ब्रह्म महा पुराण
48 - चक्रतीर्थ और पिप्पलतीर्थकी महिमा, महर्षि दधीचि, उनकी पत्नी गभस्तिनी तथा उनके पुत्रपिप्पलादके त्यागकी अद्भुत कथा
ब्रह्माजी कहते हैं - चक्रतीर्थ ब्रह्महत्या आदि पापोंका नाश करनेवाला है। वहाँ भगवान् शंकर चक्रेश्वरके नामसे निवास करते हैं। उन्हींसे भगवान् विष्णुको चक्र प्राप्त हुआ था। श्रीविष्णुने वचन रहकर चक्र के लिए भगवान् शंकर की आराधना की थी। इसीलिये उसे चक्रतीर्थ कहते हैं। उसके श्रवणमात्रसे मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। चक्रतीर्थके बाद पिप्पलतीर्थ है। उसकी महिमाका वर्णन करनेमें शेषनाग भी समर्थ नहीं हैं। नारद! चक्रेश्वर ही पिप्पलेश्वर हैं। उनके नामका कारण सुनो। दधीचि नामसे विख्यात एक मुनि थे। वे सभी उत्तम गुणोंसे सुशोभित थे। उनकी पत्नी श्रेष्ठ वंशकी कन्या और पतिव्रता थीं। उनका नाम गभस्तिनी था। वे लोपामुद्राकी बहिन थीं।दधीचिकी पत्नी सदा भारी तपस्या में लगी रहती थीं। दधीचि प्रतिदिन अग्निकी उपासना करते और गृहस्थ-धर्मके पालनमें तटपर रहते थे। उनका आश्रम गङ्गाके तटपर था। वे देवता और अतिथियोंकी सेवा करते, अपनी ही पत्नीमें अनुराग रखते और शान्तभाव से रहते थे। उनके प्रभावसे उस देशमें शत्रुओं और दैत्य-दानवोंका आक्रमण नहीं होता था।
एक दिन की बात है- दधीचि मुनिके आश्रम पर रूद्र, आदित्य, अश्विनीकुमार, इन्द्र, विष्णु, यम और अग्नि पधारे। वे दैत्योंको परास्त करके वहाँ आये थे और उस विजयके कारण उनके हृदय में हर्षकी हिलोरें उठ रही थीं। मुनिवर दधीचिको देखकर सब देवताओंने प्रणाम किया।
दधीचि भी देवताओंको देखकर बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने सबका पृथक्-पृथक् पूजन किया, फिर पत्नी के साथ देवताओंके लिए गृहस्थोचित स्वागतसत्कार का प्रबन्ध किया। इसके बाद उन्होंने देवताओंसे कुशल पूछी और देवता भी उनसे वार्तालाप करने लगे।
देवता बोले - मुने! आप इस पृथ्वीके कल्पवृक्ष हैं। आप-जैसा महर्षि जब हम लोगोंपर इतनी कृपा रखता है, तब अब हमारे लिए संसार में कौन-सी वस्तु दुर्लभ होगी। मुनिश्रेष्ठ! जीवित पुरुषोंके जीवनका इतना ही फल है कि वे तीर्थोंमें स्नान, समस्त प्राणियों पर दया और आप-जैसे महात्माओंका दर्शन करें।* मुने! इस समय स्नेहवश हम आपसे जो कुछ कहते हैं, उसे ध्यान देकर सुनें। हम बड़े-बड़े राक्षसों और दैत्योंको जीतकर यहाँ आये हैं। इससे हम बहुत सुखी हैं। विशेषत: आपका दर्शन करके हमें बड़ी प्रसन्नता हुई है। अब हमें अस्त्र-शस्त्रोंके रखनेसे कोई लाभ नहीं दिखायी देता। हम उन अस्त्रोंका बोझ ढो भी नहीं सकते। हम स्वर्ग में जब इन अस्त्रोंको रखते हैं, तब हमारे शत्रु इनका पता लगाकर वहाँ से हड़प ले जाते हैं। इसलिये हम आपके पवित्र आश्रम पर इन सब अस्त्रों को रख देते हैं। ब्रह्मन्! यहाँ दानवों और राक्षसोंसे तनिक भी भय नहीं है। आपकी आज्ञासे यहे सारा प्रदेश पवित्र और सुरक्षित हो गया है। तपस्या द्वारा आपकी समानता करनेवाला दूसरा कोई है ही नहीं। अब हम कृतार्थ होकर इन्द्रके साथ अपने-अपने स्थान को चले जाते हैं। जब इन आयुधोंकी रक्षा आपके अधीन है।
