मत्स्य महा पुराण
अविमुक्तमाहात्म्यके प्रसङ्गमें शिव-पार्वतीका प्रश्नोत्तर
देव्युवाच
हिमवन्तं गिरिं त्यक्त्वा मन्दरं गन्धमादनम्।
कैलासं निषधं चैव मेरुपृष्ठं महाद्युति॥१
रम्यं त्रिशिखरं चैव मानसं सुमहागिरिम्।
देवोद्यानानि रम्याणि नन्दनं वनमेव च॥२
सुरस्थानानि मुख्यानि तीर्थान्यायतनानि च।
तानि सर्वाणि संत्यज्य अविमुक्ते रतिः कथम्॥३
किमत्र सुमहत् पुण्यं परं गुह्यं वदस्व मे।
येन त्वं रमसे नित्यं भूतसम्पद्गुणैर्युतः॥४
क्षेत्रस्य प्रवरत्वं च ये च तत्र निवासिनः।
तेषामनुग्रहः कश्चित् तत्सर्वं ब्रूहि शङ्कर॥५
शंकर उवाच
अत्यद्भुतमिमं प्रश्नं यत्त्वं पृच्छसि भामिनि।
तत्सर्वं सम्प्रवक्ष्यामि तन्मे निगदतः शृणु॥६
वाराणस्यां नदी पुण्या सिद्धगन्धर्वसेविता।
प्रविष्टा त्रिपथा गङ्गा तस्मिन् क्षेत्रे मम प्रिये॥ ७
ममैव प्रीतिरतुला कृत्तिवासे च सुन्दरि।
सर्वेषां चैव स्थानानां स्थानं तत्तु यथाधिकम्॥८
देवी पार्वतीने पूछा-कल्याणकारी पतिदेव! हिमालयपर्वत, मन्दर, गन्धमादन, कैलास, निषध, देदीप्यमान सुमेरुपीठ, मनोहर त्रिशिखर पर्वत एवं अतिशय विशाल मानस पर्वत, रमणीय देव-उद्यान, नन्दनवन, देवस्थानों, मुख्य तीर्थों और मन्दिरों-इन सभी स्थानोंको छोड़कर आपका अविमुक्तक्षेत्रमें इतना अधिक प्रेम क्यों है? यहाँ अतिशय गोपनीय कौन-सा बहुत बड़ा पुण्य है, जिससे आप प्रमथोंके साथ यहाँ नित्य रमण करते हैं। उस क्षेत्रकी तथा वहाँके निवासियोंकी जो श्रेष्ठता है और उन लोगोंपर आपका जो अपूर्व अनुग्रह है-वे सभी बातें मुझे बतलाइये॥१-५॥
शिवजी बोले-भामिनि! तुम जो प्रश्न कर रही हो यह अतिशय अद्भुत है। मैं वह सब स्पष्टरूपसे कह रहा हूँ, सुनो। प्रिये! सिद्धों और गन्धर्वांसे सेवित त्रिपथगामिनी पुण्यशीला नदी श्रीगङ्गाजी मेरे उस क्षेत्र वाराणसीमें प्रविष्ट होती हैं। सुन्दरि! कृत्तिवासलिङ्गपर मेरा अपार प्रेम है, इसीलिये वह स्थान सभी स्थानोंसे
तेन कार्येण सुश्रोणि तस्मिन् स्थाने रतिर्मम।
तस्मिँल्लिङ्गे च सांनिध्यं मम देवि सुरेश्वरि ॥९
क्षेत्रस्य च प्रवक्ष्यामि गुणान् गुणवतां वरे।
याऽश्रुत्वा सर्वपापेभ्यो मुच्यते नात्र संशयः॥१०
यदि पापो यदि शठो यदि वाधार्मिको नरः।
मुच्यते सर्वपापेभ्यो ह्यविमुक्तं व्रजेद् यदि॥११
प्रलये सर्वभूतानां लोके स्थावरजङ्गमे।
न हि त्यक्ष्यामि तत्स्थानं महागणशतैर्वृतः॥१२
यत्र देवा: सगन्धर्वाः सयक्षोरगराक्षसाः।
वक्त्रं मम महाभागे प्रविशन्ति युगक्षये॥१३
तेषां साक्षादहं पूजां प्रतिगृह्णामि पार्वति।
सर्वगुह्योत्तमं स्थानं मम प्रियतमं शुभम् ॥१४
धन्याः प्रविष्टाः सुश्रोणि मम भक्ता द्विजातयः।
मद्भक्तिपरमा नित्यं ये मद्भक्तास्तु ते नराः॥१५
तस्मिन् प्राणान् परित्यज्य गच्छन्ति परमां गतिम्।
सदा यजति रुद्रेण सदा दानं प्रयच्छति॥१६
सदा तपस्वी भवति अविमुक्तस्थितो नरः।
यो मां पूजयते नित्यं तस्य तुष्याम्यहं प्रिये॥१७
सर्वदानानि यो दद्यात् सर्वयज्ञेषु दीक्षितः ।
सर्वतीर्थाभिषिक्तश्च स प्रपद्येत मामिह ॥१८
अविमुक्तं सदा देवि ये व्रजन्ति सुनिश्चिताः।
ते तिष्ठन्तीह सुश्रोणि मद्भक्ताश्च त्रिविष्टपे॥१९
मत्प्रसादात् तु ते देवि दीव्यन्ति शुभलोचने।
दुर्धराश्चैव दुर्धर्षा भवन्ति विगतज्वराः॥२०
अविमुक्तं शुभं प्राप्य मद्भक्ताः कृतनिश्चयाः।
निधूतपापा विमला भवन्ति विगतज्वराः॥ २१
पार्वत्युवाच
दक्षयज्ञस्त्वया देव मत्प्रियार्थे निषूदितः।
अविमुक्तगुणानां तु न तृप्तिरिह जायते ॥२२
ईश्वर उवाच
क्रोधेन दक्षयज्ञस्तु त्वत्प्रियार्थे विनाशितः।
महाप्रिये महाभागे नाशितोऽयं वरानने॥२३
अविमुक्ते यजन्ते तु मद्भक्ताः कृतनिश्चयाः।
न तेषां पुनरावृत्तिः कल्पकोटिशतैरपि॥२४
