99 - नैमित्तिक और प्राकृत प्रलयका वर्णन

व्यासजी कहते हैं – समस्त प्राणियोंका प्रलय  नामात्तक , प्राकृतिक और आत्यन्तिक भेदसे तीन प्रकारका माना गया है । कल्पके अन्तमें जो ब्राह्म प्रलय होता है , वह नैमित्तिक है । मोक्षको आत्यन्तिक प्रलय कहते हैं और जो दो परार्ध व्यतीत होनेपर हुआ करता है , उसका नाम प्राकृत प्रलय है।

 मुनियोंने कहा - भगवन् ! हमें शास्त्रों में बताये अनुसार परार्धकी संख्याका वर्णन कीजिये , जिसको दूना करनेसे प्राकृत प्रलयका ज्ञान हो सके।

व्यासजी बोले — ब्राह्मणो ! एकसे दूसरे स्थानपर क्रमश : दसगुना गिनते चलते हैं , इस प्रकार अठारहवें स्थानतक गिननेपर जो अन्तिम संख्या होती है उसका नाम परार्ध * है । परार्धको दूना करनेसे जो काल-संख्या होती है , वही प्राकृत प्रलयका समय है। उस समय सम्पूर्ण दृश्य जगत् अपने कारणभूत अव्यक्तमें लीन हो जाता है। मनुष्यका निमेष ( पलक गिरनेका काल ) मात्रा कहलाता है ; क्योंकि एक मात्रावाले अक्षरके उच्चारणमें जितना समय लगता है , उतना निमेषमें भी लगता है । पंद्रह निमेषोंकी एक काष्ठा और तीस काष्ठाकी एक कला होती है । पंद्रह कला एक नाड़ीका प्रमाण । साढ़े बारह पल ताँबेके बने हुए जलके पात्र नाड़ीका ज्ञान होता है । उस पात्रमें चार अंगुल लंबी , चार माशेकी सुवर्णमयी शलाकासे छिद्र किया जाता है । उस छिद्रको ऊपर करके जल में डुबो देनेपर जितनी देरमें वह पात्र भर जाय , वही एक नाड़ीका समय है । मगधदेशीय मापसे वह पात्र जलप्रस्थ कहलाता है । दो नाड़ीका एक मुहूर्त्त , तीस मुहूर्त्तका एक दिन - रात और तीस दिन रातका एक मास होता है । बारह मासका एक वर्ष होता है । देवलोकमें यही एक दिन - रात कहलाता है । ऐसे तीन सौ साठ वर्षोंका देवताओंका एक वर्ष होता है । बारह हजार दिव्य वर्षोंका एक चतुर्युग बताया गया है । एक हजार चतुर्युगको ब्रह्माका एक दिन कहते हैं । यही एक कल्प कहलाता है । द्विजवरो ! उस एक कल्पमें चौदह मनु बीत जाते हैं । उसके अन्तमें जो प्रलय होता है , उसको ब्राह्म या नैमित्तिक प्रलय कहते हैं अब मैं उसके भयंकर स्वरूपका वर्णन करता हूँ । इसके बाद प्राकृत प्रलयका वर्णन करूँगा । एक सहस्र चतुर्युग बीतनेपर यह भूतल प्रायः क्षीण हो जाता है । उस समय सौ वर्षोंतक अत्यन्त घोर अनावृष्टि होती है- वर्षाका अत्यन्त अभाव हो जाता है । मुनिवरो ! उस अनावृष्टिके कारण अल्प शक्तिवाले अनेकानेक पार्थिव जीव अत्यन्त पीड़ित होनेसे नष्ट हो जाते हैं । तदनन्तर रुद्ररूपधारी अविनाशी भगवान् विष्णु जगत्का संहार करनेके लिये सम्पूर्ण प्रजाको अपनेमें लीन कर