ब्रह्म महा पुराण
76 - कंसका अक्रूरको नन्दगाँव जानेकी आज्ञा देना और केशीका वध तथा भगवान् के पास नारदका आगमन
व्यासजी कहते हैं - महर्षियो! जब वृषभरूपधारी अरिष्टासुर, धेनुक और प्रलम्ब आदि असुर मारे जा चुके, गोवर्धन पर्वत धारण करके श्रीकृष्ण गोकुल को बचा लिया, उनके द्वारा कालिय नागका दमन, दोनों यमलार्जुन वृक्षोंका भङ्ग, पूतनाका वध और शकट-भङ्ग आदि घटनाएँ हो गयीं, तब देवर्षि नारदने कंसके पास जाकर क्रमशः सब समाचार कह सुनाया। यशोदा और देवकी के बालकों में जो अदला-बदली हुई, वहाँसे लेकर अरिष्ट-वधतककी सारी बातें नारदजी के मुखसे सुनकर खोटी बुद्धिवाले कंसने वसुदेवजी के प्रति बड़ा क्रोध किया और समस्त यादवोंकी सभा में अत्यन्त रोषपूर्वक उलाहना देकर उसके यदुवंशियोंकी बड़ी निन्दा की; फिर आगे के कर्तव्यके विषय में इस प्रकार विचार किया- 'बलराम और कृष्ण दोनों अभी बालक हैं। जबतक वे युवा होकर अत्यन्त बलवान नहीं हो जाते, तबतक ही मुझे उनका वध कर डालना चाहिए। युवा होनेपर तो वे मेरे काबूके बाहर हो जाएँगे। यहाँ महापराक्रमी चाणूर और बलवान् मुष्टि दोनों पहलवान मौजूद हैं। इनके द्वारा मल्लयुद्ध में उन दोनों मतवाले बालकों को मरवा डालूँगा। धनुषयज्ञ नामक उत्सव देखने के बहाने दोनों को व्रज से बुलाकर ऐसा यत्न करूँगा, जिससे उनका नाश हो जाय।'
इस प्रकार सोच-विचारकर दुष्टात्मा कंस ने बलराम और श्रीकृष्ण को मार डालने का निश्चय किया और वीरवार अक्रूर को बुलाकर कहा- 'दानपते! तुम मेरी प्रसन्नताके लिये एक बात मानो, यहाँसे रथपर बैठकर नन्दगाँव जाओ। वहाँ वसुदेव के दो पुत्र हैं, जो मेरा विनाश करनेके लिये विष्णुके अंश से उत्पन्न हुए हैं। वे दोनों दुष्ट बढ़ते जा रहे हैं। चतुर्दशी को धनुषयज्ञ का उत्सव होनेवाला है। उसमें कुश्ती लड़नेके लिये उन दोनों को बुला लाओ। मेरे दो पहलवान चाणूर और मुष्टिक दाँव-पेचमें बहुत कुशल हैं। इनके साथ यहाँ उन दोनों की कुश्ती हो और सब लोग देखें। वसुदेवके दोनों पापी पुत्र अभि बालक ही हैं। द्वारपर आते ही उन दोनों को महावतकी प्रेरणासे मेरा कुवलयापीड हाथी मार डालेगा। उन दोनों को मारकर मैं दुष्ट बुद्धिवाले वसुदेव, नन्द और अपने पिता उग्रसेन को भी मौत के घात उतारूँगा। तत्पश्चात् समस्त गोपोंका गोधन और सारा वैभव छीन लूँगा, क्योंकि वे दुष्ट मेरे वधकी इच्छा करते हैं। दानपते! तुम्हारे सिवा ये सभी यादव बड़े दुष्ट हैं, अत: मैं क्रमशः इनका भी वध करनेके लिये प्रयत्न करूँगा। तदनन्तर यादवों से रहित यह समस्त अकण्टक राज्य अकेला ही भोगूँगा। अत: वीर! तुम मेरी प्रसन्नता के लिये वहाँ जाओ। गोपोंसे ऐसा कहना जिससे वे भैंसका घी, दही आदि उपहार की वस्तुएँ लेकर शीघ्र यहाँ आयें।'
अक्रूरजी बड़ी भगवभ्दक्त थे। कंसके इस प्रकार आदेश देनेपर उन्हें बड़ी प्रसन्नता हुई। इसी बहाने कल भगवान् श्रीकृष्ण के दर्शन तो करूँगा, इस विचरने उन्हें उतावला बना दिया। राजा कंससे 'बहुत अच्छा' कहकर अक्रूरजी शीघ्र ही रथपर सवार हुए और मथुरापुरी से निकलकर नन्दगाँव की ओर चल दिये।
इधर कंसका दूत महाबली केशी कंसके ही आदेशसे वृन्दावनमें आया। श्रीकृष्णचन्द्रका वध करना ही उसकी यात्राका उद्देश्य था। उसने घोड़ेका रूप धारण कर रखा था। वह अपनी टापोंसे पृथ्वी को खोदता, गर्दनके बालों से बादलोंको उड़ाता तथा वेगसे उछलकर चन्द्रमा और सूर्यके भी मार्गको लाँघता हुआ गोपोंके समीप आया। उसके हींसने के शब्दसे समस्त गोप और गोपाङ्गनाएँ भयभीत हो भगवान् गोविन्दकी शरण में गयीं। उनकी त्राहि-त्राहि की पुकार सुनकर भगवान् श्रीकृष्ण जलपूर्ण मेघ गर्जनाके समान गम्भीर वाणीमें इस प्रकार बोले- 'गोपालगण! इस केशीसे