श्रेष्ठ है। सुश्रोणि! इसी कारण मेरा उस स्थानपर अधिक राग है तथा सुरेश्वरि ! उस लिङ्गमें मेरा सदा निवास रहता है। सभी गुणवानोंमें श्रेष्ठ देवि! अब मैं क्षेत्रके गुणोंका वर्णन करता हूँ जिन्हें सुनकर मनुष्य सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है, इसमें संदेह नहीं है। पापी, दुष्ट अथवा अधार्मिक मनुष्य भी यदि अविमुक्त (काशी)-में चला जाय तो वह सभी पापोंसे छूट जाता है। सभी प्राणियोंके स्थावर एवं जंगमसे व्याप्त लोकके प्रलयकालमें भी मैं सैकड़ों विशिष्ट गणोंके साथ रहकर उस स्थानको नहीं छोड़ता। महाभागे! जहाँ देवता, गन्धर्व, यक्ष, नाग, राक्षस-सभी युगके नाशके समय मेरे मुखमें प्रवेश कर जाते हैं। पार्वति! उनकी पूजाको मैं साक्षात्-रूपसे ग्रहण करता हूँ। यह शुभदायक अतिशय रहस्यमय स्थान मुझे परम प्रिय है। सुश्रोणि! वहाँ निवास करनेवाले मेरे भक्त द्विजातिगण धन्य हैं। सदा मेरी भक्तिमें तत्पर जो मेरे भक्त हैं वे वहाँ अपने शरीरका त्याग कर परम गतिको प्राप्त होते हैं। जो मनुष्य अविमुक्त क्षेत्र (काशी)-में निवास करता है, वह सदा रुद्रसूक्तसे पूजा करता है, सदा दान देता है और सदा तपस्यामें रत रहता है। प्रिये ! जो मेरी नित्य पूजा करता है उससे मैं प्रसन्न रहता हूँ। जो सभी प्रकारका दान करता है, सभी तरहके यज्ञोंमें दीक्षित होता है और सभी तीर्थों के जलोंके अभिषेकसे सम्पन्न है वही यहाँ मुझे प्राप्त करता है। देवि! जो सदा सुनिश्चित रूपसे अविमुक्त क्षेत्रमें जाते रहते हैं तथा यहाँ निवास करते हैं वे स्वर्गमें भी मेरे भक्त बने रहते हैं। शुभलोचने देवि! मेरी कृपासे वे देदीप्यमान रहते हैं तथा किसीसे पराजित न होनेवाले, पराक्रमशाली और संतापरहित होते हैं। स्थिर निश्चयवाले मेरे भक्त शुभप्रद अविमुक्तको प्राप्तकर पापरहित, निर्मल और उद्वेगशून्य हो जाते हैं। ६–२१ ॥
पार्वतीने कहा-देव! आपने मेरा प्रिय करनेके लिये दक्ष-यज्ञको विनष्ट किया था, किंतु अविमुक्तके गुणोंको सुननेसे मुझे यहाँ संतोष नहीं हो रहा है ॥२२॥
ईश्वर बोले-महाभागे! तुम्हें प्रसन्न करनेके लिये मैंने क्रोधवश दक्ष-यज्ञका विनाश किया था; क्योंकि वरानने! तुम तो मेरी अतिशय प्रियतमा हो, इसीलिये उस यज्ञको नष्ट किया था। जो मेरे भक्त अविमुक्तक्षेत्रमें निश्चयपूर्वक यज्ञ करते हैं उनका सैकड़ों करोड़ कल्पोंमें भी पुनः संसारमें आगमन नहीं होता॥२३-२४॥
देव्युवाच
दुर्लभास्तु गुणा देव अविमुक्ते तु कीर्तिताः।
सर्वांस्तान् मम तत्त्वेन कथयस्व महेश्वर ॥ २५
कौतूहलं महादेव हृदिस्थं मम वर्तते।
तत्सर्वं मम तत्त्वेन आख्याहि परमेश्वर ॥ २६
ईश्वर उवाच
अक्षया हमराश्चैव ह्यदेहाश्च भवन्ति ते।
मत्प्रसादाद् वरारोहे मामेव प्रविशन्ति वै॥२७
ब्रूहि ब्रूहि विशालाक्षि किमन्यच्छ्रोतुमर्हसि ॥ २८
देव्युवाच
अविमुक्ते महाक्षेत्रे अहो पुण्यमहो गुणाः।
न तृप्तिमधिगच्छामि ब्रूहि देव पुनर्गुणान्॥ २९
ईश्वर उवाच
महेश्वरि वरारोहे शृणु तांस्तु मम प्रिये।
अविमुक्ते गुणा ये तु तथान्यानपि तच्छृणु ॥ ३०
शाकपर्णाशिनो दान्ताः सम्प्रक्षाल्या मरीचिपाः ।
दन्तोलूखलिनश्चान्ये अश्मकुट्टास्तथा परे॥३१
मासि मासि कुशाग्रेण जलमास्वादयन्ति वै।
वृक्षमूलनिकेताश्च शिलाशय्यास्तथा परे॥३२
आदित्यवपुषः सर्वे जितक्रोधा जितेन्द्रियाः।
एवं बहुविधैर्धमैरन्यत्र चरितव्रताः॥३३
त्रिकालमपि भुञ्जाना येऽविमुक्तनिवासिनः।
तपश्चरन्ति वान्यत्र कलां नार्हन्ति षोडशीम्।
येऽविमुक्ते वसन्तीह स्वर्गे प्रतिवसन्ति ते॥३४
मत्समः पुरुषो नास्ति त्वत्समा नास्ति योषिताम्।
अविमुक्तसमं क्षेत्रं न भूतं न भविष्यति॥३५
अविमुक्ते परो योगो ह्यविमुक्ते परा गतिः ।
अविमुक्ते परो मोक्षः क्षेत्रं नैवास्ति तादृशम्॥३६
