मत्स्य महा पुराण
वृष्णिवंशके वर्णन-प्रसङ्गमें स्यमन्तकमणिकी कथा
सूत उवाच
गान्धारी चैव माद्री च वृष्णिभार्ये बभूवतुः।
गान्धारी जनयामास सुमित्रं मित्रनन्दनम्॥१
माद्री युधाजितं पुत्रं ततो वै देवमीढुषम्।
अनमित्रं शिबिं चैव पञ्चमं कृतलक्षणम्॥२
अनमित्रसुतो निघ्नो निघ्नस्यापि तु द्वौ सुतौ।
प्रसेनश्च महावीर्यः शक्तिसेनश्च तावुभौ ॥३
स्यमन्तकः
प्रसेनस्य मणिरत्नमनुत्तमम्।
पृथिव्यां सर्वरत्नानां राजा वै सोऽभवन्मणिः॥४
हृदि कृत्वा तु बहुशो मणिं तमभियाचितः।
गोविन्दोऽपि न तं लेभे शक्तोऽपि न जहार सः॥५
कदाचिन्मृगयां यातः प्रसेनस्तेन भूषितः ।
यथाशब्दं स शुश्राव बिले सत्त्वेन पूरिते॥६
सूतजी कहते हैं-ऋषियो! (अब आपलोग सात्त्वतके कनिष्ठ पुत्र वृष्णिका वंश-वर्णन सुनिये।) गान्धारी और माद्री-ये दोनों वृष्णिकी पत्नियाँ हुईं। उनमें गान्धारीने सुमित्र और मित्रनन्दन नामक दो पुत्रोंको तथा माद्रीने युधाजित्, तत्पश्चात् देवमीढुष, अनमित्र, शिबि और पाँचवें कृतलक्षण नामक पुत्रोंको जन्म दिया। अनमित्रका पुत्र निघ्न हुआ और निघ्नके महान् पराक्रमी प्रसेन और शक्तिसेन नामक दो पुत्र हुए। इसी प्रसेनके पास स्यमन्तक नामक सर्वश्रेष्ठ मणिरत्न था। वह मणिरत्न भूतलपर समस्त रत्नोंका राजा था। भगवान् श्रीकृष्णने भी अनेकों बार मनमें उसे प्राप्त करनेकी इच्छा करके प्रसेनसे याचना की, परंतु वे उसे प्राप्त न कर सके। साथ ही समर्थ होनेपर भी उन्होंने उसका अपहरण भी नहीं किया। एक बार प्रसेन उस मणिसे विभूषित हो शिकार खेलनेके लिये वनमें गया। वहाँ उसने एक बिल (गुफा)-में, जिसका स्वामी जीव उसमें विद्यमान था, होनेवाले कोलाहलको सुना।
ततः प्रविश्य स बिलं प्रसेनो क्षमैक्षत।
ऋक्षः प्रसेनं च तथा ऋक्षं चैव प्रसेनजित्॥ ७
हत्वा ऋक्षः प्रसेनं तु ततस्तं मणिमाददात्।
अदृष्टस्तु
हतस्तेन अन्तर्बिलगतस्तदा॥८
प्रसेनं तु हतं ज्ञात्वा गोविन्दः परिशङ्कितः।
गोविन्देन हतो व्यक्तं प्रसेनो मणिकारणात्॥ ९
प्रसेनस्तु गतोऽरण्यं मणिरत्नेन भूषितः।
तं दृष्ट्वा स हतस्तेन गोविन्दः प्रत्युवाच ह।
हन्मि चैनं दुराचारं शत्रुभूतं हि वृष्णिषु॥१०
अथ दीर्घेण कालेन मृगयां निर्गतः पुनः।
यदृच्छया च गोविन्दो बिलस्याभ्याशमागमत्॥११
तं दृष्ट्वा तु महाशब्दं स चक्रे ऋक्षराड् वली।
शब्दं श्रुत्वा तुगोविन्दः खड्गपाणिः प्रविश्य सः।
अपश्यज्जाम्बवन्तं तमृक्षराजं महाबलम्॥१२
ततस्तूर्णं हृषीकेशस्तमृक्षपतिमञ्जसा।
जाम्बवन्तं स जग्राह क्रोधसंरक्तलोचनः॥१३
तुष्टावैनं तदा ऋक्षः कर्मभिर्वैष्णवैः प्रभुम्।
ततस्तुष्टस्तु भगवान् वरेणैनमरोचयत्॥१४
जाम्बवानुवाच
इच्छे चक्रप्रहारेण त्वत्तोऽहं मरणं प्रभो।
कन्या चेयं मम शुभा भर्तारं त्वामवाप्नुयात्।
योऽयं मणिः प्रसेनं तु हत्वा प्राप्तो मया प्रभो॥१५
