युधिष्ठिरकी चिन्ता, उनकी महर्षि मार्कण्डेयसे  भेंट और महर्षिद्वारा प्रयाग-माहात्म्यका उपक्रम

नन्दिकेश्वर उवाच

अतः परं प्रवक्ष्यामि प्रयागस्योपवर्णनम्।

मार्कण्डेयेन कथितं यत् पुरा पाण्डुसूनवे॥१

भारते तु यदा वृत्ते प्राप्तराज्ये पृथासुते।

एतस्मिन्नन्तरे राजा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः ।। २

भ्रातृशोकेन संतप्तश्चिन्तयन् स पुनः पुनः ।

आसीत् सुयोधनो राजा एकादशचमूपतिः॥३

नन्दिकेश्वर बोले-नारदजी! इसके बाद मैं प्रयागके माहात्म्यका वर्णन कर रहा हूँ जिसे पूर्वकालमें महर्षि मार्कण्डेयने पाण्डुपुत्र युधिष्ठिरसे कहा था। जब महाभारत-युद्ध समाप्त हो गया और कुन्ती-पुत्र युधिष्ठिरको राज्य प्राप्त हो गया, इसी बीच कुन्ती-नन्दन महाराज युधिष्ठिर भाइयोंके शोकसे अत्यन्त दु:खी होकर बारम्बार इस प्रकार चिन्तन करने लगे-'हाय! जो राजा दुर्योधन ग्यारह अक्षौहिणी सेनाका स्वामी था,

