात्मा इन प्राकृत गुणोंमें अपनेपनका अभिमान करता है , उस समय वह गुणवान् सा ही होकर भिन्न - भिन्न गुणोंको देखता है । किंतु जब उस अभिमानको छोड़ देता है , उस समय देहादिमें आत्मबुद्धिका परित्याग करके अपने विशुद्ध परमात्मस्वरूपका साक्षात्कार करता है । उस परमात्माको बुद्धि आदिसे परे सांख्ययोगस्वरूप बताया गया है । वह सत्त्वादि गुणोंसे रहित , अव्यक्त , ईश्वर ( नियामक ) , निर्गुण , नित्य तथा प्रकृति और उसके गुणोंका अधिष्ठाता पच्चीसवाँ तत्त्व है । यह  सांख्य और योगमें कुशल एवं परम तत्त्वकी खोज करनेवाले विद्वानों का कथन है । इस प्रकार परस्पर सम्बन्ध रखनेवाले क्षर-अक्षर

( प्रकृति पुरुष ) - का स्वरूप बताया गया । सदा एक रूपमें रहनेवाला  परमात्मा अक्षर है और नाना रूपोंमें प्रतीत होनेवाला प्राकृत जगत् क्षर कहलाता है । सारांश यह कि एकत्व ही अक्षर है और नानात्वको ही क्षर कहते हैं । जब जीवात्मा पच्चीसवें तत्त्व परमात्मामें स्थित हो जाता है , उस समय उसकी सम्यक् स्थिति बतायी जाती है । एकत्व और नानात्व दोनों रूपों में उस परमात्माका ही दर्शन होता है । तत्त्ववेत्ता पुरुष एकत्व और नानात्व दोनोंके पार्थक्यको भलीभाँति जानता है । मनीषी पुरुष तत्त्वोंकी संख्या पच्चीस बतलाते हैं ; परंतु उनमें पच्चीसवाँ तत्त्व परमात्मा है , जो तत्त्वोंसे विलक्षण है। राजन् ! योगीका प्रधान कर्तव्य है ध्यान ; ध्यान ही योगियोंका सबसे बड़ा बल है । योगविद्याके ज्ञाता विद्वान् पुरुष मनकी एकाग्रता और प्राणायाम ये ध्यानके दो भेद बतलाते हैं । योगीको सब प्रकारकी आसक्तियोंका त्याग करके मिताहारी और जितेन्द्रिय होना चाहिये। वह रात्रिके पहले और पिछले भागमें मनको परमात्मामें लगाकर अन्तःकरणमें उनका ध्यान करे । मिथिलेश्वर ! सम्पूर्ण इन्द्रियोंको मनके द्वारा स्थिर करके मनको भी बुद्धिमें स्थापित कर दे और पत्थरकी भाँति अविचल हो जाय , तभी उसे योगयुक्त कहते हैं । जिस समय उसे सुनने , सूँघने , स्वाद लेने , देखने और स्पर्श करनेका भी भान नहीं रहता , जब मनमें किसी प्रकारका संकल्प नहीं उठता तथा वह काठकी भाँति स्थिर होकर किसी भी वस्तुका अभिमान या सुध - बुध नहीं रखता , उस समय मनीषी पुरुष उसे अपने स्वरूपको प्राप्त ' योगयुक्त ' कहते हैं । ध्याननिष्ठ योगीको अपने हृदयमें धूमरहित अग्नि , किरणमालाओंसे मण्डित सूर्य तथा विद्युत्के प्रकाशकी भाँति तेजस्वी आत्माका साक्षात्कार होता है । धैर्यवान् , मनीषी , वेदवेत्ता और महात्मा ब्राह्मण ही उस अजन्मा एवं अमृतस्वरूप ब्रह्मका दर्शन कर पाते हैं । वह ब्रह्म अणुसे भी अणु और महान्से भी महान् कहा गया है । सर्वत्र सम्पूर्ण भूतोंमें स्थित होते हुए भी वह किसीको दिखायी नहीं देता । वेदोंके पारगामी तत्त्वज्ञ विद्वानोंने उसे तमसे दूर अज्ञानान्धकारसे परे बताया है । वह निर्मल एवं लिङ्गरहित है । यही योगियोंका योग है । इसके सिवा योगका और क्या लक्षण हो सकता है । इस प्रकार साधना करनेवाला योगी