ततः स जाम्बवन्तं तं हत्वा चक्रेण वै प्रभुः।
कृतकर्मा महाबाहुः सकन्यं मणिमाहरत्॥ १६
ददौ सत्राजितायै तं सर्वसात्त्वतसंसदि।
तेन मिथ्यापवादेन संतप्तोऽयं जनार्दनः ॥१७
ततस्ते यादवाः सर्वे वासुदेवमथाब्रुवन्।
अस्माकं तु मतिासीत् प्रसेनस्तु त्वया हतः॥१८
कुतूहलवश प्रसेनने उसमें प्रवेश करके एक रीछको देखा। फिर तो रीछकी दृष्टि प्रसेनपर और प्रसेनकी दृष्टि रीछपर पड़ी। (तत्पश्चात् दोनोंमें युद्ध छिड़ गया।) रीछने प्रसेनको मारकर वह मणि ले ली। बिलके भीतर प्रविष्ट हुआ प्रसेन रीछद्वारा मार डाला गया, इसलिये उसे कोई देख न सका। इधर प्रसेनको मारा गया जानकर भगवान् श्रीकृष्णको आशङ्का हो गयी कि लोग स्पष्टरूपसे कहते होंगे कि मणि लेनेके लिये श्रीकृष्णने ही प्रसेनका वध किया है। ऐसी किंवदन्तीके फैलनेपर भगवान् गोविन्दने उत्तर दिया कि 'उस मणिरत्रको धारण करके प्रसेन वनमें गया था, उसे देखकर (मणिको हथियानेके लिये) किसीके द्वारा (सम्भवत:) वह मार डाला गया है। अतः वृष्णिवंशके शत्रुरूप उस दुराचारीका मै वध करूँगा।' तदनन्तर दीर्घकालके पश्चात् आखेटके लिये निकले हुए भगवान् श्रीकृष्ण इच्छानुसार भ्रमण करते हुए उसी बिल (गुफा)-के निकट जा पहुंचे। उन्हें देखकर महाबली रीछराजने उच्चस्वरसे गर्जना की। उस शब्दको सुनकर भगवान् गोविन्द हाथमें तलवार लिये हुए उस बिलमें घुस गये। वहाँ उन्होंने उन महाबली रीछराज जाम्बवान्को देखा। तब जिनके नेत्र क्रोधसे लाल हो गये थे, उन हृषीकेश श्रीकृष्णने शीघ्र ही रीछराज जाम्बवान्को वेगपूर्वक अपने वशमें कर लिया। उस समय रीछराजने विष्णुसम्बन्धी स्तोत्रोंद्वारा उन प्रभुका स्तवन किया। उससे संतुष्ट होकर भगवान् श्रीकृष्णने जाम्बवान्को भी वरप्रदानद्वारा प्रसन्न कर दिया ॥ १-१४॥
जाम्बवान्ने कहा-प्रभो! मेरी अभिलाषा है कि मैं आपके चक्र-प्रहारसे मृत्युको प्राप्त होऊँ। यह मेरी सौन्दर्यशालिनी कन्या आपको पतिरूपमें प्राप्त करे। प्रभो! यह मणि, जिसे मैंने प्रसेनको मारकर प्राप्त किया है, आपके ही पास रहे। तत्पश्चात् सामर्थ्यशाली एवं महाबाहु श्रीकृष्णने अपने चक्रसे उन जाम्बवान्का वध करके कृतकृत्य हो कन्यासहित मणिको ग्रहण कर लिया। घर लौटकर भगवान् जनार्दनने समस्त सात्वतोंकी भरी सभामें वह मणि सत्राजित्को समर्पित कर दी;क्योंकि वे उस मिथ्यापवादसे अत्यन्त दुःखी थे। उस समय सभी यदुवंशियोंने वसुदेव- नन्दन श्रीकृष्णसे यों कहा-'श्रीकृष्ण! हमलोगोंका तो यह दृढ़ निश्चय था कि प्रसेन तुम्हारे ही हाथों मारा गया है।
१. अन्य भागवत, विष्णु आदि पुराणोंके अनुसार सिंहने प्रसेनको और जाम्बवान्ने सिंहको मारा है। परिष्कारदृष्ट्या मत्स्यपुराणकी भागवतादिसे पूर्व स्थिति सिद्ध होती है।