परं गुह्यं प्रवक्ष्यामि तत्त्वेन वरवर्णिनि।
अविमुक्ते महाक्षेत्रे यदुक्तं हि मया पुरा॥३७
देवीने पूछा-देव! आपने अविमुक्तक्षेत्रके जिन दुर्लभ गुणोंका वर्णन किया है, महेश्वर! आप उन सभी गुणोंका रहस्यपूर्वक मुझसे वर्णन कीजिये। महादेव! मेरे हृदयमें परम आश्चर्य हो रहा है, अतः परमेश्वर! उन सभी विषयोंको मुझे रहस्यपूर्वक बतलाइये ।।२५-२६ ॥
ईश्वर बोले-सुन्दरि! जो अविमुक्तक्षेत्रमें निवास करते हैं वे मेरी कृपासे विदेह, अक्षय और अमर हो जाते हैं तथा अन्तमें निश्चय ही मुझमें लीन हो जाते हैं। विशालनेत्रे! कहो, कहो, तुम और क्या सुनना चाहती हो? ॥ २७-२८॥
देवीने पूछा-देव! अविमुक्त नामक विशाल क्षेत्रका आश्चर्यजनक पुण्य है एवं आश्चर्यजनक गुण हैं, इनके सुननेसे मुझे तृप्ति नहीं हो रही है, अतः पुनः उन गुणोंका वर्णन कीजिये ॥ २९॥
ईश्वरने कहा-महेश्वरि! तुम तो परम सुन्दरी एवं मेरी प्रिया हो, अत: अविमुक्तक्षेत्र में जो गुण हैं, उन्हें तथा उनके अतिरिक्त अन्यान्य गुणोंको भी सुनो। जो शाक एवं पत्तोंपर जीवन-निर्वाह करनेवाले, संयमी, भलीभाँति स्नानसे निर्मल सूर्य-किरणोंका पान करनेवाले, दाँतरूपी ओखलीसे निर्वाह करनेवाले, पत्थरपर कूटकर भोजन करनेवाले, प्रतिमास कुशके अग्रभागसे जलका आस्वादन करनेवाले, वृक्षकी जड़में निवास करनेवाले, पत्थरपर शयन करनेवाले, आदित्यके समान तेजस्वी शरीरधारी, क्रोधविजयी और जितेन्द्रिय हैं, तथा इसी तरह अनेक प्रकारके धर्मोंसे अन्य स्थानोंमें व्रतका आचरण करनेवाले हैं अथवा तपस्या में संलग्न हैं, वे सभी तीनों कालोंमें भोजन करनेवाले अविमुक्तनिवासी व्यक्तिकी सोलहवीं कलाकी बराबरी नहीं कर सकते। जो अविमुक्तक्षेत्रमें निवास कर रहे हैं, वे मानो स्वर्गमें ही निवास कर रहे हैं ॥ ३०-३४ ॥
विश्वमें मेरे समान न कोई दूसरा पुरुष है, न तुम्हारे समान कोई स्त्री है और न अविमुक्तके समान कोई अन्य तीर्थस्थान हुआ है, न होगा। अविमुक्तमें परम योग, अविमुक्तमें श्रेष्ठ गति, अविमुक्तमें परम मोक्ष प्राप्त होता है, इसके समान अन्य कोई भी क्षेत्र नहीं है। शोभने ! महाक्षेत्र अविमुक्तके विषयमें मैंने जो पूर्वमें कहा है, उस परम रहस्यको मैं यथार्थरूपसे कह रहा हूँ।
जन्मान्तरशतैर्देवि योगोऽयं यदि लभ्यते।
मोक्षः शतसहस्त्रेण जन्मना लभ्यते न वा॥ ३८
अविमुक्ते न संदेहो मद्भक्तः कृतनिश्चयः।
एकेन जन्मना सोऽपि योगं मोक्षं च विन्दति ॥३९
अविमुक्ते नरा देवि ये व्रजन्ति सुनिश्चिताः।
ते विशन्ति परं स्थानं मोक्षं परमदुर्लभम्॥ ४०
पृथिव्यामीदृशं क्षेत्रं न भूतं न भविष्यति।
चतुर्मूर्तिः सदा धर्मस्तस्मिन् संनिहितः प्रिये।
चतुर्णामपि वर्णानां गतिस्तु परमा स्मृता॥ ४१
देव्युवाच
श्रुता गुणास्ते क्षेत्रस्य इह चान्यत्र ये प्रभो।
वदस्व भुवि विप्रेन्द्राः कं वा यज्ञैर्यजन्ति ते॥४२
ईश्वर उवाच
इज्यया चैव मन्त्रेण मामेव हि यजन्ति ये।
न तेषां भयमस्तीति भवं रुद्रं यजन्ति यत्॥४३
अमन्त्रो मन्त्रको देवि द्विविधो विधिरुच्यते।
सांख्यं चैवाथ योगश्च द्विविधो योग उच्यते॥४४
सर्वभूतस्थितं यो मां भजत्येकत्वमास्थितः।
सर्वथा वर्तमानोऽपि स योगी मयि वर्तते॥ ४५
आत्मौपम्येन सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति।
तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति॥४६
निर्गुणः सगुणो वापि योगश्च कथितो भुवि।
सगुणश्चैव विज्ञेयो निर्गुणो मनसः परः ।। ४७
एतत् ते कथितं देवि यन्मां त्वं परिपृच्छसि ॥४८
देव्युवाच
या भक्तिस्त्रिविधा प्रोक्ता भक्तानां बहुधा त्वया।
तामहं श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः कथयस्व मे॥ ४९
ईश्वर उवाच
