मत्स्य महा पुराण
विश्वचक्रदानकी विधि
मत्स्य उवाच
अथातः सम्प्रवक्ष्यामि महादानमनुत्तमम्।
विश्वचक्रमिति ख्यातं महापातकनाशनम्॥ १ |
तपनीयस्य शुद्धस्य विश्वचक्रं तु कारयेत्।
श्रेष्ठं पलसहस्रेण तदर्धेन तु मध्यमम्॥ २
मत्स्यभगवान्ने कहा-अब इसके बाद मैं महापातकनाशी एवं अत्यन्त श्रेष्ठ विश्वचक्र नामक महादानकी विधि बतला रहा हूँ। यह विश्वचक्र तपाये हुए शुद्ध स्वर्णका बनवाना चाहिये। यह विश्वचक्र एक सहम पल सुवर्णका उत्तम, पाँच सौ पलका मध्यम और
तस्यार्धेन कनिष्ठं स्याद् विश्वचक्रमुदाहृतम्।
अन्यद् विंशत् पलादूर्ध्वमशक्तोऽपि निवेदयेत्॥ ३
षोडशारं ततश्चक्रं भ्रमन्नेम्यष्टकावृतम्।
नाभिपद्मे स्थितं विष्णुं योगारूढं चतुर्भुजम्॥ ४
शङ्खचक्रेऽस्य पार्श्वे तु देव्यष्टकसमावृतम्।
द्वितीयावरणे तद्वत् पूर्वतो जलशायिनम्॥ ५
अत्रि गुर्वसिष्ठश्च ब्रह्मा कश्यप एव च।
मत्स्यः कूर्मो वराहश्च नरसिंहोऽथ वामनः॥ ६
रामो रामश्च कृष्णश्च बुद्धः कल्कीति वै क्रमात्।
तृतीयावरणे गौरी मातृभिर्वसुभिर्युता॥ ७
चतुर्थे द्वादशादित्या वेदाश्चत्वार एव च।
पञ्चमे पञ्च भूतानि रुद्राश्चैकादशैव तु॥ ८
लोकपालाष्टकं षष्ठे दिङ्मातङ्गास्तथैव च।
सप्तमेऽस्त्राणि सर्वाणि मङ्गलानि च कारयेत्॥ ९
अन्तरान्तरतो देवान् विन्यसेदष्टमे पुनः ।
तुलापुरुषवच्छेषं समंतात् परिकल्पयेत्॥१०
ऋत्विङ्मण्डपसम्भारभूषणाच्छादनादिकम् ।
विश्वचक्रं ततः कुर्यात् कृष्णाजिनतिलोपरि॥११
तथाष्टादश धान्यानि रसांश्च लवणादिकान्।
पूर्णकुम्भाष्टकं चैव वस्त्राणि विविधानि च॥१२
माल्येक्षुफलरत्नानि वितानं चापि कारयेत्।
ततो मङ्गलशब्देन स्नातः शुक्लाम्बरो गृही।
होमाधिवासनान्ते वै गृहीतकुसुमाञ्जलिः॥१३
इममुच्चारयेन्मन्त्रं त्रिः कृत्वा तु प्रदक्षिणम्।
नमो विश्वमयायेति विश्वचक्रात्मने नमः॥१४
परमानन्दरूपी त्वं पाहि नः पापकर्दमात्।
तेजोमयमिदं यस्मात् सदा पश्यन्ति योगिनः॥१५
हृदि तत्त्वं गुणातीतं विश्वचक्रं नमाम्यहम्।
वासुदेवे स्थितं चक्रं चक्रमध्ये तु माधवः ।। १६
अन्योन्याधाररूपेण प्रणमामि स्थिताविह।
विश्वचक्रमिदं यस्मात् सर्वपापहरं परम्॥१७
ढाई सौ पलका कनिष्ठ कहा गया है। अल्प वित्तवाला मनुष्य अन्य प्रकारसे बीस पलसे ऊपरका बना हुआ विश्वचक्र दान कर सकता है। यह चक्र सोलह अरों तथा आठ नेमियोंसे युक्त घूमता हुआ होना चाहिये। उसके नाभि-कमलपर योगारूढ़ चतुर्भुज विष्णुको स्थापित करना चाहिये। उनके बगलमें शङ्ख और चक्र हों तथा आठ देवियाँ उन्हें चारों ओरसे घेरे हुए उसके दूसरे आवरणमें उसी प्रकार जलशायी, अत्रि, भृगु, वसिष्ठ, ब्रह्मा, कश्यप, मत्स्य, कूर्म, वराह, नरसिंह, वामन, रामचन्द्र, परशुराम, कृष्ण, बुद्ध और कल्किको, तीसरे आवरणमें मातृकाओं तथा वसुओंसहित गौरीको, चतुर्थ आवरणमें बारहों आदित्यों तथा चारों वेदोंको, पाँचवें आवरणमें पाँचों महाभूतों तथा ग्यारहों रुद्रको, छठे आवरणमें आठों लोकपालों तथा दिग्गजोंको, सप्तम आवरणमें सभी प्रकारके माङ्गलिक अस्त्रोंको तथा अष्टम आवरणमें थोड़े-थोड़े अन्तरपर देवताओंको स्थापित करे। शेष कार्य तुला-पुरुष-दानकी तरह करना चाहिये। उसी तरह ऋत्विज्, मण्डप, पूजन-सामग्री, भूषण और आच्छादन आदिको भी रखना चाहिये। फिर उक्त विश्वचक्रको कृष्णमृगचर्मपर रखे गये तिलके ऊपर स्थापित करना चाहिये ॥१-११॥