देवताओंकी यह बात सुनकर दधीचि ने कहा- 'एवमस्तु'। उस समय उनकी प्यारी पत्नीने उन्हें रोका- 'मुने! यह देवताओंका कार्य विरोध उतोंन करनेवाला है। अत: इसमें आपको पड़नेकी क्या आवश्यकता है? जो शास्त्रोंका ज्ञान प्राप्त करके परमार्थ-तत्त्वमें स्थित हो चुके हैं, संसार के कार्यों में जिनकी कोई आसक्ति नहीं है, उन्हें दूसरोंके लिए ऐसा संकट मोल लेनेसे क्या लाभ, जिससे न इस लोक में सुख हैऔर न परलोक में। विप्रवर! मेरी बातें ध्यान देकर सुनो। यदि अपने इन आयुधोंको स्थान दे दिया तो इन देवताओं के शत्रु अआप्से भी द्वेष करेंगे। यदि इनमें से कोई अस्त्र नष्ट हुआ या चोरी चला गया तो ये देवता भी कुपित होकर हमारे शत्रु बन जाएँगे। अत: मुनीश्वर! आप वेदवेत्ताओंमें श्रेष्ठ हैं। आपके लिए इस पराये द्रव्यमें ममत्व जोड़ना ठीक नहीं। यदि धन देनेकी शक्ति हो तो याचकको देना ही चाहिये- उसमें कुछ विचार करनेकी आवश्यकता नहीं है। यदि धन देनेकी शक्ति न हो तो साढू पुरुष केवल मन, वाणी तथा शारीरिक क्रियाओंद्वारा दूसरोंका कार्य- साधन करते हैं। प्राणनाथ! पराये धनको अपने यहाँ धरोहरके रूप में रखना साधु पुरुषों ने कभी स्वीकार नहीं किया है। इसका उन्होंने सदा बहिष्कार ही किया है। अत: आप यह कार्य न कीजिये।'* अपनी प्यारी पत्नी की यह बात सुनकर ब्राह्मण ने कहा- "भद्रे! मैं देवतापन की प्रार्थना प्र पहले ही 'हाँ' कह चुका हूँ। अब 'नहीं' कर दूँ तो मुझे सुख नहीं मिलेगा।' पतिका कथन सुनकर ब्राह्मणी यह सोचकर चुप हो गयी कि दैवके सिवा और किसीका किसीपर वश नहीं चल सकता। देवतालोग अपने अत्यन्त तेजस्वी अस्त्र आश्रम पर रखकर मुनीश्वरको नमस्कार करके कृतार्थ को अपने-अपने लोक में चले गये। देवताओंके चले जानेपर मुनि अपनी पत्निके साथ धर्म में तत्पर हो प्रसन्नतापूर्वक वहाँ रहने लगे। इस प्रकार एक हजार दिव्य वर्ष बीत गये। तब दधीचि ने अपनी पत्नीसे कहा- 'देवि! देवता यहाँ से अस्त्र ले जाना नहीं चाहते और दैत्य मुझसे द्वेष करते हैं। अब तुम्हीं बताओ- क्या करना चाहिये?' पत्नी ने विनयपूर्वक कहा- नाथ! मैंने तो पहले ही निवेदन किया था। अब आप ही जानें और जो उचित हो, सो करें। दैत्योंमें जो बड़े-बड़े वीर, तपस्वी और बलवान् हैं, वे इन अस्त्र-शास्त्रों की निश्चित ही हड़प लेंगे।' तब दधीचिने उन अस्त्रोंकी रक्षाके लिए एक काम किया- उन्होंने पवित्र जलसे मन्त्र पढ़ते हुए अस्त्रोंको नहलाया। फिर वह सर्वास्त्रमय परम पवित्र और तेजयुक्त जल स्वयं पी लिया। तेज निकल जाने से वे सभी अस्त्र-शस्त्र शक्तिहीन हो गये, अत: क्रमशः समयानुसार नष्ट हो गये। तदनन्तर देवताओं ने आकार दधीचिसे कहा- 'मुनिवर! हमारे ऊपर शत्रुओंका महान् भय आ पहुँचा है। अत: हमने जो अस्त्र आपके यहाँ रख दिए थे, उन्हें इस समय दे दीजिये।' दधीचिने कहा- 'आपलोग बहुत दिनोंतक