हिरण्यकशिपुकी तपस्या, ब्रह्माद्वारा उसे वरप्राप्ति, हिरण्यकशिपुका अत्याचार, विष्णुद्वारा देवताओंको अभयदान, भगवान् विष्णुका नृसिंहरूप धारण करके हिरण्यकशिपुकी विचित्र सभामें प्रवेश

ऋषय ऊचुः

इदानीं श्रोतुमिच्छामो हिरण्यकशिपोर्वधम्।

नरसिंहस्य माहात्म्यं तथा पापविनाशनम्॥१

सूत उवाच

पुरा कृतयुगे विप्रा हिरण्यकशिपुः प्रभुः।

दैत्यानामादिपुरुषश्चकार स महत्तपः॥२

दश वर्षसहस्राणि दश वर्षशतानि च।

जलवासी समभवत् स्नानमौनधृतव्रतः॥३

ऋषियोंने पूछा-सूतजी! अब हमलोग दानवराज हिरण्यकशिपुका वध तथा भगवान् नरसिंहके पापविनाशक माहात्म्यको सुनना चाहते हैं (आप उसे हमें सुनाइये) ॥१॥

सूतजी कहते हैं-विप्रवरो! पूर्वकालमें कृतयुगमें दैत्योंके आदि पुरुष सामर्थ्यशाली हिरण्यकशिपुने महान् तप किया। उसने स्नान और मौनका व्रत धारण करके ग्यारह हजार वर्षांतक जलमें निवास किया।

