मत्स्य महा पुराण
स्नान और तर्पणकी विधि
नन्दिकेश्वर उवाच
नैर्मल्यं भावशुद्धिश्च विना स्नानं न विद्यते।
तस्मान्मनोविशुद्ध्यर्थं स्नानमादौ विधीयते॥१
नन्दिकेश्वर बोले-नारदजी! स्नान किये बिना शरीरकी निर्मलता और भाव-शुद्धि नहीं प्राप्त होती, अत: मनकी विशुद्धिके लिये (सभी व्रतोंमें) सर्वप्रथम स्नानका
१. स्वल्पान्तरसे ये सभी व्रत पद्मपुराण, सृष्टिखण्ड, अ० २०, श्लोक ४५ से १४४ तक तथा भविष्योत्तरपुराणके १२०वें अध्यायमें भी निर्दिष्ट हैं।
२. नानविधिकी विस्तृत चर्चा 'मानव्यास' में है। यह सुन्दर प्रकरण बृहद्व्यासादि स्मृतियोंमें भी संगृहीत है।
अनुद्धृतैरुद्धृतैर्वा जलैः स्नानं समाचरेत्।
तीर्थं प्रकल्पयेद् विद्वान् मूलमन्त्रेण मन्त्रवित्।
नमो नारायणायेति मन्त्र एष उदाहृतः॥ २
दर्भपाणिस्तु विधिना आचान्तः प्रयतः शुचिः।
चतुर्हस्तसमायुक्तं चतुरस्त्रं समन्ततः।
प्रकल्प्यावाहयेद् गङ्गामेभिर्मन्त्रैर्विचक्षणः॥ ३
विष्णुपादप्रसूतासि वैष्णवी विष्णुदेवता।
त्राहि नस्त्वेनसस्तस्मादाजन्ममरणान्तिकात्॥ ४
तिस्त्र: कोट्योऽर्धकोटी च तीर्थानां वायुरब्रवीत्।
दिवि भूम्यन्तरिक्षे च तानि ते सन्ति जाह्नवि॥ ५
नन्दिनीत्येव ते नाम देवेषु नलिनीति च।
दक्षा पृथ्वी च विहगा विश्वकायामृता शिवा॥ ६
विद्याधरी सुप्रसन्ना तथा विश्वप्रसादिनी।
क्षेमा च जाह्नवी चैव शान्ता शान्तिप्रदायिनी॥ ७
एतानि पुण्यनामानि स्नानकाले प्रकीर्तयेत् ।
भवेत् संनिहिता तत्र गङ्गा त्रिपथगामिनी॥ ८
सप्तवाराभिजप्तेन करसम्पुटयोजितम्।
मूर्ध्नि कुर्याज्जलं भूयस्त्रिचतुःपञ्चसप्तकम्।
स्नानं कुर्यान्मृदा तद्वदामन्त्र्य तु विधानतः॥ ९
अश्वक्रान्ते रथक्रान्ते विष्णुक्रान्ते वसुन्धरे।
मृत्तिके हर मे पापं यन्मया दुष्कृतं कृतम्॥१०
उद्धृतासि वराहेण कृष्णेन शतबाहुना।
मृत्तिके ब्रह्मदत्तासि कश्यपेनाभिमन्त्रिता।
आरुह्य मम गात्राणि सर्वं पापं प्रचोदय॥११*
मृत्तिके देहि नः पुष्टिं सर्वं त्वयि प्रतिष्ठितम् ।
नमस्ते सर्वलोकानां प्रभवारणि सुव्रते॥१२
विधान है। कुएँ आदिसे निकाले हुए अथवा बिना निकाले हुए नदी-तालाब आदिके जलसे स्नान करना चाहिये। मन्त्रवेत्ता विद्वान् पुरुषको मूलमन्त्रद्वारा उस जलमें तीर्थकी कल्पना करनी चाहिये। 'ॐ नमो नारायणाय'-यह मूलमन्त्र कहा गया है। मनुष्य पहले हाथमें कुश लिये हुए विधिपूर्वक आचमन कर ले, फिर जितेन्द्रिय एवं शुद्ध भावसे अपने चारों ओर चार हाथका चौकोर मण्डल बनाकर उसमें तीर्थकी कल्पना कर इन (वक्ष्यमाण) मन्त्रोंद्वारा गङ्गाजीका आवाहन करे-'देवि! तुम भगवान् विष्णुके चरणोंसे प्रकट हुई हो, वैष्णवी कही जाती हो और विष्णु ही तुम्हारे देवता हैं, अत: तुम जन्मसे लेकर मरणान्ततक होनेवाले पापसे हमारी रक्षा करो। जळुनन्दिनी! वायुदेवने स्वर्गलोक, मृत्युलोक और अन्तरिक्षलोक-इन तीनों लोकोंमें जिन साढ़े तीन करोड़ तीर्थोंको बतलाया है, वे सभी तुम्हारे भीतर निवास करते हैं। देवोंमें तुम नन्दिनी और नलिनी नामसे प्रसिद्ध हो। इसके अतिरिक्त दक्षा, पृथ्वी, विहगा, विश्वकाया, अमृता, शिवा, विद्याधरी, सुप्रशान्ता, विश्वप्रसादिनी, क्षेमा, जाह्नवी, शान्ता और शान्तिप्रदायिनी- ये भी तुम्हारे ही नाम हैं।' स्नानके समय इन पुण्यमय नामोंका कीर्तन करना चाहिये, इससे त्रिपथगामिनी गङ्गा वहाँ उपस्थित हो जाती हैं॥ १-८॥
हाथोंको सम्पुटित करके सात बार इन नामोंका जप करनेके पश्चात् तीन, चार, पाँच अथवा सात बार जलको अपने मस्तकपर छिड़क ले। तत्पश्चात् विधिपूर्वक पृथ्वीको आमन्त्रित करके पहले शरीरमें मिट्टी लगाकर स्नान करना चाहिये। (आमन्त्रण-मन्त्र इस प्रकार है)- 'मृत्तिके! तुम अग्निचयन, उख संभरणादिके समय अश्वके द्वारा शुद्ध की जाती हो, तुम (शिवके) रथ और वामन- अवतारमें भगवान् विष्णुके पैरद्वारा भी आक्रान्त होकर शुद्ध हुई हो, सारा धन तुम्हारे ही भीतर वर्तमान है, इसलिये मेरे द्वारा जो कुछ भी पाप घटित हुए हैं, उन सभीको हर लो। मृत्तिके! शतबाहु भगवान् विष्णुने श्यामवर्णका वराहरूप धारण कर तुम्हारा पातालसे उद्धार किया है, पुनः महर्षि कश्यपद्वारा आमन्त्रित होकर तुम ब्राह्मणोंको प्रदान की गयी हो, अत: मेरे अङ्गोंपर आरूढ़ होकर मेरे सारे पापोंको दूर कर दो। मृत्तिके! विश्वके सारे पदार्थ तो तुम्हारे भीतर ही स्थित हैं, अत: तुम हमें पुष्टि प्रदान करो। सुव्रते! तुम समस्त जीवोंकी उत्पत्तिके लिये अरणिस्वरूपा हो,
*ये दो मन्त्र तैत्तिरीयारण्यक १०।१३-२४ में भी प्राप्त हैं। उनपर सायणका भाष्य बहुत सुन्दर है।
एवं स्नात्वा ततः पश्चादाचम्य च विधानतः।
उत्थाय वाससी शुक्ले शुद्धे तु परिधाय वै॥१३
ततस्तु तर्पणं कुर्यात् त्रैलोक्याप्यायनाय वै।
ब्रह्माणं तर्पयेत्पूर्वं विष्णुं रुद्रं प्रजापतिम्॥१४
देवा यक्षास्तथा नागा गन्धर्वाप्सरसोऽसुराः ।
क्रूराः सर्पाः सुपर्णाश्च तरवो जम्बुकाः खगाः॥१५
वाय्वाधारा जलाधारास्तथैवाकाशगामिनः ।
निराधाराश्च ये जीवा: पापे धर्मे रताश्च ये॥१६
तेषामाप्यायनायैतद् दीयते सलिलं मया।
कृतोपवीती देवेभ्यो निवीती च भवेत् ततः॥१७
मनुष्यांस्तर्पयेद् भक्त्या ब्रह्मपुत्रानृषींस्तथा।
सनकश्च सनन्दश्च तृतीयश्च सनातनः ।। १८
कपिलश्चासुरिश्चैव वोढुः पञ्चशिखस्तथा।
सर्वे ते तृप्तिमायान्तु मद्दत्तेनाम्बुना सदा॥१९
मरीचिमत्र्यङ्गिरसं पुलस्त्यं पुलहं क्रतुम्।
प्रचेतसं वसिष्ठं च भृगु नारदमेव च।
देवब्रह्मऋषीन् सर्वांस्तर्पयेदक्षतोदकैः॥२०
अपसव्यं ततः कृत्वा सव्यं जान्वाच्य भूतले।
अग्निष्वात्तास्तथा सौम्या हविष्मन्तस्तथोष्मपाः ।। २१
सुकालिनो बर्हिषदस्तथा चैवाज्यपाः पुनः।
संताः पितरो भक्त्या सतिलोदकचन्दनैः॥ २२
यमाय धर्मराजाय मृत्यवे चान्तकाय च।
वैवस्वताय कालाय सर्वभूतक्षयाय च॥२३
औदुम्बराय दध्नाय नीलाय परमेष्ठिने।