उन्हें लेने नहीं आये। अत: दैत्योंके भयसे हमने उन अस्त्रोंको पी लिया है। अब वे हमारे शरीरमें स्थित हैं। इसलिये जो उचित हो, वह कहें।' यह सुनकर देवताओंने विनीत भाव से कहा- "मुनीश्वर! इस समय तो हम इतना ही कह सकते हैं कि अस्त्र दे दीजिए।' ब्राह्मण ने कहा- 'सब अस्त्र मेरी हड्डियों में मिल गये हैं। अत: उन हड्डियों को ही ले जाओ।' उस समय प्रिय वचन बोलनेवाली दधीचिकी पत्नी प्रातिथेयी उनके पास नहीं थीं। देवता उनसे बहुत डरते थे। उन्हें न देखकर दधीचि से बोले- 'विप्रवर! जो कुछ करना हो, शीघ्र करें।' दधीचिने अपने दुस्त्यज प्राणोंका परित्याग करते हुए कहा- 'देवताओं! तुम सुखपूर्वक मेरा शरीर ले लो। मेरी हड्डियों से प्रसन्नता प्राप्त करो। मुझे इस देहसे क्या काम है।'
यों कहकर दधीचि पद्मासन बाँधकर बैठ गये। उनकी दृष्टि नासिकाके अग्रभागपर स्थिर हो गयी। मुखपर प्रकाश और प्रसन्नता विराज रही थी। उन्होंने हृदयाकाशमें स्थित अग्निसहित वायुको धीरे-धीरे ऊपरकी ओर उठाकर अप्रमेय परम पद ब्रह्मके स्वरुप में स्थापित कर दिया। इस प्रकार महात्मा दधीचिने ब्रह्मसायुज्य प्राप्त किया। उनका शरीर निष्प्राण हो गया। यह देख देवताओं ने विश्वकर्मा से उतावलीपूर्वक कहा- 'अब आप अभि बहुत-से अस्त्र-शस्त्र बना डालिये।' विश्वकर्माने कहा- 'देवताओं! यह ब्राह्मणका शरीर है। मैं इसका उपयोग कैसे करूँ। जब केवल इनकी हड्डियाँ रह जाएँगी, तभी उनका अस्त्रनिर्माण करूँगा।' तब देवताओं ने गौओं से कहा- 'हम तुम्हारा मुख वज्रके समान किये देते हैं। तुम हमारे हितके लिए अस्त्र-शस्त्र निर्माण करनेके उद्देश्यसे दधीचि के शरीर को क्षणभरमें विदीर्ण कर डालो और शुद्ध हड्डियाँ निकलकर दे दो।' देवताओंके आदेशसे गौओंने वैसा ही किया उन्होंने दधीचि के शरीरको चाट-चाटकर हड्डियाँ निकाल लीं और देवताओं को दे दीं। देवता उत्साहके साथ अपने लोक में चले गये और गौएँ भी अपने स्थानको लौट गयीं।
तदनन्तर बहुत देर के बाद दधीचि की सुशीला पत्नी हाथ में जल से भरा हुआ कलश ले फल और फूलों से पार्वती देवीकी अर्चना और वन्दना करके अग्नि, पति अट्टहा आश्रम के दर्शन की उत्सुकतासे शीघ्रता पूर्वक पैर बढ़ाती हुई आयीं। उस समय उनके गर्भमें बालक आ गया था। आश्रम पर पहुँचने पर जब उन्होंने अपने स्वामीको नहीं देखा, तब बड़े विस्मयमें पड़कर अग्निसे पूछा- 'मेरे पतिदेव कहाँ चले गये?' अग्निने जो कुछ हुआ था, सब सुना दिया। पतिकी मृत्युका दु:खद समाचार सुनकर वे दु:ख और उद्वेग से पृथ्वी पर गिर पड़ीं। उस समय अग्निदेव ही उन्हें धीरे-धीरे आश्वासन दिया।
प्रतिथेयी बोलीं - मैं देवताओंको शाप देने में समर्थ नहीं हूँ, अत: स्वयं ही अग्निमें प्रवेश करुँगी। अब जीवन रखकर क्या होगा। संसार में जो वस्तु उत्पन्न होती है, वह सब नश्वर है; अत: उसके लिए शोक नहीं होना चाहिये। परंतु मनुष्योंमें वे ही पुण्यके भागी होते हैं जो गौ, ब्राह्मण तथा देवताओंके लिए अपने प्यारे प्राणों का उत्सर्ग कर देते हैं।१ इस परिवर्तनशील संसार-चक्र में धर्मपरायण तथा शक्तिशाली शरीर पाकर जो प्राणी देवताओं तथा ब्राह्मणोंके लिए अपने प्यारे प्राणों का त्याग करते हैं, वे ही धन्य हैं। जिसने देह धारण किया है, उसके प्राण एक-न-एक दिन अवश्य जाएँगे- यह जानकर जो ब्राह्मण, गौ, देवता तथा दीन आदि के लिए इन प्राणों का उत्सर्ग करते हैं, वे ईश्वर हैं।२