ततः शमदमाभ्यां च ब्रह्मचर्येण चैव हि।

ब्रह्मा प्रीतोऽभवत्तस्य तपसा नियमेन च।।४

ततः स्वयम्भूर्भगवान् स्वयमागम्य तत्र ह।

विमानेनार्कवर्णेन हंसयुक्तेन भास्वता॥ ५

आदित्यैर्वसुभिः साध्यैर्मरुद्भिर्दैवतैस्तथा।

रुद्रैर्विश्वसहायैश्च यक्षराक्षसपन्नगैः॥ ६

दिग्भिश्चैव विदिग्भिश्च नदीभिः सागरैस्तथा।

नक्षत्रैश्च मुहूर्तेश्च खेचरैश्च महाग्रहैः॥ ७

देवैर्ब्रह्मर्षिभिः सार्धं सिद्धैः सप्तर्षिभिस्तथा।

राजर्षिभिः पुण्यकृद्भिर्गन्धर्वाप्सरसां गणैः ।।८

चराचरगुरुः श्रीमान् वृतः सर्वैर्दिवौकसैः।

ब्रह्मा ब्रह्मविदां श्रेष्ठो दैत्यं वचनमब्रवीत्॥ ९

प्रीतोऽस्मि तव भक्तस्य तपसानेन सुव्रत।

वरं वरय भद्रं ते यथेष्टं काममाप्नुहि॥१०

हिरण्यकशिपुरुवाच

न देवासुरगन्धर्वा न यक्षोरगराक्षसाः।

न मानुषाः पिशाचा वा हन्युर्मां देवसत्तम॥११

ऋषयो वा न मां शापैः शपेयुः प्रपितामह।

यदि मे भगवान् प्रीतो वर एष वृतो मया॥१२

न चास्त्रेण न शस्त्रेण गिरिणा पादपेन च।

न शुष्केण न चाट्टैण न दिवा न निशाथ वा॥१३

भवेयमहमेवार्कः सोमो वायुर्हताशनः ।

सलिलं चान्तरिक्षं च नक्षत्राणि दिशो दश॥१४

अहं क्रोधश्च कामश्च वरुणो वासवो यमः।

धनदश्च धनाध्यक्षो यक्षः किंपुरुषाधिपः॥१५

ब्रह्मोवाच

एते दिव्या परास्तात मया दत्तास्तवाद्भुताः।

सर्वान्कामान्सदा वत्स प्राप्स्यसे त्वं न संशयः॥१६

एवमुक्त्वा स भगवाझगामाकाश एव हि।

वैराजं ब्रह्मसदनं ब्रह्मर्षिगणसेवितम्॥१७

ततो देवाश्च नागाश्च गन्धर्वा ऋषिभिः सह।

वरप्रदानं श्रुत्वैव पितामहमुपस्थिताः॥१८

तब उसके मनःसंयम, इन्द्रियनिग्रह, ब्रह्मचर्य, तपस्या और नियमपालनसे ब्रह्मा प्रसन्न हो गये। तत्पश्चात् स्वयं भगवान् ब्रह्मा सूर्यके समान तेजस्वी एवं चमकीले विमानपर, जिसमें हंस जुते हुए थे, सवार होकर आदित्यों, वसुओं, साध्यों, मरुद्गणों, देवताओं, रुद्रों, विश्वेदेवों, यक्षों, राक्षसों, नागों, दिशाओं, विदिशाओं, नदियों, सागरों, नक्षत्रों, मुहूर्तों, आकाशचारी महान् ग्रहों, देवगणों, ब्रह्मर्षियों, सिद्धों, सप्तर्षियों, पुण्यकर्मा राजर्षियों, गन्धर्षों और अप्सराओंके गणोंके साथ वहाँ आये। तदुपरान्त सम्पूर्ण देवताओंसे घिरे हुए ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ चराचरगुरु श्रीमान् ब्रह्मा उस दैत्यसे इस प्रकार बोले-'सुव्रत! तुम-जैसे भक्तकी इस तपस्यासे मैं प्रसन्न हूँ। तुम्हारा कल्याण हो। अब तुम यथेष्ट वर माँग लो और अपना मनोरथ सिद्ध करो'॥ २-१०॥

हिरण्यकशिपु बोला-देवसत्तम! देवता, असुर गन्धर्व, यक्ष, नाग, राक्षस, मनुष्य अथवा पिशाच-ये कोई भी मुझे न मार सकें। प्रपितामह ! ऋषिगण अपने शापोंद्वारा मुझे अभिशप्त न कर सकें। न अस्त्रसे, न शस्त्रसे, न पर्वतसे, न वृक्षसे, न शुष्क पदार्थसे, न गीले पदार्थसे, न दिनमें, न रातमें-अर्थात् कभी भी अथवा किसीसे भी मेरी मृत्यु न हो। मैं ही सूर्य, चन्द्रमा, वायु, अग्नि, जल, आकाश, नक्षत्र, दसों दिशाएँ, क्रोध, काम, वरुण, इन्द्र, यम, धनाध्यक्ष कुबेर और किम्पुरुषोंका अधीश्वर यक्ष हो जाऊँ। यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं तो मैं यही वर माँग रहा हूँ॥११-१५॥

ब्रह्माने कहा-तात! मैंने तुम्हें इन दिव्य एवं अद्भुत वरदानोंको प्रदान कर दिया। वत्स! तुम सदा सभी मनोरथोंको प्राप्त करते रहोगे, इसमें संशय नहीं है। ऐसा कहकर भगवान् ब्रह्मा आकाशमार्गसे ब्रह्मर्षियोंद्वारा सेवित अपने वैराज नामक निवासस्थानको चले गये। तदनन्तर ऋषियोंसहित देवता, नाग और गन्धर्व इस प्रकारके वरप्रदानकी बात सुनते ही पितामहके पास पहुँचे (और बोले) ॥१६-१८॥

