जनकने कहा- मुनिश्रेष्ठ ! क्षर और अक्षर ( प्रकृति और पुरुष ) दोनोंका सम्बन्ध तो पत्नी और पतिके सम्बन्धकी भाँति स्थिर जान पड़ता है । जैसे पुरुषके बिना स्त्री तथा स्त्रीके बिना पुरुष संतान नहीं उत्पन्न कर सकते , उसी प्रकार प्रकृति और पुरुष भी सदा एक दूसरेसे संयुक्त होकर ही सृष्टि करते हैं । ऐसी दशामें पुरुषका मोक्ष असम्भव जान पड़ता है । यदि मोक्षके निकट पहुँचनेवाला
(उसके स्वरूपका स्पष्ट बोध करानेवाला ) कोई दृष्टान्त हो तो बताइये ; क्योंकि आपको सब कुछ प्रत्यक्ष है । हमारे मनमें भी मोक्षकी अभिलाषा है । हम भी उस पदको प्राप्त करना चाहते हैं , जो अनामय , अजेय , बुढ़ापेसे रहित , नित्य , इन्द्रियातीत एवं परम स्वतन्त्र है ।
वसिष्ठजी बोले- राजन् ! तुम्हारा कहना ठीक है , तुमने वेद और शास्त्रोंका दृष्टान्त देकर अपना प्रश्न उपस्थित किया है । तथापि अभी ग्रन्थका यथार्थ तत्त्व तुम्हारे समझमें नहीं आया है । जो वेद और शास्त्रोंके ग्रन्थोंको रट लेता है किंतु उसके तत्त्वको नहीं समझता , उसका वह रटना व्यर्थ है । जो याद किये हुए ग्रन्थका अर्थ नहीं जानता , वह तो केवल उसका बोझ ढोता है । उसके तत्त्वका यथार्थ बोध होनेसे ही वह उसके अर्थको ग्रहण कर सकता है । जिसकी बुद्धि स्थूल और मन्द है , अतएव जो ग्रन्थके तत्त्वको ठीक ठीक जाननेके लिये उत्सुक नहीं है , वह उस ग्रन्थके विषयका निर्णय कैसे कर सकता है । जो मनुष्य ग्रन्थके तत्त्वको जाने बिना ही लोभ अथवा दम्भवश उसपर विवाद करता है , वह पापी नरकमें पड़ता है । इसलिये महाराज ! सांख्य और योगके ज्ञाता महात्मा पुरुषों के मतमें मोक्षका जैसा स्वरूप देखा जाता है , उसे मैं यथार्थरूपसे बतलाता हूँ ; सुनो । योगी जिस तत्त्वका साक्षात्कार करते हैं , सांख्यके विद्वान् भी उसीका ज्ञान प्राप्त करते हैं । जो सांख्य और योगको एक समझता है , वही बुद्धिमान् है । जैसे बीजसे बीजकी उत्पत्ति होती है , उसी प्रकार द्रव्यसे द्रव्य , इन्द्रियसे इन्द्रिय और देहसे देहकी प्राप्ति होती है । परंतु परमात्मा तो इन्द्रिय , बीज , द्रव्य और देहसे रहित तथा निर्गुण है ; अतः उसमें गुण कैसे हो सकते हैं । जैसे आकाश आदि गुण सत्त्वादि गुणोंसे उत्पन्न होते और उन्हींमें लीन हो जाते हैं , उसी प्रकार सत्त्वादि गुण भी प्रकृतिसे उत्पन्न होकर उसीमें लीन होते हैं । आत्मा तो जन्म - मृत्युसे रहित , अनन्त , सबका द्रष्टा एवं अद्वितीय है । वह सत्त्वादि गुणोंमें केवल आत्माभिमान करनेके कारण ही गुणस्वरूप कहलाता है । गुण तो गुणवान्में ही रहते हैं , निर्गुण आत्मामें गुण कैसे रह सकते हैं । अतः गुणोंके स्वरूपको जाननेवाले विद्वान् पुरुष ऐसा मानते हैं कि जब जीवात्मा इन प्राकृत गुणोंमें अपनेपनका अभिमान करता है , उस समय वह गुणवान् सा ही होकर भिन्न - भिन्न गुणोंको देखता है । किंतु जब उस अभिमानको छोड़ देता है , उस समय देहादिमें आत्मबुद्धिका परित्याग करके अपने विशुद्ध परमात्मस्वरूपका साक्षात्कार करता है । उस परमात्माको बुद्धि आदिसे परे सांख्ययोगस्वरूप बताया गया है । वह सत्त्वादि गुणोंसे रहित , अव्यक्त , ईश्वर ( नियामक ) , निर्गुण , नित्य तथा प्रकृति और उसके गुणोंका अधिष्ठाता पच्चीसवाँ तत्त्व है । यह सांख्य और योगमें कुशल एवं परम तत्त्वकी खोज करनेवाले विद्वानों का कथन है । इस प्रकार परस्पर सम्बन्ध रखनेवाले क्षर-अक्षर