वृकोदराय चित्राय चित्रगुप्ताय वै नमः।
दर्भपाणिस्तु विधिना पितॄन् संतर्पयेद् बुधः ॥ २४
पित्रादीन् नामगोत्रेण तथा मातामहानपि।
संतl विधिना भक्त्या इमं मन्त्रमुदीरयेत्॥ २५
येऽबान्धवा बान्धवा वा येऽन्यजन्मनि बान्धवाः।
ते तृप्तिमखिला यान्तु यश्चास्मत्तोऽभिवाञ्छति॥२६
तुम्हें नमस्कार है।' इस प्रकार मिट्टी लगाकर स्नान करनेके पश्चात् विधिपूर्वक आचमन करे। पुन: जलसे बाहर निकलकर दो श्वेत रंगके शुद्ध वस्त्र धारण करे। तत्पश्चात् त्रिलोकीको तृप्त करनेके लिये इस प्रकार तर्पण करना चाहिये। उस समय उपवीती होकर (जनेऊको जैसे पहनते हैं, बायें कंधेपर तथा दाहिने हाथके नीचे कर) सर्वप्रथम देवतर्पण करते हुए इन मन्त्रोंका उच्चारण करे-'देव, यक्ष, नाग, गन्धर्व, अप्सरा, असुर, क्रूर सर्प, गरुड आदि पक्षी, वृक्ष, शृगाल, अन्य पक्षिगण तथा जो जीव वायु एवं जलके आधारपर जीवित रहनेवाले हैं, आकाशचारी हैं, निराधार हैं और जो जीव पाप एवं धर्ममें लगे हुए हैं, उन सबकी तृप्तिके लिये मैं यह जल दे रहा हूँ।' तदनन्तर निवीती हो जाय (जनेऊको मालाकार कर लें)॥९-१७॥
फिर भक्तिपूर्वक मनुष्यों तथा ब्रह्मपुत्र ऋषियोंके तर्पणका विधान है-'सनक, सनन्दन, तीसरे सनातन, कपिल, आसुरि, वोढु तथा पञ्चशिख-ये सभी मेरे द्वारा दिये हुए जलसे सदा तृप्त हो जायँ।' तत्पश्चात् मरीचि, अत्रि, अङ्गिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, प्रचेता, वसिष्ठ, भृगु और नारद-इन सभी देवर्षियों और ब्रह्मर्षियोंका अक्षत और जलसे तर्पण करनेका विधान है। तदनन्तर अपसव्य होकर (जनेऊको दाहिने कंधेपर रखकर) और बायें घुटनेको भूमिपर टेककर अग्निष्वात्त, सौम्य, हविष्मान्, ऊष्मप, सुकाली, बर्हिषद् तथा अन्य आज्यप नामक पितरोंको भक्तिपूर्वक तिल, जल, चन्दन आदिसे तृप्त करना चाहिये। पुनः बुद्धिमान् मनुष्य हाथमें कुश लेकर यम, धर्मराज, मृत्यु, अन्तक, वैवस्वत, काल, सर्वभूतक्षय, औदुम्बर, दन, नील, परमेष्ठी, वृकोदर, चित्र और चित्रगुप्त-इन चौदह दिव्य पितरोंका विधिपूर्वक तर्पण करके इन्हें नमस्कार करे। तत्पश्चात् अपने पिता आदि तथा नाना आदिके नाम और गोत्रका उच्चारण कर भक्तिपूर्वक विधानके साथ तर्पण करनेके पश्चात् इस मन्त्रका उच्चारण करे–'जो लोग इस जन्ममें मेरे भाई-बन्धु रहे हों या इनके अतिरिक्त कुटुम्बमें पैदा हुए हों अथवा जन्मान्तरमें भाई-बन्धु रहे हों तथा जो कोई भी मुझसे जलकी इच्छा रखते हों, वे सभी पूर्णतया तृप्त हो जायँ' ॥१८-२६ ॥
ततश्चाचम्य विधिवदालिखेत् पद्ममग्रतः।
अक्षताभिः सपुष्पाभिः सजलारुणचन्दनम्।
अर्घ्यं दद्यात् प्रयत्नेन सूर्यनामानि कीर्तयेत्।। २७
नमस्ते विष्णुरूपाय नमो विष्णुमुखाय वै।
सहस्त्ररश्मये नित्यं नमस्ते सर्वतेजसे॥ २८
नमस्ते रुद्रवपुषे नमस्ते सर्ववत्सल।
जगत्स्वामिन् नमस्तेऽस्तु दिव्यचन्दनभूषित॥२९