देवा ऊचुः

वरप्रदानाद् भगवन् वधिष्यति स नोऽसुरः।

तत्प्रसीदाशु भगवन् वधोऽप्यस्य विचिन्त्यताम्॥१९

भगवन् सर्वभूतानामादिकर्ता स्वयं प्रभुः।

स्रष्टा त्वं हव्यकव्यानामव्यक्तप्रकृतिर्बुधः॥२०

सर्वलोकहितं वाक्यं श्रुत्वा देवः प्रजापतिः।

आश्वासयामास सुरान् सुशीतैर्वचनाम्बुभिः॥२१

अवश्यं त्रिदशास्तेन प्राप्तव्यं तपसः फलम्।

तपसान्तेऽस्य भगवान् वधं विष्णुः करिष्यति॥२२

तच्छ्रुत्वा विबुधा वाक्यं सर्वे पङ्कजजन्मनः ।

स्वानि स्थानानि दिव्यानि विप्रजग्मुर्मुदान्विताः॥२३

लब्धमात्रे वरे चाथ सर्वाः सोऽबाधत प्रजाः।

हिरण्यकशिपुर्दैत्यो वरदानेन दर्पितः॥२४

आश्रमेषु महाभागान् स मुनीञ्छंसितव्रतान्।

सत्यधर्मपरान् दान्तान् धर्षयामास दानवः॥२५

देवांस्त्रिभुवनस्थांश्च पराजित्य महासुरः।

त्रैलोक्यं वशमानीय स्वर्गे वसति दानवः॥२६

यदा वरमदोत्सित्तश्चोदितः कालधर्मतः।

यज्ञियानकरोद् दैत्यानयज्ञियाश्च देवताः॥२७

तदादित्याश्च साध्याश्च विश्वे च वसवस्तथा।

सेन्द्रा देवगणा यक्षाः सिद्धद्विजमहर्षयः॥२८

शरण्यं शरणं विष्णुमुपतस्थुर्महाबलम्।

देवदेवं यज्ञमयं वासुदेवं सनातनम् ॥ २९

देवा ऊचुः

नारायण महाभाग देवास्त्वां शरणं गताः।

त्रायस्व जहि दैत्येन्द्रं हिरण्यकशिपुं प्रभो॥३०

त्वं हि नः परमो धाता त्वं हि नः परमो गुरुः।

त्वं हि नः परमो देवो ब्रह्मादीनां सुरोत्तम॥३१

विष्णुरुवाच

भयं त्यजध्वममरा अभयं वो ददाम्यहम् ।

तथैव त्रिदिवं देवाः प्रतिपद्यत मा चिरम्॥३२

देवताओंने कहा-भगवन्! आपके इस वरप्रदानसे तो वह असुर हमलोगोंका वध कर डालेगा। अतः प्रभो! कृपा कीजिये और शीघ्र ही उसके वधका भी उपाय सोचिये। भगवन्! आप स्वयं सम्पूर्ण प्राणियोंके आदिकर्ता, स्वामी, हव्य एवं कव्यके स्रष्टा, अव्यक्तप्रकृति और सर्वज्ञ हैं। देवताओंके समस्त लोकोंके लिये हितकारक ऐसे वचनको सुनकर प्रजापति ब्रह्माने अपने परम शीतल वचनरूपी जलसे देवताओंको संसिक्त एवं आश्वस्त करते हुए बोले-'देवगण! उसे अपनी तपस्याका फल तो अवश्य ही मिलना चाहिये। हाँ, तपस्याके पुण्यफलके समाप्त हो जानेपर भगवान् विष्णु उसका वध करेंगे।' कमलजन्मा ब्रह्माकी वह बात सुनकर सभी देवता हर्षपूर्वक अपने-अपने दिव्य स्थानोंको लौट गये ॥१९-२३॥

उधर वर प्राप्त होते ही उस वरदानसे गर्वित हुआ दैत्यराज हिरण्यकशिपु सभी प्रजाओंको कष्ट देना प्रारम्भ किया। उस दानवने आश्रमोंमें जाकर उन महान् भाग्यशाली मुनियोंको, जो उत्तम व्रतका पालन करनेवाले, सत्यधर्म-परायण और जितेन्द्रिय थे, धर्षित कर दिया। उस महान् असुरने त्रिभुवनमें स्थित सभी देवताओंको पराजित कर दिया। तब वह दानव त्रिलोकीको अपने अधीन करके स्वर्गमें निवास करने लगा। इस प्रकार कालधर्मकी प्रेरणासे जब उसने वरदानके मदसे उन्मत्त हो दैत्योंको यज्ञभागका अधिकारी बनाया और देवताओंको उनके समुचित यज्ञभागोंसे वञ्चित कर दिया, तब आदित्यगण, साध्यगण, विश्वेदेव, वसुगण, इन्द्रसहित देवगण, यक्ष, सिद्धगण और महर्षिगण-ये सभी उन महाबली विष्णुकी शरणमें गये, जो शरणदाता, देवाधिदेव, यज्ञमूर्ति, वसुदेवके पुत्र और अविनाशी हैं ॥२४-२९॥

देवताओंने कहा-महाभाग्यशाली नारायण! हम सभी देवता आपकी शरणमें आये हुए हैं, आप हमारी रक्षा कीजिये। प्रभो! आप दैत्यराज हिरण्यकशिपुका वध कीजिये। सुरोत्तम! आप ही हमलोगोंके परम पालक हैं, आप ही हमलोगोंके सर्वोत्कृष्ट गुरु हैं और आप ही हम ब्रह्मा आदि देवताओंके परम देव हैं॥३०-३१॥

भगवान् विष्णुने कहा-देवताओ! तुमलोग भय छोड़ दो। मैं तुमलोगोंको अभयदान दे रहा हूँ। पहलेकी तरह पुनः तुमलोगोंका शीघ्र ही स्वर्गपर अधिकार हो जायगा।