( प्रकृति पुरुष ) - का स्वरूप बताया गया । सदा एक रूपमें रहनेवाला परमात्मा अक्षर है और नाना रूपोंमें प्रतीत होनेवाला प्राकृत जगत् क्षर कहलाता है । सारांश यह कि एकत्व ही अक्षर है और नानात्वको ही क्षर कहते हैं । जब जीवात्मा पच्चीसवें तत्त्व परमात्मामें स्थित हो जाता है , उस समय उसकी सम्यक् स्थिति बतायी जाती है । एकत्व और नानात्व दोनों रूपों में उस परमात्माका ही दर्शन होता है । तत्त्ववेत्ता पुरुष एकत्व और नानात्व दोनोंके पार्थक्यको भलीभाँति जानता है । मनीषी पुरुष तत्त्वोंकी संख्या पच्चीस बतलाते हैं ; परंतु उनमें पच्चीसवाँ तत्त्व परमात्मा है , जो तत्त्वोंसे विलक्षण है। राजन् ! योगीका प्रधान कर्तव्य है ध्यान ; ध्यान ही योगियोंका सबसे बड़ा बल है । योगविद्याके ज्ञाता विद्वान् पुरुष मनकी एकाग्रता और प्राणायाम ये ध्यानके दो भेद बतलाते हैं । योगीको सब प्रकारकी आसक्तियोंका त्याग करके मिताहारी और जितेन्द्रिय होना चाहिये। वह रात्रिके पहले और पिछले भागमें मनको परमात्मामें लगाकर अन्तःकरणमें उनका ध्यान करे । मिथिलेश्वर ! सम्पूर्ण इन्द्रियोंको मनके द्वारा स्थिर करके मनको भी बुद्धिमें स्थापित कर दे और पत्थरकी भाँति अविचल हो जाय , तभी उसे योगयुक्त कहते हैं । जिस समय उसे सुनने , सूँघने , स्वाद लेने , देखने और स्पर्श करनेका भी भान नहीं रहता , जब मनमें किसी प्रकारका संकल्प नहीं उठता तथा वह काठकी भाँति स्थिर होकर किसी भी वस्तुका अभिमान या सुध - बुध नहीं रखता , उस समय मनीषी पुरुष उसे अपने स्वरूपको प्राप्त ' योगयुक्त ' कहते हैं । ध्याननिष्ठ योगीको अपने हृदयमें धूमरहित अग्नि , किरणमालाओंसे मण्डित सूर्य तथा विद्युत्के प्रकाशकी भाँति तेजस्वी आत्माका साक्षात्कार होता है । धैर्यवान् , मनीषी , वेदवेत्ता और महात्मा ब्राह्मण ही उस अजन्मा एवं अमृतस्वरूप ब्रह्मका दर्शन कर पाते हैं । वह ब्रह्म अणुसे भी अणु और महान्से भी महान् कहा गया है । सर्वत्र सम्पूर्ण भूतोंमें स्थित होते हुए भी वह किसीको दिखायी नहीं देता । वेदोंके पारगामी तत्त्वज्ञ विद्वानोंने उसे तमसे दूर अज्ञानान्धकारसे परे बताया है । वह निर्मल एवं लिङ्गरहित है । यही योगियोंका योग है । इसके सिवा योगका और क्या लक्षण हो सकता है । इस प्रकार साधना करनेवाला योगी सबके द्रष्टा अजर अमर परमात्माका दर्शन करता है । यहाँतक मैंने तुम्हें योग दर्शनका यथार्थस्वरूप बतलाया । अब सांख्यका वर्णन करता हूँ , यह विचार प्रधान दर्शन है । राजन् ! प्रकृतिवादी विद्वान् मूल प्रकृतिको अव्यक्त कहते हैं उससे दूसरा तत्त्व प्रकट हुआ , जो ' महत्तत्त्व ' कहलाता है । महत्तत्त्वसे अहंकार नामक तीसरे तत्त्वकी उत्पत्ति सुनी गयी है । सांख्य दर्शनके ज्ञाता विद्वान् अहंकारसे सूक्ष्म