सबके द्रष्टा अजर अमर परमात्माका दर्शन करता है । यहाँतक मैंने तुम्हें योग दर्शनका यथार्थस्वरूप बतलाया । अब सांख्यका वर्णन करता हूँ , यह विचार प्रधान दर्शन है । राजन् ! प्रकृतिवादी विद्वान् मूल प्रकृतिको अव्यक्त कहते हैं उससे दूसरा तत्त्व प्रकट हुआ , जो ' महत्तत्त्व ' कहलाता है । महत्तत्त्वसे अहंकार नामक तीसरे तत्त्वकी उत्पत्ति सुनी गयी है । सांख्य दर्शनके ज्ञाता विद्वान् अहंकारसे सूक्ष्म भूतोंका – पञ्च - तन्मात्राओंका प्रादुर्भाव बतलाते हैं । इन आठोंको प्रकृति कहते हैं ; इनसे सोलह तत्त्वोंकी उत्पत्ति होती है , जो ' विकृति ' कहलाते हैं । पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ , पाँच कर्मेन्द्रियाँ , ग्यारहवाँ मन तथा पाँच स्थूलभूत- ये ही सोलह विकार हैं । ये प्रकृति और विकृति मिलकर चौबीस तत्त्व होते हैं । सांख्यदर्शनमें तत्त्वोंकी इतनी ही संख्या मानी गयी है । सांख्यमार्गपर स्थित और सांख्यविधिके ज्ञाता मनीषी पुरुष ऐसा ही कहते हैं । जो तत्त्व जिससे उत्पन्न होता है , उसका उसीमें लय भी होता है । प्रकृति परमात्माके संनिधानसे अनुलोम क्रमके अनुसार तत्त्वोंकी रचना करती है अर्थात् प्रकृतिसे महत्तत्त्व , महत्त्वसे अहंकार तथा अहंकारसे सूक्ष्म भूत आदिके क्रमसे सृष्टि होती है ; किंतु उसका संहार विलोमक्रमसे होता है । अर्थात् पृथ्वीका जलमें , जलका तेजमें और तेजका वायुमें लय होता है ; इसी प्रकार सभी तत्त्व अपने - अपने कारणमें लीन होते हैं । जैसे समुद्रसे उठी हुई लहरें फिर उसीमें शान्त हो जाती हैं , उसी प्रकार  सम्पूर्ण तत्त्व अनुलोमक्रमसे उत्पन्न होकर विलोमक्रमसे लीन होते हैं । नृपश्रेष्ठ ! इस प्रकार प्रकृतिसे ही जगत्की उत्पत्ति और उसीमें उसका लय होता है । प्रलयकालमें तो वह एक रूपमें रहती है और सृष्टिके समय नाना रूप धारण  करती है । ज्ञान - निपुण पुरुषोंको इसी प्रकार प्रकृतिके  एकत्व और नानात्वका ज्ञान प्राप्त करना चाहिये । प्रकृतिका अधिष्ठाता जो अव्यक्त आत्मा है , उसके विषयमें भी यही बात है । वह भी प्रकृतिसे  सम्बन्ध रखनेपर एकत्व और नानात्वको प्राप्त होता है । प्रलयकालमें तो वह भी एक ही रूपमें रहता है , किंतु सृष्टिके समय प्रकृतिको प्रेरित करनेके कारण उसकी ही अनेकतासे वह स्वयं भी अनेक - सा प्रतीत होता है । परमात्मा ही प्रकृतिको | प्रसवके लिये उन्मुख करके उसे अनेक रूपोंमें परिणत करता है । प्रकृति और उसके विकारों को क्षेत्र कहते हैं । चौबीस तत्त्वोंसे भिन्न जो पच्चीसवाँ  तत्त्व महान् आत्मा है , वही उस क्षेत्रमें अधिष्ठातारूपसे निवास करता है । वह क्षेत्रको जानता है , इसलिये क्षेत्रज्ञ कहलाता है । क्षेत्रज्ञ प्रकृतिजनित पुर ( शरीर ) - में शयन करता है , इसलिये उसे पुरुष कहते हैं । वास्तवमें क्षेत्र अन्य वस्तु है और क्षेत्रज्ञ अन्य । क्षेत्र अव्यक्त ( प्रकृति ) है और क्षेत्रज्ञ उसका ज्ञाता पच्चीसवाँ तत्त्व परमात्मा है । जब पुरुष अपनेको