लेनेका यत्न करते हैं । मुनिवरो ! उस समय भगवान् विष्णु सूर्यकी सातों किरणोंमें स्थित होकर पृथ्वीका सम्पूर्ण जल सोख लेते हैं । सम्पूर्ण प्राणियों और पृथ्वीमें स्थित समस्त जलको सोखकर वे समूची वसुधाको सुखा डालते हैं । समुद्र , नदी , पर्वतीय नदी , झरने तथा पातालोंमें जो जल होता है , वह सब वे सुखा देते हैं । तत्पश्चात् भगवान्‌के प्रभावसे और सब जगहके जलका शोषण करनेसे परिपुष्ट हुई वे सूर्यकी सात रश्मियाँ सात सूर्योके रूपमें प्रकट होती हैं । उस समय ऊपर - नीचे सब ओर जाज्वल्यमान होकर वे सातों सूर्य पाताललोकसहित सम्पूर्ण त्रिलोकीको जला डालते हैं । उन तेजस्वी सूर्योकी किरणोंसे जलती हुई त्रिलोकी पर्वत , नदी और समुद्र आदिके सहित नीरस हो जाती है । तीनों लोकोंके जल और वृक्ष दग्ध हो जानेके कारण यह पृथ्वी कछुएकी पीठकी भाँति दिखायी देती है । तदनन्तर भूतसर्गका संहार करनेवाले कालाग्निरुद्र रूपधारी श्रीहरि शेषनागके श्वासजनित तापसे नीचेके समस्त पातालोंको जलाना आरम्भ करते हैं । सातों पातालोंको भस्म कर डालनेके पश्चात् वह प्रचण्ड अग्नि भूमिपर पहुँचकर सम्पूर्ण भूमण्डलको भी भस्म कर डालती है । फिर भुवर्लोक और स्वर्लोकको जलाकर ज्वाला - मालाओंके महान् आवर्तके रूपमें वह दारुण अग्नि सब ओर चक्कर लगाने लगती । उस समय प्रचण्ड लपटोंसे घिरी हुई यह सारी त्रिलोकी जलते हुए कड़ाह - सी प्रतीत होती । तत्पश्चात् भुवर्लोक और स्वर्लोकके निवासी अत्यन्त तापसे संतप्त एवं क्षीणशक्ति होकर कहीं रहनेके लिये स्थान न होनेसे महर्लोकमें चले जाते । वहाँके लोग भी उस महान् तापसे तप्त हो वहाँसे हटकर जनलोकमें प्रवेश करते हैं । मुनिवरो ! इसके बाद रुद्ररूपधारी श्रीजनार्दन सम्पूर्ण जगत्को दग्ध करके अपने मुखके निः श्वाससे मेघोंको प्रकट करते हैं । उस समय आकाशमें घोर संवर्तक मेघ उमड़ आते हैं , जो बड़े - बड़े गजराजोंके समान प्रतीत होते हैं । वे बिजलीकी गड़गड़ाहटके साथ भयंकर गर्जना करते हैं । उनका आकार विशाल होता है , अपनी विकट गर्जनासे वे सम्पूर्ण आकाशको व्याप्त कर लेते हैं और मूसलाधार पानी बरसाकर त्रिलोकीके भीतर फैले हुए उस अत्यन्त भयंकर अग्निको पूर्णरूपसे बुझा देते हैं । रथकी धुरीके समान स्थूल धाराओंकी वर्षा करते हुए सम्पूर्ण जगत्को जलसे आप्लावित कर देते हैं । सम्पूर्ण भूतलको जलमग्न करनेके पश्चात् वे भुवर्लोकको डुबो देते हैं । उस समय संसारमें सब ओर अन्धकार छा जाता है । चर और अचर सब नष्ट जाते हैं । उस अवस्थामें वे महान् संवर्तक मेघ सौ वर्षों से अधिक कालतक वर्षा करते रहते हैं । द्विजवरो ! जब