२. यह कथा प्राय: कल्किपुराणसे मिलती है। शेष अन्य भागवत, विष्णु आदि पुराणों में जाम्बवान् कन्या-दान करनेके बाद भी जीवित ही रहते हैं। कल्किपुराणके अन्तमें जाम्बवान् तथा शशविन्दुकी ऐसी स्थिति हुई है।
कैकेयस्य सुता भार्या दश सत्राजितः शुभाः।
तासूत्पन्नाः सुतास्तस्य शतमेकं तु विश्रुताः।
ख्यातिमन्तो महावीर्या भङ्गकारस्तु पूर्वजः ॥ १९
अथ व्रतवती तस्माद् भङ्गकारात् तु पूर्वजात्।
सुषुवे सुकुमारीस्तु तिस्रः कमललोचनाः॥२०
सत्यभामा वरा स्त्रीणां व्रतिनी च दृढव्रता।
तथा पद्मावती चैव ताश्च कृष्णाय सोऽददात्॥ २१
अनमित्राच्छिनिर्जज्ञे कनिष्ठाद् वृष्णिनन्दनात्।
सत्यकस्तस्य पुत्रस्तु सात्यकिस्तस्य चात्मजः ॥२२
सत्यवान् युयुधानस्तु शिनेर्नप्ता प्रतापवान्।
असङ्गो युयुधानस्य धुम्निस्तस्यात्मजोऽभवत्॥ २३
द्युम्नेर्युगंधर: पुत्र इति शैन्या: प्रकीर्तिताः।
अनमित्रान्वयो ह्येष व्याख्यातो वृष्णिवंशजः॥ २४
अनमित्रस्य संजज्ञे पृथ्व्यां वीरो युधाजितः ।
अन्यौ तु तनयौ वीरौ वृषभः क्षत्र एव च॥ २५
वृषभः काशिराजस्य सुतां भार्यामविन्दत।
जयन्तस्तु जयन्त्यां तु पुत्रः समभवच्छुभः ॥ २६
सदायज्ञोऽतिवीरश्च श्रुतवानतिथिप्रियः।
अक्रूरः सुषुवे तस्मात् सदायज्ञोऽतिदक्षिणः ॥ २७
रत्ना कन्या च शैब्यस्य अक्रूरस्तामवाप्तवान्।
पुत्रानुत्पादयामास त्वेकादश महाबलान्॥ २८
उपलम्भः सदालम्भो वृकलो वीर्य एव च।
सवीतरः सदापक्षः शत्रुघ्नो वारिमेजयः॥ २९
धर्मभृद् धर्मवर्माणो धृष्टमानस्तथैव च।
सर्वे च प्रतिहोतारो रत्नायां जज्ञिरे च ते॥३०
अक्रूरादुग्रसेनायां सुतौ द्वौ कुलवर्धनौ।
देववानुपदेवश्च जज्ञाते देवसंनिभौ॥३१
अश्चिन्यां च ततः पुत्राः पृथुर्विपृथुरेव च।
अश्वत्थामा सुबाहुश्च सुपार्श्वकगवेषणौ॥३२
वृष्टिनेमिः सुधर्मा च तथा शर्यातिरेव च।
अभूमिवर्जभूमिश्च श्रमिष्ठः श्रवणस्तथा ॥ ३३
इमां मिथ्याभिशस्ति यो वेद कृष्णादपोहिताम्।
नस मिथ्याभिशापेन अभिशाप्योऽथ केनचित्॥३४
केकयराजकी दस सौन्दर्यशालिनी कन्याएँ सत्राजित्की पत्रियाँ थीं। उनके गर्भसे सत्राजित्के एक सौ पुत्र उत्पन्न हुए थे, जो विश्वविख्यात, प्रशंसित एवं महान् पराक्रमी थे। उनमें भंगकार ज्येष्ठ था। उस ज्येष्ठ भंगकारके संयोगसे व्रतवतीने तीन कमलनयनी सुकुमारी कन्याओंको जन्म दिया। उनके नाम हैं-स्त्रियोंमें सर्वश्रेष्ठ सत्यभामा, दृढव्रतपरायणा व्रतिनी तथा पद्मावती। भंगकारने इन तीनोंको पनीरूपमें श्रीकृष्णको प्रदान किया था। कनिष्ठ वृष्णिनन्दन अनमित्रसे शिनिका जन्म हुआ। उसका पुत्र सत्यक और सत्यकका पुत्र सात्यकि हुआ। सत्यवान् और प्रतापी युयुधान- -ये दोनों शिनिके नाती थे। युयुधानका पुत्र असंग और उसका पुत्र धुम्नि हुआ। धुम्निका पुत्र युगंधर हुआ। इस प्रकार यह शिनि-वंशका वर्णन किया गया॥१५-२३॥