यों कहकर उन्होंने अग्नियोंका यथावत् पूजन किया और अपना पेट चीरकर गर्भके बालक को हाथ से निकाल दिया; फिर गङ्गा, पृथ्वी, आश्रम तथा आश्रमके वनस्पतियों और अन्न आदि ओषधियोंको प्रणाम करके पतिकी त्वचा और लोम आदि के साथ चिता में प्रवेश करनेका विचार किया। उस समय वे बोलीं- 'मेरे गर्भ का यह बालक पिता-माता से हीन है, इसके कोई सगोत्र बन्धु भी नहीं हैं; अत: सम्पूर्ण भूतगण, ओषधियाँ तथा लोकपाल इसकी रक्षा करें। जो लोग माता-पितासे हीन बालकको अपने औरस पुत्रोंके समान देखते और उसी भाव से रक्षा करते हैं, वे निश्चय ही ब्रह्मा आदि देवताओंके भी वन्दनीय हैं।'३
यों कहकर दधीचिकी पत्नीने बालक को पीपलके समीप रख दिया और स्वामीमें चित्त लगाकर अग्निको प्रणाम किया; फिर अग्निकी परिक्रमा करके यज्ञ पात्रोंके साथ ही चित्रा में प्रवेश किया और पतिसहित दिव्यलोकको चली गयीं। उस समय आश्रम के वनवासी भी रोने लगे। प्रतिथेयी और दधीचिने उनका अपने पुत्रोंकी भाँति पालन किया था। मृग, पक्षी तथा वृक्ष सब रो-रोकर एक-दूसरेसे कहने लगे- 'हम पिता दधीचि और माता प्रातिथेयी के बिना जीवित नहीं रह सकते। जो लोग स्वर्गवासी माता-पिता की संतानोंपर निरन्तर स्वाभाविक स्नेह रखते हैं, वे ही पुण्यात्मा और कृतार्थ हैं।४ दधीचि और प्रातिथेयी हमें जिस स्नेहपूर्ण दृष्टिसे देखा करते थे, वैसे सगे माता-पिता भी नहीं देखते।हमें धिक्कार है। हम पापी हैं, जो उनके दर्शनसे वञ्चित हो गये। आज से हम सब लोगोंका यही निश्चय होना चाहिये कि यह बालक ही हम लोगोंके लिए दधीचि और प्रातिथेयी है तथा यह बालक ही हमारा सनातन धरम हैं।'
यों कहकर वनस्पतियों और ओषधियोंने अपने राजा सोम के पास जाकर उत्तम अमृतकी याचना की। सोम ने उन्हें बहुत उत्तम अमृत दिया और वनस्पतियोंने वह लाकर बालकको दे दिया। अमृत से तृप्त हुआ बालक शुक्लपक्ष के चन्द्रमा के समान बढ़ने लगा। पीपल के वृक्षोंसे उसका पालन किया था, इसलिये वह पिप्पलादने पीपलके वृक्षोंसे अत्यन्त विस्मित होकर कहा- 'लोक में यह देखा जाता है कि मनुष्योंसे मनुष्य, पक्षियोंसे पक्षी तथा वनस्पतियोंसे वनस्पति उत्पन्न होते हैं; इसमें कहीं विषमता नहीं दिखायी देती। परंतु मैं वृक्षका पुत्र होकर हाथ-पैर आदिसे विशिष्ट जीव कैसे हो गया!' उनकी बात सुनकर वृक्षोंने क्रमशः उनके पिता दधीचिकी मृत्यु और पतिव्रता माता के अग्निप्रवेशका सब समाचार कह सुनाया। सुनते ही वे दु:ख से व्याप्त होकर पृथ्वीपर गिर पड़े। उस समय वृक्षोंने धर्म और अर्थयुक्त वचन कहकर उन्हें सान्त्वना दी। आश्वस्त होनेपर उन्होंने ओषधियों और वनस्पतियोंसे कहा- 'जिन्होंने मेरे पिताकी हत्या की है, उनका मैं भी वध करूँगा, अन्यथा जीवित नहीं रह सकता। जो पिता के लिटर और शत्रु होते है, उनके साथ पुत्र भी वैसा ही बर्ताव करता है। जो ऐसा करता है, वही पुत्र है। जो इसके विपरीत आचरण करता है, वह पुत्रके रूप में शत्रु माना गया है।'