शृणु पार्वति देवेशि भक्तानां भक्तिवत्सले।
प्राप्य सांख्यं च योगं च दुःखान्तं च नियच्छति॥५०
देवि! करोड़ों जन्मोंके पश्चात् मोक्षकी प्राप्ति होती है या नहीं, इसमें भी संदेह है, परंतु यदि कहीं सैकड़ों जन्मोंके बाद ऐसा योग उपलब्ध हो जाय तो दृढ़ निश्चयवाला मेरा भक्त अविमुक्तक्षेत्रमें एक ही जन्ममें योग और मोक्षको प्राप्त कर लेता है। देवि! जो दृढ़ निश्चयसे सम्पन्न पुरुष अविमुक्तक्षेत्रमें जाते हैं वे परम दुर्लभ श्रेष्ठ मोक्षपदको प्राप्त करते हैं। प्रिये! पृथ्वीमें ऐसा क्षेत्र न हुआ है और न होगा। चार मूर्तिवालाधर्म इस क्षेत्रमें सदा निवास करता है। यहाँ चारों वर्गों की परम गति कही गयी है ॥३५-४१ ॥
देवीने पूछा-प्रभो! आपके क्षेत्रके लौकिक और पारलौकिक गुणोंको मैंने सुन लिया। अब यह बतलाइये कि पृथ्वीपर जो श्रेष्ठ विप्रवृन्द हैं वे यज्ञोंद्वारा किसका यजन करते हैं?॥४२॥
ईश्वरने कहा-जो यज्ञ और मन्त्रद्वारा मेरा ही यजन करते हैं उन लोगोंको कोई भय नहीं रह जाता; क्योंकि वे भव और रुद्रकी आराधना करनेवाले हैं। देवि! मन्त्ररहित और मन्त्रसहित-दोनों प्रकारकी विधियाँ कही गयी हैं। इसी प्रकार सांख्य और योगके भेदसे योग भी दो प्रकारका कहा गया है। जो सजातीय, विजातीय एवं स्वगत भेदोंसे शून्य हो सबको एक मानकर सभी प्राणियोंमें स्थित मेरी आराधना करता है वह योगी सदा अपने स्वरूपमें रहता हुआ भी मुझमें ही स्थित रहता है। जो सर्वत्र सबको आत्मसदृश मुझमें अवस्थित देखता है, उससे न तो मैं वियुक्त होता हूँ और न वह मुझसे अलग होता है। भूतलपर निर्गुण और सगुण-दो प्रकारके योग कहे गये हैं। उनमें सगुण योग ही ज्ञानके द्वारा जाना जा सकता है, निर्गुण योग मनसे परे है। देवि! जो तुमने मुझसे पूछा है, वह मैंने तुम्हें बतला दिया॥४३-४८ ॥
देवीने पूछा-आपने भक्तोंकी जो तीन प्रकारकी भक्ति अनेक बार कही है उसे मैं सुनना चाहती हूँ। आप उसका यथार्थरूपमें मुझसे वर्णन कीजिये॥४९॥
ईश्वर (शिव)-ने कहा-भक्तोंके प्रति वात्सल्य भाव रखनेवाली देवेश्वरी पार्वती! सुनो। जो सांख्य और योगको प्राप्तकर दुःखका सर्वथा विनाश कर लेता है,
सदा यः सेवते भिक्षां ततो भवति रञ्जितः।
रञ्जनात् तन्मयो भूत्वा लीयते स तु भक्तिमान्॥५१
शास्त्राणां तु वरारोहे बहुकारणदर्शिनः।
न मां पश्यन्ति ते देवि ज्ञानवाक्यविवादिनः॥५२
परमार्थज्ञानतृप्ता युक्ता जानन्ति योगिनः ।
विद्यया विदितात्मानो योगस्य च द्विजातयः॥५३
प्रत्याहारेण शुद्धात्मा नान्यथा चिन्तयेच्च तत्।
तुष्टिं च परमां प्राप्य योगं मोक्षं परं तथा।
त्रिभिर्गुणैः समायुक्तो ज्ञानवान् पश्यतीह माम्॥५४
एतत् ते कथितं देवि किमन्यच्छ्रोतुमर्हसि।
भूय एव वरारोहे कथयिष्यामि सुव्रते।।५५
गुह्यं पवित्रमथवा यच्चापि हृदि वर्त्तते।
तत् सर्वं कथयिष्यामि शृणुष्वैकमनाः प्रिये॥५६
देव्युवाच
त्वद्रूपं कीदृशं देव युक्ताः पश्यन्ति योगिनः ।
एतं मे संशयं ब्रूहि नमस्ते सुरसत्तम ॥ ५७
श्रीभगवानुवाच
अमूर्तं चैव मूर्तं च ज्योतीरूपं हि तत् स्मृतम्।
तस्योपलब्धिमन्विच्छन् यत्नः कार्यो विजानता॥ ५८
गुणैर्वियुक्तो भूतात्मा एवं वक्तुं न शक्यते।
शक्यते यदि वक्तुं वै दिव्यैर्वर्षशतैर्न वा॥५९
देव्युवाच
किं प्रमाणं तु तत्क्षेत्रं समन्तात् सर्वतो दिशम्।
यत्र नित्यं स्थितो देवो महादेवो गणैर्युतः॥६०
ईश्वर उवाच
द्वियोजनं तु तत् क्षेत्रं पूर्वपश्चिमतः स्मृतम्।
अर्धयोजनविस्तीर्णं तत् क्षेत्रं दक्षिणोत्तरम्॥६१
वरणाऽसी नदी यावत् तावच्छुक्लनदी तु वै।
भीष्मचण्डिकमारभ्य पर्वतेश्वरमन्तिके॥६२
