मत्स्य महा पुराण
राजा ययातिका विषय-सेवन और वैराग्य तथा पूरुका राज्यभिषेक करके वनमें जाना
शौनक उवाच
वयसा
एवमुक्तः स राजर्षिः काव्यं स्मृत्वा महाव्रतम्।
संक्रामयामास जरां तदा पुत्रे महात्मनि॥ १
पौरवेणाथ
ययातिर्नहुषात्मजः।
प्रीतियुक्तो नरश्रेष्ठश्चचार विषयान् प्रियान्॥ २
यथाकामं यथोत्साहं यथाकालं यथासुखम्।
धर्माविरुद्धान् राजेन्द्रो यथार्हति स एव हि॥ ३
देवानतर्पयद् यज्ञैः श्राद्धैरपि पितामहान्।
दीनाननुग्रहैरिष्टैः कामैश्च द्विजसत्तमान्॥ ४
अतिथीनन्नपानैश्च विशश्च प्रतिपालनैः ।
अनृशंस्येन शूद्रांश्च दस्यून् निग्रहणेन च॥ ५
धर्मेण च प्रजाः सर्वा यथावदनुरञ्जयन्।
ययातिः पालयामास साक्षादिन्द्र इवापरः॥ ६
स राजा सिंहविक्रान्तो युवा विषयगोचरः।
अविरोधेन धर्मस्य चचार सुखमुत्तमम्॥ ७
ससम्प्राप्य शुभान्कामांस्तृप्तः खिन्नश्च पार्थिवः।
कालं वर्षसहस्रान्तं सस्मार मनुजाधिपः॥ ८
परिचिन्त्य स कालज्ञः कला: काष्ठाश्च वीर्यवान्।
पूर्णं मत्वा ततः कालं पूरुं पुत्रमुवाच ह॥ ९
न जातु कामः कामानामुपभोगेन शाम्यति।
हविषा कृष्णवर्मेव भूय एवाभिवर्धते॥१०
शौनकजी कहते हैं-शतानीक! पूरुके ऐसा कहनेपर राजर्षि ययातिने महान् व्रतपरायण शुक्राचार्यका स्मरण कर अपने महात्मा पुत्र पूरुके शरीरमें अपनी वृद्धावस्थाका संक्रम कराया (और उसकी युवावस्था स्वयं ले ली) । नहुषके पुत्र नरश्रेष्ठ ययातिने पूरुकी युवावस्थासे अत्यन्त प्रसन्न होकर अभीष्ट विषय-भोगोंका सेवन आरम्भ किया। उन राजेन्द्रकी जैसी कामना होती, जैसा उत्साह होता और जैसा समय होता, उसके अनुसार वे सुखपूर्वक धर्मानुकूल भोगोंका उपभोग करते थे। वास्तवमें उसके योग्य वे ही थे। उन्होंने यज्ञोंद्वारा देवताओंको, श्राद्धोंसे पितरोंको, इच्छाके अनुसार अनुग्रह करके दीन-दुःखियोंको और मुँहमाँगी भोग्य वस्तुएँ देकर श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको तृप्त किया। वे अतिथियोंको अन्न और जल देकर, वैश्योंको उनकेधन-वैभवकी रक्षा करके, शूद्रोंको दयाभावसे, लुटेरोंको कैद करके तथा सम्पूर्ण प्रजाको धर्मपूर्वक संरक्षणद्वारा प्रसन्न रखते थे। इस प्रकार साक्षात् दूसरे इन्द्रके समान राजा ययातिने समस्त प्रजाका पालन किया। वे राजा सिंहके समान पराक्रमी और नवयुवक थे। सम्पूर्ण विषय उनके अधीन थे और वेधर्मका विरोध न करते हुए उत्तम सुखका उपभोग करते थे। वे नरेश शुभ भोगोंको प्राप्त करके पहले तो तृप्त एवं आनन्दित होते थे, परंतु जब यह बात ध्यानमें आती कि ये हजार वर्ष भी पूरे हो जायेंगे, तब उन्हें बड़ाखेद होता था।कालतत्त्वको जाननेवाले पराक्रमी राजा ययाति एक-एक कला और काष्ठाकी गिनती कर एक हजार वर्षके समयकी अवधिका स्मरण रखते थे। जब उन्होंने देखा कि अब समय पूरा हो गया, तब वे अपने पुत्र पूरुके पास आकर बोले-'शत्रुदमन पुत्र! मैंने तुम्हारी जवानीके द्वारा अपनी रुचि, उत्साह और समयके अनुसार विषयोंका सेवन किया; परंतु विषयोंकी कामना उन विषयोंके उपभोगसे कभी शान्त नहीं होती, अपितु घीकी आहुति पड़नेसे अग्निकी भाँति वह अधिकाधिक बढ़ती ही जाती है।
यत् पृथिव्यां व्रीहियवं हिरण्यं पशवः स्त्रियः।
नालमेकस्य तत् सर्वमिति मत्वा शमं व्रजेत्॥११
यथासुखं यथोत्साहं यथाकाममरिंदम।
सेविता विषयाः पुत्र यौवनेन मया तव॥१२
पूरो प्रीतोऽस्मि भद्रं ते गृहाणेदं स्वयौवनम्।