डरनेकी आवश्यकता नहीं है। आपलोग तो गोप-जाति के हैं। इस तरह भयसे व्याकुल होकर अपने वीरोचित पराक्रमका लोप क्यों कर रहे हैं? अरे! इस दैत्य में शक्ति ही कितनी है, यह हमारा क्या कर लेगा? यह तो जोर-जोर से हिन-हिनाकर केवल आतङ्क फैला रहा है। इसपर तो दैत्यों की सेना सवारी करती है। यह दुष्ट अश्व व्यर्थ ही उछल-कूद मचा रहा है।' ग्वालों से यों कहकर भगवान् ने उस दैत्य से कहा- 'ओ दुष्ट! इधर आ। मैं कृष्ण हूँ। जैसे पिनाकधारी वीरभद्र ने पूषा के दाँत तोड़ दिये थे, उसी तरह मैं भी तेरे सारे दाँत गिराये देता हूँ'
यों कहकर भगवान् श्रीकृष्ण केशीके सामने गये। वह दैत्य भी मुँह फैलाकर उनकी ओर दौड़ा। श्रीकृष्ण ने अपनी बाँहको बढाकर दुष्ट केशीके मुख में घुसेड़ दिया। उससे टकराकर केशीके सारे दाँत शुभ्र मेघ-खण्डोंकी भाँति छिन्न-भिन्न हो गिर गये। श्रीकृष्णकी भुजा केशीके शरीर में बढ़ती ही चली गयी। जैसे अवहेलनापूर्वक उपेक्षा किया हुआ रोग धीरे-धीरे बढ़कर विनाशका कारण बन जाता है, वैसे ही वह भुजा भी उस दैत्यकी मृत्युका साधन बन गयी। उसके जबड़े फट गये। वह मुखसे फेन और रक्त फेंकने लगा। नस-नाड़ियों के बन्धन टूट जानेसे उसके दोनों जबड़े बिलग हो गये। वह लीद और पेशाब करता हुआ धरतीपर पैर पटकने लगा। उसका सारा शरीर पसीनेसे तर हो गया और वह थककर प्राणों से हाथ धो बैठा। उसकी सारी हलचल समाप्त हो गयी। जैसे बिजली गिरनेसे किसी वृक्षके दो टुकड़े हो जाते हैं, उसी प्रकार श्रीकृष्णकी भुजासे वह महाभयंकर असुर दो टुकड़े होकर गिर पड़ा। केशीको मारनेसे श्रीकृष्ण के शरीर में कोई थकावट नहीं हुई। वे स्वस्थरूपसे हँसते हुए वहीं खड़े रहे। उस दैत्यके मारे जानेसे गोप और गोपियोंको बड़ी प्रसन्नता हुई। वे श्रीकृष्णको सब ओरसे घेरकर आश्चर्यचकित हो उनकी स्तुति करने लगे। इसी समय देवर्षि नारद बड़ी उतावली के साथ वहाँ आये और बादलों में स्थित हो गये। केशीको मारा गया देख वे हर्षसे फूले नहीं समाते थे।
नारदजी बोले - जगन्नाथ! आपको धन्यवाद है। अच्युत! आपने खेल-खेल में ही इस केशीको मार डाला। यह देवताओं को बड़ा क्लेश दिया करता था। मधुसूदन! आपने इस अवतार में जो-जो महान् कर्म किये है, उनसे मेरे चित्तको बड़ा आश्चर्य और संतोष हुआ है। यह अश्वरूपधारी दैत्य जब गर्दन के बालों को हिलाते और हिनहिनाते हुए आकाशकी ओर देखता था, उस समय देवराज इन्द्र और सम्पूर्ण देवता भी थर्रा उठते थे। जनार्दन! आपने दुष्टात्मा केशीका वध किया है, इसलिये अब लोकमें आप 'केशव' नाम से विख्यात होंगे। आपका कल्याण हो, अब मैं जाऊँगा और परसों कंसके यहाँ आपके साथ जो युद्ध होगा, उसमें फिर सम्मिलित होऊँगा। धरणीधर! उग्रसेनकुमार कंस जब अपने अनुचरोंसहित मारा जायगा, उस समय पृथ्वीका भार आप बहुत कुछ उतार देंगे। उसके बाद भी राजाओंके साथ आपके अनेक युद्ध हमें द्केहनेको मिलेंगे। गोविन्द! आपने देवताओंका बहुत बड़ा कार्य सिद्ध किया और मुझे भी बहुत आदर दिया। आपका कल्याण हो, अब मैं जाता हूँ।
यों कहकर नारदजी चले गये। तब श्रीकृष्ण अत्यन्त सौम्यभावसे ग्वालों के साथ गोकुलमें चले आये।
Summary of chapter 74 of the Brahma Mahā Purana is as follows:
Having heard Devī's prophecy that the one destined to kill him has escaped, Kaṃsa summons his demon allies and orders the massacre of all infants. He dispatches various demons to Gokula and surrounding areas to destroy the divine child. The chapter describes Kaṃsa's fear expressed as violent despotism, and the divine child Kṛṣṇa's existence in Gokula under the loving protection of Nanda and Yaśodā.