सदा भिक्षासे जीवन-यापन करता है और उसीसे प्रसन्न रहता है तथा इस प्रकार प्रसन्नताके कारण उसीमें तन्मय होकर लीन हो जाता है, वह भक्तिमान् कहलाता है।वरारोहे! जो शास्त्रोंके अनेकों कारणोंपर विचार करनेवाले हैं, वे ज्ञानवाक्योंमें विवाद करनेवाले लोग मेरा दर्शन नहीं कर पाते। देवि! जो परमार्थ-ज्ञानसम्पन्न योगी हैं तथा जो द्विजातिवृन्द योगके ज्ञानसे आत्मज्ञानको प्राप्त कर चुके हैं, वे ही मुझे जान पाते हैं। जिसका आत्मा प्रत्याहारके द्वारा विशुद्ध हो गया है, जो परम संतोष, उत्कृष्ट योग और मोक्षको पाकर अन्यथा विचार नहीं करते और तीनों गुणोंसे सम्पन्न हैं, ऐसे ज्ञानी इस अविमुक्तक्षेत्रमें मेरा साक्षात्कार कर पाते हैं। देवि! यह तो मैंने तुमसे कह दिया, अब तुम और क्या सुनना चाहती हो? उत्तम पातिव्रत धारण करनेवाली सुन्दरि! मैं पुनः उसका वर्णन करूँगा। प्रिये ! जो गोपनीय, पावन अथवा हृदयमें वर्तमान है, वह सब मैं कहूँगा, तुम एकाग्रचित्त होकर सुनो ॥ ५०-५६ ॥
देवीने पूछा-देव! योगसिद्धिसम्पन्न योगिगण आपके कैसे स्वरूपका दर्शन करते हैं? देवश्रेष्ठ! मैं हैं आपको नमस्कार करती हूँ, आप मेरे इस संदेहपर प्रकाश डालिये॥५७॥
श्रीभगवान्ने कहा-मेरा वह ज्योतिःस्वरूप अमूर्त और मूर्त-दो प्रकारका कहा गया है। विद्वान् पुरुषको उसे प्राप्त करनेकी अभिलाषासे प्रयत्न करना चाहिये। जो प्राणी गुणोंसे रहित है, वह इस प्रकार* इसका वर्णन नहीं कर सकता। यदि करना चाहे तो सैकड़ों दिव्य वर्षों में कर सकता है या नहीं-इसमें भी संदेह है।५८-५९ ॥
देवीने पूछा-जहाँ देवाधिदेव महादेव अपने गणोंके साथ नित्य स्थित रहते हैं, वह क्षेत्र चारों ओर सभी दिशाओंमें कितनी दूरतक विस्तृत है? ॥ ६० ॥
भगवान् शङ्करने कहा-वह क्षेत्र पूर्वसे पश्चिमतक दो योजन और दक्षिणसे उत्तरतक आधा योजन विस्तृत बतलाया जाता है। जहाँतक वरुणा और असी नदियाँ हैं, वहाँतक भीष्मचण्डिकसे लेकर पर्वतेश्वरके समीपतक शुक्लनदी है।
गणा यत्रावतिष्ठन्ति सन्नियुक्ता विनायकाः।
कूष्माण्डगजतुण्डश्च जयन्तश्च मदोत्कटाः ।।६३
सिंहव्याघ्रमुखा: केचिद् विकटा: कुब्जवामनाः।
यत्र नन्दी महाकालश्चण्डघण्टो महेश्वरः॥६४
दण्डचण्डेश्वरश्चैव घण्टाकर्णो महाबलः।
एते चान्ये च बहवो गणाश्चैव गणेश्वराः॥६५
महोदरा महाकाया वज्रशक्तिधरास्तथा।
रक्षन्ति सततं देवि ह्यविमुक्तं तपोवनम्।
द्वारे द्वारे च तिष्ठन्ति शूलमुद्गरपाणयः॥६६
सुवर्णशृङ्गी रौप्यखुरां चैलाजिनपयस्विनीम्।
वाराणस्यां तु यो दद्यात् सवत्सां कांस्यभाजनाम् ॥ ६७
गां दत्त्वा तु वरारोहे ब्राह्मणे वेदपारगे।
आसप्तमं कुलं तेन तारितं नात्र संशयः॥६८
यो दद्याद् ब्राह्मणे किञ्चित् तस्मिन् क्षेत्रे वरानने।
कनकं रजतं वस्त्रमन्नाद्यं बहुविस्तरम्॥६९
अक्षयं चाव्ययं चैव स्यातां तस्य सुलोचने।
शृणु तत्त्वेन तीर्थस्य विभूतिं व्युष्टिमेव च॥७०
तत्र स्नात्वा महाभागे भवन्ति नीरुजा नराः।
दशानामश्वमेधानां फलं प्राप्नोति मानवः॥७१
तदवाप्नोति धर्मात्मा तत्र स्नात्वा वरानने।
बहुस्वल्पे च यो दद्याद् ब्राह्मणे वेदपारगे॥७२
शुभां गतिमवाप्नोति अग्निवच्चैव दीप्यते।
वाराणसीजाह्नवीभ्यां संगमे लोकविश्रुते॥७३
दत्त्वान्नं च विधानेन न स भूयोऽभिजायते।
एतत् ते कथितं देवि तीर्थस्य फलमुत्तमम्॥७४
पुनरन्यत् प्रवक्ष्यामि तीर्थस्य फलमुत्तमम्।
उपवासं तु यः कृत्वा विप्रान् संतर्पयेन्नरः।
सौत्रामणेश्च यज्ञस्य फलं प्राप्नोति मानवः॥ ७५
एकाहारस्तु यस्तिष्टेन्मासं तत्र वरानने।
यावज्जीवकृतं पापं सहसा तस्य नश्यति॥७६