वृक्षों ने कहा - महाद्युते! तुम्हारी माता ने परलोक में जाते समय यह उद्रार प्रकट किया गया था- 'जो दूसरोंके द्रोहमें लगे रहते हैं, जो अपने कल्याणकी बातें भूल जाते हैं तथा जो भ्रान्चित्त होकर इधर-उधर भटकते हैं, वे नरकके गड्ढे में गिरते हैं।' माता की कही हुई वह बात सुनकर पिप्पलाद कुपित होकर बोले- 'जिसके अन्त:कारण में अपमान की आग प्रज्वलित हो रही हो, उसके सामने साधुताकी बातें व्यर्थ हैं।' फिर उन्होंने भगवान् चक्रेश्वर महादेव के स्थानपर जाकर उनसे कहा- 'मुझे तो शत्रुओंका नाश करनेके लिए कोई शक्ति दीजिये।' पिप्पलादके इतना कहते ही भगवान् शंकरके नेत्रोंसे भयंकर कृत्या प्रकट हुई। उसकी आकृति बडवा (घोड़ी)- के समान थी। सम्पूर्ण जीवोंका विनाश करनेके लिए उसने अपने गर्भमें भयंकर अग्नि छिपा रखी थी। मृत्युकी लपलपाती हुई जीभके समान वह महारौद्ररूपा भीषण कृत्या पिप्पलादसे बोली- 'बताओ, मुझे क्या करना है?' पिप्पलादने कहा- 'देवता मेरे शत्रु हैं। उन्हें कहा जा।' फिर तो उस बडवाके गर्भसे महाभयंकर अग्नि ओरकट हुई, जो समस्त लोकोंका प्रलय करने में समर्थ थी। देवता उसे देखते ही थर्रा उठे और पिप्पलाद द्वारा आराधित पिप्पलेश नामसे प्रसिद्ध भगवान् शिवकी शरणमें आये। उन्होंने भयभीत होकर शिवजीकी स्तुति करते हुए कहा- 'शम्भो! आप हमारी रक्षा करें। कृत्या और उससे प्रकट हुई आग हमें बड़ा कष्ट दे रही है। सर्वेश्वर! आप भयभीत मनुष्योंको अभय देनेवाले हैं। शिव! जो सब ओरसे सताये हुए, पीड़ित तथा श्रान्तचित्त प्राणी हैं, उन सबकी आप ही शरण हैं। जगन्मय! आप पिप्पलादको शान्त कीजिये।'
'बहुत अच्छा' कहकर जगदीश्वर शिवने पिप्पलादके पास आकर उससे कहा- 'बेटा! देवताओंका नाश कर दिया जाय तो भी तुम्हारे पिता लौटकर नहीं आयेंगे। उन्होंने देवताओंके कार्यकी सिद्धिके लिए अपने प्राण दिये हैं। संसार में उनके समान दीन-दु:खियोंका दयामय बन्धु कौन होगा! तुम्हारी पतिव्रता माता भी उन्हींके साथ दिव्यलोकमें चली गयीं। यहाँ उनकी समता करनेवाली कौन स्त्री है। क्या लोपामुद्रा और अरुन्धती भी उनकी बराबरी कर सकती हैं? जिनकी हड्डियोंसे सम्पूर्ण देवता सदा विजयी और सुखी बने रहते अहिं, वे तुम्हारे पिता कितने शक्तिशाली थे! उन्होंने जिस उज्जवल सुयश-राशिका उपार्जन किया है, उसे तुम्हारी माता ने अपने दिव्य- त्यागीसे अक्षय बना दिया है। तुम उन्हींके पुत्र हो। उनसे बढ़कर तुमने अभीतक कुछ नहीं किया। तुम्हारे प्रताप और भयसे आज देवता स्वर्ग से भ्रष्ट हो चुके हैं। वे सोच नहीं पाते कि हम किस दिशाको भागकर जायँ। तुम उन्हें बचाओ। अमरोंकी रक्षा करो। आर्त्त प्राणियोंकी