अस्मान् संताप्य बहुशः सर्वे ते निधनं गताः।

वासुदेवं समाश्रित्य पञ्च शेषास्तु पाण्डवाः॥ ४

हत्वा भीष्मं च द्रोणं च कर्णं चैव महाबलम्।

दुर्योधनं च राजानं पुत्रभ्रातृसमन्वितम्॥ ५

राजानो निहताः सर्वे ये चान्ये शूरमानिनः ।

किं नो राज्येन गोविन्द किं भोगै वितेन वा॥ ६

धिक् कष्टमिति संचिन्त्य राजा वैक्लव्यमागतः।

निर्विचेष्टो निरुत्साहः किञ्चित् तिष्ठत्यधोमुखः॥ ७

लब्धसंज्ञो यदा राजा चिन्तयन् स पुनः पुनः।

कतमो विनियोगो वा नियमं तीर्थमेव च॥ ८

येनाहं शीघ्रमामुञ्चे महापातककिल्बिषात्।

यत्र स्थित्वा नरो याति विष्णुलोकमनुत्तमम्॥ ९

कथं पृच्छामि वै कृष्णं येनेदं कारितोऽस्म्यहम्।

धृतराष्ट्रं कथं पृच्छे यस्य पुत्रशतं हतम्॥१०

एवं वैक्लव्यमापन्ने धर्मराजे युधिष्ठिरे।

रुदन्ति पाण्डवाः सर्वे भ्रातृशोकपरिप्लुताः॥११

ये च तत्र महात्मानः समेताः पाण्डवाः स्मृताः।

कुन्ती च द्रौपदी चैव ये च तत्र समागताः।

भूमौ निपतिताः सर्वे रुदन्तस्तु समंततः॥१२

वाराणस्यां मार्कण्डेयस्तेन ज्ञातो युधिष्ठिरः।

यथा वैक्लव्यमापन्नो रोदमानस्तु दुःखितः॥१३

अचिरेणैव कालेन मार्कण्डेयो महातपाः।

सम्प्राप्तो ह्यस्तिनपुरं राजद्वारे ह्यतिष्ठत॥१४

द्वारपालोऽपि तं दृष्ट्वा राज्ञः कथितवान् द्रुतम्।

त्वां द्रष्टुकामो मार्कण्डो द्वारि तिष्ठत्यसौ मुनिः।

त्वरितो धर्मपुत्रस्तु द्वारमागादतः परम्॥१५

युधिष्ठिर उवाच

स्वागतं ते महाभाग स्वागतं ते महामुने।

अद्य मे सफलं जन्म अद्य मे तारितं कुलम्॥१६

अद्य मे पितरस्तुष्टास्त्वयि दृष्टे महामुने।

अद्याहं पूतदेहोऽस्मि यत् त्वया सह दर्शनम्॥ १७

वह हमलोगोंको अनेकों बार कष्टमें डालकर अपने सभी सहायकोंके साथ कालके गालमें चला गया। श्रीकृष्णका आश्रय लेनेके कारण केवल हम पाँच पाण्डव ही शेष रह गये हैं। गोविन्द! हमलोगोंने भीष्म, द्रोण, महाबली कर्ण और पुत्रों एवं भाइयोंसमेत राजा दुर्योधनको मारकर जो अन्य शूर, मानी नरेश थे उन सबका भी संहार कर डाला, ऐसी परिस्थितिमें हमें राज्यसे क्या लेना है, अथवा भोगों एवं जीवनसे ही क्या प्रयोजन है? 'हाय! धिक्कार है, महान् कष्ट आ पड़ा'-ऐसा सोचकर राजा युधिष्ठिर व्याकुल हो गये और निश्चेष्ट एवं उत्साहरहित हो कुछ देरतक नीचे मुख किये बैठे ही रह गये। जब राजा युधिष्ठिरको पुन: चेतना प्राप्त हुई तब वे इस प्रकार सोचने लगे-'ऐसा कौन-सा विनियोग (प्रायश्चित्त), नियम (व्रतोपवास) अथवा तीर्थ है, जिसका सेवन करनेसे मैं शीघ्र ही इस महापातकके पापसे मुक्त हो सकूँगा, अथवा जहाँ निवास कर मनुष्य सर्वोत्तम विष्णुलोकको प्राप्त कर सकता है। इसके लिये मैं श्रीकृष्णसे कैसे पूछू; क्योंकि उन्होंने ही तो मुझसे ऐसा कर्म करवाया है। दादा धृतराष्ट्रसे भी किसी प्रकार नहीं पूछ सकता; क्योंकि उनके सौ पुत्र मार डाले गये हैं।' ऐसा सोचकर धर्मराज युधिष्ठिर व्याकुल हो गये। उस समय सभी पाण्डव भ्रातृ-शोकमें निमग्न होकर रुदन कर रहे थे। उस समय राजा युधिष्ठिरके समीप जो अन्य महात्मा पुरुष आये थे तथा कुन्ती, द्रौपदी एवं अन्यान्य जो लोग आ गये थे, वे सभी रोते हुए युधिष्ठिरको घेरकर पृथ्वीपर पड़ गये॥१-१२॥

उस समय महर्षि मार्कण्डेय वाराणसीमें निवास कर रहे थे। उन्हें जिस प्रकार युधिष्ठिर दुःखी और व्याकुल हो रो रहे थे, ये सारी बातें (योगबलसे) ज्ञात हो गयीं। तब महातपस्वी मार्कण्डेय थोड़े ही समयमें हस्तिनापुर जा पहुँचे और राजद्वारपर उपस्थित हुए। उन्हें आया हुआ देखकर द्वारपालने तुरंत राजाको सूचना देते हुए कहा-'महाराज! ये महामुनि मार्कण्डेय आपसे मिलनेके लिये दरवाजेपर खड़े हैं।' यह सुनते ही धर्म-पुत्र युधिष्ठिर शीघ्रतापूर्वक दरवाजेपर आ पहुँचे॥ १३-१५॥

युधिष्ठिरने कहा-महाभाग! आपका स्वागत है। महामुने! आपका स्वागत है। महामुने! आपका दर्शन करके आज मेरा जन्म सफल हो गया। आज मैंने अपने कुलका उद्धार कर दिया तथा आज मेरे पितर संतुष्ट हो गये। आपका जो यह (आकस्मिक) दर्शन प्राप्त हुआ, इससे आज मेरा शरीर पवित्र हो गया॥१६-१७॥