जहाँ कूष्माण्ड, गजतुण्ड, जयन्त, उत्कट पराक्रमी विनायकगण भलीभाँति नियुक्त होकर विराजमान रहते हैं। उनमें कुछ सिंह एवं बाघके-से मुखवाले , कुछ भयंकर, कुबड़े और वामन (बोने) हैं। जहाँ नन्दी, महाकाल, चण्डघण्ट, महेश्वर, दण्डचण्डेश्वर, महाबली घण्टाकर्ण-ये एवं अन्य अनेक गणसमूह और गणेश्वरवृन्द विद्यमान रहते हैं। देवि! ये सभी विशाल उदरवाले एवं विशालकाय हैं तथा हाथमें वज्र और शक्ति धारण करके इस अविमुक्त तपोवनकी सदा रक्षा करते हैं। ये सभी हाथमें शूल और मुद्गर धारण कर प्रत्येक द्वारपर स्थित रहते हैं॥ ६१-६६॥
वरारोहे ! जो स्वर्णजटित सींगोंवाली, चाँदीसे युक्त खुरोंवाली, सुन्दर वस्त्र और मृगचर्मसे सुशोभित, दूध देनेवाली, कांसदोहनीसे युक्त सवत्सा गौका वाराणसीमें वेदपारङ्गत ब्राह्मणको दान करता है, वह अपनी सात पीढ़ियोंको तार देता है-इसमें संदेह नहीं है। वरानने! जो उस क्षेत्रमें थोड़ा अथवा अधिक मात्रामें सुवर्ण, रजत, वस्त्र, अन्न आदि ब्राह्मणको दान करता है, सुलोचने! उसका वह दान अक्षय एवं अविनाशी हो जाता है। महाभागे ! इस तीर्थकी वास्तविक विभूति और विशिष्ट फलको सुनो। वहाँ स्नान कर मनुष्य रोगरहित हो जाते हैं। वरानने ! दस अश्वमेध याग करनेसे मनुष्य जो फल प्राप्त करता है, वह उस धर्मात्मा व्यक्तिको वहाँ स्नान करनेसे ही प्राप्त हो जाता है। जो वेदके पारङ्गत ब्राह्मणको अधिक या स्वल्प-जो भी अपनी शक्तिके अनुसार दान देता है, उस दानसे उसे शुभ गति प्राप्त होती है और वह अग्निके समान तेजस्वी हो जाता है। जो संसारमें प्रसिद्ध वरुणा-असी और गङ्गाके संगमपर विधानपूर्वक अन्नका दान देता है, उसका पुनर्जन्म नहीं होता। देवि! मैंने इस तीर्थका यह उत्तम फल तुम्हें बतला दिया ॥६७-७४॥
अब मैं पुन: इस तीर्थका अन्य उत्तम फल बतला रहा हूँ। जो मनुष्य इस तीर्थमें उपवासपूर्वक विप्रोंको भलीभाँति तृप्त करता है, वह मानव सौत्रामणि नामक यज्ञका फल प्राप्त करता है। वरानने! जो वहाँ एक मासतक एक समय भोजन कर जीवन व्यतीत करता है, उसका जीवनपर्यन्त किया हुआ पाप अनायास ही नष्ट हो
अग्निप्रवेशं ये कुर्युरविमुक्ते विधानतः।
प्रविशन्ति मुखं ते मे नि:संदिग्धं वरानने॥७७
कुर्वन्त्यनशनं ये तु मद्भक्ताः कृतनिश्चयाः।
न तेषां पुनरावृत्तिः कल्पकोटिशतैरपि॥७८
अर्चयेद् यस्तु मां देवि अविमुक्ते तपोवने।
तस्य धर्मं प्रवक्ष्यामि यदवाप्नोति मानवः॥७९
दशाश्वमेधिकं पुण्यं लभते नात्र संशयः।
दशसौवर्णिकं पुष्पं योऽविमुक्ते प्रयच्छति॥८०
अग्निहोत्रफलं धूपे गन्धदाने तथा शृणु।
भूमिदानेन तत्तुल्यं गन्धदानफलं स्मृतम्॥८१
सम्मार्जने पञ्चशतं सहस्रमनुलेपने।
मालया शतसाहस्रमनन्तं गीतवाद्यतः ।। ८२
देव्युवाच
अत्यद्भुतमिदं देवं स्थानमेतत् प्रकीर्तितम्।
रहस्यं श्रोतुमिच्छामि यदर्थं त्वं न मुञ्चसि ।। ८३
ईश्वर उवाच
आसीत् पूर्वं वरारोहे ब्रह्मणस्तु शिरो वरम्।
पञ्चमं शृणु सुश्रोणि जातं काञ्चनसप्रभम्॥८४
ज्वलत् तत् पञ्चमं शीर्षं जातं तस्य महात्मनः ।
तदेवमब्रवीद् देवि जन्म जानामि ते ह्यहम्॥ ८५
ततः क्रोधपरीतेन संरक्तनयनेन च।
वामाङ्गुष्ठनखाग्रेण च्छिन्नं तस्य शिरो मया॥ ८६
ब्रह्मोवाच
यदा निरपराधस्य शिरश्छिन्नं त्वया मम।
तस्माच्छापसमायुक्तः कपाली त्वं भविष्यसि।
ब्रह्महत्याकुलो भूत्वा चर तीर्थानि भूतले ।। ८७
ततोऽहं गतवान् देवि हिमवन्तं शिलोच्चयम्।
तत्र नारायणः श्रीमान् मया भिक्षां प्रयाचितः॥८८
ततस्तेन स्वकं पार्श्व नखानेण विदारितम् ।
स्रवतो महती धारा तस्य रक्तस्य निःसृता ।। ८९
प्रयाता सातिविस्तीर्णा योजनार्धशतं तदा।
न सम्पूर्ण कपालं तु घोरमद्भुतदर्शनम्।। ९०