रक्षासे बढ़कर पुण्य कहीं भी नहीं है। मनुष्यलोकमें जबतक मनोहर यश फैला रहता है, तबतक एक-एक दिनके बदले एक-एक वर्षके क्रमसे दीर्घकालतक स्वर्गलोकमें मनुष्य निर्विकार चित्तसे निवास करते हैं। इस जगत् में वे ही मुर्दे के समान हैं, जिन्होंने यशका उपार्जन नहीं किया; वे ही अंधे हैं, जिन्होंने शास्त्र नहीं पढ़े। वे ही नपुंसक है, जो सदा दान नहीं देते तथा वे ही शोक के योग्य हैं, जो सदा धर्मपालनमें संलग्न नहीं रहते।*
देवाधिदेव महादेवजी का यह वचन सुनकर पिप्पलाद मुनि शान्त हो गये। उन्होंने भगवान् शिवको नमस्कार किया और हाथ जोड़कर कहा- 'जो मन, वाणी और क्रियाद्वारा सदा मेरे हित में संलग्न रहकर मेरा उपकार करते रहते हैं, उनका तथा अन्य लोगोंका हित करनेके लिए मैं देवता आदिके पूजनीय उमासाहित भगवान् शंकर को प्रणाम करता हूँ। जिन्होंने मेरी रक्षा ही, हमें पाल-पोसकर बड़ा किया, अपना सगोत्र और सहधर्मी बनाया, भगवान् शिव उनके मनोरथ पूर्ण करें। मैं बाल-चन्द्रमाका मुकुट धारण करनेवाले महादेवजीको नित्य प्रणाम करता हूँ। प्रभो! जिन्होंने माता-पिताकी भाँति मेरा भरण-पोषण किया है, उनके नामसे तीनों लोकोंके लिये यह तीर्थ हो। इससे उनका यश होगा और मैं उनके ऋणसे उऋण हो जाऊँगा। पृथ्वीपर देवताओंके जो-जो क्षेत्र और तीर्थ हैं, उन सबकी अपेक्षा इस तीर्थका अधिक माहात्म्य हो। इस बातका यदि देवतालोग अनुमोदन करें तो मैं उनके अपराध क्षमा कर सकता हूँ।'
पिप्पलादने यह बात इन्द्र आदि सम्पूर्ण देवताओंके सामने कही और सबने आदरपूर्वक इसका समर्थन किया। बालक पिप्पलादकी बुद्धि, विनय, विद्या, शौर्य, बल, साहस, सत्यभाषण, माता-पिताके प्रति भक्ति तथा भाव-शुद्धिको जानकर शंकरजीने उनसे कहा- 'बेटा! जो तुम्हारा अभीष्ट हो, उसे बताओ। वह तुम्हें अवश्य प्राप्त होगा। तुम अपने मन में अन्यथा विचार न करना।'
पिप्पलाद बोले - महेश्वर! जो धर्मनिष्ठ पुरुष गङ्गा में स्नान करके आपके चरणकमलोंका दर्शन करते हैं, उन्हें समस्त अभीष्ट वस्तुएँ प्राप्त हों और शरीरका अन्त होनेपर वे शिवके धाम में जाएँ। नाथ! मेरे पिता और माता आपके चरणोंमें पड़े थे। ये पीपल और देवता भी आपके स्थान में आकर सुखी हुए हैं। ये सब लोग सदा आपका दर्शन करें और आपके ही धाम जाएँ।
पिप्पलाद की यह बात सुनकर देवताओंको बड़ी प्रसन्नता हुई। वे उनके भयसे मुक्त हो इस प्रकार बोले- 'ब्रह्मन्! तुमने वाही किया है, जो देवताओंको अभीष्ट था। देवाधिदेव भगवान् शिवकी आज्ञाका भी पालन किया और पहले वरदान भी दूसरोंके ही लिये माँगा, अपने लिये नहीं; इसलिये हम भी संतुष्ट होकर तुम्हें कुछ देना चाहते हैं। तुमहमसे कोई वर माँगो।'
पिप्पलाद ने कहा - देवताओं! मैं अपने माता-पिताको देखना चाहता हूँ। मैंने केवल उनका नाम सुना है। संसार में वे ही प्राणी धन्य है, जो माता-पिता के अधीन रहकर उनकी सेवा-शुश्रूषा करते हैं। अपनी इन्द्रियोंको, शरीर को, कुल, शक्ति और बुद्धिको माता-पिताके कार्यमें लगाकर पुत्र कृतकृत्य हो जाता है। यदि मैं उनका दर्शन भी पा जाऊँ तो मेरे मन, वचन, शरीर और क्रियाओंका फल प्राप्त हो जायगा।
