मत्स्य महा पुराण
चारों युगोंकी व्यवस्थाका वर्णन
मत्स्य उवाच
चत्वार्याहुः सहस्राणि वर्षाणां तु कृतं युगम्।
तस्य तावच्छती संध्या द्विगुणा रविनन्दन॥ १
यन्न धर्मश्चतुष्पादस्त्वधर्मः पादविग्रहः।
स्वधर्मनिरताः सन्तो जायन्ते यत्र मानवाः॥ २
विप्राः स्थिता धर्मपरा राजवृत्तौ स्थिता नृपाः।
कृष्यामभिरता वैश्याः शूद्राः शुश्रूषवः स्थिताः॥ ३
तदा सत्यं च शौचं च धर्मश्चैव विवर्धते।
सद्भिराचरितं कर्म क्रियते ख्यायते च वै॥ ४
एतत्कार्तयुगं वृत्तं सर्वेषामपि पार्थिव।
प्राणिनां धर्मसङ्गानामपि वै नीचजन्मनाम्॥ ५
त्रीणि वर्षसहस्राणि त्रेतायुगमिहोच्यते।
तस्य तावच्छती संध्या द्विगुणा परिकीर्त्यते॥ ६
द्वाभ्यामधर्मः पादाभ्यां त्रिभिर्धर्मो व्यवस्थितः।
यत्र सत्यं च सत्त्वं च त्रेताधर्मो विधीयते॥ ७
त्रेतायां विकृतिं यान्ति वर्णास्त्वेते न संशयः।
चतुर्वर्णस्य वैकृत्याद्यान्ति दौर्बल्यमाश्रमाः॥ ८
एषा त्रेतायुगगतिर्विचित्रा देवनिर्मिता।
द्वापरस्य तु या चेष्टा तामपि श्रोतुमर्हसि॥ ९
द्वापरं द्वे सहस्त्रे तु वर्षाणां रविनन्दन।
तस्य तावच्छती संध्या द्विगुणा युगमुच्यते॥१०
तत्र चार्थपराः सर्वे प्राणिनो रजसा हताः।
सर्वे नैष्कृतिकाः क्षुद्रा जायन्ते रविनन्दन॥११
द्वाभ्यां धर्मः स्थितः पद्भ्यामधर्मस्त्रिभिरुत्थितः।
विपर्ययाच्छनैर्धर्मः क्षयमेति कलौ युगे॥१२
ब्राह्मण्यभावस्य ततस्तथौत्सुक्यं विशीर्यते।
व्रतोपवासास्त्यज्यन्ते द्वापरे युगपर्यये॥१३
मत्स्यभगवान्ने कहा-रविनन्दन! कृतयुगकी अवधि चार हजार दिव्य वर्षोंकी बतलायी जाती है और उसकी संध्या उससे दुगुनी शती अर्थात् आठ सौ वर्षों-की होती है। उस युगमें धर्म अपने चारों पादोंसे विद्यमान रहता है और अधर्म चतुर्थांशमात्र रहता है। उस युगमें उत्पन्न होनेवाले मानव अपने धर्ममें निरत रहते हैं। ब्राह्मण धर्म-पालनमें तत्पर रहते हैं। क्षत्रिय राज-धर्ममें स्थित रहते हैं। वैश्य कृषिकर्ममें लगे रहते हैं और शूद्र सेवाकार्यमें तल्लीन रहते हैं। उस समय सत्य, शौच और धर्मकी अभिवृद्धि होती है। सभी लोग सत्पुरुषोंद्वारा आचरित कर्मका अनुकरण करते हैं और उसकी प्रशंसा करते हैं। पार्थिव! कृतयुगका यह आचार सभी प्राणियोंमें पाया जाता है, चाहे वे धर्मप्राण विप्र आदि हों अथवा नीच जातिके हों। इसके बाद तीन हजार दिव्य वर्षोंका त्रेतायुग कहलाता है। उसकी संध्या उससे दुगुनी शती अर्थात् छ: सौ वर्षकी कही गयी है। इस युगमें धर्म तीन चरणोंसे और अधर्म दो पादोंसे स्थित रहता है। उस समय त्रेताधर्म सत्य और सत्त्वगुणप्रधान माना जाता है। इसमें संदेह नहीं कि त्रेतायुगमें ये ब्राह्मणादि चारों वर्ण (कुछ) विकृत हो जाते हैं और इनके विकृत हो जानेके कारण चारों आश्रम भी दुर्बलताको प्राप्त हो जाते हैं। भगवान्द्वारा निर्मित त्रेतायुगकी यह विचित्र गति है। अब द्वापरयुगकी जो चेष्टा है, उसे भी सुनिये॥ १-९॥
रविनन्दन! द्वापरयुग दो हजार दिव्य वर्षोंका होता है। उसकी संध्या चार सौ वर्षोंकी कही जाती है। सूर्यपुत्र! उस युगमें रजोगुणसे ग्रस्त सभी प्राणी अर्थपरायण होते हैं। उस युगमें जन्म लेनेवाले सभी प्राणी निष्कर्मी एवं विचारवाले होते हैं। उस समय धर्म दो चरणोंसे स्थित रहता है और अधर्मकी वृद्धि तीन चरणोंसे होती है। इस प्रकार धीरे-धीरे परिवर्तन होनेके कारण कलियुगमें धर्म नष्ट हो जाता है। द्वापरयुगके परिवर्तनके समय लोगोंमें ब्राह्मणोंके प्रति आस्था नष्ट हो जाती है और लोग व्रत-उपवास आदिको छोड़ बैठते हैं। उस समय क्षुद्र
तथा वर्षसहस्रं तु वर्षाणां द्वे शते अपि।
संध्यया सह संख्यातं क्रूरं कलियुगं स्मृतम्॥१४
यत्राधर्मश्चतुष्पादः स्याद् धर्मः पादविग्रहः।
कामिनस्तपसा हीना जायन्ते तत्र मानवाः ।।१५