जाता है। वरानने! जो इस अविमुक्तक्षेत्रमें विधानपूर्वक अग्निमें प्रवेश कर जाते हैं, वे निश्चय ही मेरे मुख में प्रवेश करते हैं, जो मेरे भक्त यहाँ दृढ़ निश्चयपूर्वक निराहार रहते हैं उनका सैकड़ों करोड़ कल्पोंमें भी पुनः संसारमें आगमन नहीं होता। देवि! जो इस अविमुक्त तपोवनमें मेरी पूजा करता है, उसका धर्म बतला रहा हूँ, जो उस मनुष्यको प्राप्त होता है। वह नि:संदेह दस अश्वमेध यागके फलको प्राप्त करता है। जो इस अविमुक्तमें दस सुवर्णनिर्मित पुष्पका दान करता है तथा वहाँ धूप दान करता है, उसे अग्निहोत्रका फल प्राप्त होता है। अब गन्धदानका फल सुनो। भूमिदानके समान ही गन्ध-दानका फल कहा गया है। भलीभाँति स्नान करनेपर पाँच सौ, चन्दन लगानेसे एक हजार, माला समर्पण करनेसे एक लाख और गाने-बजानेसे अनन्त अग्निहोत्रके फलकी प्राप्ति होती है॥ ७५-८२॥
देवीने पूछा-देव! जैसा आपने बतलाया है, सचमुच ही यह स्थान अतिशय अद्भुत है। अब मैं उस रहस्यको सुनना चाहती हूँ, जिसके कारण आप इस स्थानको नहीं छोड़ते ॥८३ ॥
ईश्वरने कहा-सुन्दर कटिभागवाली वरारोहे ! सुनो। प्राचीनकालमें ब्रह्माका सुवर्णके समान कान्तिमान् पाँचवाँ सुन्दर सिर उत्पन्न हुआ। देवि! उस महात्माके उत्पन्न हुए उस पाँचवें देदीप्यमान मुखने इस प्रकार कहा कि मैं तुम्हारा जन्म जानता हूँ। यह सुनकर मैं क्रोधसे परिव्याप्त हो गया और मेरी आँखें लाल हो गयीं। तब मैंने बायें अँगूठेके नखके अग्रभागसे उनके सिरको काट दिया ॥८४-८६॥
ब्रह्मा बोले-आपने बिना अपराधके ही मेरा सिर काट दिया है, अतः आप भी शापसे युक्त हो कपाली हो जायेंगे। साथ ही आप ब्रह्महत्यासे व्याकुल होकर भूतलपर तीर्थों में भ्रमण कीजिये। देवि! तब मैं हिमालय पर्वतपर चला गया और वहाँ मैंने श्रीमान् नारायणसे भिक्षाकी याचना की। इसके बाद उन्होंने नखके अग्रभागसे अपने पार्श्वभागको विदीर्ण कर दिया, तब उससे रक्तकी विपुल धारा प्रवाहित हुई। वह धारा बहती हुई पचास योजनतक परिव्याप्त हो गयी, किंतु भयंकर दीखनेवाला अद्भुत कपाल उससे नहीं भरा।
दिव्यं वर्षसहस्रं तु सा च धारा प्रवाहिता।
प्रोवाच भगवान् विष्णुः कपालं कुत ईदृशम्॥ ९१
आश्चर्यभूतं देवेश संशयो हृदि वर्तते।
कुतश्च सम्भवो देव सर्वं मे ब्रूहि पृच्छतः॥ ९२
देवदेव उवाच
श्रूयतामस्य हे देव कपालस्य तु सम्भवः ।
शतं वर्षसहस्राणां तपस्तप्त्वा सुदारुणम्॥ ९३
ब्रह्मासृजद् वपुर्दिव्यमद्भुतं लोमहर्षणम्।
तपसश्च प्रभावेण दिव्यं काञ्चनसंनिभम्॥ ९४
ज्वलत् तत् पञ्चमं शीर्ष जातं तस्य महात्मनः ।
निकृत्तं तन्मया देव तदिदं पश्य दुर्जयम्॥ ९५
यत्र यत्र च गच्छामि कपालं तत्र गच्छति।
एवमुक्तस्ततो देवः प्रोवाच पुरुषोत्तमः॥ ९६
श्रीभगवानुवाच
गच्छ गच्छ स्वकं स्थानं ब्रह्मणस्त्वं प्रियं कुरु।
तस्मिन् स्थास्यति भद्रं ते कपालं तस्य तेजसा॥ ९७
ततः सर्वाणि तीर्थानि पुण्यान्यायतनानि च।
गतोऽस्मि पृथुलश्रोणि न क्वचित् प्रत्यतिष्ठत॥ ९८
ततोऽहं समनुप्राप्तो ह्यविमुक्ते महाशये।
अवस्थितः स्वके स्थाने शापश्च विगतो मम॥ ९९
विष्णुप्रसादात् सुश्रोणि कपालं तत् सहस्रधा।
स्फुटितं बहुधा जातं स्वप्नलब्धं धनं यथा॥१००
ब्रह्महत्यापहं तीर्थं क्षेत्रमेतन्मया कृतम्।
कपालमोचनं देवि देवानां प्रथितं भुवि॥१०१
कालो भूत्वा जगत् सर्वं संहरामि सृजामि च।
ततस्तत् पतितं तत्र शापश्च विगतो मम॥१०२
कपालमोचनं तीर्थमभूद्धत्याविनाशनम्।
मद्भक्तास्तत्र गच्छन्ति विष्णुभक्तास्तथैव च ॥१०३
तत्रस्थोऽस्मि जगत् सर्वं सुकरोमि सुरेश्वरि।
देवेशि सर्वगुह्यानां स्थानं प्रियतरं मम॥१०४
ये भक्ता भास्करे देवि लोकनाथे दिवाकरे।
तत्रस्थो यस्त्यजेद् देहं मामेव प्रविशेत् तु सः॥१०५
इस प्रकार वह धारा हजार दिव्य वर्षोंतक अनवरत प्रवाहित होती रही। तब भगवान् विष्णुने पूछा कि 'ऐसा अद्भुत कपाल आपको कहाँसे प्राप्त हुआ है? देवेश! मेरे हृदयमें संदेह हो रहा है। देव! यह कहाँसे उत्पन्न हुआ? मुझ प्रश्नकर्ताको सभी बातें बतलाइये' ।। ८७–९२॥