एषोऽहं सगणं दैत्यं वरदानेन दर्पितम्।

अवध्यममरेन्द्राणां दानवेन्द्रं निहन्म्यहम्॥ ३३

एवमुक्त्वा तु भगवान् विसृज्य त्रिदशेश्वरान्।

वधं संकल्पयामास हिरण्यकशिपोः प्रभुः॥ ३४

साहाय्यं च महाबाहुरोङ्कारं गृह्य सत्वरम्।

अथोंकारसहायस्तु भगवान् विष्णुरव्ययः॥ ३५

हिरण्यकशिपुस्थानं जगाम हरिरीश्वरः।

तेजसा भास्कराकारः शशी कान्त्यैव चापरः॥३६

नरस्य कृत्वार्धतर्नु सिंहस्यार्धतर्नु तथा।

नारसिंहेन वपुषा पाणिं संस्पृश्य पाणिना॥३७

ततोऽपश्यत विस्तीर्णां दिव्यां रम्यां मनोरमाम्।

सर्वकामयुतां शुभ्रां हिरण्यकशिपोः सभाम्॥३८

विस्तीर्णा योजनशतं शतमध्यर्धमायताम्।

वैहायसी कामगमां पञ्चयोजनविस्तृताम्॥३९

जराशोकक्लमापेतां निष्प्रकम्पां शिवां सुखाम्।

वेश्महर्म्यवती रम्यां ज्वलन्तीमिव तेजसा॥४०

अन्तःसलिलसंयुक्तां विहितां विश्वकर्मणा।

दिव्यरत्नमयैर्वृक्षैः फलपुष्पप्रदैर्युताम्॥४१

नीलपीतसितश्यामैः कृष्णैर्लोहितकैरपि।

अवतानैस्तथा गुल्मैर्मञ्जरीशतधारिभिः ॥ ४२

सिताभ्रघनसङ्काशा प्लवन्तीव व्यदृश्यत।

रश्मिवती भास्वरा च दिव्यगन्धमनोरमा॥४३

सुसुखा न च दुःखा सा न शीता न च घर्मदा।

न क्षुत्पिपासे ग्लानिं वा प्राप्य तां प्राप्नुवन्ति ते॥४४

नानारूपैरुपकृतां विचित्रैरतिभास्वरैः।

स्तम्भैर्न बिभृता सा वै शाश्वती चाक्षपा सदा॥४५

अति चन्द्रं च सूर्यं च शिखिनं च स्वयम्प्रभा।

दीप्यते नाकपृष्ठस्था भासयन्तीव भास्करान्॥ ४६

मैं सेनासहित उस दानवराज दैत्यका, जो वरदानकी प्राप्तिसे गर्वीला और देवेश्वरोंके लिये अवध्य हो गया है, वध करूँगा। ऐसा कहकर महाबाहु भगवान् विष्णुने देवेश्वरोंको विदा कर दिया और स्वयं शीघ्रतापूर्वक ओंकारको (सहायकरूपमें) साथ लेकर हिरण्यकशिपुके वधका विचार करने लगे। तदनन्तर जो सर्वव्यापक, अविनाशी, परमेश्वर, सूर्यके समान तेजस्वी और दूसरे चन्द्रमाके-से कान्तिमान् थे, वे भगवान् श्रीहरि ओंकारको साथ लेकर हिरण्यकशिपुके स्थानपर गये। उस समय वे आधा मनुष्यका और आधा सिंहका शरीर धारण कर नरसिंहरूपसे स्थित हो हाथसे हाथ मल रहे थे। तदनन्तर उन्होंने हिरण्यकशिपुकी चमकती हुई दिव्य सभा देखी, जो विस्तृत, अत्यन्त रुचिर, मनको लुभानेवाली और सम्पूर्ण अभिलषित पदार्थों से युक्त थी। सौ योजनके विस्तारमें फैली हुई वह सभा पचास योजन लम्बी और पाँच योजन चौड़ी थी। वह स्वेच्छानुसार आकाशमें उड़नेवाली तथा बुढ़ापा, शोक और थकावटसे रहित, निश्चल, कल्याणकारिणी, सुखदायिनी और परम रमणीय थी। उसमें अट्टालिकाओंसे युक्त भवन बने थे और वह तेजसे प्रज्वलित-सी हो रही थी॥३२-४०॥

उसके भीतर जलाशय थे। वह फल-पुष्प प्रदान करनेवाले दिव्य रत्नमय वृक्षोंसे संयुक्त थी। उसे विश्वकर्माने बनाया था। वह नीले, पीले, श्वेत, श्याम, कृष्ण और लोहित रंगके आवरणों और सैकड़ों मंजरियोंसे युक्त गुल्मोंसे आच्छादित होनेके कारण श्वेत बादलकी तरह उड़ती हुई-सी दीख रही थी। उसमेंसे किरणे फूट रही थीं। वह चमकीली और दिव्य गन्धसे कारण मनोरम थी। वह सर्वथा सुखदायिनी थी। उसमें दुःख, सर्दी और धूपका नाम-निशान नहीं था। उसमें पहुँचकर दानवोंको भूख-प्यास और ग्लानिकी प्राप्ति नहीं होती थी। वह चित्र-विचित्र रंगवाले एवं अत्यन्त चमकीले नाना प्रकारके खम्भोंसे युक्त थी, परंतु उन खम्भोंपर आधारित नहीं थी। वहाँ रात नहीं होती थी, अपितु निरन्तर दिन ही बना रहता था। वह अपनी प्रभासे सूर्य, चन्द्रमा और अग्निका तिरस्कार कर रही थी तथा स्वर्गलोकमें स्थित होकर अनेकों सूर्योको उद्भासित करती हुई-सी उद्दीप्त हो रही थी। युक्त होनेके