प्रकृतिसे भिन्न जान लेता है , उस समय वह अद्वितीय परमात्मरूपसे स्थित होता है । इस प्रकार मैंने तुम्हें सम्यग् दर्शन ( सांख्य ) का यथार्थ वर्णन किया । जो इसे इस प्रकार जानते हैं , वे समस्वरूप ब्रह्मको प्राप्त होते हैं। महाराज ! इस प्रकार मैंने तुमसे शुद्ध , सनातन आदि ब्रह्मके यथार्थ तत्त्वका वर्णन किया है । तुम मात्सर्यका त्याग करके अपनी बुद्धिसे इस तत्त्वको ग्रहण करो । असत्यवादी , शठ , नपुंसक , कुटिल बुद्धिवाले , अपनेको पण्डित माननेवाले तथा दूसरोंको कष्ट पहुँचानेवाले मनुष्यको इसका उपदेश नहीं देना चाहिये । शिष्यको बोध करानेके लिये ही इस तत्त्वका उपदेश करना उचित है । जो श्रद्धालु , गुणवान् , परायी निन्दासे दूर रहनेवाले , विशुद्ध योगी , विद्वान् , वेदोक्त कर्म करनेवाले , क्षमाशील तथा सबके हितैषी हों , वे ही इस ज्ञानके अधिकारी हैं । जितेन्द्रिय तथा संयमी पुरुषको इसका उपदेश अवश्य देना चाहिये । महाराज कराल ! तुमने मुझसे आज परब्रह्मका ज्ञान प्राप्त किया है । अब तुम्हारे मनमें तनिक भी भय नहीं होना चाहिये । नरेन्द्र ! तुमने मुझसे जैसा प्रश्न किया था , उसके अनुसार ही मैंने तुम्हें यह उपदेश किया है ; कोई दूसरी बात नहीं कही है । यह महान् ज्ञान मोक्षवेत्ता पुरुषोंका परम आश्रय है । यह मुझे साक्षात् ब्रह्माजी प्राप्त हुआ है ।

व्यासजी कहते हैं – मुनिवरो ! पूर्वकालमें महर्षि वसिष्ठने जिस प्रकार पच्चीसवें तत्त्वरूप परब्रह्म स्वरूपका वर्णन किया था , उसी प्रकार मैंने तुम्हें बताया है । यही वह ब्रह्म है , जिसे जान लेनेपर मनुष्य फिर इस संसारमें नहीं आता । यह ज्ञान हिरण्यगर्भ ब्रह्माजीसे महर्षि वसिष्ठको प्राप्त हुआ , वसिष्ठजीसे देवर्षि नारदको मिला और देवर्षि नारदसे मुझको प्राप्त हुआ । वही यह सनातन ज्ञान  मैंने तुम सब लोगोंको बताया है ; यह परम पद है , इसका श्रवण करके अब तुम्हें शोक नहीं करना चाहिये । जिसने क्षर और अक्षरके भेदको जान लिया , उसे किसी प्रकारका भय नहीं है । जो उन्हें ठीक - ठीक नहीं जानता , उसीको भय है । मूर्ख मनुष्य इस तत्त्वको न जाननेके कारण बारंबार उपद्रवग्रस्त हो मरता और मरनेके बाद पुनः हजारों बार जन्म - मृत्युके कष्ट भोगता है । वह देव , मनुष्य और पशु - पक्षी आदिकी योनियों में भटकता रहता है । अज्ञानरूपी समुद्र अव्यक्त , अगाध और भयंकर है । इसमें प्रतिदिन कितने ही प्राणी डूबते चले जा रहे हैं । तुमलोग यह उपदेश सुनकर इस अगाध भवसागरसे पार हो गये हो । अब तुममें रजोगुण और तमोगुणका भाव नहीं रह गया । तुम्हारी शुद्ध सत्त्वमें स्थिति हो गयी है । मुनिवरो ! इस प्रकार मैंने सारसे भी सारभूत परमतत्त्वका वर्णन किया । यह परम मोक्षरूप है । | इसे जान लेनेपर मनुष्य फिर इस संसारमें लौटकर नहीं आता । जो नास्तिक हो , जिसके हृदयमें गुरु और भगवान्‌के प्रति भक्ति न हो , जिसकी बुद्धि | खोटी और हृदय श्रद्धासे विमुख हो , ऐसे मनुष्यको | कभी इसका उपदेश नहीं करना चाहिये ।