पिप्पलाद मुनिका यह कथन सुनकर देवताओं ने परस्पर सलाह करके कहा- 'ब्रह्मन्! तुम्हारे माता-पिता दिव्य विमानपर आरूढ़ हो तुम्हें देखनेके लिए आते हैं। तुम भी निश्चय ही उन्हें देखोगे। विषाद छोड़कर अपने मनको शान्त करो। देखो, देखो, वे श्रेष्ठ विमानपर बैठे आ रहे हैं। उनके दिव्य शरीरपर स्वर्गीय आभूषण शोभा पाते हैं।' पिप्पलादने भगवान् शिवके समीप अपने माता-पिता को देखकर प्रणाम किया। उस समय उनके नेत्रोंमें आनन्दके आँसू भर आये थे। वे किसी तरह गद्रद कण्ठसे बोले- 'अन्य कुलीन पुत्र अपने माता-पिता को तारते हैं; किन्तु मैं ऐसा भाग्यहीन हूँ, जो अपनी माता के उदरको विदीर्ण करनेमें कारण बना।'
उस समय उसके माता-पिता ने कहा- 'पुत्र! तुम धन्य हो, जिसकी कीर्ति स्वर्गलोकतक फैली है। तुमने भगवान् शंकरका प्रत्यक्ष दर्शन किया और देवताओंको सान्त्वना दी। तुम-जैसे पुत्रसे पितरोंके उत्तम लोक कभी क्षीण नहीं होते।' इसी समय पिप्पलादके मस्तकपर आकाशसे फूलोंकी वर्षा होने लगी। देवताओंने जय-जयकार किया। पत्नीसहित दधीचिने भी पुत्रको आशीर्वाद दिया और शंकर,
गङ्गा तथा देवताओंको नमस्कार करके पिप्पलादसे कहा- 'बेटा! विवाह करके भगवान् शिवकी भक्ति और गङ्गाजी का सेवन करो। पुत्रोंकी उत्पत्ति करके विधिपूर्वक दक्षिणासहित यज्ञोंका अनुष्ठान करो और सब प्रकारसे कृतार्थ हो दीर्घकाल के लिये दिव्यलोकमें स्थान प्राप्त करो।'
पिप्पलाद ने कहा - पिताजी! मैं ऐसा ही करूँगा। तदनन्तर पत्नीसहित दधीचि पुत्रको बारंबार सान्त्वना दे देवताओंकी आज्ञा ले पुन:दिव्यलोकमें चले गये। इसके बाद देवताओंने भगवान् शिव से कहा- 'जगदीश्वर! अब दधीचिकी हड्डियोंकी, हमारी तथा इन गौओंकी पवित्रताके लिये कोई उपाय बताइये।' शिव ने कहा- 'गङ्गाजी में स्नान करके सम्पूर्ण देवता और गौएँ पापमुक्त हो सकती हैं। इसी प्रकार दधीचि शरीरकी हड्डियाँ भी गङ्गाजी के जल में धोनेसे पवित्र हो जाएँगी।' शिवजीकी आज्ञा के अनुसार देवता स्नान करके शुद्ध हो गये और हड्डियाँ धोनेमात्रसे पवित्र हो गयीं। जहाँ देवता पापमुक्त हुए, वह 'पापनाशन' तीर्थ कहलाता है। वहाँ का स्नान और दान ब्रह्महत्याका नाश करनेवाला है। जहाँ गौएँ पवित्र हुईं, उस स्थानका नाम 'गोतार्थ' हुआ। जहाँ दधीचिकी हड्डियाँ पवित्र की गयीं, उसे' 'पितृतीर्थ' जानना चाहिये। वह पितरोंकी प्रसन्नताको बढ़ानेवाला है। जिस किसी प्राणीके , वह कितना ही पापी क्यों न हो, शरीरकी राख, हड्डी, नख और रोएँ उस तीर्थमें पड़ जाते हैं, वह तबतक स्वर्गलोकमें निवास करता है जबतक कि चन्द्रमा, सूर्य और तारोंका अस्तित्व बना रहता है। इस प्रकार उस तीर्थसे तीन तीर्थ प्रकट हुए। उस समय देवताओं और गौओंने पवित्र होकर भगवान् शंकरसे कहा- 'हमलोग अपने-अपने स्थानको जाएँगे। यहाँ सूर्यदेवकी प्रतिष्ठा की गयी है। इनके प्रतिष्ठित होनेसे सब देवता प्रतिष्ठित हो जाएँगे। इसलिये आप हमें आज्ञा दें। सनातन सूर्यदेव स्थावर-जङ्गमरूप जगत्के आत्मा हैं। जहाँ जगज्जननी गङ्गा और साक्षात् भगवान् त्र्यम्बक विराजा रहे हैं, वहाँ प्रतिष्ठान नामक तीर्थ भी हो।'