सर्वे च कामाः प्रचुरा ये दिव्या ये च मानुषाः।

रसयुक्तं प्रभूतं च भक्ष्यभोज्यमनन्तकम्॥४७

पुण्यगन्धस्त्रजश्चात्र नित्यपुष्पफलद्रुमाः।

उष्णेशीतानि तोयानि शीते चोष्णानि सन्ति च॥४८

पुष्पिताग्रा महाशाखा: प्रवालाङ्कुरधारिणः ।

लतावितानसंछन्ना नदीषु च सरःसु च॥४९

वृक्षान् बहुविधांस्तत्र मृगेन्द्रो ददृशे प्रभुः।

गन्धवन्ति च पुष्पाणि रसवन्ति फलानि च॥५०

नातिशीतानि नोष्णानि तत्र तत्र सरांसि च।

अपश्यत् सर्वतीर्थानि सभायां तस्य स प्रभुः॥५१

नलिनैः पुण्डरीकैश्च शतपत्रैः सुगन्धिभिः।

रक्तैः कुवलयैर्नीलैः कुमुदैः संवृतानि च॥५२

सुकान्तैर्धार्तराष्टैश्च राजहंसैश्च सुप्रियैः।

कारण्डवैश्चक्रवाकैः सारसैः कुररैरपि॥५३

विमलैः स्फाटिकाभैश्च पाण्डुरच्छदनैर्द्विजैः ।

बहुहंसोपगीतानि सारसाभिरुतानि च॥५४

गन्धवत्यः शुभास्तत्र पुष्टमञ्जरिधारिणीः ।

दृष्टवान् पर्वताग्रेषु नानापुष्पधरा लताः॥५५

केतक्यशोकसरलाः पुन्नागतिलकार्जुनाः।

चूता नीपा: प्रस्थपुष्पाः कदम्बा बकुला धवाः॥५६

प्रियङ्गुपाटलावृक्षाः शाल्मल्यः सहरिद्रकाः।

सालास्तालास्तमालाश्च चम्पकाश्च मनोरमाः॥५७

तथैवान्ये व्यराजन्त सभायां पुष्पिता द्रुमाः।

विद्रुमाश्च द्रुमाश्चैव ज्वलिताग्निसमप्रभाः॥५८

स्कन्धवन्तः सुशाखाश्च बहुतालसमुच्छ्रयाः।

अर्जुनाशोकवर्णाश्च बहवश्चित्रका द्रुमाः ।। ५९

वरुणो वत्सनाभश्च पनसाः सह चन्दनैः।

नीपा: सुमनसश्चैव निम्बा अश्वत्थतिन्दुकाः॥६०

पारिजाताश्च लोध्राश्च मल्लिका भद्रदारवः।

आमलक्यस्तथा जम्बूलकुचाः शैलवालुकाः॥६१

सभी प्रकारके मनोरथ, चाहे वे दिव्य हों या मानुष, सब-के-सब वहाँ प्रचुरमात्रामें उपलब्ध थे। वहाँ असंख्य प्रकारके अधिक-से-अधिक रसीले भक्ष्य एवं भोज्य पदार्थ और पुण्यगन्धमयी मालाएँ सुलभ थीं। वहाँके वृक्ष नित्य पुष्प और फल देनेवाले थे। वहाँका जल गर्मी में शीतल और सर्दीमें उष्ण रहता था। वहाँ नदियों और सरोवरोंके तटपर बड़ी-बड़ी शाखाओंवाले वृक्ष लगे थे, जिनके अग्रभागमें पुष्प खिले हुए थे और जो लाल-लाल पल्लवों और अङ्कुरोंसे सुशोभित एवं लतारूपी वितानसे आच्छादित थे। भगवान् नृसिंह वहाँ ऐसे अनेकों प्रकारके वृक्ष देखे, जो सुगन्धित पुष्पों और रसदार फलोंसे लदे हुए वहाँ यत्र-तत्र सरोवर भी थे, जिनमें न तो अत्यन्त शीतल और न गरम जल भरा रहता था॥ ४१-५०३ ॥