फिर अठारह प्रकारके अन्न, लवण आदि सभी रस, जलसे भरे हुए आठ माङ्गलिक कलश, विविध प्रकारके वस्त्र, पुष्पमाला, ईख, फल, रत्न, वितान- इन सबको भी यथास्थान रखना चाहिये। तदनन्तर माङ्गलिक शब्दोंके साथ गृहस्थ यजमान स्नान करके श्वेत वस्त्र धारणकर हवन एवं अधिवासनके उपरान्त अञ्जलिमें पुष्प ग्रहणकर तीन बार प्रदक्षिणा करे और इस मन्त्रका उच्चारण करे-'विश्वमयको नमस्कार है। विश्वचक्रात्माको प्रणाम है। तुम परमानन्दस्वरूप हो, अतः पापरूप कीचड़से हमारी रक्षा करो। चूँकि इस तत्त्वस्वरूप, गुणातीत, तेजोमय विश्वचक्रको योगीलोग सदा अपने हृदयमें देखते हैं, अतः मैं तुम्हें नमस्कार करता हूँ। यह विश्वचक्र वासुदेवमें स्थित है और माधव इस चक्रके मध्य भागमें स्थित हैं, इस प्रकार तुम दोनों अन्योन्याधाररूपसे स्थित हो, तुम्हें मैं प्रणाम करता हूँ। चूँकि यह विश्वचक्र सम्पूर्ण पातकोंका विनाश करनेवाला,
आयुधं चापि वासश्च भवादुद्धर मामतः।
इत्यामन्त्र्य च यो दद्याद् विश्वचक्रं विमत्सरः॥१८
विमुक्तः सर्वपापेभ्यो विष्णुलोके महीयते।
वैकुण्ठलोकमासाद्य चतुर्बाहुः सनातनः ॥१९
सेव्यतेऽप्सरसां सङ्घस्तिष्ठेत् कल्पशतत्रयम्।
प्रणमेद् वाथ यः कृत्वा विश्वचक्रं दिने दिने।
तस्यायुर्वर्धते नित्यं लक्ष्मीश्च विपुला भवेत्॥ २०
इति सकलजगत्सुराधिवासं
वितरति यस्तपनीयषोडशारम्।
हरिभवनमुपागतः स सिद्ध-
श्चिरमभिगम्य नमस्यते शिरोभिः॥२१
असुदर्शनतां प्रयाति शत्रो-
मदनसुदर्शनतां च कामिनीभ्यः।
स सुदर्शनकेशवानुरूपः
कनकसुदर्शनदानदग्धपापः ॥२२
कृतगुरुदुरितानि षोडशार-
प्रवितरणे प्रवराकृतिर्मुरारेः।
अभिभवति भवोद्भवन्ति भित्त्वा
भवमभितो भवने भयानि भूयः॥ २३
भगवान्का आयुध तथा उनका निवासस्वरूप भी है, अतः इस भवसे मेरा उद्धार करें।' इस प्रकार आमन्त्रित करके जो मनुष्य मत्सररहित हो इस विश्वचक्रका दान करता है, वह सभी पापोंसे छूटकर विष्णुलोकमें पूजित होता है तथा वैकुण्ठलोकको प्राप्तकर चार भुजाओंसे युक्त और अविनाशी हो जाता है तथा अप्सरासमूहोंद्वारा सेवित होकर तीन सौ कल्पोंतक वहाँ निवास करता है। अथवा जो व्यक्ति इस विश्वचक्रका निर्माण कर इसे प्रतिदिन प्रणाम करता है, उसकी आयु बढ़ती है और नित्य लक्ष्मीकी वृद्धि होती है। इस प्रकार जो व्यक्ति सुवर्णनिर्मित सोलह अरोंसे युक्त तथा समस्त जगत् एवं देवताओंके अधिष्ठानरूप इस चक्रको वितरित करता है, वह विष्णु-भवनको प्राप्त होता है तथा उसे सिद्धगण सिर झुकाकर नमस्कार करते हैं। वह पुरुष स्वर्णनिर्मित सुदर्शनके दानसे निष्पाप होकर शत्रुओंको विकराल रूपमें तथा कामिनियोंको मदनकी भाँति सुन्दर कमनीयरूपमें दिखायी पड़ता है और शुभदर्शन केशवकी भाँति मनोरम स्वरूप धारण करता है। इस सोलह अरोंवाले सुवर्णनिर्मित चक्रके दान करनेसे किये गये महापाप शीघ्र ही नष्ट हो जाते हैं और कर्ता मुरारिकी श्रेष्ठ आकृति प्राप्त करता है तथा भव-भयका भेदन कर बार-बार जन्म-मरणके भयसे भी छूट जाता है॥१२-२३॥
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे महादानानुकीर्तने विश्वचक्रप्रदानविधिर्नाम पञ्चाशीत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २८५॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें महादान-वर्णन-प्रसंगमें विश्वचक्रादान-विधि नामक दो सौ पचासीवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २८५ ॥
Summary of chapter 288 of the Matsya Mahā Purana is as follows:
Bhagavān Matsya details the procedure for Kalpalatā-dāna, the fourteenth Mahādāna featuring ten golden wish-fulfilling creepers adorned with golden leaves, flowers, fruit clusters, and bird icons. Bhagavān Matsya describes arranging the golden creepers upon a sanctified wooden altar, worshipping them as the embodiments of divine grace and prosperity. The donor presents the golden creepers along with garments, copper vessels, and ritual honorariums to pious Vedic scholars, securing continuous family prosperity, artistic mastery, and eternal joy in heavenly realms.