यों कहकर देवताओंने पिप्पलादसे भी अनुमति ली और अपने-अपने निवासस्थानको चले गये। वहाँ जितने पीपल थे, कालान्तर में अक्षय स्वर्गको प्राप्त हुए। प्रतापी पिप्पलादने उस क्षेत्रके अधिष्ठाता देवताके रूप में भगवान् शंकरकी स्थापना करके उनका पूजन किया। फिर गौतमकी कन्यको पत्नीरूप में प्राप्त करके कई पुत्र उत्पन्न किये, लक्ष्मी और यग्यका उपार्जन किया तथा अन्तमें वे सुह्रज्जनोंके साथ स्वर्गलोकको चले गये। तब से वह क्षेत्र पिप्पलेश्वरतीर्थ केलाने लगा। वह सब यज्ञोंका फल देनेवाला पवित्र तीर्थ है। उसके स्मरणमात्रसे पापोंका नाश हो जाता है। फिर स्नान, दान और सूर्यके दर्शनसे जो लाभ होता है, उसके लिए तो कहना ही क्या है। वहाँ देवाधिदेव महादेवजी केदो नाम हैं- चक्रेश्वर और पिप्पलेश्वर। इस रहस्यको जानकार मनुष्य सब अभीष्ट वस्तुओंको प्राप्त कर लेता है। देवमंदिरमें सूर्यकी प्रतिष्ठा होनेसे वह क्षेत्र प्रतिष्ठान कहलाया, जो देवताओंको भी बहुत प्रिय है। यह उपाख्यान अत्यन्त पवित्र है। जो मनुष्य इसका पाठ अथवा श्रवण करता है, वह दीर्घजीवी, धनवान और धर्मात्मा होता है तथा अन्त में भगवान् शंकरका स्मरण करके उन्हींको प्राप्त कर लेता है।
*एतदेव फलं पुंसां जीवतां मुनिसत्तम। तीर्थाप्लुतिर्भूतदया दर्शनं च भवादृशाम् ॥ (११०।१६)
*चेदस्ति शक्तिर्द्रव्यदाने ततस्ते दातव्यमेवार्थिने किं विचार्यम्। नो चेत् सन्त: परकार्या कुर्युर्वाग्भिर्मनोभि; कृतिभिस्तथैव ॥
पार्स्वसंधारणमेतदेव सभ्दिर्निरस्तं त्यज कान्त सद्य: ॥ (११०।२९-३०)
१. उत्पद्यते यत्तु विनाशि सर्वं न शोच्यमस्तीति मनुष्यलोके। गोविप्रदेवार्थमिह त्यजन्ति प्राणान् प्रियान् पुण्यभाजो मनुष्या: ॥ (११०।६३)
२. प्राणा: सर्वेऽस्यापि देहान्वितस्य यातारो वै नात्र संदेहलेश:। एवं ज्ञात्वा विप्रगोदेवदीनाद्यर्थ चैनानुत्सृजन्तीश्वरास्ते ॥ (११०।६५)
३. ये बालकं मातृपितृप्रहीणं सनिर्विशेषं स्वतनुप्ररूढै:। पश्यन्ति रक्षन्ति त एव नूनं ब्रह्मादिकानामपि वन्दनीया:॥ (११०।७०)
४. स्वर्गमासेदुषो: पित्रोस्तदप्तयेष्वकृत्रिमम्। ये कुर्वन्त्यनिशं स्नेहं त एवकृतिनो नरा;॥ (११०।७५)
Summary of chapter 47 of the Brahma Mahā Purana is as follows:
The divine origin of the sacred idols of Puruṣottama is narrated. Indradyumna, anxious to behold the Lord's physical form, receives divine instruction on the three materials suitable for idol-making — rock, clay, and wood. A divine craftsman of cosmic skill fashions the sacred image. The installation of the Jagannātha idol at Nīlāgiri is described as a transcendent event witnessed and celebrated by the entire assembly of Devas and sages.