हेमधरा (सुवर्णमयी पृथ्वी)-दानकी विधि

मत्स्य उवाच

अथातः सम्प्रवक्ष्यामि धरादानमनुत्तमम्।

पापक्षयकरं नृणाममङ्गल्यविनाशनम्॥ १

कारयेत् पृथिवीं हैमी जम्बूद्वीपानुकारिणीम्।

मर्यादापर्वतवती मध्ये मेरुसमन्विताम्॥ २

लोकपालाष्टकोपेतां नववर्षसमन्विताम्।

नदीनदसमोपेतां सप्तसागरवेष्टिताम्॥ ३

महारत्नसमाकीर्णा वसुरुद्रार्कसंयुताम्।

हेम्नः पलसहस्त्रेण तदर्धनाथ शक्तितः॥ ४

शतत्रयेण वा कुर्याद् द्विशतेन शतेन वा।

कुर्यात् पञ्चपलादूर्ध्वमशक्तोऽपि विचक्षणः॥ ५

तुलापुरुषवत् कुर्याल्लोकेशावाहनं बुधः।

ऋत्विङ्मण्डपसम्भारभूषणाच्छादनादिकम् ॥ ६

वेद्यां कृष्णाजिनं कृत्वा तिलानामुपरि न्यसेत्।

तथाष्टादशधान्यानि रसांश्च लवणादिकान्॥ ७

तथाष्टौ पूर्णकलशान् समन्तात् परिकल्पयेत्।

वितानकं च कौशेयं फलानि विविधानि च॥ ८

तथांशुकाणि रम्याणि श्रीखण्डशकलानि च।

इत्येवं कारयित्वा तामधिवासनपूर्वकम्॥ ९

शुक्लमाल्याम्बरधरः शुक्लाभरणभूषितः।

प्रदक्षिणं ततः कृत्वा गृहीतकुसुमाञ्जलिः॥१०

पुण्यं कालमथासाद्य मन्त्रानेतानुदीरयेत्।

नमस्ते सर्वदेवानां त्वमेव भवनं यतः॥११

धात्री च सर्वभूतानामतः पाहि वसुंधरे।

वसु धारयसे यस्माद् वसु चातीव निर्मलम्॥१२

वसुंधरा ततो जाता तस्मात् पाहि भयादलम्।

चतुर्मुखोऽपि नो गच्छेद् यस्मादन्तं तवाचले॥१३

मत्स्यभगवान्ने कहा-अब इसके बाद मैं मनुष्योंके अमङ्गल और पापको नष्ट करनेवाले सर्वश्रेष्ठ हेमधरादानका वर्णन कर रहा हूँ। दानी इस दानमें जम्बूद्वीपके आकारकी भाँति सुवर्णमयी पृथ्वीकी रचना करवाये, वह मध्यमें सुमेरुपर्वतसे युक्त, मर्यादापर्वतोंसे सम्पन्न तथा आठ लोकपालों, नौ वर्षों, नदियों और नदोंसे युक्त हो, सातों सागरोंसे घिरी हुई हो। उसे बहुमूल्य रत्नोंसे जटित तथा वसु, रुद्र और आदित्योंसे युक्त कर दे। इस पृथ्वीको अपनी शक्तिके अनुसार एक हजार, पाँच सौ, तीन सौ, दो सौ या एक सौ पल सोनेका बनवाना चाहिये। विचक्षण पुरुष अपनी असमर्थतामें इसे पाँच पलसे अधिक स्वर्णसे भी बनवा सकता है। बुद्धिमान् पुरुष तुलापुरुष-दानकी भाँति लोकपालोंका आवाहन तथा ऋत्विज्, मण्डप, पूजनसामग्री, आभूषण और आच्छादन आदिका संकलन करे। फिर वेदीपर कृष्णमृगचर्म फैलाकर उसके ऊपर रखी हुई तिलराशिपर पृथ्वीकी प्रतिमा स्थापित कर दे। तत्पश्चात् उसके चारों ओर अठारह प्रकारके अन्नों, लवणादि रसों और जलसे भरे आठ माङ्गलिक कलशोंको स्थापित करना चाहिये। उसे रेशमी चँदोवा, विविध प्रकारके फल, मनोहर रेशमी वस्त्र और चन्दनोंके टुकड़ोंसे अलंकृत करना चाहिये। इस प्रकार अधिवासनपूर्वक पृथ्वीका सारा कार्य सम्पन्नकर स्वयं श्वेत वस्त्र और पुष्पमाला धारणकर, श्वेत वर्णके आभूषणोंसे विभूषित हो अञ्जलिमें पुष्प लेकर प्रदक्षिणा करे तथा पुण्यकाल आनेपर इन मन्त्रोंका उच्चारण करे॥१-१०॥