(तब) देवाधिदेव शंकर बोले-देव! आप इस कपालकी उत्पत्तिका विवरण सुनिये। ब्रह्माने सौ हजार वर्षोंतक अतिशय घोर तपस्या कर दिव्य रोमाञ्चकारी अद्भुत शरीरकी रचना की। उन महात्मा ब्रह्माके शरीरमें तपस्याके प्रभावसे सुवर्णके समान देदीप्यमान पाँचवाँ सिर उत्पन्न हुआ। देव! मैंने उसे काट दिया। यह वही दुर्जय कपाल है। अब देखिये, मैं जहाँ-जहाँ जाता हूँ, वहाँ यह कपाल भी मेरे पीछे लगा रहता है। (इस प्रकार) ऐसा कहे जानेपर पुरुषोत्तमभगवान्ने तब कहा- ॥९३-९६॥
श्रीभगवान् बोले-जाइये, आप अपने स्थानको लौट जाइये और ब्रह्माको प्रसन्न कीजिये। उनके तेजसे आपका यह श्रेष्ठ कपाल वहीं स्थित हो जायगा। पृथुल- श्रोणि ! इसके बाद मैं सभी तीर्थों और पुण्य क्षेत्रोंमें गया, परंतु यह कहीं भी ठहर न सका। तत्पश्चात् मैं अतिशय प्रभावशाली अविमुक्तक्षेत्रमें पहुँचा। वह वहाँ अपने स्थानपर स्थित हो गया और मेरा शाप समाप्त हो गया। सुश्रोणि! विष्णुकी कृपासे वह कपाल स्वप्नमें प्राप्त हुए धनके समान हजारों टुकड़ोंमें टूट-फूट गया। देवि! मैंने इस तीर्थको ब्रह्महत्याको दूर करनेवाला बना दिया। यह भूतलपर देवताओंके लिये कपालमोचनतीर्थके नामसे प्रसिद्ध हुआ। मैं कालके रूपमें उत्पन्न होकर सम्पूर्ण विश्वका संहार और सृजन करता हूँ। इस प्रकार वह कपाल इस क्षेत्रमें गिरा और मेरा शाप नष्ट हुआ। इसी कारण यह कपालमोचनतीर्थ ब्रह्महत्याका विनाशक हुआ। सुरेश्वरि ! मैं वहीं स्थित हूँ और सम्पूर्ण विश्वका कल्याण करता हूँ। देवेशि! सभी गुप्त स्थानोंमें यह अविमुक्तक्षेत्र मेरे लिये प्रियतर है। देवि! वहाँ मेरे भक्त, विष्णुभक्त और जो लोकनाथ प्रभाशाली सूर्यके भक्त हैं, वे सभी जाते हैं। जो वहाँ रहकर शरीरका त्याग करता है, वह मुझमें ही प्रविष्ट हो जाता है॥ ९७–१०५॥
देव्युवाच
अत्यद्भुतमिदं देव यदुक्तं पद्मयोनिना।
त्रिपुरान्तकरस्थान गुह्यमेतन्महाद्युते॥१०६
यान्यन्यानि सुतीर्थानि कलां नार्हन्ति षोडशीम्।
यत्र तिष्ठति देवेशो यत्र तिष्ठति शङ्करः॥१०७
गङ्गा तीर्थसहस्त्राणां तुल्या भवति वा न वा।
त्वमेव भक्तिर्देवेश त्वमेव गतिरुत्तमा॥१०८
ब्रह्मादीनां तु ते देव गतिरुक्ता सनातनी।
श्राव्यते यद् द्विजातीनां भक्तानामनुकम्पया ।। १०९
देवीने कहा-महाकान्तिशाली देव! ब्रह्माद्वारा कथित यह विषय अत्यद्भुत है। त्रिपुरका विनाश करनेवाले शिवजीका यह प्रिय गुप्त स्थान है। अन्य जितने उत्तम तीर्थस्थान हैं, वे सभी उस स्थानकी सोलहवीं कलाकी समता नहीं कर सकते। जहाँ देवेश भगवान् शंकर निवास करते हैं तथा जिससे हजारों तीर्थोंसे श्रेष्ठ गङ्गाकी तुलना नहीं हो सकती, वह भी यहीं स्थित है। देवेश! आप ही (ज्ञानात्मिका) भक्ति हैं और आप ही उत्तम गति हैं। देव! आपने ब्रह्मा आदिकी जो सनातनी गति बतलायी है, जिसे भक्त एवं द्विजातिगण सुनते हैं, वह सब भी आपकी ही अनुकम्पा है॥१०६-१०९॥
इति श्रीमात्स्ये महापुराणेऽविमुक्तमाहात्म्ये त्र्यशीत्यधिकशततमोऽध्यायः॥ १८३॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके अविमुक्तमाहात्म्यमें एक सौ तिरासीवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १८३ ।।
Summary of chapter 185 of the Matsya Mahā Purana is as follows:
Bhagavān Matsya catalogs the most prominent sub-pilgrimages and holy bathing ghats situated along the sacred river Gaṅgā in Vārāṇasī. The text highlights the glories of Manikarnikā, where Goddess Pārvatī's earring fell, Dashāshvamedha, where Bhagavān Brahmā performed ten horse sacrifices, Lolārka, Harishchandra Ghat, and Chakaratīrtha created by Bhagavān Vishṇu's Chakra, detailing the specific spiritual benefits of bathing at each holy site.