वृक्षजन्य उत्पातके लक्षण और उनकी शान्तिके उपाय

गर्ग उवाच

पुरेषु येषु दृश्यन्ते पादपा देवचोदिताः।

रुदन्तो वा हसन्तो वा स्रवन्तो वा रसान् बहून्॥१

अरोगा वा विना वातं शाखां मुञ्चन्त्यथ द्रुमाः।

फलं पुष्पं तथाकाले दर्शयन्ति त्रिहायनाः॥२

पूर्ववत् स्वं दर्शयन्ति फलं पुष्पं तथान्तरे।

क्षीरं स्नेहं तथा रक्तं मधु तोयं स्रवन्ति च॥३

शुष्यन्त्यरोगाः सहसा शुष्का रोहन्ति वा पुनः ।

उत्तिष्ठन्तीह पतिताः पतन्ति च तथोत्थिताः॥४

तत्र वक्ष्यामि ते ब्रह्मन् विपाकं फलमेव च।

गर्गजीने कहा-ब्रह्मन्! जिन ग्रामोंमें दैव-प्रेरित वृक्ष अपने-आप रोते, हँसते, प्रचुर परिमाणमें रस बहाते हुए किसी रोग अथवा वायुके बिना डालियाँ गिराते हैं, तीन ही वर्षके वृक्ष असमयमें फलने-फूलने लगते  हैं, अन्यत्र कोई-कोई वृक्ष ऋतुकालकी भाँति अपनेको फलों और पुष्पोंसे लदे हुए दिखलाते हैं तथा दुग्ध, तैल, रक्त, मधु और जल बहाते हैं, किसी रोगके बिना ही सहसा सूख जाते हैं अथवा सूखे हुए पुनः अङ्कुरित हो जाते हैं, गिरे हुए उठकर खड़े हो जाते हैं तथा खड़े हुए गिर पड़ते हैं, वहाँ होनेवाला परिणाम और फल मैं आपको बतला रहा हूँ, सुनिये ॥१-४३ ॥

रोदने व्याधिमभ्येति हसने देशविभ्रमम्॥ ५

शाखाप्रपतनं कुर्यात् संग्रामे योधपातनम्।

बालानां मरणं कुर्युरकाले पुष्पिता द्रुमाः॥ ६

स्वराष्ट्रभेदं कुरुते फलपुष्पमथान्तरे।

क्षयः सर्वत्र गोक्षीरे स्नेहे दुर्भिक्षलक्षणम्॥ ७

वाहनापचयं मद्ये रक्ते संग्राममादिशेत्।

मधुस्रावे भवेद् व्याधिर्जलस्रावे न वर्षति॥

अरोगशोषणं ज्ञेयं ब्रह्मन् दुर्भिक्षलक्षणम्।

शुष्केषु सम्प्ररोहस्तु वीर्यमन्नं च हीयते॥ ९

उत्थाने पतितानां च भयं भेदकरं भवेत्।

स्थानात् स्थानं तु गमने देशभङ्गस्तथा भवेत्॥१०

ज्वलत्स्वपि च वृक्षेषु रुदत्स्वपि धनक्षयम्।

एतत्पूजितवृक्षेषु सर्वं राज्ञो विपद्यते॥११

पुष्पे फलेवा विकृते राज्ञो मृत्यु तथाऽऽदिशेत्।

अन्येषु चैव वृक्षेषु वृक्षोत्पातेष्वतन्द्रितः॥१२

आच्छादयित्वा तं वृक्षं गन्धमाल्यैर्विभूषयेत्।

वृक्षोपरि तथा च्छत्रं कुर्यात् पापप्रशान्तये॥१३

शिवमभ्यर्चयेद् देवं पशुं चास्मै निवेदयेत्।

रुद्रेभ्य इति वृक्षेषु हुत्वा रुद्रं जपेत् ततः॥१४

मध्वाज्ययुक्तेन तु पायसेन

सम्पूज्य विप्रांश्च भुवं च दद्यात्।

गीतेन नृत्येन तथार्चयेत्तु

देवं हरं पापविनाशहेतोः॥१५

ब्रह्मन्! वृक्षोंके रुदन करनेपर व्याधियाँ फैलती हैं, हँसनेपर देशमें संकटकी वृद्धि होती है, शाखाओंके गिरनेसे संग्राममें योद्धाओंका विनाश होता है, असमयमें फूले हुए वृक्ष बालकोंकी मृत्यु सूचित करते हैं, वृक्षसमूहोंमेंसे किसी-किसीके फलने-फूलनेपर अपने राष्ट्रमें भेद उत्पन्न होता है, गायके दूध गिरनेसे चारों ओर विनाश उपस्थित होता है, तेलका गिरना दुर्भिक्षका लक्षण है, मदिराके गिरनेसे वाहनोंका विनाश होता है, रक्त गिरनेपर संग्राम बतलाना चाहिये, मधु चूनेसे व्याधियाँ फैलती हैं, जल गिरनेसे वृष्टि नहीं होती। किसी रोगके बिना वृक्षोंका सूख जाना दुर्भिक्षका लक्षण जानना चाहिये। सूखे हुए वृक्षसे अंकुर फूटनेपर वीर्य (पराक्रम) और अन्नकी हानि होती है। गिरे हुए वृक्षोंके उठनेपर भेदकारी भय होता है तथा एक स्थानसे दूसरे स्थानपर जानेसे देश-भङ्ग होता है, वृक्षोंके अकस्मात् जलने तथा रुदन करनेपर सम्पत्तिका विनाश होता है। ये उपद्रव यदि पूजित वृक्षोंमें होते हैं तो अवश्य ही राजापर विपत्तियाँ आती हैं। वृक्षोंके फलों तथा फूलोंमें विकार होनेपर राजाकी मृत्यु कहनी चाहिये। इसी प्रकार अन्यान्य वृक्षोंमें भी उपद्रवके लक्षणोंके दिखायी पड़नेपर उत्साही ब्राह्मण उस वृक्षको ऊपरसे ढककर चन्दन और पुष्पमालासे भूषित करे और पापकी शान्तिके लिये वृक्षके ऊपर छत्र लगाये। तदनन्तर शिवकी पूजा करे और पशुको 'रुद्रेभ्य:०' इस संकल्पसे निवेदित कर वृक्षोंके नीचे हवन करनेके पश्चात् शिवका जप करे। फिर मधु तथा घृतयुक्त खीरसे ब्राह्मणोंको संतुष्ट कर उन्हें पृथ्वीका दान दे और उस पापकी शान्तिके लिये गीत तथा नृत्यका आयोजन कराकर भगवान् शंकरकी अर्चना करे॥५-१५॥

इति श्रीमात्स्ये महापुराणेद्धतशान्तौ वृक्षोत्पातप्रशमनं नाम द्वात्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥२३२।।

इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके अद्भुत-शान्ति-प्रकरणमें वृक्षोत्पात-प्रशमन नामक

दो सौ बत्तीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २३२॥