भगवान् नृसिंहने उसकी सभामें सभी पुण्यक्षेत्रोंको भी देखा, जो सुगन्धयुक्त कमल, श्वेत कमल, लाल कमल, नील कमल और कुमुदिनी आदि पुष्पोंसे तथा अत्यन्त सुन्दर काली चोंच और काले पैरोंवाले हंसों, परमप्रिय लगनेवाले राजहंसों, बतखों, चक्रवाकों, सारसों, कराँकुलों एवं स्फटिककी-सी कान्तिवाले निर्मल और पीले पंखोंसे सुशोभित अन्यान्य पक्षियोंसे आच्छादित थे। उनमें बहुत-से हंस कूज रहे थे और सर्वत्र सारसोंकी बोली सुनायी पड़ती थी। भगवान् नृसिंहने पर्वत-शिखरोंपर पुष्पोंसे लदी हुई अनेकों प्रकारकी लताओंको भी देखा, जो सुन्दर मंजरियोंसे सुशोभित थीं और जिनसे मनोरम गन्ध फैल रही थी। उस सभामें केतकी, अशोक, सरल (चीड़), पुन्नाग, तिलक, अर्जुन, आम, नीप, प्रस्थपुष्प, कदम्ब, बकुल, धव, प्रियंगु, पाटल, शाल्मली, हरिद्रक, साल, ताल, तमाल, मनोरम चम्पक, विद्रुम तथा प्रज्वलित अग्निकी-सी कान्तिवाले अन्यान्य वृक्ष फूलोंसे लदे हुए शोभा पा रहे थे। वहाँ अर्जुन और अशोकके-से वर्णवाले मोटी-मोटी डालों एवं सुन्दर शाखाओंसे युक्त बहुत-से चित्रक (रेड़ या तिलक)-के वृक्ष थे, जिनकी ऊँचाई अनेकों तालवृक्षोंके बराबर थी। वहाँ वरुण, वत्सनाभ, कटहल, चन्दन, सुन्दर पुष्पोंसे युक्त नीप, नीम, पीपल, तिन्दुक, पारिजात, लोध्र, मल्लिका, भद्रदारु आमला, जामुन, बड़हर, शैलबालुक,