राज्यं चैव गृहाणेदं त्वं हि मे प्रियकृत् सुतः॥१३
शौनक उवाच
प्रतिपेदे जरां राजा ययाति हुषस्तदा।
यौवनं प्रतिपेदे स पूरुः स्वं पुनरात्मनः॥१४
अभिषेक्तुकामं च नृपं पूरुं पुत्रं कनीयसम्।
ब्राह्मणप्रमुखा वर्णा इदं वचनमब्रुवन्॥१५
कथं शुक्रस्य दौहित्रं देवयान्याः सुतं प्रभो।
ज्येष्ठं यदुमतिक्रम्य राज्यं पूरोः प्रदास्यसि॥१६
ज्येष्ठो यदुस्तव सुतस्तुर्वसुस्तदनन्तरम्।
शर्मिष्ठायाः सुतो द्रुह्युस्तथानुः पूरुरेव च ॥१७
कथं ज्येष्ठमतिक्रम्य कनीयान् राज्यमर्हति।
एतत् सम्बोधयामस्त्वां स्वधर्ममनुपालय॥१८
ययातिरुवाच
ब्राह्मणप्रमुखा वर्णाः सर्वे शृण्वन्तु मे वचः।
ज्येष्ठं प्रति यतो राज्यं न देयं मे कथंचन॥१९
मम ज्येष्ठेन यदुना नियोगो नानुपालितः।
प्रतिकूलः पितुर्यश्च न स पुत्रः सतां मतः ।। २०
मातापित्रोर्वचनकृद्धितः पथ्यश्च यः सुतः ।
स पुत्रः पुत्रवद् यश्च वर्तते पितृमातृषु॥२१
यदुनाहमवज्ञातस्तथा तुर्वसुनापि वा।
द्रुह्युणा चानुना चैव मय्यवज्ञा कृता भृशम्॥२२
पूरुणा मे कृतं वाक्यं मानितश्च विशेषतः।
कनीयान् मम दायादो जरा येन धृता मम॥२३
मम कामः स च कृतः पूरुणा पुत्ररूपिणा।
शुक्रेण च वरो दत्तः काव्येनोशनसा स्वयम्॥ २४
पुत्रो यस्त्वानुवर्तेत स राजा पृथिवीपतिः।
भवन्तः प्रतिजानन्तु पूरुं राज्येऽभिषिच्यताम्॥ २५
इस पृथ्वीपर जितने भी धान, जौ, सुवर्ण, पशु और स्त्रियाँ हैं, वे सब एक मनुष्यके लिये भी पर्याप्त नहीं हैं, ऐसा मानकर शान्ति धारण कर लेना चाहिये।पूरो! तुम्हारा भला हो, मैं प्रसन्न हूँ। तुम अपनी यह जवानी ले लो। साथ ही यह राज्य भी अपने अधिकारमें कर लो; क्योंकि तुम मेरा प्रिय करनेवाले पुत्र हो' ॥१-१३॥
शौनकजी कहते हैं-शतानीक! उस समय नहुषनन्दन राजा ययातिने अपनी वृद्धावस्था वापस ले ली और पूरुने पुनः अपनी युवावस्था प्राप्त कर ली। जब ब्राह्मण आदि वर्णोंने देखा कि महाराज ययाति अपने छोटे पुत्र पूरुको राजाके पदपर अभिषिक्त करना चाहते हैं, तब उनके पास आकर इस प्रकार बोले-'प्रभो! शुक्राचार्यके नाती और देवयानीके ज्येष्ठ पुत्र यदुके होते हुए उन्हें लाँघकर आप पूरुको राज्य क्यों देते हैं? यदु आपके ज्येष्ठ पुत्र हैं। उनके बाद तुर्वसु उत्पन्न हुए। तदनन्तर शर्मिष्ठाके पुत्र क्रमशः द्रुह्यु अनु और पूरु हैं। ज्येष्ठ पुत्रोंका उल्लङ्घन करके छोटा पुत्र राज्यका अधिकारी कैसे हो सकता है? हम आपको इस बातका स्मरण दिला रहे हैं। आप धर्मका पालन कीजिये'॥ १४-१८॥
ययातिने कहा-ब्राह्मण आदि सब वर्णके लोग मेरी बात सुनें, मुझे ज्येष्ठ पुत्रको किसी तरह राज्य नहीं देना है। मेरे ज्येष्ठ पुत्र यदुने मेरी आज्ञाका पालन नहीं किया है। जो पिताके प्रतिकूल हो, वह सत्पुरुषोंकी दृष्टिमें पुत्र नहीं माना गया है। जो माता और पिताकी आज्ञा मानता है, उनका हित चाहता है, उनके अनुकूल चलता है तथा माता-पिताके प्रति पुत्रोचित बर्ताव करता है, वही वास्तवमें पुत्र है। यदुने मेरी अवहेलना की है, तुर्वसु, द्रुघु तथा अनुने भी मेरा बड़ा तिरस्कार किया है। (और) पूरुने मेरी आज्ञाका पालन किया, मेरी बातको अधिक आदर दिया है, इसीने मेरा बुढ़ापा ले रखा था; अत: मेरा यह छोटा पुत्र ही वास्तवमें मेरे राज्य और धनको पानेका अधिकारी है। पूरुने पुत्ररूप होकर मेरी कामनाएँ पूर्ण की हैं। स्वयं शुक्राचार्यने मुझे वर दिया है कि 'जो पुत्र तुम्हारा अनुसरण करे वही राजा एवं समस्त भूमण्डलका पालक हो।' अतः मैं आपलोगोंसे विनयपूर्ण आग्रह करता हूँ कि पूरुको ही राज्यपर अभिषिक्त करें॥१९-२५॥