भूतोंका – पञ्च - तन्मात्राओंका प्रादुर्भाव बतलाते हैं । इन आठोंको प्रकृति कहते हैं ; इनसे सोलह तत्त्वोंकी उत्पत्ति होती है , जो ' विकृति ' कहलाते हैं । पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ , पाँच कर्मेन्द्रियाँ , ग्यारहवाँ मन तथा पाँच स्थूलभूत- ये ही सोलह विकार हैं । ये प्रकृति और विकृति मिलकर चौबीस तत्त्व होते हैं । सांख्यदर्शनमें तत्त्वोंकी इतनी ही संख्या मानी गयी है । सांख्यमार्गपर स्थित और सांख्यविधिके ज्ञाता मनीषी पुरुष ऐसा ही कहते हैं । जो तत्त्व जिससे उत्पन्न होता है , उसका उसीमें लय भी होता है । प्रकृति परमात्माके संनिधानसे अनुलोम क्रमके अनुसार तत्त्वोंकी रचना करती है अर्थात् प्रकृतिसे महत्तत्त्व , महत्त्वसे अहंकार तथा अहंकारसे सूक्ष्म भूत आदिके क्रमसे सृष्टि होती है ; किंतु उसका संहार विलोमक्रमसे होता है । अर्थात् पृथ्वीका जलमें , जलका तेजमें और तेजका वायुमें लय होता है ; इसी प्रकार सभी तत्त्व अपने - अपने कारणमें लीन होते हैं । जैसे समुद्रसे उठी हुई लहरें फिर उसीमें शान्त हो जाती हैं , उसी प्रकार सम्पूर्ण तत्त्व अनुलोमक्रमसे उत्पन्न होकर विलोमक्रमसे लीन होते हैं । नृपश्रेष्ठ ! इस प्रकार प्रकृतिसे ही जगत्की उत्पत्ति और उसीमें उसका लय होता है । प्रलयकालमें तो वह एक रूपमें रहती है और सृष्टिके समय नाना रूप धारण करती है । ज्ञान - निपुण पुरुषोंको इसी प्रकार प्रकृतिके एकत्व और नानात्वका ज्ञान प्राप्त करना चाहिये । प्रकृतिका अधिष्ठाता जो अव्यक्त आत्मा है , उसके विषयमें भी यही बात है । वह भी प्रकृतिसे सम्बन्ध रखनेपर एकत्व और नानात्वको प्राप्त होता है । प्रलयकालमें तो वह भी एक ही रूपमें रहता है , किंतु सृष्टिके समय प्रकृतिको प्रेरित करनेके कारण उसकी ही अनेकतासे वह स्वयं भी अनेक - सा प्रतीत होता है । परमात्मा ही प्रकृतिको | प्रसवके लिये उन्मुख करके उसे अनेक रूपोंमें परिणत करता है । प्रकृति और उसके विकारों को क्षेत्र कहते हैं । चौबीस तत्त्वोंसे भिन्न जो पच्चीसवाँ तत्त्व महान् आत्मा है , वही उस क्षेत्रमें अधिष्ठातारूपसे निवास करता है । वह क्षेत्रको जानता है , इसलिये क्षेत्रज्ञ कहलाता है । क्षेत्रज्ञ प्रकृतिजनित पुर ( शरीर ) - में शयन करता है , इसलिये उसे पुरुष कहते हैं । वास्तवमें क्षेत्र अन्य वस्तु है और क्षेत्रज्ञ अन्य । क्षेत्र अव्यक्त ( प्रकृति ) है और क्षेत्रज्ञ उसका ज्ञाता पच्चीसवाँ तत्त्व परमात्मा है । जब पुरुष अपनेको प्रकृतिसे भिन्न जान लेता है , उस समय वह अद्वितीय परमात्मरूपसे स्थित होता है । इस प्रकार मैंने तुम्हें सम्यग् दर्शन ( सांख्य ) का यथार्थ वर्णन किया । जो इसे इस प्रकार जानते हैं , वे समस्वरूप ब्रह्मको प्राप्त होते हैं। महाराज ! इस प्रकार मैंने तुमसे शुद्ध , सनातन आदि ब्रह्मके यथार्थ तत्त्वका वर्णन किया है । तुम मात्सर्यका त्याग करके अपनी बुद्धिसे इस तत्त्वको ग्रहण करो । असत्यवादी , शठ , नपुंसक , कुटिल बुद्धिवाले , अपनेको पण्डित माननेवाले तथा दूसरोंको कष्ट पहुँचानेवाले