खर्जूर्यो नारिकेलाश्च हरीतकविभीतकाः।

कालीयका द्रुकालाश्च हिङ्गवः पारियात्रकाः॥६२

मन्दारकुन्दलक्ताश्च पतङ्गाः कुटजास्तथा।

रक्ताः कुरण्टकाश्चैव नीलाश्चागरुभिः सह॥६३

कदम्बाश्चैव भव्याश्च दाडिमा बीजपूरकाः।

सप्तपर्णाश्च बिल्वाश्च मधुपैरावृतास्तथा॥६४

अशोकाश्च तमालाश्च नानागुल्मलतावृताः।

मधूकाः सप्तपर्णाश्च बहवस्तीरगा द्रुमाः॥६५

लताश्च विविधाकाराः पत्रपुष्पफलोपगाः।

एते चान्ये च बहवस्तत्र काननजा द्रुमाः ॥ ६६

नानापुष्पफलोपेता व्यराजन्त समंततः।

चकोराः शतपत्राश्च मत्तकोकिलसारिकाः॥६७

पुष्पिताः पुष्पिताग्रैश्च सम्पतन्ति महाद्रुमाः ।

रक्तपीतारुणास्तत्र पादपाग्रगताः खगाः॥६८

परस्परमवेक्षन्ते प्रहृष्टा जीवजीवकाः।

तस्यां सभायां दैत्येन्द्रो हिरण्यकशिपुस्तदा।। ६९

स्त्रीसहस्त्रैः परिवृतो विचित्राभरणाम्बरः।

अनर्घ्यमणिवज्रार्चिः शिखाज्वलितकुण्डलः ॥७०

आसीनश्चासने चित्रे दशनल्वप्रमाणतः।

दिवाकरनिभे दिव्ये दिव्यास्तरणसंस्तुते॥७१

दिव्यगन्धवहस्तत्र मारुतः सुसुखो ववौ।

हिरण्यकशिपुर्दैत्य आस्ते ज्वलितकुण्डलः॥७२

उपचेरुर्महादैत्यं हिरण्यकशिपुं तदा।

दिव्यतानेन गीतानि जगुर्गन्धर्वसत्तमाः॥७३

विश्वाची सहजन्या च प्रम्लोचेत्यभिविश्रुता।

दिव्याथ सौरभेयी च समीची पुञ्जिकस्थली।७४

मिश्रकेशी च रम्भा च चित्रलेखा शुचिस्मिता।

चारुकेशी घृताची च मेनका चोर्वशी तथा।।७५

एताः सहस्रशश्चान्या नृत्यगीतविशारदाः।

उपतिष्ठन्ति राजानं हिरण्यकशिपुं प्रभुम्॥७६

खजूर, नारियल, हरीतक, विभीतक, कालीयक, दुकाल, हींग, पारियात्रक, मन्दार, कुन्द, लक्त, पतंग, कुटज, लाल कुरण्टक, अगुरु, कदम्ब, सुन्दर अनार, बिजौरा नींबू, सप्तपर्ण, बेल, भँवरोंसे घिरे हुए अशोक, अनेकों गुल्मों और लताओंसे आच्छादित तमाल, महुआ और सप्तपर्ण आदि बहुत-से वृक्ष तटपर उगे हुए थे॥५१-६५ ॥

वहाँ पत्र, पुष्प और फलसे सुशोभित अनेकों प्रकारकी लताएँ फैली हुई थीं। ये तथा इनके अतिरिक्त अन्यान्य बहुत-से जंगली वृक्ष नाना प्रकारके पुष्पों और फलोंसे लदे हुए चारों ओर शोभा पा रहे थे। चकोर, शतपत्र (कठफोड़वा), मतवाली कोयल और मैना एक पुष्पित वृक्षके पल्लवसे उड़कर दूसरे पुष्पित महान् वृक्षपर बैठ रही थीं। वहाँ रक्त, पीत और अरुण वर्णवाले बहुतेरे पक्षी वृक्षोंके शिखरोंपर बैठे थे तथा चकोर प्रसन्न मनसे परस्पर एक-दूसरेकी ओर देख रहे थे। उसी सभामें उस समय दैत्यराज हिरण्यकशिपु सूर्यके समान चमकीले एवं दिव्य बिछौनोंसे आच्छादित एक दस नल्व* प्रमाणवाले रमणीय दिव्य सिंहासनपर आसीन था। वह विचित्र ढंगके आभूषणों और वस्त्रोंसे सुसज्जित तथा हजारों स्त्रियोंसे घिरा हुआ था। उसके कुण्डल बहुमूल्य मणियों और हीरेकी प्रभासे उद्भासित हो रहे थे। ऐसे उद्दीप्त कुण्डलोंसे विभूषित दैत्यराज हिरण्यकशिपु वहाँ विराजमान था। उस समय दिव्य गन्धसे युक्त परम सुखदायिनी वायु चल रही थी। परिचारकगण महादैत्य हिरण्यकशिपुकी सेवामें जुटे हुए थे। गन्धर्वश्रेष्ठ दिव्य तानद्वारा गीत अलाप रहे थे॥६६-७३ ।।

उस समय विश्वाची, सहजन्या, सुविख्यात प्रम्लोचा, दिव्या, सौरभेयी, समीची, पुंजिकस्थली, मिश्रकेशी, रम्भा, पवित्र मुसकानवाली चित्रलेखा, चारुकेशी, घृताची, मेनका तथा उर्वशी-ये तथा अन्य हजारों नाचने-गानेमें निपुण अप्सराएँ सामर्थ्यशाली दैत्यराज हिरण्यकशिपुकी सेवामें उपस्थित थीं।