पद्मासन नमस्तेऽस्तु कुण्डलाङ्गदभूषित।
नमस्ते सर्वलोकेश जगत् सर्वं विबोधसे॥३०
सुकृतं दुष्कृतं चैव सर्वं पश्यसि सर्वग।
सत्यदेव नमस्तेऽस्तु प्रसीद मम भास्कर॥३१
दिवाकर नमस्तेऽस्तु प्रभाकर नमोऽस्तु ते।
एवं सूर्यं नमस्कृत्य त्रिःकृत्वाथ प्रदक्षिणम्।
द्विजं गां काञ्चनं स्पृष्ट्वा ततश्च स्वगृहं व्रजेत्॥ ३२
तदुपरान्त विधिपूर्वक आचमनकर अपने सामनेकी भूमिपर कमलका चित्र बनाकर अक्षत, पुष्प आदिसे सूर्यकी पूजा करे और प्रयत्नपूर्वक सूर्यके नामोंका कीर्तन करते हुए लाल चन्दनमिश्रित जलसे उन्हें अर्घ्य प्रदान करे। पुनः इस प्रकार प्रार्थना करे–'सूर्यदेव! आप विष्णुरूप हैं, आपको नमस्कार है। विष्णुके मुखस्वरूप आपको प्रणाम है। सहस्रकिरणधारी एवं समस्त तेजोंके धामको नित्य अभिवादन है। सर्वेश्वर! दिव्य चन्दनसे विभूषित देव! आप रुद्र (शिव)-रूप हैं। आप सम्पूर्ण जीवोंके कल्याणकारक तथा उनके प्रति पुत्रवत् प्रेमभाव रखनेवाले हैं, आपको बारम्बार नमस्कार है। पद्मासन! आप सदा कुण्डल और बाजूबंदसे सुसज्जित रहते हैं, आपको अभिवादन है। समस्त लोकोंके अधीश्वर! आप सारे जगत्को उद्बुद्ध करनेवाले हैं, आपको नमस्कार है। सर्वत्र गमन करनेवाले सत्यदेव! आप सम्पूर्ण प्राणियोंके सारे पुण्यों एवं पापोंको देखते रहते हैं, आपको प्रणाम है। भास्कर! मुझपर प्रसन्न हो जाइये। दिवाकर! आपको अभिवादन है। प्रभाकर! आपको नमस्कार है।' इस प्रकार प्रार्थना करनेके बाद तीन बार प्रदक्षिणा कर सूर्यको नमस्कार करे। पुनः ब्राह्मण, गौ और सुवर्णका स्पर्श करनेके पश्चात् अपने घर जाना चाहिये॥२७-३२॥
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे स्नानविधिर्नाम द्वयधिकशततमोऽध्यायः ।। १०२॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें स्नानविधि नामक एक सौ दोवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥१०२।।
Summary of chapter 102 of the Matsya Mahā Purana is as follows:
Bhagavān Matsya expounds upon the extraordinary spiritual fruits achieved by taking holy baths at Prayāga, particularly during the sacred month of Māgha when all celestial Deities, Rishis, Gandharvas, and sacred waters assemble at the holy Saṅgama. Bhagavān Matsya describes how the pale waters of Gaṅgā merge with the dark blue waters of Yamunā, creating a divine stream that bestows immediate liberation upon devout bathers. Performing ritual bathing, offering water libations to ancestors and Devas, and observing vows of purity at Prayāga ensures that a devotee cleanses seven generations of maternal and paternal ancestors from hellish conditions, elevating them directly to the celestial abodes of Brahmāloka and Vishṇuloka.