'वसुंधरे! चूँकि तुम्हीं सभी देवताओं तथा सम्पूर्ण जीवनिकायकी भवनभूता तथा धात्री हो, अतः मेरी रक्षा करो। तुम्हें नमस्कार है। चूँकि तुम सभी प्रकारके भवनों, उनमें वास करनेवाले प्राणियों तथा अत्यन्त निर्मल रत्नोंको भी धारण करती हो, इसीसे तुम्हारा वसुंधरा नाम है, तुम संसार-भयसे मेरी रक्षा करो। अचले! चूँकि ब्रह्मा भी तुम्हारे अन्तको नहीं प्राप्त कर सकते,

अनन्तायै नमस्तस्मात् पाहि संसारकर्दमात्।

त्वमेव लक्ष्मी गोविन्दे शिवे गौरीति चास्थिता॥१४

गायत्री ब्रह्मणः पार्श्वे ज्योत्स्ना चन्द्रे रवौ प्रभा।

बुद्धिबृंहस्पतौ ख्याता मेधा मुनिषु संस्थिता॥१५

विश्वं व्याप्य स्थिता यस्मात्ततो विश्वम्भरा स्मृता।

धृतिः स्थितिः क्षमा क्षोणी पृथ्वी वसुमती रसा॥१६

एताभिर्मूर्तिभिः पाहि देवि संसारसागरात्।

एवमुच्चार्य तां देवीं ब्राह्मणेभ्यो निवेदयेत्॥१७

धरार्धं वा चतुर्भागं गुरवे प्रतिपादयेत्।

शेषं चैवाथ ऋत्विग्भ्यः प्रणिपत्य विसर्जयेत्॥१८

अनेन विधिना यस्तु दद्याद्धेमधरां शुभाम्।

पुण्यकाले तु सम्प्राप्ते स पदं याति वैष्णवम्॥१९

विमानेनार्कवर्णेन किङ्किणीजालमालिना।

नारायणपुरं गत्वा कल्पत्रयमथावसेत्।

पितॄन् पुत्रांश्च पौत्रांश्च तारयेदेकविंशतिम्॥२०

इति पठति य इत्थं यः शृणोति प्रसङ्गा-

दपि कलुषवितानैर्मुक्तदेहः समन्तात्।

दिवममरवधूभिर्याति सम्प्रार्थ्यमानो

पदममरसहस्त्रैः सेवितं चन्द्रमौलेः॥२१

इसलिये तुम अनन्ता हो, तुम्हें प्रणाम है। तुम इस संसाररूप कीचड़से मेरी रक्षा करो। तुम्हीं विष्णुमें लक्ष्मी, शिवमें गौरी, ब्रह्माके समीप गायत्री, चन्द्रमामें ज्योत्स्ना, रविमें प्रभा, बृहस्पतिमें बुद्धि और मुनियोंमें मेधा नामसे ख्यात हो। चूँकि तुम समस्त विश्वमें व्याप्त हो, इसलिये विश्वम्भरा कही जाती हो। धृति, स्थिति, क्षमा, क्षोणी, पृथ्वी, वसुमती तथा रसा-ये तुम्हारी मूर्तियाँ हैं। देवि! तुम अपनी इन मूर्तियोंद्वारा इस संसारसागरसे मेरी रक्षा करो।' इस प्रकार उच्चारणकर पृथ्वीकी मूर्तिको ब्राह्मणोंको निवेदित कर दे। उस पृथ्वीका आधा अथवा चौथाई भाग गुरुको समर्पित करे। शेष भाग ऋत्विजोंको देकर उन्हें नमस्कार कर विसर्जन करे। जो मनुष्य पुण्यकाल आनेपर सुवर्णनिर्मित कल्याणमयी पृथ्वीका इस विधिके साथ दान करता है, वह वैष्णव पदको प्राप्त होता है तथा क्षुद्रघंटिकाओं (घुघरू)-से सुशोभित एवं सूर्यके समान तेजस्वी विमानद्वारा वैकुण्ठमें जाकर तीन कल्पपर्यन्त निवास करता है और इक्कीस पीढ़ियोंके पितरों, पुत्रों तथा पौत्रोंका उद्धार कर देता है। इस प्रकार जो मनुष्य इस विधिको प्रसङ्गवश भी पढ़ता अथवा श्रवण करता है, उसका शरीर सर्वथा पापसमूहोंसे मुक्त हो जाता है और वह स्वर्गलोकमें देवाङ्गनाओंद्वारा प्रार्थित होता हुआ सहस्रों देवताओंद्वारा सेवित शंकरजीके लोकको प्राप्त होता है॥११-२१॥

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे महादानानुकीर्तने हेमपृथिवीदानमाहात्म्यं नाम चतुरशीत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः॥२८४॥

इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें महादान-प्रसङ्गमें हेम-पृथ्वीदान- माहात्म्य नामक दो सौ चौरासीवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २८४॥