*चार सौ हाथका या किसी-किसीके मतसे एक सौ हाथव का प्राचीन माप।

तत्रासीनं महाबाहुं हिरण्यकशिपुं प्रभुम्।

उपासते दितेः पुत्राः सर्वे लब्धवरास्तथा॥७७

तमप्रतिमकर्माणं शतशोऽथ सहस्त्रशः।

बलिर्विरोचनस्तत्र नरकः पृथिवीसुतः॥७८

प्रह्लादो विप्रचित्तिश्च गविष्ठश्च महासुरः ।

सुरहन्ता दुःखहन्ता सुनामा सुमतिर्वरः॥७९

घटोदरो महापार्श्वः क्रथन: पिठरस्तथा।

विश्वरूपः सुरूपश्च स्वबलश्च महाबलः ।। ८०

दशग्रीवश्च वाली च मेघवासा महासुरः।

घटास्योऽकम्पनश्चैव प्रजनश्चन्द्रतापनः॥ ८१

दैत्यदानवसङ्घाते सर्वे ज्वलितकुण्डलाः।

स्त्रग्विणोवाग्मिनः सर्वे सदैव चरितव्रताः॥८२

सर्वे लब्धवराः शूराः सर्वे विगतमृत्यवः ।

एते चान्ये च बहवो हिरण्यकशिपुं प्रभुम्।। ८३

उपासन्ति महात्मानं सर्वे दिव्यपरिच्छदाः।

विमानैर्विविधाकारैर्धाजमानैरिवाग्निभिः॥ ८४

महेन्द्रवपुषः सर्वे विचित्राङ्गदबाहवः।

भूषिताङ्गा दितेः पुत्रास्तमुपासन्त सर्वशः॥ ८५

तस्यां सभायां दिव्यायामसुराः पर्वतोपमाः।

हिरण्यवपुषः सर्वे दिवाकर समप्रभाः॥ ८६

न श्रुतं नैव दृष्टं हि हिरण्यकशिपोर्यथा।

ऐश्वर्यं दैत्यसिंहस्य यथा तस्य महात्मनः॥ ८७

कनकरजतचित्रवेदिकायां

परिहृतरत्नविचित्रवीथिकायाम् ।

स ददर्श मृगाधिपः सभायां

सुरचितरत्नगवाक्षशोभितायाम्॥ ८८

कनकविमलहारविभूषिताङ्गं

दितितनयं स मृगाधिपो ददर्श।

दिवसकरमहाप्रभाज्वलन्तं

दितिजसहस्रशतैर्निषेव्यमाणम् ॥८९

अनुपम कर्म करनेवाले सामर्थ्यशाली महाबाहु हिरण्यकशिपुके वहाँ विराजमान होनेपर वरप्राप्तिवाले सैकड़ों-हजारों दैत्य उसकी सेवा करते रहते थे। बलि, विरोचन, भूमि-पुत्र नरक, प्रह्लाद, विप्रचित्ति, महान् असुर गविष्ठ, सुरहन्ता, दुःखहन्ता, सुनामा, असुरश्रेष्ठ सुमति, घटोदर, महापार्श्व, क्रथन, पिठर, विश्वरूप, सुरूप, महाबली स्वबल, दशग्रीव, वाली, महान् असुर मेघवासा, घटास्य, अकम्पन, प्रजन और इन्द्रतापन-ये तथा इनके अतिरिक्त अन्य बहुत-से दैत्यों एवं दानवोंके समुदाय महान् आत्मबलसे सम्पन्न एवं सामर्थ्यशाली हिरण्यकशिपुकी सेवा कर रहे थे। उन सभीके कानोंमें चमकीले कुण्डल झलमला रहे थे और गलेमें माला शोभा पा रही थी। वे सभी बोलनेमें निपुण तथा सदा व्रतका पालन करनेवाले थे। वे सभी शूरवीर, वरदानसे सम्पन्न, मृत्युरहित और दिव्य वस्त्रोंसे विभूषित थे। वे अग्निके समान चमकीले विविध प्रकारके विमानोंसे सम्पन्न थे। उनके शरीर आभूषणोंसे विभूषित थे। उनकी भुजाओंपर विचित्र केयूर बँधा हुआ था और उनके शरीर महेन्द्रके समान सुन्दर थे। इस प्रकार वे दैत्य सब तरहसे हिरण्यकशिपुकी उपासना कर रहे थे। उस दिव्य सभामें बैठनेवाले सभी असुर पर्वतके समान विशालकाय थे। उनका शरीर स्वर्णके समान चमकीला था और उनकी कान्ति सूर्यके समान थी। महान् आत्मबलसे सम्पन्न उस दैत्यसिंह हिरण्यकशिपुका जैसा ऐश्वर्य था, वैसा न कभी देखा गया था और न सुना ही गया था॥७४-८७॥

जिसमें सुवर्ण और चाँदीकी सुन्दर वेदिकाएँ बनी थीं, रत्नजटित होनेके कारण जिसकी गलियाँ अत्यन्त मनोहर लग रही थीं और जो सुन्दर ढंगसे बनाये गये रत्नोंके झरोखोंसे सुशोभित थी। उस सभामें भगवान् नृसिंहने दितिनन्दन हिरण्यकशिपुको देखा, उसका शरीर स्वर्णनिर्मित विमल हारसे विभूषित था, वह सूर्यकी उत्कट प्रभाके समान उद्दीप्त हो रहा था और उसकी सैकड़ों-हजारों दैत्य सेवा कर रहे थे॥ ८८-८९ ।।

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे नारसिंहप्रादुर्भाये एकषष्टयधिकशततमोऽध्यायः ।। १६१॥

इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके नारसिंहप्रादुर्भावप्रसङ्गमें एक सौ एकसठवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥१६१ ॥