सारा जल सप्तर्षियोंके स्थानतक  पहुँचकर स्थिर होता है , उस समय सम्पूर्ण त्रिलोकी है एकार्णवमग्न हो जाती है । तदनन्तर भगवान् विष्णुके पृथ्वी निःश्वाससे प्रकट हुई वायु उन मेघोंको छिन्न - भिन्न जल कर देती है और सौ वर्षों से अधिक कालतक है बहती रहती है । फिर विश्वके आदिकारण , अनादि, अचिन्त्य एवं सर्वभूतमय भूतभावन भगवान् सम्पूर्ण वायुको पीकर एकार्णवके जलमें शेषनागकी शय्यापर आसीन होते हैं । वे आदिकर्ता भगवान् श्रीहरि ब्रह्माजीका रूप धारण करके शयन करते हैं । उस समय जनलोकके सनकादि सिद्ध उनकी स्तुति करते हैं और ब्रह्मलोकके मुमुक्ष उनका चिन्तन जल करते रहते हैं । वे परमेश्वर अपनी मायामयी दिव्य योगनिद्राका आश्रय ले अपने ही वासुदेव नामक स्वरूपका चिन्तन करते हैं । विप्रवरो ! यह नैमित्तिक नामका प्रलय है । इसमें निमित्त यही है कि उस समय ब्रह्मरूपधारी श्रीहरि शयन करते हैं । जबतक सर्वात्मा श्रीहरि जागते हैं , तबतक सारा जगत् सचेष्ट रहता है और जब वे मायामयी शय्यापर शयन करते हैं , उस समय सारा जगत् विलीन हो जाता है । ब्रह्माजीका जो सहस्र चतुर्युगका दिन होता है , एकार्णवमें शयन करनेपर उनकी उतनी ही बड़ी रात्रि होती है । रात्रिके बाद जागनेपर ब्रह्मरूपधारी अजन्मा श्रीविष्णु पुनः सृष्टि करते हैं , यह बात मैं पहले बतला चुका हूँ । यह कल्पका संहार , अन्तर प्रलय अथवा नैमित्तिक प्रलय कहा गया । अब प्राकृत प्रलयका वर्णन सुनो ।

 अनावृष्टि और अग्नि आदिके द्वारा जब सब प्राणियोंका संहार हो जाता है और सम्पूर्ण लोक तथा समस्त पाताल नष्ट हो जाते हैं , उस समय भगवान् विष्णुकी इच्छासे प्राकृत प्रलयका अवसर उपस्थित होनेपर महत्तत्त्वसे लेकर विशेषपर्यन्त सम्पूर्ण विकारोंका क्षय हो जाता है । पहले भूमिके गन्ध आदि गुणको जल अपनेमें लीन कर लेता है । गन्ध नष्ट हो जानेसे पृथ्वीका लय हो जाता । गन्धतन्मात्राका नाश हो जानेके कारण सारी पृथ्वी जलरूपमें परिणत हो जाती है । फिर तो जल बड़े वेगसे घोर शब्द करते हुए बढ़ने लगता और सम्पूर्ण जगत्‌को व्याप्त कर लेता है । वह कहीं तो स्थिर रहता है और कहीं वेगसे बहता रहता है इस प्रकार सम्पूर्ण लोक सब ओरसे तरङ्गमालाओंसे युक्त जल राशिद्वारा व्याप्त हो जाते । तत्पश्चात् जलके गुण रसको तेज पी लेता है । रसतन्मात्राका नाश होनेसे जल अत्यन्त तप्त होकर सूख जाता है । रसका अपहरण होनेसे सम्पूर्ण जल तेजः स्वरूप हो जाता है । इस प्रकार जब तेजसे आवृत होकर जल अग्निकी - सी अवस्थामें पहुँच जाता है , तब अग्नितत्त्व सब ओर फैलकर उस जलको सोख लेता है । उस समय सम्पूर्ण जगत्में