रत्नधेनुदानकी विधि

मत्स्य उवाच

अथातः सम्प्रवक्ष्यामि महादानमनुत्तमम्।

रत्नधेन्विति विख्यातं गोलोकफलदं नृणाम्॥ १

पुण्यं दिनमथासाद्य तुलापुरुषदानवत्।

लोकेशावाहनं कृत्वा ततो धेनुं प्रकल्पयेत्॥ २

मत्स्यभगवान्ने कहा-अब मैं मनुष्योंको गोलोक प्रदान करनेवाले अत्युत्तम 'रत्नधेनु' नामक महादानकी विधिका वर्णन कर रहा हूँ। किसी पुण्य दिनके आनेपर यजमान तुलापुरुषदानकी तरह लोक- पालोंका आवाहन करनेके पश्चात् धेनुकी कल्पना करे।

भूमौ कृष्णाजिनं कृत्वा लवणद्रोणसंयुतम्।

धेनुं रत्नमयीं कुर्यात् सङ्कल्प्य विधिपूर्वकम्॥ ३

स्थापयेत् पद्मरागाणामेकाशीतिं मुखे बुधः ।

पुष्परागशतं तद्वद् घोणायां परिकल्पयेत्॥ ४

ललाटे हेमतिलकं मुक्ताफलशतं दृशोः ।

भ्रूयुगे विद्रुमशतं शुक्ती कर्णद्वये स्मृते॥ ५

काञ्चनानि च शृङ्गाणि शिरो वज्रशतात्मकम्।

ग्रीवायां नेत्रपटलं गोमेदकशतान्वितम्॥ ६

इन्द्रनीलशतं पृष्ठे वैदूर्यशतपार्श्वके।

स्फाटिकैरुदरं तद्वत् सौगन्धिकशतैः कटिम्॥ ७

खुरा हेममया: कार्याः पुच्छं मुक्तावलीमयम्।

सूर्यकान्तेन्दुकान्तौ च घ्राणे कर्पूरचन्दने॥ ८

कुङ्कुमानि च रोमाणि रौप्यनाभिंच कारयेत्।

गारुत्मतशतं तद्वदपाने परिकल्पयेत्॥ ९

तथान्यानि च रत्नानि स्थापयेत् सर्वसन्धिषु ।

कुर्याच्छर्करया जिह्वां गोमयं च गुडात्मकम्॥१०

गोमूत्रमाज्येन तथा दधिदुग्धे स्वरूपतः।

पुच्छाग्रे चामरं दद्यात् समीपे ताम्रदोहनम्॥११

कुण्डलानि च हैमानि भूषणानि च शक्तितः।

कारयेदेवमेवं तु चतुर्थांशेन वत्सकम्॥१२

तथा धान्यानि सर्वाणि पादाश्चक्षुमयाः स्मृताः।

नानाफलानि सर्वाणि पञ्चवर्णं वितानकम्॥१३

एवं विरचनं कृत्वा तद्वद्धौमाधिवासनम्।

ऋत्विग्भ्यो दक्षिणां दद्याद्धेनुमामन्त्रयेत् ततः।

गुडधेनुवदावाह्य इह चोदाहरेत् ततः॥१४

त्वां सर्वदेवगणधाम यतः पठन्ति

रुद्रेन्द्रसूर्यकमलासनवासुदेवाः

तस्मात् समस्तभुवनत्रयदेहयुक्ता

मां पाहि देवि भवसागरपीड्यमानम्॥१५॥

पृथ्वीपर कृष्णमृगचर्म बिछाकर उसपर एक द्रोण लवण रखकर उसके ऊपर विधिपूर्वक संकल्पसहित रत्नमयी धेनुको स्थापित करे। बुद्धिमान् पुरुष उसके मुख में इक्यासी पद्मराग मणि तथा थूथुनमें इक्यासी पुष्पराग (पुखराज) स्थापित करे। उस गौके ललाटपर सोनेका तिलक लगावे। उसकी दोनों आँखोंमें सौ मुक्ता (मोती), दोनों भौंहोंपर सौ प्रवाल (मूंगा) और दोनों कानोंकी जगह दो शुक्तियाँ (सी) लगानी चाहिये। उसके सींग सोनेके होने चाहिये। सिरकी जगह सौ हीरोंको स्थापित करना चाहिये। कण्ठ और नेत्र-पलकोंमें सौ गोमेदक, पृष्ठभागमें सौ इन्द्रनील (नीलम), दोनों पार्श्वस्थानोंमें सौ वैदू (डू)-र्य (बिलौर), उदरपर स्फटिक तथा कटिदेशपर सौ सौगन्धिक (माणिक-लाल) मणि रखना चाहिये। खुरोंको स्वर्णमय, पूँछको मुक्ता (मोतियों)- की लड़ियोंसे युक्त और दोनों नाकोंको सूर्यकान्त तथा चन्द्रकान्त मणियोंसे बनाकर कर्पूर और चन्दनसे अर्चित करना चाहिये। रोमोंको केसर और नाभिको चाँदीसे बनवाये। गुदामें सौ लाल मणियोंको लगाना चाहिये। अन्य रत्नोंको संधिभागोंपर लगाना चाहिये। जीभको शक्करसे, गोबरको गुड़से और गोमूत्रको घीसे बनवाना चाहिये। दही-दूध प्रत्यक्ष ही रखे। पूँछके अग्रभागपर चमर तथा समीपमें ताँबेकी दोहनी रखनी चाहिये ॥१-११॥

अपनी आर्थिक शक्तिके अनुसार उसे सोनेसे निर्मित आभूषण और कुण्डल पहनाने चाहिये, उसके ईखके पैर होने चाहिये। इसी प्रकार गौके चतुर्थांशसे बछड़ा बनवाना चाहिये। उस गौके समीप सभी प्रकारके अन्न, विविध फल, पँचरंगा वितान भी यथास्थान रखना चाहिये। इस प्रकार गौकी रचना, हवन और अधिवासन करनेके बाद ऋत्विजोंको दक्षिणा देनी चाहिये। इसके बाद धेनुको आमन्त्रित करे। उस समय गुड़धेनुकी तरह आवाहन कर यह कहना चाहिये-'देवि! चूँकि रुद्र, इन्द्र, सूर्य, ब्रह्मा, विष्णु-ये सभी तुम्हें सम्पूर्ण देवताओंका निवासस्थान मानते हैं तथा समस्त त्रिभुवन तुम्हारे ही शरीरमें व्याप्त हैं, अतः तुम भवसागरसे पीड़ित मेरा उद्धार करो।'

आमन्त्र्य चेत्थमभितः परिवृत्य भक्त्या

दद्याद् द्विजाय गुरवे जलपूर्विकां ताम्।

यः पुण्यमाप्य दिनमत्र कृतोपवासः

पापैर्विमुक्ततनुरेति पदं मुरारेः॥१६

इति सकलविधिज्ञो रत्नधेनुप्रदानं

वितरति स विमानं प्राप्य देदीप्यमानम्।

सकलकलुषमुक्तो बन्धुभिः पुत्रपौत्रैः

स हि मदनसरूपः स्थानमभ्येति शम्भोः॥१७

इस प्रकार आमन्त्रित करनेके बाद गौकी परिक्रमा कर भक्तिपूर्वक हाथमें जल लेकर उस गौको ब्राह्मण गुरुको दान करना चाहिये। जो व्यक्ति इस प्रकार पुण्य दिन आनेपर उपवासकर यह दान करता है, उसका शरीर पापोंसे मुक्त हो जाता है और वह भगवान् मुरारिके परमपदको प्राप्त करता है। इस प्रकार सम्पूर्ण विधियोंको जाननेवाला जो पुरुष इस रत्नधेनुका दान करता है, वह  म्पूर्ण पापोंसे मुक्त होकर कामदेव-सदृश सौन्दर्यशाली हो जाता है तथा अपने बन्धुओं, पुत्रों और पौत्रोंके साथ देदीप्यमान विमानपर सवार हो, शिवके लोक (कैलास या सुमेरुस्थित दिव्य शिवधाम)-को प्राप्त करता है ॥ १२ -१७॥

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे महादानानुकीर्तने रत्नधेनुप्रदानविधिर्नामाष्टाशीत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २८८॥

इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके महादानवर्णन-प्रसङ्गमें रत्नधेनुदान नामक दो सौ अठासीवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ। २८८॥