मनुष्यको इसका उपदेश नहीं देना चाहिये । शिष्यको बोध करानेके लिये ही इस तत्त्वका उपदेश करना उचित है । जो श्रद्धालु , गुणवान् , परायी निन्दासे दूर रहनेवाले , विशुद्ध योगी , विद्वान् , वेदोक्त कर्म करनेवाले , क्षमाशील तथा सबके हितैषी हों , वे ही इस ज्ञानके अधिकारी हैं । जितेन्द्रिय तथा संयमी पुरुषको इसका उपदेश अवश्य देना चाहिये । महाराज कराल ! तुमने मुझसे आज परब्रह्मका ज्ञान प्राप्त किया है । अब तुम्हारे मनमें तनिक भी भय नहीं होना चाहिये । नरेन्द्र ! तुमने मुझसे जैसा प्रश्न किया था , उसके अनुसार ही मैंने तुम्हें यह उपदेश किया है ; कोई दूसरी बात नहीं कही है । यह महान् ज्ञान मोक्षवेत्ता पुरुषोंका परम आश्रय है । यह मुझे साक्षात् ब्रह्माजी प्राप्त हुआ है ।
व्यासजी कहते हैं – मुनिवरो ! पूर्वकालमें महर्षि वसिष्ठने जिस प्रकार पच्चीसवें तत्त्वरूप परब्रह्म स्वरूपका वर्णन किया था , उसी प्रकार मैंने तुम्हें बताया है । यही वह ब्रह्म है , जिसे जान लेनेपर मनुष्य फिर इस संसारमें नहीं आता । यह ज्ञान हिरण्यगर्भ ब्रह्माजीसे महर्षि वसिष्ठको प्राप्त हुआ , वसिष्ठजीसे देवर्षि नारदको मिला और देवर्षि नारदसे मुझको प्राप्त हुआ । वही यह सनातन ज्ञान मैंने तुम सब लोगोंको बताया है ; यह परम पद है , इसका श्रवण करके अब तुम्हें शोक नहीं करना चाहिये । जिसने क्षर और अक्षरके भेदको जान लिया , उसे किसी प्रकारका भय नहीं है । जो उन्हें ठीक - ठीक नहीं जानता , उसीको भय है । मूर्ख मनुष्य इस तत्त्वको न जाननेके कारण बारंबार उपद्रवग्रस्त हो मरता और मरनेके बाद पुनः हजारों बार जन्म - मृत्युके कष्ट भोगता है । वह देव , मनुष्य और पशु - पक्षी आदिकी योनियों में भटकता रहता है । अज्ञानरूपी समुद्र अव्यक्त , अगाध और भयंकर है । इसमें प्रतिदिन कितने ही प्राणी डूबते चले जा रहे हैं । तुमलोग यह उपदेश सुनकर इस अगाध भवसागरसे पार हो गये हो । अब तुममें रजोगुण और तमोगुणका भाव नहीं रह गया । तुम्हारी शुद्ध सत्त्वमें स्थिति हो गयी है । मुनिवरो ! इस प्रकार मैंने सारसे भी सारभूत परमतत्त्वका वर्णन किया । यह परम मोक्षरूप है । | इसे जान लेनेपर मनुष्य फिर इस संसारमें लौटकर नहीं आता । जो नास्तिक हो , जिसके हृदयमें गुरु और भगवान्के प्रति भक्ति न हो , जिसकी बुद्धि | खोटी और हृदय श्रद्धासे विमुख हो , ऐसे मनुष्यको | कभी इसका उपदेश नहीं करना चाहिये ।
Summary of chapter 103 of the [[BOOK_TITLE]] is as follows:
The narrative of Śrī Kṛṣṇa's earthly life is formally concluded. Vyāsa consoles Arjuna and the grieving survivors of the Yādava destruction, explaining the cosmic purpose behind all that has occurred. The sage Aṣṭāvakra's encounter with Arjuna — in which the sage narrates how the Apsaras who laughed at his deformity received Kṛṣṇa as husband but were destined to fall into the hands of Dasyus, fulfilling an old curse — is recounted. Arjuna is taught to accept all events as divinely ordained.