ब्रह्म महा पुराण
55 - यम, आग्नेय, कपोत और उलूक-तीर्थकी महिमा
ब्रह्माजी कहते हैं - यमतीर्थ पितरोंकी प्रसन्नताको बढ़ानेवाला है। वह प्रत्यक्ष और परोक्ष- सब प्रकारकी अभीष्ट वस्तुओंको देनेवाला है। सम्पूर्ण देवता और मुनि उस तीर्थ का सेवन करते हैं। मैं उसके प्रभावका वर्णन करता हूँ, जो सब पापों का नाश करनेवाला है। एक बलवान् कपोत था, जो अनुह्रादके नाम से विख्यात था। उसकी पत्नी हेति नामकी यक्षिणी थी, जो इच्छानुसार रूप धारण कर सकती थी। अनुह्रादके मृत्युके पुत्रका पुत्र था और हेती मृत्यु की पुत्री की पुत्री थी। समयानुसार उन दोनों के भी अनेक पुत्र-पौत्र हुए। पक्षियोंका राजा उलूक अनुह्रादका प्रबल शत्रुथा। गङ्गा के उत्तर-तटपर कपोतका आश्रम था और दक्षिण किनारे पक्षिराज उलूक रहता था। उलूक भी अपने पुत्र-पौत्रों के साथ निवास करता था। कपोत और उलूक दोनों बहुत समयतक एक-दूसरे के विरोधी होकर युद्ध करते रहे। दोनों ही अपने पुत्र-पौत्रों के साथ लेकर लड़ते थे। यह बलवान् शत्रुओंके साथ बलवानों का युद्धथा। उनमें से उलूक अथवा कपोय-किसीकी भी जय-पराजय नहीं होती थी। कपोतने यमराज तथा अपने पितामह मृत्युकी आराधना करके याम्यास्त्र प्राप्त किया, अत: वह सबसे अधिक शक्तिशाली हो गया। इसी प्रकार उलूक भी अग्निकी आराधना करके अत्यन्त बलवान् हो गया। वर पाकर दोनों ही उन्मत्त हो गये थे, अत: फिर उनमें बड़ा भयंकर युद्ध छिड़ गया। उसमें उलूकने कपोतके ऊपर आग्नेयास्त्रका प्रहार किया। कपोत ने भी उलूकपर यमपाश तथा यमदण्डका प्रयोग किया। कपोतकी स्त्रीहेति बड़ी पतिव्रता थी। उस महायुद्ध में अपने स्वामीके निकट अग्निको प्रज्वलित देख वह दु:खसे विह्वल हो गयी। विशेषत: पुत्रोंको अग्निसे आवृत देख उसकी व्याकुलता और भी बढ़ गयी। उसने अग्निदेवके पास जाकर नाना प्रकारकी उक्तियोंसे स्तवन करना आरम्भ किया।
हेति बोली - जिनका रुप और दान प्रत्यक्ष है, सम्पूर्ण पदार्थ जिनके आत्मस्वरुप हैं और देवता जिनके द्वारा हवनीय पदार्थोंका भोजन करते हैं, उन यज्ञभोक्ता स्वाहापति अग्निको मैं नमस्कार करती हूँ। जो देवताओंके मुख, देवताओंके हविष्यको वहन करनेवाले, देवताओंके होता और देवताओंके दूत हैं, उन आदिदेव भगवान् अग्निकी मैं शरण लेती हूँ। जो शरीर के भीतर प्राणरूप में स्थित हैं और बाहर अन्नदातारूप में विद्यमान हैं तथा जो यज्ञ के साधन हैं, उन धनंजय (अग्निदेव)- की मैं शरण लेती हूँ।*
अग्नि बोले - पतिव्रते! मेर येह अस्त्र अमोघ है; अत: जिस लक्ष्यपर इसका विश्राम हो सके, उसको बताओ।
कपोतीने कहा - अग्निदेव! आपका अस्त्र मुझपर ही विश्राम करे, मेरे पुत्र और पतिपर नहीं। मुझे मारकर आप सत्यवादी हों। आपको नमस्कार है।
अग्निदेवने कहा - पतिव्रते! तुम्हारे सुवचन और पतिभक्तिसे मैं बहुत संतुष्ट हूँ। तुम्हारे स्वामी औरपुत्रोंका अनिष्ट नहीं होगा। मैं उनकी रक्षा का वचनदेता हूँ। यह मेरा आग्नेयास्त्र तुम्हारे पतिको, पुत्रोंको तथा तुमको भी नहीं जलायेगा; अत: तुम सुखपूर्वक लौट जाओ।