नैवातिसात्त्विकः कश्चिन्न साधुर्न च सत्यवाक् ।
नास्तिका ब्रह्मभक्ता वा जायन्ते तत्र मानवाः॥१६
अहंकारगृहीताश्च प्रक्षीणस्नेहबन्धनाः।
विप्राः शूद्रसमाचाराः सन्ति सर्वे कलौ युगे॥१७
आश्रमाणां विपर्यासः कलौ सम्परिवर्तते।
वर्णानां चैव संदेहो युगान्ते रविनन्दन ॥१८
विद्याद् द्वादशसाहस्री युगाख्यां पूर्वनिर्मिताम्।
एवं सहस्रपर्यन्तं तदहाह्ममुच्यते॥१९
ततोऽहनि गते तस्मिन् सर्वेषामेव जीविनाम्।
शरीरनिर्वृतिं दृष्ट्वा लोकसंहारबुद्धितः॥२०
देवतानां च सर्वासां ब्रह्मादीनां महीपते।
दैत्यानां दानवानां च यक्षराक्षसपक्षिणाम्॥ २१
गन्धर्वाणामप्सरसां भुजङ्गानां च पार्थिव।
पर्वतानां नदीनां च पशूनां चैव सत्तम।
तिर्यग्योनिगतानां च सत्त्वानां कृमिणां तथा॥ २२
महाभूतपतिः पञ्च हृत्वा भूतानि भूतकृत्।
जगत्संहरणार्थाय कुरुते वशसं महत्॥ २३
भूत्वा सूर्यश्चक्षुषी चाददानो
भूत्वा वायुः प्राणिनां प्राणजालम्।
भूत्वा वह्निर्निर्दहन् सर्वलोकान्
भूत्वा मेघो भूय उग्रोऽप्यवर्षत्॥ २४
क्रूर कलियुगका प्रवेश होता है, जिसकी संख्या संध्याके दो सौ वर्षोंसहित एक हजारकी बतलायी गयी है। उस युगमें अधर्म चारों पादोंसे प्रभावी हो जाता है और धर्म चतुर्थांशमात्र रह जाता है। उस युगमें जन्म लेनेवाले मानव कामपरायण और तपस्यासे हीन होते हैं। कलियुगमें उत्पन्न होनेवाले मानवोंमें न तो कोई अत्यन्त सात्त्विक होता है और न साधुस्वभाव एवं सत्यवादी ही होता है। सभी नास्तिक हो जाते हैं और अपनेको परब्रह्मका भक्त बतलाते हैं। लोग अहंकारके वशीभूत और प्रेमबन्धनसे रहित हो जाते हैं। कलियुगमें सभी ब्राह्मण शूद्रके समान आचरण करने लगते हैं। रविनन्दन! कलियुगमें आश्रमोंमें भी परिवर्तन हो जाता है। युगान्तका समय आनेपर तो लोगोंमें वर्णोंका भी संदेह उत्पन्न हो जाता है॥ १०-१८॥
महीपते! इस प्रकार पूर्वकालमें निर्मित बारह हजारकी युग-संख्या जाननी चाहिये। इस प्रकार जब एक हजार चतुर्युगी बीत जाती है, तब ब्रह्माका एक दिन कहा जाता है। ब्रह्माके उस दिनके व्यतीत हो जानेपर जीवोंके उत्पादक महाभूतपति श्रीहरि सभी प्राणियोंके शरीर-मोक्षको देखकर लोकसंहारकी भावनासे ब्रह्मा आदि सभी देवताओं, दैत्यों, दानवों, यक्षों, राक्षसों, पक्षियों, गन्धर्वो, अप्सराओं, नागों, पर्वतों, नदियों, पशुओं, तिर्यग्योनिमें उत्पन्न हुए जीवों तथा कीटोंके पञ्चमहाभूतोंका विनाश कर जगत्का संहार करनेके निमित्त महान् विनाशकारी दृश्य उत्पन्न कर देते हैं। उस समय वे सूर्य बनकर सभीके नेत्रोंकी ज्योति नष्ट कर देते हैं, वायुरूप होकर जीवोंके प्राणसमूहको समेट लेते हैं, अग्निका रूप धारणकर सभी लोकोंको जलाकर भस्म कर देते हैं तथा मेघ बनकर पुनः भयंकर वृष्टि करते हैं ॥१९-२४॥
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे पद्मोद्भवप्रादुर्भावे पञ्चषष्टयधिकशततमोऽध्यायः ॥ १६५॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके पद्मोद्भवप्रसङ्गमें एक सौ पैंसठवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १६५ ॥
Summary of chapter 167 of the Matsya Mahā Purana is as follows:
Bhagavān Matsya describes the cosmic manifestation of Bhagavān Vishṇu as the divine boar, Bhagavān Varāha, during the deluge of the Chākshusha Manvantara. When the earth goddess Bhūdevī sank beneath the dark waters of the bottomless ocean due to the oppression of demons, the Supreme Lord assumed a massive, colossal boar form possessing the strength of thunderbolts and an effulgence brighter than a million suns, diving deep into the cosmic abyss to rescue the earth.