धीरे - धीरे आगकी लपटें फैल जाती हैं । जब सारा जगत् ऊपर - नीचे और इधर - उधर अग्निकी ज्वालाओंसे व्याप्त हो जाता है , तब अग्निके प्रकाशक गुण रूपको वायुतत्त्व अपनेमें लीन कर लेता है सबके कारणस्वरूप वायुमें जब अग्निका प्रकाशक तत्त्व - रूप विलीन हो जाता है, तब रूपतन्मात्राके नष्ट हो जानेसे अग्नितत्त्व रूपहीन हो स्वयं ही शान्त हो जाता है । फिर वायु प्रचण्ड गतिसे चलने लगती है । तेजस्तत्त्वके वायुमें स्थित हो जानेसे जगत्में प्रकाश नहीं रह जाता तब वायुतत्त्व अपने उद्भव और लयस्थान आकाशका आश्रय ले ऊपर - नीचे , अगल - बगल एवं दसों दिशाओं में बड़े वेगसे बहने लगता है । तदनन्तर वायुके भी गुण स्पर्शको आकाश ग्रस लेता है । इससे वायु शान्त हो जाती है और केवल आवरणशून्य आकाश जाता है । वह रूप , रस , स्पर्श , गन्ध तथा आकारसे रहित परम महान् आकाश सबको व्याप्त करके प्रकाशित होता है । आकाश सब ओरसे गोल एवं छत्रस्वरूप है । शब्द उसका गुण है । वह शब्दतन्मात्रायुक्त आकाश सम्पूर्ण विश्वको आवृत किये रहता है । तत्पश्चात् आकाशको भूतादि ( तामस अहंकार ) , भूतादिको महत्त्व और इन सबके सहित महत्तत्त्वको मूल प्रकृति अपनेमें लीन कर लेती है । द्विजवरो ! न्यूनता और अधिकतासे रहित जो सत्त्वादि तीनों गुणोंकी साम्यावस्था है , उसीको प्रकृति कहते हैं । यही प्रधान भी कहलाती है प्रधान ही सम्पूर्ण सृष्टिका प्रधान कारण है । ब्राह्मणो इस प्रकार यह सम्पूर्ण प्रकृति व्यक्ताव्यक्तस्वरूपिणी है । इसमें जो व्यक्त स्वरूप है , वह अव्यक्तमें लीन होता है । द्विजवरो ! प्रकृतिसे भिन्न जो एक सिद्ध , अक्षर नित्य तथा सर्वव्यापी पुरुष है , वह भी सर्वभूतमय परमात्माका ही अंश है जो सत्तामात्रस्वरूप , ज्ञेय ज्ञानात्मा और देहात्मसंघातसे परे है , जिसमें नाम और जाति आदिकी समस्त कल्पनाएँ विलीन हो जाती हैं , वही परब्रह्म परमधाम , परमात्मा तथा परमेश्वर है । उसीको विष्णु कहते हैं । भगवान् विष्णु ही इस सम्पूर्ण विश्वके रूपमें स्थित हैं उनको प्राप्त हो जानेपर मनुष्य फिर इस संसारमें नहीं लौटता । मैंने जिस व्यक्ताव्यक्त रूपिणी प्रकृतिका वर्णन किया है , वह तथा पुरुष दोनों ही परमात्मामें लीन होते हैं । वह परमात्मा सबका आधार तथा परमेश्वर है । वेदों और वेदान्तोंमें विष्णुके नामसे उसीकी महिमाका गान किया जाता है । प्रवृत्ति ( कर्मयोग ) और निवृत्ति ( सांख्ययोग )-के भेदसे वैदिक कर्म दो प्रकारके हैं । उन दोनों ही कर्मोद्वारा मनुष्य यज्ञस्वरूप भगवान्‌की आराधना करते हैं । प्रवृत्तिमार्गके अनुयायी पुरुष ऋक् , यजुः और