इसी बीच में उलूकीने भी अपने पतिको देखा। वे यमपाशमें बँधकर यमदण्डसे तादित हो रहे थे। सती-साध्वी उलूकी यह देखकर बहुत दु:खी हुई और भयसे व्याकुल हो यमराज के पास गयी।
उलूकी बोली - देव! मनुष्य आपसे भयभीत होकर भागते हैं, आपसे डरकर ब्रह्मचर्यका पालन करते हैं। आपके ही भयसे धीर पुरुष उत्तम बर्ताव करते हैं और आपके ही दरसे कर्मोंके अनुष्ठान में लगते हैं। आपसे भय पाकर लोग उपवास करते और गाँव छोड़कर वंमें जाते हैं। आपके ही डरसे सौम्यभाव ग्रहण करते और आपके ही भयसे सोमपान करते हैं। आपसे भयभीत पुरुष ही अन्नदान और गोदान में प्रवृत्त होते हैं और आपसे डरकर ही मुमुक्षु ब्रह्मवादीकी चर्चा करते हैं।*
इस प्रकार स्तुति करती हुई उलूकीसे दक्षिण दिशाके स्वामी यमराजने कहा- 'तुम्हारा कल्याण हो। तुम वर माँगो। मैं तुम्हें मन के अनुकूल वर दूँगा।' यमराजकी यह बात सुनकर पतिव्रता उलूकीने उनसे कहा- 'सुरश्रेष्ठ! मेरे स्वामी आपके पाशमें बँधे हैं और आपके ही दण्डसे पीड़ित हो रहे हैं। आप उससे मेरे पति और पुत्रोंकी रक्षा करें।' उसकी यह कातर वाणी सुनकर यमराज को बड़ी दया आयी। उन्होंने बार-बार कहा- 'सुमुखि! मेरे ये पाश और दण्ड किसपर पड़ें? इनके लिए स्थान बताओ।' उसने कहा- 'जगदीश्वर! आपके पाश मुझे ही बाँधें और आपका दण्ड भी मुझपर ही पड़े।'
यमराज ने कहा - शुभे! तुम्हारे पुत्र, पति और तुम सब लोग निश्चिन्त होकर जीवन व्यतीत करो। यों कहकर यमराजने अपने पाश समेट लिए और अग्निदेवने आग्नेयास्त्रका निवारण कर दिया। इतना ही नहीं, उन दोनों देवताओं ने मिलकर कपोत और उलूकमें प्रेम करा दिया। फिर पक्षियों से कहा- 'तुमलोग इच्च्नुसार वर माँगो।' दोनों पक्षी बोले- 'भगवन्! हमने आपस के वैरके कारण आपलोगोंका दुर्लभ दर्शन प्राप्त किया। हम तो पपयोनि पक्षी हैं। वरदान लेकर क्या करेंगे तथापि यदि आपलोग प्रेमपूर्वक वर देना ही चाहते हैं तो हमलोग उस कल्याणमय वरको अपने लिए नहीं चाहते। देवेश्वरो! जो अपने लिए याचना करता है, वह शोकका पात्र है। जो सदा परोपकार के लिए उद्यत रहता है, उसीका जीवन सफल है। अग्नि, जल, सूर्य, पृथ्वी और नाना प्रकार के धान्योंका तथा विशेषत: संत-महात्माओंका उपयोग सदा दूसरोंके भले के लिए ही होता है। क्योंकि ब्रह्मा आदि देवता भी एक दिन मृत्युको प्राप्त होते हैं, देवेश्वरो! यह जानकर स्वार्थसिद्धिके लिए परिश्रम करना व्यर्थ है। विधताने प्राणियोंके जन्मके साथ ही उनके लिए जो विद्ध रच दिया है, वह कभी बदल नहीं सकता। अत: जीव व्यर्थ ही कलेश उठाते हैं।* इसलिये हम जगत्के कल्याण के लिय ही कुछ याचना करते हैं। हमारी यह याचना सबके लिए गुणदायक है। आप दोनों इसका अनुमोदन करें। गङ्गाके दोनों तटोंपर जो हमारे आश्रम हैं, वे तीर्थरूप में परिणत हो जाएँ। वहाँ कोई पापी या पुण्यात्मा जिस किसी तरह जो कुछ भी स्नान, दान, जप, होम और पितरोंका पूजन आदि करें, वह सब अक्षय पुण्य देनेवाला हो।