अब मैं वृष्णि-वंशमें उत्पन्न अनमित्रके वंशका वर्णन कर रहा हूँ। अनमित्रकी दूसरी पत्नी पृथ्वीके गर्भसे वीरवर युधाजित् पैदा हुए। उनके वृषभ और क्षत्र नामवाले दो अन्य शूरवीर पुत्र थे। वृषभने काशिराजकी जयन्ती नामकी कन्याको पत्नीरूपमें प्राप्त (ग्रहण) किया। उन्हें उस जयन्तीके गर्भसे जयन्त नामक अत्यन्त सुन्दर पुत्र प्राप्त हुआ, जो सदा यज्ञानुष्ठानमें निरत रहनेवाला, महान् शूरवीर, शास्त्रज्ञ तथा अतिथियोंका प्रेमी था। उससे अक्रूर नामक पुत्रकी उत्पत्ति हुई। वह भी आगे चलकर सदा यज्ञानुष्ठानशील और विपुल दक्षिणा देनेवाला हुआ। शिवि- नरेशकी एक रत्ना नामकी कन्या थी, जिसे अक्रूरने पत्नीरूपमें प्राप्त किया और उसके गर्भसे ग्यारह महाबली पुत्रोंको उत्पन्न किया। उनके नाम इस प्रकार हैं-उपलम्भ, सदालम्भ, वृकल, वीर्य, सविता, सदापक्ष, शत्रुघ्न, वारिमेजय, धर्मभृद्, धर्मवर्मा और धृष्टमान। रत्नाके गर्भसे उत्पन्न हुए ये सभी पुत्र यज्ञादि शुभ कर्म करनेवाले थे। अक्रूरके संयोगसे उग्रसेनाके गर्भसे देववान् और उपदेव नामक दो पुत्र और उत्पन्न हुए थे, जो देवताके सदृश शोभाशाली और वंश-विस्तारक थे। उन्हींकी दूसरी पत्नी अश्विनीके गर्भसे पृथु, विपृथु, अश्वत्थामा, सुबाहु, सुपार्श्वक, गवेषण, वृष्टिनेमि, सुधर्मा, शर्याति, अभूमि, वर्जभूमि, श्रमिष्ठ तथा श्रवण-ये तेरह पुत्र भी पैदा हुए थे। जो मनुष्य श्रीकृष्णके शरीरसे हटाये गये इस मिथ्यापवादको जानता है, वह किसीके भी द्वारा मिथ्याभिशापसे अभिशप्त नहीं किया जा सकता॥२४-३४॥
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे सोमवंशो नाम पञ्चचत्वारिंशोऽध्यायः॥४५॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके सोमवंश-वर्णनमें पैंतालीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ४५ ॥
Summary of chapter 45 of the Matsya Mahā Purana is as follows:
Bhagavān Matsya details the main branches of the Yadu dynasty that expanded into the Sātvata, Andhaka, and Vṛshṇi clans across western and central India. The chapter chronicles the noble lineage of Sātvata and his sons Bhajamāna, Devāvṛdha, Andhaka, and Vṛshṇi, highlighting their extraordinary commitment to truth, sacrificial rites, and charity. Devāvṛdha was celebrated for his spiritual perfection, and his son Babhru was hailed as the greatest among men, under whose protection no citizen suffered disease or premature death. The text documents the heroic figures of the Andhaka branch, including Ugrasena and Kamsa, setting the historical lineage for upcoming divine events.