प्रकृतय ऊचुः
यः पुत्रो गुणसम्पन्नो मातापित्रोर्हितः सदा।
सर्वं सोऽर्हति कल्याणं कनीयानपि स प्रभुः ॥ २६
अहं पूरोरिदं राज्यं यः प्रियः प्रियकृत् तव।
वरदानेन शुक्रस्य न शक्यं वक्तुमुत्तरम्॥ २७
शौनक उवाच
पौरजानपदैस्तुष्टैरित्युक्तो नाहुषस्तदा।
अभिषिच्य ततः पूरुं राज्ये स्वसुतमात्मजम्॥ २८
दत्त्वा च पूरवे राज्यं वनवासाय दीक्षितः ।
पुरात् स निर्ययौ राजा ब्राह्मणैस्तापसैः सह।। २९
यदोस्तु यादवा जातास्तुर्वसोर्यवनाः सुताः।
द्रुह्योश्चैव सुता भोजा अनोस्तु म्लेच्छजातयः॥३०
पूरोस्तु पौरवो वंशो यत्र जातोऽसि पार्थिव।
इदं वर्षसहस्रात् तु राज्यं कुरु कुलागतम्॥३१
प्रजावर्गके लोग बोले-जो पुत्र गुणवान् और सदा माता-पिताका हितैषी हो, वह छोटा होनेपर भी श्रेष्ठतम है। वही सम्पूर्ण कल्याणका भागी होने योग्य है। पूरु आपका प्रिय करनेवाले पुत्र हैं, अत: शुक्राचार्यके वरदानके अनुसार ये ही इस राज्यको पानेके अधिकारी हैं। इस निश्चयके विरुद्ध अब कुछ भी उत्तर नहीं दिया जा सकता॥२६-२७॥
शौनकजी कहते हैं- नगर और राज्यके लोगोंने संतुष्ट होकर जब इस प्रकार कहा, तब नहुषनन्दन ययातिने अपने पुत्र पूरुको ही अपने राज्यपर अभिषिक्त किया। इस प्रकार पूरुको राज्य दे वनवासकी दीक्षा लेकर राजा ययाति तपस्वी ब्राह्मणोंके साथ नगरसे बाहर निकल गये। यदुसे यादव क्षत्रिय उत्पन्न हुए, तुर्वसुकी संतान (सीमान्तसे लेकर यूनानतकके निवासी) यवन कहलायी, द्रुह्युके पुत्र भोज नामसे प्रसिद्ध हुए और अनुसे म्लेच्छ जातियाँ उत्पन्न हुईं। राजन् ! पूरुसे पौरव वंश चला, जिसमें तुम उत्पन्न हुए हो। हजारों वर्षों से यह राज्य कुरुकुलमें सम्मिलित हो गया है, अर्थात् यह कुरुवंश नामसे प्रसिद्ध हो गया है॥२८-३१ ॥
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे ययातिच चरिते चतुस्त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३४॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें ययाति-चरित्र-वर्णन नामक चौंतीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥३४॥
Summary of chapter 34 of the Matsya Mahā Purana is as follows:
Bhagavān Matsya details how King Yayāti, reinvigorated with Puru's youth, spent a thousand years enjoying all manner of earthly and celestial sensory delights alongside Devayānī in full righteousness. At the end of this vast period, King Yayāti realized the ultimate truth of material existence that sensory desires are never extinguished by indulgence, but rather burn brighter like fire fed with ghee. Realizing the impermanence of worldly pleasure, King Yayāti returned the youth back to Puru, reclaimed his own original old age, and declared Puru as the rightful heir to the throne despite his younger age, owing to his unparalleled filial devotion. King Yayāti performed the coronation of King Puru, assigned outlying territories to his elder sons, and prepared to renounce his kingdom for the forest.