यमराज बोले - जो लोग गौतमीके उत्तर-तटपर यमस्तोत्रका पाठ करेंगे, उनके वंश में सात पीढ़ियों तक किसीकी अकालमृत्यु नहीं होगी। वे पुरुष सदा सब प्रकारकी सम्पत्तियोंके भागी होंगे। जो जितात्मा पुरुष प्रतिदिन इस स्त्रोतकापाठ करेगा, वह अट्ठासी हजार व्याधियोंसे कभी पीड़ित न होगा। इस तीर्थमें तीन मासतक स्नान करनेसे स्ति-साध्वी स्त्री गर्भवती होगी। वन्ध्या भी छ: महीनेतक स्नान करनेसे गर्भवती होगी। गर्भिणी स्त्री एक सप्ताह स्नान करे तो वह वीर पुत्रकी जननी होगी और उसका पुत्र भी सौ वर्षकी आयुवाला, धनवान्, बुद्धिमान, शूरवीर तथा पुत्र-पौत्रों का विस्तार करनेवाला होगा। इस तीर्थमें पिण्ड आदि देनेसे पितरोंकी मुक्ति हो जायगी। कोई भी मनुष्य इसमें करनेसे मन, वाणी तथा शरीरजानी पापसे मुक्त हो जाएगा।
अग्निदेव ने कहा - जो लोग नियमपूर्वक रहते हुए दक्षिण-तटपर मेरे स्त्रोतका पाठ करेंगे, उन्हें मैं आयु, आरोग्य, ऐश्वर्य, लक्ष्मी तथा रूप प्रदान करूँगा। जो कोई मानव कहीं भी इस स्त्रोतका पाठ करेगा अथवा लिखकर भी इसे घर में रख देगा, उसको तथा उसके घरको कभी भी अग्निसे भय न होगा। जो मनुष्य पवित्र होकर अग्नितीर्थमें स्नान और दान करेगा, उसे निश्चय ही अग्निष्टोम-यज्ञका फल मिलेगा।
तबसे वह तीर्थ याम्यतीर्थ, आग्नेयतीर्थ, कपोततीर्थ, उलूकतीर्थ और हेत्युलूकतीर्थ के नामसे विद्वानोंमें प्रसिद्ध हुआ। वहाँ तीन हजार तीन सौ नब्बे तीर्थ हैं और उनमें से प्रत्येक तीर्थ मोक्ष देनेवाला है। उन तीर्थोंमें स्नान करनेसे मनुष्य पवित्र होते, पुत्र और धन पाते तथा अन्त में स्वर्गलोकको जाते हैं।
* रूपं न दानं न परोक्षमस्ति यस्यातमभूतं च पदार्थजातम्।
अश्नन्ति हव्यानि च येन देवा: स्वाहापतिं यज्ञभुजं नमस्ये ॥
मुखभूतं च देवानां देवानां हव्यवाहनम्। होतारं चापि देवानां देवानां दूतमेव च ॥
तं देवं शरणं यामि आदिदेवं विभावसुम्।
अन्त:स्थित: प्राणरूपो बहिश्चान्नप्रदो हि य:। यो यज्ञसाधनं यामि शरणं तं धनंजयम् ॥
(१२४।१४-१७)
* त्वभ्दीता अनुद्रवन्ते जनास्त्वभ्दीता ब्रह्मचर्यं चरन्ति। त्वभ्दीता: साधु चरन्ति धीरास्त्वभ्दीता: कर्मनिष्ठा भवन्ति ॥
त्वभ्दीता अनाशकमाचरन्ति ग्रामादरण्यमभि यच्चरन्ति ।
त्वभ्दीता: सौम्यतामाश्रयन्ते त्वभ्दीता: सोमपानं भजन्ते। त्वभ्दीताश्चान्नगोदाननिष्ठास्त्वभ्दीता ब्रह्मवादं वदन्ति ॥
(१२४।२३-२४)
* आत्मार्थं यस्तु याचेत स शोच्यो हि सुरेश्वरौ। जीवितं सफलं तस्य य: परार्थोद्यात: सदा ॥
अग्निरापो रवि: पृथ्वी धान्यानि विविधानि च। परार्थं वर्तनं तेषां सतां चापि विशेषत: ॥
ब्रह्मादयोऽपि हि यतो युज्यन्ते मृत्युना सह। एवं ज्ञात्वा तु देवेशौ वृथा स्वार्थपरिश्रम: ॥
जन्मना सह यत्पुसां विहितं परमेष्ठिना। कदाचिन्नान्यथा तद्वै वृथा क्लिश्यन्ति जन्तव: ॥
(१२४।३६-३९)
Summary of chapter 54 of the Brahma Mahā Purana is as follows:
Mārkaṇḍeya visits the shrine of Śrī Kṛṣṇa located within the Puruṣottama kṣetra. The beauty of this shrine and the divine form of Kṛṣṇa enshrined there are described. The sage offers worship and prayer, and the extraordinary merit of visiting — sins accumulated over many births are destroyed, and the devotee is assured of reaching Viṣṇu's supreme abode.