नन्दिकेश्वर उवाच

सिंहासने समास्थाप्य पादशौचार्चनादिभिः ।

युधिष्ठिरो महात्मा वै पूजयामास तं मुनिम्॥१८

ततः स तुष्टो मार्कण्डः पूजितश्चाह तं नृपम्।

आख्याहि त्वरितं राजन् किमर्थं रुदितं त्वया।

केन वा विक्लवीभूतः का बाधा ते किमप्रियम्॥१९

युधिष्ठिर उवाच

अस्माकं चैव यद् वृत्तं राज्यस्यार्थे महामुने।

एतत् सर्वं विदित्वा तु चिन्तावशमुपागतः॥२०

मार्कण्डेय उवाच

शृणु राजन् महाबाहो क्षात्रधर्मव्यवस्थितिम्।

नैव दृष्टं रणे पापं युध्यमानस्य धीमतः॥२१

किं पुना राजधर्मेण क्षत्रियस्य विशेषतः। ।

तदेवं हृदयं कृत्वा तस्मात् पापं न चिन्तयेत्॥२२

ततो युधिष्ठिरो राजा प्रणम्य शिरसा मुनिम्।

पप्रच्छ विनयोपेतः सर्वपातकनाशनम्॥२३

युधिष्ठिर उवाच

पृच्छामि त्वां महाप्राज्ञ नित्यं त्रैलोक्यदर्शिनम्।

कथय त्वं समासेन येन मुच्येत किल्बिषात्॥ २४

मार्कण्डेय उवाच

शृणु राजन् महाबाहो सर्वपातकनाशनम्।

प्रयागगमनं श्रेष्ठं नराणां पुण्यकर्मणाम्॥ २५

नन्दिकेश्वर बोले-नारदजी! तत्पश्चात् महात्मा युधिष्ठिरने मार्कण्डेय मुनिको सिंहासनपर बैठाकर पादप्रक्षालन आदि अर्चाविधिके अनुसार उनकी पूजा की। तब पूजनसे संतुष्ट हुए मुनिवर मार्कण्डेयने राजा युधिष्ठिरसे पूछा-'राजन् ! तुम किसलिये रो रहे थे? किसने तुम्हें व्याकुल कर दिया? तुम्हें कौन-सी बाधा सता रही है ? तुम्हारा कौन-सा अमङ्गल हो गया? यह सब हमें शीघ्र बतलाओ'॥ १८-१९॥

युधिष्ठिरने कहा-महामुने! राज्यकी प्राप्तिके लिये हमलोगोंने जैसा-जैसा व्यवहार किया है, वही सब सोचकर मैं चिन्ताके वशीभूत हो गया हूँ॥२०॥

मार्कण्डेयजी बोले-महाबाहु राजन्! क्षात्रधर्मकी व्यवस्था तो सुनो। इसके अनुसार रणस्थलमें युद्ध करते हुए बुद्धिमान्के लिये पाप नहीं बतलाया गया है, तब फिर राजधर्मके अनुसार विशेषरूपसे युद्ध करनेवाले क्षत्रियके लिये तो पापकी बात ही क्या है। हृदयमें ऐसा विचारकर युद्धसे उत्पन्न हुए पापकी भावनाको छोड़ दो। तदनन्तर राजा युधिष्ठिरने मुनिवर मार्कण्डेयको सिर झुकाकर प्रणाम किया और विनम्रतापूर्वक समस्त पापोंका विनाश करनेवाले साधनके विषयमें प्रश्न किया॥ २१-२३ ।।

युधिष्ठिरने पूछा-महाप्राज्ञ! आप तो नित्य त्रैलोक्यदर्शी हैं, अतः मैं आपसे पूछ रहा हूँ। आप संक्षेपमें कोई ऐसा साधन बतलाइये, जिसका पालन करनेसे पापसे छुटकारा मिल सके॥ २४॥

मार्कण्डेयजी बोले-महाबाहु राजन्! सुनो, पुण्यकर्मा मनुष्योंके लिये प्रयाग-गमन ही सम्पूर्ण पापोंका विनाश करनेवाला सर्वश्रेष्ठ साधन है ॥ २५ ॥

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे प्रयागमाहात्म्ये त्र्यधिकशततमोऽध्यायः॥१०३॥

इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके प्रयागमाहात्म्य-वर्णन-प्रसङ्गमें एक सौ तीनवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥१०३ ॥