सामवेदोक्त मार्गोंसे यज्ञोंके स्वामी यज्ञपुरुष भगवान् पुरुषोत्तमका यजन करते हैं तथा निवृत्ति एवं योगमार्गके पथिक ज्ञानयोगके द्वारा ज्ञानात्मा , ज्ञानमूर्ति एवं मुक्तिफलदायक भगवान् विष्णुकी आराधना हैं । हस्व , दीर्घ और प्लुत स्वरोंके द्वारा जिस किसी वस्तुका प्रतिपादन किया जाता है और जो वाणीका विषय नहीं है , वह सब अविनाशी भगवान् विष्णु ही हैं । वे ही व्यक्त , वे ही अव्यक्त , वे ही अव्यय पुरुष तथा वे ही परमात्मा , विश्वात्मा और विश्वरूपधारी श्रीहरि हैं । वह व्यक्ताव्यक्त - स्वरूपिणी प्रकृति तथा पुरुष भी उन्हीं अव्याकृत परमात्मामें लीन होते हैं । ब्राह्मणो ! मैंने जो परार्धका काल बतलाया है , वह सर्वेश्वर भगवान् विष्णुका दिन कहलाता है । व्यक्त जगत्के अव्यक्त प्रकृतिमें और प्रकृतिके पुरुषमें लीन होनेपर फिर उतने ही कालकी भगवान् विष्णुकी रात्रि होती है । तपोधनो ! वास्तवमें नित्यस्वरूप परमात्मा श्रीविष्णुका न तो कोई दिन और न रात्रि ही ; तथापि केवल आरोपसे उनके विषयमें ऐसा कहा जाता है । मुनिवरो ! इस प्रकार मैंने तुमसे प्राकृत प्रलयका वर्णन किया ।

* विष्णुपुराण ६ | ३ | ४ की विष्णुचित्तीय टीकामें यह संख्या इस प्रकार बतायी गयी है – एक , दश , शत , सहस्र , अयुत , लक्ष , प्रयुत , कोटि , अर्बुद , अब्ज , खर्व , निखर्व , महापद्म , शङ्कु , समुद्र , अन्त्य , मध्य और परार्ध । उक्त श्लोककी ही टीका करते हुए श्रीधर स्वामीने वायुपुराणके कुछ श्लोक उद्धृत किये हैं , जो इस प्रकार हैं — कोटिकोटिसहस्राणि परार्धमिति कीर्त्यते । परार्धद्विगुणं चापि  परमाहुर्मनीषिणः ॥ स्थानं दशगुणं विद्यादेकं दश  शतं     ततःI सहस्रमयुतं तस्मान्नियुतं प्रयुतं ततः ॥

अर्बुदं  न्यर्बुदं  चैव  वृन्दं  चैव  ततः   परम्। खर्वं चैव निखर्वं च शङ्खं पद्मं तथैव च ॥  समुद्रो   मध्यमन्त्यश्च पराध      परमेव च I   एवमष्टादशैतानि पदानि गणनाविधौ ॥

  अर्थात् ' कोटि कोटि सहस्र १००००००००००००००००० को एक परार्ध कहते हैं । इसको दूना करनेपर एक ' पर ' होता है , ऐसा मनीषी पुरुषोंका कथन है । नीचे लिखे अङ्कोंके १८ स्थान उत्तरोत्तर दसगुने जानने चाहिये- एक , दश , शत , सहस्र , अयुत , नियुत , प्रयुत , अर्बुद , न्यर्बुद , वृन्द , खर्व , निखर्व , शङ्ख , पद्म , समुद्र , मध्य , अन्त्य तथा परार्ध । परार्धको दूना करनेसे ' पर ' होता है । विष्णुचित्तीय और श्रीधरी टीकाकी संख्याओंके नामोंमें कुछ अन्तर है — जैसे पूर्वगणनाके अनुसार ‘ नियुत ’ दस लाखका वाचक है और द्वितीय गणनाकी रीतिसे वह एक लाखका बोध कराता है, इत्यादि ।